नवम्बर-2017

मेरी पसन्दसृजन तो सदैव शास्त्र का अतिक्रमण करता है     Posted: March 1, 2017

         किसी भी विधा को परिभाषित एवं विशेषताओं से लक्षित करना कठिन है ,क्योंकि जिन तत्वों से गढ़ते हैं; रचनाएँ उनका अतिक्रमण कर जाती हैं ।वे ऑटोमेटिक को ध्वस्त कर नयेपन पर हस्ताक्षर करती हैं ।मेरे लिए लघुकथा एक पूरा वाक्य है ,इसीलिए मैं उसकी बनावट और बुनावट से गुजरते हुए लक्ष्यार्थ को जीवन के यथार्थ और मूल्यों के साथ रख देता हूँ। भाषा की सारी इकाइयाँ, यथार्थ के कितने ही रूप, कथात्मक संरचना के कितने ही मोड़ ,द्वंद्वात्मकता की क्रियापरकता और पहले वाक्य से अंतिम वाक्य तक संरचनात्मक विन्यास अपनी अर्थ -व्यंजकता को छिटकाते हैं।शैली चाहे आत्मपरक हो, विवरणात्मक हो ,पंचतंत्रीय  या फैंटेसीनुमा हो, सपाट हो या कोलाजनुमा: पर वह लघुकथा को व्यंजना के  मुकाम तक पाठक को कैसे सहयात्री बना लेती है ,यही उसकी खूबी है ।यों भी रचनाओं से शास्त्रीयता उपजती है ,फिर वह रचना की नाप में सहायक हो जाती है ।पर सृजन तो सदैव शास्त्र का अतिक्रमण करता है। इसलिए शास्त्रीय प्रतिमानों की समझ के साथ नये सृजन को उसके नयेपन और आंतरिक बनावट से पहचानना जरूरी है।

हिंदी लघुकथा ने ग्लोबल तक अपने नन्हें कदम फैलाए हैं ,पर उसकी आंचलिक एवं जातीय विशिष्टता  एक खास पहचान रखती है। हमारी सामाजिक संरचना आज भी सारे तापों- अनुतापों स्वार्थों और विभाजक रेखाओं के बीच उन मूल्य -मानकोंऔर मानवीय रसायनों को अपने भीतर जीती है ;जो थर्मामीटर के लाल निशान के इर्द-गिर्द ही होते हैं ।उपेंद्र प्रसाद राय की लघुकथा-‘ एक गरम रात’  का  गरम ‘विशेषण मानवीय संवेदन की वही ऊष्मा है ,जो भिखारीपन में भी संवेदना का सुखद एहसास कराती है ।बर्फीली  रात में धकियाकर सेठ द्वारा बाँटे गये  कंबल को किसी भिखारिन की बच्ची की तपती देह पर ओढ़ाकर और अपनी भूख की दो रोटियों को भिखारिन रामकली को देकर वह बूढ़ा भिखारी संवेदना के उस मूल्य को व्यंजक बना देता है ;जो सभ्यता के रंगों में लिपी-पुती दुनिया के सामने सवालिया एहसास है। और बात केवल संवेदन की नहीं संवेदना की कथात्मक बुनावट की भी है। यह कथा -भूमि आंचलिक बोली की माँग करती है। संवेदना के विरोधी सादृश्यों के बीच उभरते मानवीय परस को सँजोने के संवादीपन की माँग करती है । बरफ की रात में कंबल के नीचे मिलनेवाली सुखद ऊष्मा का एहसास कराती है और मानवीय सहचार से उपजे रिश्तों के अपनेपन में कंबल के त्याग से  पाठक के संवेदन को पिघला देती है ।कथाकार एहसासों की भाषा को भी गढ़ता हैऔर सहकार के अंदरुनी भावों को भी संवादी बनाता बनाता है।वह भिखारी चरित्र अपनी आस्थाओं को भी बच्ची के अच्छे होने की कामना से सान देता है। भिखारी के हाथ में नया-‘ कंबल एक स्वर्ग है’  , बर्फीली रात में कंबल के नीचे मिलने वाली सुखद ऊष्मा भिखारियत में वैयक्तिक सुख का एहसास है ।”देह छूबी ……कत्ते जली रह लो छय में भिखारिन माँ की पीड़ा है। ‘भगवान से अनुनय की     ,धोती के छोर से बँधी दो रोटियाँ रामकली को थमाई ‘में आस्था और कर्तव्य का संवेदन है ।रिश्ताविहीन रिश्तों  का यह बोध मानवीय संवेदन की गर्माहट है ,जो त्याग की भारी भरकम शब्दावली के बजाए सहज मानवीय क्रिया के रूप में सुखद एहसास कराती है।चरित्र कंबल बाँँटने वाले सेठ की खुशियों भरी अनुकंपा का भी है और भिखारीपन में कंबल के परित्याग का भी।

    माला वर्मा की लघु कथा गहना मध्यम वर्गीय परिवेश में रिश्तों की दरकती जमीन को अपने गीले रसायनों से फिर सँवार लेती है ।परिवार में बेटी की हिस्सेदारी आज का कानूनी पक्ष है और रिश्तों की रागात्मक भूमि में वह अपनी अहमियत खोकर रिश्तों को कालगत  लंबाई दे जाता है। माँ की मृत्यु के बाद बेटी में भी कुछ जेवर पा जाने की इच्छा उसे बँटवारे की घंटी तक ले जाती है। पर अपनी बड़ी भाभी के फोन से बँटवारे के तिक्त रसायनों को रिश्तो के मधुर रसायनों से पुख्ता कर जाती है। बड़की भोजाई का यह आत्मीय संवाद -‘छोटकी बबुनी ……..आखिर उनके गहने पर उनकी बेटियों का भी हक है।’ और यही लंबा संवाद एक ननद के प्रत्युत्तर में रिश्तों के रंगों को उजला स्थायीत्व दे जाता है-‘ ननद भौजाई का यह प्रेम बना रहे और अब तो आप ही हमारी माँ के समान हैं…….. प्लीज कुछ ना कहें ।’लघुकथा का पूर्वार्ध और लघुकथा का उत्तरार्ध एक द्वंद्व को रिश्तों की पूँजी बना देते हैं। निश्चय ही इस लघुकथा में परिवेश, पारिवारिक संरचना ,रिश्तो के तनाव -बनाव और भाषिक संरचना भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों की आंतरिक संरचना के यथार्थ और रिश्तो की स्नेहिल जमीन को बुनते हैं। बात आदर्श और यथार्थ की नहीं, क्योंकि पूर्वार्ध का यथार्थ भी पारिवारिक संरचना का यथार्थ है और उत्तरार्ध की रिश्तों की संवेदना भी।अलबत्ता लघुकथा का अंतिम वाक्य मुझे क्षेपक की तरह गैरजरूरी लगता है।

1-एक गरम रात-डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय

कम्बल लेकर जब वह बूढ़ा चला तो उसे लगा कि उसके हाथों में एक स्वर्ग है। वह बुदबुदा रहा था, ‘‘हे भगवान, हमरा औरदा भी लग जाये सेठ के उस बच्चे को जो धरती पर आते ही कम्बल बँटवाया गरीबों में….. नहाते-धोते भी एको रोयाँ ना टूटे बच्चे का।’’

वह भूल चुका था कि दोपहर से लेकर अन्धेरा होने तक याचकों की अपार भीड़ में कितनी बार धक्के खाकर वह नीचे गिरा था, कितनी चोंटें आई थीं उसकी बूढ़ी हड्डियों में, घिघियाते-घिघियाते कितना गला दुखा था उसका।

‘‘…. आधा से अधिक आदमी सबको तो मिलबे नय किया। कितना बार लाइन लगाया कारकारता सब। लेकिन कोय माने तब न।’’ वह सोच रहा था, मुस्कुरा रहा था…. और बर्फीली रात में कम्बल के नीचे मिलने वाली सुखद ऊष्मा को अभी से महसूस कर रहा था।

वह कुछ ही देर चला होगा कि अचानक उसके पैर थम गए। अपशगुन की आशंका हुई। जाकर देखा तो-रमकलिया एक फटे-पुराने बोरे पर बैठी हुई थी और उसकी गोद में उसकी 6 साल की बच्ची कराह रही थी।

‘‘का रे रामकली, तीन दिन से दिखाइए नहीं पड़ी तुम। भीखो नय माँगने आती हो। का बात है?’’

बूढ़े ने पूछा तो रामकली रो पड़ी,‘‘कि कहबोन काका, तीन दिनांे से छोरी के बुखार आबी रहलो छय। देह छूबी के देखो नी, कत्ते जली रहलो छय।’’

बूढ़े ने बच्ची को छूकर देखा- शरीर तप रहा था।

उसने थोड़ी देर तक बच्ची के कुशल के लिए भगवान से अनुनय की, धोती के छोर से बँधी दो रोटियाँ रामकली को थमाई और फिर उठ खड़ा हुआ, ‘‘चलते हैं भाय, आज ठण्डो तो बहुत है। लगता है सारा धरतिए बरफ हो गिया है। बरफ…’’ बोलते बोलते बूढ़े ने कम्बल बच्ची के शरीर पर डाल दिया और तेज़-तेज़ कदमों से चलकर कुलियों के अलाव के पास पहुँच गया। अन्तिम गाड़ी के साथ ही सारे कुली भी जा चुके थे।

‘‘बचिया सो रही होगी गरम होकर। कित्ता प्यारी-सी है।’’ बूढ़े ने खुश होकर सोचा और रोज़ की तरह वहीं, अलाव के पास, चादर ओढ़कर लेट रहा।

….और…..और…. यद्यपि वह भूखा था और उसकी चादर जगह-जगह  फटी हुई थी और धरती बर्फ बनी हुई थी, लेकिन…….लेकिन…… आज उसे ठंड नहीं लग रही थी।

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2-गहना-माला वर्मा

माँ का गहना उनकी बेटियों को भी मिलना चाहिए। शादी के बाद उनका हक नईहर से खत्म तो नहीं हो जाता! माँ को गुज़रे वर्ष भर ही हुए थे कि बात उनके  गहनों तक पहुँच गई। अभी तक तो सब जगह शांति थी पर अब किसी न किसी को मुँह खोलना ही था– माँ के  गहने कितने थे! क्या–क्या था, अपने हिस्से क्या आएगा आदि–आदि कई तरह की अटकलबाजि़याँ चल रही थीं। बहनों में छोटकी कुसुम ही ज़्यादा परेशान थी। जहाँ चार–चार भौजाइयाँ पहले से मौजूद हों, वहाँ तो ननदों को गहने मिलने से रहे, पर पूछताछ तो करनी ही होगी। कुछ भी मिले। मिले तो सही– फिर उसकी कीमत आँकी जायेगी। अभी तो वैसे ही सोने के  भाव आसमान छू रहे हैं– फायदा तो होगा ही। घर–परिवार में शादी–ब्याह के  मौके  पर सोना–चाँदी खरीदना ही पड़ता है, इसी में नईहर से कुछ मिल जाए तो नुकसान क्या है?

अगली बार किसी भौजाई से बात होगी तो घुमा–फिराकर पूछना ही होगा– माँ के  जेवर कहाँ रखे हुए हैं? घर में हैं या लॉकर में? आप सबने क्या सोचा, आदि कई–कई प्रश्न दिमाग में घूम रहे थे। देखा जाए उधर से क्या जवाब मिलता है। इसी बीच में एक पड़ोसन ने टोक दिया– ‘माँ के  गहना–गुरिया में से कुछ हिस्सा मिला क्या?’ अब कुसुम को कुछ मिले या ना मिले, उससे पड़ोसिन को क्या लाभ!

एकाध महीने निकल गए, न कुसुम ने फोन पर कुछ पूछा न उधर से किसी भौजाई ने कुछ कहने की ज़रूरत समझी। कई–कई बातें होतीं पर उसमें ‘गहनों’ की चर्चा नहीं हुई। बाकी बहनों को कोई मतलब नहीं– वैसे इतना तो तय था कि बँटवारा होगा तो उन्हें उनका हिस्सा मिल ही जाएगा ;लेकिन इसके  लिए बिल्ली के  गले में घंटी कौन बाँधेगा….? तो छोटकी कुसुम थी ही…. और…. एक दिन कुसुम ने साहस किया। अब तो पूछना ही होगा, बेकार की माथापच्ची वो अकेले क्यों सहे! दोपहर का वक्त था– कुसुम इत्मीनान से फोन के  करीब पहुँची ही थी कि फोन खुद बज उठा। जाने किसका फोन। पर उधर से बड़की भौजाई थी, आश्चर्य! इस टेलीपैथी को क्या कहा जाए…

कुशल–मंगल के  बाद बात आगे बढ़ती, कुसुम दिल कड़ा करके  ‘कुछ’ पूछती तब तक उधर से बड़की भौजाई बोल उठी, ‘छोटकी बबुनी, एक ज़रूरी बात करनी थी। माँजी का गहना लॉकर में पड़ा था। आज निकाल कर घर लाए। जो भी गहना है उसका लिस्ट भी रखा है। आप सब जब भी यहाँ जुटेंगी– जो पसंद आए गहना ले लेंगी। संकोच ज़रा भी नहीं करना। आखिर उनके  गहने पर उनकी बेटियों का भी हक है। गहना घर में रखा है, चिंता भी हो रही है। किसी बहाने आप सब आ जातीं तो अच्छा था। बड़की बबुनी को पहले फोन मिलाया था ,पर वो घर में नहीं थी। आसानी से आपका नम्बर लग गया ,तो सोचे पहले आपसे से ही कह दें।’

इस अप्रत्याशित स्नेह वार से कुसुम हतप्रभ थी। उसके  दिल–दिमाग ने तो कुछ दूसरा ही ‘बातचीत’ का खाका खींच रखा था…. पर यह असमंजस थोड़ी देर ही बना रहा। उसके  बाद तो सब कुछ काँच की तरह साफ था।

‘अरे नहीं…. बड़की भाभी, माँ के  गहने हमें नहीं चाहिए। हमारे खुद के  गहने इतने हैं कि उसे ही पहनना नहीं होता। सबके  सब लॉकर में पड़े हैं। आप तो बस्स माँ के  गहने उनके  सभी पोता–पोती में बाँट दें। उनकी शादी के  वक्त दादी की तरपफ से आशीर्वाद भी हो जाएगा। गहने किसी के  पास रहें, उससे क्या फर्क पड़ता है। भाभी, आपने इतना ही पूछा, हमारे लिए वही बहुत है….’

‘नहीं–नहीं बबुनी, ऐसा कैसे होगा! कुछ निशानी सबको लेना ही होगा।आप सब आइए तो सही। मैं सबको खबर कर रही हूँ….’

‘नहीं भाभी! मैं तो न लूँगी। मेरी निशानी मैं आपको सौंप रही हूँ।ननद–भौजाई का ये प्रेम बना रहे और अब तो आप ही हमारी माँ समान हैं….प्लीज़ कुछ न कहें।’

कुसुम की आँखें डबडबा आईं। इधर बबुनी ने चुप्पी साधी तो भौजाई भी रो रही थी…. क्या कुसुम ने यही चाहा था! यह हृदय परिवर्तन हुआ कैसे?

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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