नवम्बर-2017

देशराक्षस     Posted: November 1, 2017

आठवाँ पुरस्कार   प्राप्त  लघुकथा– डॉ संध्या पी  दवे

उत्तेजना के साथ प्रस्तुत उसकी   बातें  ध्यान  से सुननी पड़ीं।   जब उसने कहा-  मम्मी वह  पप्पी हमारी बस के नीचे आ  गया और

टायर  उसे कुचलकर आगे निकल गया। ड्राइवर   ने  ब्रेक  दिया लेकिन वह नहीं बचा,   मर गया। मैंने,  हे   भगवान! कहते   हुए आँखें मींच   लीं।  मेरे  पूछने पर कि ड्राइवर  बस तेजी  से चला  रहा था   क्या?   सफाई सी देते  हुए उसने कहा-ड्राइवर  काका  ठीक  सेचला रहे थे,   लेकिन वह कुत्ते  का पिल्ला अचानक  उछलकर आगे आया   और टकरा गया!  यह वाकया 6 साल के   मेरे  बेटे ने  5 या 6 बार मुझे सुनाया,  जोशीले अंदाज   में   घटनाक्रम का  पूरा वर्णन  करते हुए। दुर्घटना  घटित होने का दुख  भरा  विचलित होने  का भाव  उसकी बातों में  मुझे नहीं दिखा।   यह किस्सा वह अपनी दादी   और   बड़ी मम्मी  को पहले   ही  सुना  चुका  था। मीडिया के  एक रिपोर्टर  की तरह संपूर्ण घटना का   ब्यौरा  पहले  सूचित  करने  के दंभ   के  साथ  वह अतिरिक्त  हाव-भाव दर्शा रहा   था। स्कूल  में   हुई  पढ़ाई  से  संबंधित बातें  वह कभी  इस उत्साह से नहीं  करता। इसलिए आज दुर्घटना  का  ऐसा   वर्णन सुनकर मैं   दुखी  होने  के साथ अचंभित  रह गई, संवेदना  के ह्रास की ज्वलंत मिसाल सामने देखकर। मुझे  अपने बचपन की   घटना याद आ गई।  हम बच्चे एक बिल्ली पाला  करते थे।  रोज  छुप-छुपकर उसे  दूध   पिलाते, उसके बच्चों  को  उठाते-सहलाते।  कुछ  दिनों के   लिए वह  बिल्ली गायब क्या हुई, हमारी  मुस्कान खो  गई,  नींद   हराम हो  गई। बिलाव पर शक हुआ। जरूर उसने मार डाला होगा।  वे  दिन बहुत बेचैनी  भरे  थे। उस दौरान  हम बिल्ली के  पिल्लों का  विशेष ध्यान  रखने लगे थे।  फिर पता चला कि बिल्ली ने कहीं  और  अपना डेरा  बना लिया है।  पापा ने  बताया, बड़े  हो   चुके  बच्चों से दूर  रहकर उनको  आत्मनिर्भर बनाने  के  लिए। हमें  गली में   रहने  वाले मुर्गी  के नन्हें  चूजे बड़े ही प्यारे लगते।  गली  में  लापरवाही से साइकिल  चलाने वालों  से उन्हें चोट न पहुँचे,  यह डर  हमारे  मन में   लगा रहता। इसलिए  चूजों  को घरों के  आस-पास उठाकर  रखते  जाते।  उनके पीछे दौड़-भाग   की कसरत करते हुए।  और यह बच्चा! संवेदनहीनता की पराकाष्ठा छू  ।रहा है।  इस निर्ममता की जड़ें   कहाँ  हैं!   सोचते हुए मैं कसमसाने  लगी।

पति के ऑफिस से  लौटते  ही  बेटे ने  तुरंत वह घटनाक्रम  सुनाने का  उत्साह दिखाया।  मैंने गौर किया इस बार उसकी वर्णन  क्षमता बढ़  गई है।  हमें  प्रभावित  देखने के  लिए, खुद अप्रभावित   रहते।   यह बात मैं   पचा नहीं  पाई।  तभी  उसके आसपास घुटनों   के बल चलता खेलता छोटू  गिर पड़ा।  छोटू  के गिरने का दोषारोपण करते  हुए मैंने  उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया; क्योंकि निकट होने  के बावजूद वह  तटस्थ रहा  था।  अपने निर्दोष  होने  का उसे   बखूबी  भान था, इसलिए वह जोर से रो  पड़ा। उसे गले लगाते  हुए चुप  कराने  के क्रम में   मेरी नजर  चार्ज हो  रहे मोबाइल  पर पड़ी।  विचार कौंधा,  बच्चे को संवेदनहीन  बनाने  वाला  मायावी   राक्षस   ऊर्जा पा  रहा  है।  उसे कृत्रिम खेलों  की  मशीनी दुनिया में   ले जाने  के लिए।

 -0- मो  :   9974138384

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine