जुलाई-2017

दस्तावेज़यादों का दस्तावेज़:दृष्टि के अँधेरे में सृजन की ललक     Posted: May 2, 2017

 

आँखों की रोशनाई का काल जब छिन जाता है तो स्मृतियाँ ही आँख बनकर उभरती हैं। यादों का दस्तावेज कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’ का लघुकथा संग्रह इसी विवशता की खड़खड़ाती स्मृतियाँ हैं, जो पारिवारिक जीवन के वृत्त में रिश्तों के समाजशास्त्र को दरकाती हुई व्यथाओं को सामने लाती हैं। ऐसा भी नहीं कि दृ2-yadon ke dastavez - Copyष्टि के अभाव में भीतर की आँखें नितांत असहाय हो जाती हों, कई बार तो अँधेरों के बीच रोशन होकर वे मर्म को जीवंत भी कर देती हैं। अलबत्ता जीवन व्यवहारों का दायरा विवृत्त होने के बजाय थोड़ा संवृत्त होने लगता है, इसीलिए इन लघुकथाओं में पारिवारिक जीवन के बनते-बिगड़ते तंतुजाल को जितना माइक्रोस्कोपिक बनाया गया है, उतना जीवन के वृहत्तर क्षेत्र में नहीं हो पाया है।

इस लघुकथा-संग्रह की रचनाओं में रिश्तों की निकटता में मनःस्थितियों की दूरियाँ ज़्यादा हैं। नई माँ के प्रति घर के सदस्यों में पूर्वाग्रह और परायापन इस क़दर हावी है कि उनकी बॉडीलैंग्वेज, उनके तीखे संवाद, भीतर-भीतर की कूटनीति, रिश्तों में चुप्पी भरे तनाव, पैंतरे दिखानेवाली पारिवारिक-मानसिक बुनावट, दैनंदिन कार्यों में उपेक्षा भाव, तेरे-मेरे के कशीदे हर बार एक नयी कथा को बुन देते हैं। ‘तुम डाल-डाल हम पात-पात’ वाली मानसिकता इस मनावैज्ञानिक गणित को उलझाती जाती है। अगरचे नई माँ इन पूर्व संतानों को पढ़ाने के चक्कर में अनुशासन की आँख दिखा दे ,तो वह ‘माँ’ के बजाय मैडम (कौन, माँ या मैडम) में रूपांतरित हो जाती है। ‘खुल्लमखुल्ला’ रिश्तों को हलाल करती हुई लघुकथा है, जो पहले के बच्चों को नई माँ से सचेत रहने की सरेआम हिदायत देती है, पर नई माँ चेहरे पर शिकन नहीं लाती। उलटे, पति से प्रशस्ति पाती है। इन उलझते-सिकुड़ते रिश्तों का इतना विविध और सूक्ष्म चित्रण करती हुई लेखिका की ये लघुकथाएँ स्केन की तरह दृश्यमान हो जाती हैं। यही नहीं, ‘निर्णय’ लघुकथा में तो पहली सास ही दामाद से कहती है- ‘बेटा, तुम शादी करोगे, वह तो हमारी दृष्टि में बिल्ली पालने जैसा होगा।’ ‘गर्म चपाती’ में बच्चों को सँवारने के लिए टोकनेवाली नयी माँ के बजाय गरम चपाती देनेवाली चाची ही माँ बनी रहती है। ‘शीतला अष्टमी’ में अपना गठजोड़ बनाती बहुओं का पैंतरा है- ‘नई माँ को अकेले ही खपने दो, इसे भी तो मालूम पड़े।’ ‘अनमोल रतन’ में रिश्ते की बुजु़र्ग महिला चूड़ियों में अँगुलियाँ फँसाकर बोलती है- ‘ये जेवर तो हमारी बेटी पहनती थी, तुम्हें पीहर से क्या मिला ?’ छुट्टियों में घर आई बुआएँ फब्ती कसती हैं-‘यह क्या तुम्हारी क़द्र करेगी, जिसने तुम्हारे पोतड़े तक नहीं धोए?’ और इसी नयी माँ को पुराने पीहर के लोग भी संदेहभरी नज़रों से देखते हैं और ससुराल में बच्चे-बहुएँ तक कनखियों से। ये ही बातें ‘माँ’ को ‘नयी माँ’ के पथरीले-नुकीले अक्ष पर ले जाती हैं- ‘जिनके लिए कोख उजाड़ी वो ही क़द्र न कर सके तो दूसरों से क्या ‘गिला-शिकवा’ ?’ और इन सारे परिदृश्यों में न तो पुरुष की उपस्थिति दर्ज़ हुई है और न सहकार की आश्वस्ति। इन कथा-परिदृश्यों के नज़रिये दूसरे भी हो सकते हैं, पर इन परिदृश्यों में मातृत्व की संजीवनी बिलबिलाकर रह जाती है।

सास-बहू के रिश्तों में भी अनेक कथानक उलझे हुए हैं। पारिवारिक ईसीजी का ग्राफ इन रिश्तों के आघातों को व्यक्त करता है। ये आघात कभी नज़रों-कनखियों में टकराते हैं, ‘तीखी मिर्च’ में, कभी ‘कायापलट’ में सवेरे का पराँठा दो बार सेंक कर शाम को सास को परोसती बहू में, कभी ‘अपनी-अपनी सोच’ लघुकथा में दो बहुओं के बीच सास के कथन की छीछालेदार में, कभी ‘श्रवणकुमार का रोष’ लघुकथा में माँ के पास बैठे पति पर पत्नी के रोष के रूप में। बच्चों से दुलार और सास की अनदेखी रिश्तों में ऐसी चुप्पी भरी नागफनियाँ उगा देती है, जो प्रत्यक्ष नहीं दिखती पर भीतर को खरोंच देती है। पर ऐसा भी नहीं है कि इन रिश्तों की नकारात्मक के बीच सकारात्मक सोच का रंजक रूप न हो। ‘ऐसा करें तो’ लघुकथा में तो बच्चे ही प्रतिबोध देते हैं- ‘जो व्यवहार दादी के साथ कर रही हैं, उनकी बहू भी उनके बुढ़ापे में ऐसा ही करे तो ?’ ये उजले स्वर हैं, जो रिश्तोें में पलती उदासीनता, ठंडेपन और अनदेखी के तिरस्कार को धक्का मारकर विवेक को जगाते हैं। घर में उपजे रिश्तों के बाग़वान में दूसरों के सामने बड़ों का सम्मान करते लोग घर के वीराने में कितने दूर-दूर नज़र आते हैं – ‘लोगो ! देखो-देखो!’ लघुकथा में। और ‘नंबरवाले ताले’ लघुकथा में लेखिका ने कोडवर्ड की तरह रिश्तों को छुपाते व्यवहारों पर तंज कसा है, पर ‘संबोधन में छिपा प्रमोशन’ में कसक भरी खिलखिलाती हँसी भी इस उदासी को छिटकाती है।

संयुक्त परिवार के अपने राग-विराग हैं, अपनी-अपनी तिलमिलाहटें हैं। कभी रिश्तों के अपनेपन में बच्चे माँ-बाप के बजाय चाचा-चाची में प्रगाढ़ता पा जाते हैं, पर उन्हीं रिश्तों के बीच रहते हुए नये जोड़े उम्मीदों की सुबह में एक नयी थीम पर अटक जाते हैं – ‘डीयर, टेंशन लेने का नहीं, देने का।’ कुनबा अब बोझ बन गया है, जिसे परिवार की हर खूँटी छिटकाना चाहती है – ‘यहाँ-वहाँ’, ‘नई दुल्हन नौ दिन’, ‘जब ऐसा हो तो’, ‘आपको भी तो’, ‘हम दो हमारे दो’ जैसी लघुकथाएँ अलग-अलग कोण से संयुक्त परिवार की कुनमुनाहट और दरकती हुई रिश्तों की ज़मीन को सामने लाती हैं। अलबत्ता ‘छिद्रान्वेषण’, ‘सोच का फ़र्क’, ‘सहानुभूति का तकिया’ जैसी लघुकथाएँ उस योजक पक्ष को भी मजबूत करती हैं, जो इस टूटन, उलझन और टकराव में विवेक संगत नज़रिये का संकेत देती हैं। पारिवारिक जीवन में उगता हुआ ‘पीहरवाद’ भी इन रिश्तों के समाजशास्त्र को उस ओर ले जाता है, जहाँ उलझते हुए रिश्ते खंड-खंड अखंड नज़र आते हैं।

नयी पीढ़ी में साहित्य के प्रति घटते रुझान और इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रति बढ़ते अनुराग को कई लघुकथाओं में व्यक्त किया है। लेखिका को शायद यह लगता है कि ऑनलाइन से बढ़ते और होमलाइन के घटते रिश्तों में कहीं-न-कहीं इस सांस्कारिकता की कमी आई है, जो साहित्य से मिलती थी। खान-पान, शॉपिंग, टी.वी., सिनेमा या मल्टीमीडिया में खोया हुआ समाज उस मूल्यवाद से प्रतिबोधित नहीं है, जो साहित्य में संवेगों के स्तर पर पात्रों में झलकता है। ‘अपनी कहो’, ‘मीडिया’, ‘शब्दों की कुल्हाड़ी’ जैसी लघुकथाएँ साहित्य के प्रति उदासीनता और जीवन-शैली के भोगपरक व्यवहारों के प्रति अतिशय लगाव को दर्शाती हैं।

पारिवारिक परिधि में सिमटी इन लघुकथाओं के सामाजिक अक्ष भी हैं और मूल्यों के क्षरण की चिंताएँ भी। पर ये लघुकथाएँ उन सूक्ष्म-सी घटनाओं का प्रत्यंकन करती हैं, जहाँ घर के किरदारों की मनोवृत्तियाँ अपनी-अपनी बॉडीलैंग्वेज गढ़ते चेहरों में प्रतिच्छवित होती हैं। लेखिका की मजबूरी है, उसकी आँखों में अँधेरे का बिम्ब। दृष्टिहीनता के कारण वह इन लघुकथाओं को वैसी बुनावट नहीं दे पाती, जो अपने लिखे को बार-बार काटकर नयी इबारत गढ़ने से बनती है। न ही वह लघुकथा की ज़मीन को बड़ा अनुभव-वृत्त दे पाती है, जो दृष्टि के सहकार से बन सकता था। उसके पास अनुभव और अनुभूति का जो संचित रूप है या कि असहिष्णुताओं को सहता हुआ वर्तमान है, वही किसी सहायक के माध्यम से इन लघुकथाओं में उतरकर आया है। इसीलिए आत्मकथ्य की सीमाओं का अतिक्रमण कर कल्पनाओं से उसके वृत्त को बड़ा करने के बजाय कई लघुकथाएँ प्रतिक्रिया या टिप्पणियों के संवेग में खो जाती हैं। कई बार लेखिका इन लघुकथाओं के अंत में टिप्पणीकार बनकर आती है, शायद व्यथा की अतिशयता या व्यंग्य का प्रतिबोध करवाने के लिए। लेकिन रचना के भीतर लेखक का प्रक्षेप वस्तुपरकता और रचनाशीलता को बाधित करता है। अलबत्ता लेखिका के पास संवादों की तल्खी है, जीवन के अच्छे-बुरे मुहावरों का अभिज्ञान है, भाषा में सांकेतिकता और नये सादृश्यों को घटनाचक्र में समेटने वाली व्यंजक भाषा है। ‘फिक्स डिपॉजिट’ लघुकथा की मणि धीर भाव से कहती है- ‘मैंने ऐसे लोगों के लिए फिक्स डिपॉजिट कर रखे हैं। फिक्स डिपॉजिट केवल रुपये-पैसे के ही नहीं होते, ज़िन्दगी के इन अनपेक्षित व्यवहारों के भी होते हैं।’ और अनपेक्षित व्यवहारों के ये फिक्स डिपॉजिट ही इन लघुकथाओं के कथानक हैं, संवाद हैं, शब्दों के मनोवृत्तिपरक उद्वेलन हैं। लेखिका ने लिखा भी है- ‘मेरे मन की बंद पेटी में ऐसे ढ़ेरों निगेटिव जमा हैं, बरसों से। उन्हीं को पॉजिटिव करने में लगी हूँ।’ पर इन निगेटिव को पॉजिटिव करते कथाचक्रों में सारी तल्खियों के बीच कहीं-कहीं उजास भी है, जीवट भी है, रंजन के क्षण भी हैं, हँसी ठट्ठों का आह्लाद भी है, जो जीवन को राह देता है। लेखिका की दृष्टिविवशता से उपजी लघुकथाओं की बुनावट की कमजोरियाँ उनकी विवशता के आगे छोटी ही हैं। बड़ी बात है कि अँधेरी आँखों के बावजूद सृजन का यह रूप निरंतर जारी है।

यादों का दस्तावेज़(लघुकथा-संग्रह): कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’, पृष्ठ:124; मूल्य:250 रुपये, प्रकाशक:शब्द-प्रवाह,ए/ 99वी डी मार्केट-उज्जैन-456006 ( म प्र)

-0-सम्पर्क-36, क्लीमेन्स स्ट्रीट, सरवना स्टोर्स के पीछे,पुरुषवाकम् , चेन्नई (तमिलनाडु)-पिन-600007; मो. 094250.83335  ;E-Mail : balulalachha@yahoo.com

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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