अगस्त-2017

संचयनरांग नंबर     Posted: February 1, 2015

‘‘पापा प्लीज……फोन नहीं रखना, मैं जानती हूँ, मैंने आपका विश्वास तोड़ा। मैं बहुत पछता रही हूँ कि घर से भागकर मुंबई आ गई….मैं यहाँ बहुत परेशान हूँ, पापा!…..मैं तुरंत घर लौटना चाहती हूँ। पापा प्लीज….!
एक बार….सिफर्. एक बार कह दीजिए कि आपने मुझे माफ कर दिया!’’ उसने फोन पर ‘हैलो’ सुनते ही गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया था।
‘‘बेटी, तुम कहाँ हो? तुम जल्दी ही घर लौट आओ। मैंने तुम्हारी सब गलतियाँ माफ कर दीं…।’’ कहकर उस आदमी ने फोन रख दिया।
पचास वर्षीय वह कुँवारा–प्रौढ़ सोचने लगा कि उसकी तो शादी ही नहीं हुई, यह बेटी कहाँ से आ गई? लेकिन वह तत्काल समझ गया था कि किसी भटकी हुई लड़की ने उसके यहाँ रांग नम्बर डायल कर दिया था। बहरहाल, उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी आवाज उस लड़की के पिता से मिलती–जुलती थी और उसने उसे ‘रांग नंबर’ कहने की बजाय ठीक जवाब दिया था।
-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine