जून -2018

दस्तावेज़रंग     Posted: June 1, 2018

[रंग लघुकथा का पाठ अशोक भाटिया द्वारा बरेली गोष्ठी 89 में किया गया था।पढ़ी गई  लघुकथाओं पर उपस्थित लघुकथाकारों द्वारा तत्काल समीक्षा की गई थी। पूरे कार्यक्रम की रिकार्डिग कर उसे ‘आयोजन’ (पुस्तक) के रूप में प्रकाशित किया गया था।  लगभग 28 वर्ष बाद लघुकथा और उस विद्वान साथियों के विचार अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं-]

अशोक भाटिया
रंग

होली का दिन है। ज्यों-ज्यों दिन चढ़ता है, इस कस्बे में होली खेलने की उमंग बढ़ती जा रही है।श्रीनिवास घर पर बैठे अखबार पढ़ रहे हैं। उनकी पत्नी आकर कहती है, ‘‘सुनो, साढ़े ग्यारह बज गए हैं। अब तो होली खेलना थम गया होगा। कुछ सब्जी ले आओ। कोई रंग डाल भी दे ंतो पुराने कपड़े हैं, फर्क नहीं पड़ेगा।’’

श्रीनिवास उठते हुए कहते हैं, ‘‘नहीं , रंग-वंग कोई क्यों डालेगा मुझपर।’’

कस्बे में श्रीनिवास का रौब-दाब है। आज वे स्कूटर की बजाय साइकिल पर बाजार को निकले हैं। वे देखते हैं कि चारों तरफ होली का रंग अपने निखार पर है। कहीं लाल-पीला रंग लगाया जा रहा है, कहीं लोग आपस में गले मिल रहे हैं तो कहीं ढोलक के साथ नाच रहे हैं किसी को छोड़ा नहीं जा रहा है।लेकिन श्रीनिवास को देखकर किसी को उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती। बड़े अफसर हैं, बुरा न मान जाएँ। और श्रीनिवास के चेहरे पर भी अहम् है कि देखो, मुझ पर कोई रंग नहीं डाल सकता।

यही होता है। वह वैसे के वैसे घर लौट आते हैं। पत्नी ,सब्जी का थैला थामते हुए कहती है, ‘‘वाह! किसी ने रंग नहीं लगाया।’’

श्रीनिवास एक खिसियानी हँसी हँसकर कमरे मे आ जाते हैं। रास्ते के रंग भरे दृश्य उनकी आँखों के आगे एक-एक करके आने लगे हैं। अचानक उन्हें लगता है कि वे कस्बे में सबसे अलग-थलग पड़ गए हैैं।

वे उठते हैं और मेज पर रखे लिफाफे में से गुलाल निकाल कर अपने मुँह पर लगा लेते हैं।

विमर्श

डॉ0 भगवानशरण भारद्वाज

‘रंग’ आत्मगरिमा के गजदन्ती मीनार में कैद अफसर के मानवोचित पीड़ाबोध की की तीव्र व्यंजना करती है।

डॉ0 स्वर्णकिरण

अशोक भाटिया की लघुकथा ‘रंग’ बड़े अफसर श्रीनिवास की पराजय की कहानी है। इनका परम्परा से जुड़ना चोट पहुँचाता है। लघुकथा में अस्वाभाविकता ही अस्वाभाविकता है, बड़े अफसर हैं, साइकिल से होली के दिन सब्जी खरीदने जाते हैं। क्या घर में कोई नौकर चाकर नहीं है? फिर उन्हें यह नहीं मालूम कि एक दिन पहले सामान खरीद लेना चाहिए। होली के दिन बाजार बन्द रहता है, पत्नी के कहने से बाजार जाते हैं,साइकिल से जाते हैं। क्या उनके पास गाड़ी या स्कूटर नहीं है? रौबदाब है, कोई रंग नहीं लगा सकता और रंग नहीं ही लगता। अपने लिफाफे में से गुलाल निकालकर अपने मुँह में लगा लेते हैं।

बलराम अग्रवाल

आदमी जब अपने चारों ओर आतंक बुन लेता, और उसे ही अपनी सफलता मान लेता है ,तब वह कितना निरीह हो जाता है। यथार्थ से यह आतंक आदमी को समाज से किस कदर दूर ओर विस्मृत कर देता है……तथा यह विस्मरण किस प्रकार उसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए समाज की आवश्यकता का आभास दिलाता है। उसे अशोक भाटिया ने ‘रंग’ में अच्छी प्रकार प्रस्तुत किया है। कुछ तथ्यों को सुधार दिया जाए,तो यह एक श्रेष्ठ रचना है।

सतीशराज पुष्करणा

अशोक भाटिया की लघुकथा ‘रंग’ की चर्चा करना चाहूँगा। इस लघुकथा के विषय में जो कुछ मैं कहता चाहता था ,उसमें से कई बातें मेरे पूर्व वक्ता डा.स्वर्ण किरण कह चुके हैं; किन्तु फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि सटीक प्रस्तुति एवं सुन्दर मनोवैज्ञानिक कथ्य के बावजूद यह लघुकथा अस्वाभाविकता एवं अयथार्थ का शिकार होकर रह गई है। कारण, इस लघुकथा में बताया गया है कि उस दिन होली है, नायक बहुत बड़ा अफसर है, जिसका अपने क्षेत्र में इतना रोबदाब है कि उस पर कोई रंग नहीं डालता है और नायक अन्त में घर आकर स्वयं अपने मुँह में रंग लगा लेता है। मार्च…..होली का दिन हो और आदमी बाजार से बचकर चला आए ,यह असम्भव है। यदि यह मान भी लिया जाए कि नायक के आतंक से समझदार यानी वयस्क व्यक्ति उससे आतंकित हो सकते हैं ; किन्तु बच्चे किसी से आतंकित नहीं होते ओर वह होली के दिन किसी को नहीं बख्शते। दूसरी बात, जब वह इतना बड़ा अफसर है ,तो होली के दिन उसे बाजार से सामान लाने की जरूरत नहीं। कारण, एक तो उस दिन बाजार बन्द रहता है दूसरा, अफसर है तो होली से एक दिन पूर्व ही अपने घर की जरूरत की सामग्री को घर में लाकर या मँगवाकर रख लेगा जैसा कि हर एक व्यक्ति करता है ओर यदि वह अफसर है तो घर में सरकारी या निजी एक नौकर तो होगा ही और यदि वह अफसर है तो वह साइकिल पर नहीं निकलेगा। या तो वह पैदल निकलेगा (यदि बाजार निकट है) अन्यथा स्कूटर से जाएगा। कारण, आज स्कूटर प्रत्येक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की पहुँच के भीतर है। मुझे तो इसका शीर्षक भी सटीक नहीं लगता। कारण यह ‘रंग’ शीर्षक लघुकथा की आत्मा से कहीं भी जुड़ा हुआ नहीं है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिंमाशु’

‘रंग’ में डॉ. भाटिया ने जो कहना चाहा है मेरी समझ में यह आया है कि आदमी अपने लिए एक कवच का निर्माण करता है विशिष्ट बनने के लिए। इस कवच की घुटन ‘रंग’ लघुकथा में व्यंजित हुई है।

रामयतन यादव

अशोक भाटिया की लघुकथा ‘रंग’ संवेदनातमक अनुभूति पर आधारित सहज रूप से तिलमिला देने वाली लघुकथा है। यह लघुकथा सूक्ष्म विचार शक्ति और सर्जनात्मक क्षमता का विस्मयकारी प्रमाण है।इस लघुकथा का विचार पक्ष ओर कला पक्ष पूर्णता सन्तुलित है, जो सहज ही पाठकों के हृदय को छू जाती है।

इस लघुकथा का नायक बेहद अहंकार है। होली के दिन वह घर से बाहर निकलने के पूर्व सोचता है कि मुहल्ले भर में उसका दबदबा है, इसलिए उस पर रंग डालने या गुलाल फेंकने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।उसकी यह धारणा सही सिद्ध होती है,कोई उस पर रंग नहीं डालता ; लेकिन वह अपने अहंकार से अपनी भावनाओं को नहींे जीत पाता, जिसके फलस्वरूप ‘वह’ अपने आप को सामज से कटा हुआ महसूस करता है और एकाएक स्वतः घर में आईने के सामने बैठकर अपने चहेरे पर गुलाल मल लेता है।

जहाँ पर लघुकथा का नायक हारता है वहीं पाठकों का मन संतुष्ट हो जाता है और लघुकथा अपने उद्देश्य तक पहुँच पाती है। एक सूक्ष्म भाव को अशोक भाटिया ने सहज ढंग से शाब्दिक अभिव्यक्ति दी है। शब्दों का चयन भी सटीक ढंग से किया गया है।यह लघुकथा शाब्दिक रूप में जहाँ समाप्त होती है ,वहीं से यह पाठकों के मन में शुरू होती है और यही किसी भी रचना की सफलता की मूल कसौटी है।

इस कसौटी पर ‘रंग’ खरी उतरती है। मेरे विचार से लघुकथा में प्रत्यक्ष ढंग से कोई निदान नहीं ठूँसा जाना चाहिए। निदान या उपदेश लघुकथा को बोधकथा में परिणत कर देता है। अशोक भाटिया ने अपनी रचना को बुराइयों से बचाने में शतप्रतिशत सफलता प्राप्त की है।रंग के माध्यम से भाटिया ने जो संदेश दिया है वह ग्राह्य है।

गंम्भीर सिंह पालनी

‘रंग’ ने दूसरे सत्र में रंग जमाया है।

जगदीश कश्यप

अशोक भाटिया की ‘रंग’ अपनी परम्परा से कटकर आदमी किस कदर छटपटाता है, यही इस रचना का प्रतिपाद्य है। रचना उस समय और भी प्रभावकारी बन जाती है जब परम्परा से कटा आदमी अकेले में खुद ही अपने माथे पर रंग लगा लेता है।

डॉ0 शंकर पुणतांबेकर

‘रंग’ लघुकथा पर निर्रथक चर्चा हुई……जैसे होली के दिन दुकानें नहीं खुली रहतीं…….अफसर साइकिल पर नहीं जाएगा ,आदि। मैं इसे एक सशक्त मनोवैज्ञानिक लघुकथा मानूँगा। इसी कारण यह लघुकथा राजेन्द्र यादव की सशक्त कहानी ‘बिरादरी बाहर’’ की याद दिलाती है।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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