नवम्बर-2017

दस्तावेज़राजपथ के साथ पगडंडियाँ भी     Posted: August 1, 2015

लघुकथा भी साहित्य की कई अन्य विधाओं की भाँति अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है । परंतु यहाँ दिक्कत यह है कि कई लेखक इस विधा को मसीहाई अंदाज में लेते हैं । अर्थात वे लघुकथा को साधन नहीं साध्य समझते हैं । ‘लघुकथा, लघुकथा के लिए’ वाला भाव अंततः इस विधा के लिए ही घातक है । इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं । जिस प्रकार लघुकथा के नाम पर बेसिर-पैर की रचनाएँ सामने आ रही हैं और समाचार पत्र जिन्हें गले लगा रहे हैं इसे देखते हुए भविष्य में इस विधा के मूल्यांकन में काफी दिक्कतें आने वाली हैं क्योंकि ये ही बाद में संग्रह के रूप में प्रस्तुत की जायेंगी । दूसरी ओर किसी विधा विशेष में प्रतिष्ठार्जित कतिपय लेखक ऐसे भी हैं जो गाहे-बगाहे लघुकथाएँ लिखते तो हैं किन्तु इन रचनाओं को ‘छोटी कहानी’ या ‘कहानी’ कहने में स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं । हाल ही में ‘जलसा’ (सं.असद ज़ैदी) के अंक में वरिष्ठ कवि हेमंत शेष की लघुकथाएँ छपी हैं, शीर्षक दिया गया है, ‘पैंसठ कहानियाँ’ । लघुकथाएँ लिखने के बावजूद अन्य विधा में स्थापित साहित्यकार लघुकथाकार कहलाना पसंद नहीँ करते । यह वैसे ही है जैसे कोई पड़ौस में छाछ मांगने जाये मगर बर्तन पीठ पीछे छिपाये रखे । उक्त प्रसंग में संपादक महोदय की ज़िम्मेदारी बनती थी कि वे लघुकथाओं को कहानियाँ शीर्षक से प्रकाशित नहीं करते ।
आँगन से राजपथ-पवित्रा छपास बुभुक्षा के इस दौर में गंभीर लघुकथाकार आज भी लघुकथा को एक सामाजिक दायित्व की भाँति ले रहे हैं । पवित्रा अग्रवाल इनमें से एक है । यह बात सच है कि साहित्य सामाजिक परिवर्तन नहीं कर सकता । साहित्य के द्वारा सामाजिक परिवर्तन की बात कहना बड़बोलापन है । जैसा कि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में साहित्यकारों का एक वर्ग किया करता था । परंतु यह भी सच है कि साहित्य सामाजिक बदलाव के लिए एक मनोभूमि तैयार करता है । कोई विधा जितनी अधिक लोकप्रिय होगी, इस कार्य के लिए उतनी ही अधिक सक्षम होगी । इसमें कोई संदेह नहीं है कि लघुकथा आज सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है । इसलिए लघुकथाकारों का दायित्व और भी बढ़ जाता है । लघुकथाकार की नजर जितनी पैनी और साफ होगी वह उतनी ही सफाई से छद्म यथार्थ की परतें उधेड़ते हुए पाठकों को सचाई से रूबरू करा सकेगा । यह विडम्बना ही है कि ज्यों-ज्यों शिक्षा का विस्तार हो रहा है, मनुष्य की सोच संकीर्ण होती जा रही है । उम्मीद थी कि शिक्षित होने के साथ-साथ मनुष्य खुले दिमाग(ब्रॉड
माइंडेड) का, तार्किक, सहिष्णु, समझदार व रूढ़ीभंजक होता जायेगा । परंतु हो क्या रहा है ? इस प्रश्न का उत्तर पवित्रा अग्रवाल के प्रथम लघुकथा संग्रह ‘आँगन से राजपथ’ की बहुत सी लघुकथाओं में मिल जायेगा ।
पवित्रा ऐसे संस्कारों में पली-बढ़ी हैं जहाँ अंधश्रद्धा की अपेक्षा कार्यकारण सम्बन्धों पर विशेष बल प्रदान किया जाता है । उन्होंने ‘चित भी उनकी और पट भी’, ‘आस्तिक-नास्तिक’, ‘जेल की रोटी’, ‘औचित्य’, ‘शुभ दिन’, ‘अशुभ दिन’, ‘’पाप-पुण्य’, ‘बैठी लक्ष्मी’, ‘वाह देवी माँ’ आदि एक दर्जन से अधिक लघुकथाओं में बार-बार बद्धमूल धारणाओं पर प्रहार किया है ताकि पाठक वैज्ञानिक सोच की ओर प्रवृत्त हो सकें । यह स्वागत योग्य कदम है और साहसपूर्ण भी, खासकर यह देखते हुए कि देश में अंधश्रद्धा व अतार्किकता के विरुद्ध काम करने वाले नाकाबिले बर्दाश्त होते जा रहे हैं, कहीं-कहीं तो उन्हें ठिकाने (डॉ.नरेन्द्र दाभोलकर, लेखक गोविंद पानसरे) लगा दिया जा रहा है । इन लघुकथाओं में पवित्रा ने मुहूर्त, वास्तुदोष, मूर्तिपूजा, जन्म-पत्री मिलान, शकुन, पशुबलि आदि तर्कहीन परम्पराओं की धज्जियाँ उड़ायी हैं । उनकी नजर गलत मान्यताओं के चलते मुस्लिम नारी की नारकीय जिंदगी (जन्नत, मोहब्बत) पर भी रही है । यहाँ भी उनकी कोशिश रही है कि मुस्लिम मर्दों में चेतना जगे और वे ‘जच्चगी में मौत हुई तो जन्नत मिलेगी’ वाली आधारहीन धारणा से ऊपर उठें । यह बात गौरतलब है कि पवित्रा अग्रवाल ने ये लघुकथाएँ किसी आवेगवश नहीं लिखी हैं । उनका स्वयं का जीवन इस बात की मिसाल रहा है । वे ‘मेरी लघुकथा यात्रा’ आलेख में कहती हैं, ‘न मेरे भाई-बहनों की शादी जन्म-पत्री मिलाकर, मुहूर्त निकालकर हुई न मेरे बच्चों की । इस मामले में मेरे विचार इतने दृढ़ हैं कि दूसरा पक्ष यदि तैयार हो तो मैं श्राद्ध के दिनों में भी शादी करने से इन्कार नहीं करती । मेरा यह मानना है कि कोई भी दिन शुभ या अशुभ नहीं होता । ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन जन्म या मरण न होता हो । कोई दिन किसी के लिए शुभ तो किसी के लिए अशुभ या दुखद हो सकता है । श्राद्ध के दिनों में कोई शुभ काम नहीं किए जाते पर बच्चा जन्म इन दिनों में भी लेता है । मैं नास्तिक नहीं हूँ पर व्रत, उपवास और मंदिरों में भटकने में मेरी कतई रुचि नहीं रही |’ यदि किसी रचनाकार की कथनी और करनी में अंतर न हो तो उसकी रचनाओं में एक किस्म की आंतरिक ताकत होती है जो पाठकों को प्रभावित किए बिना नहीं रहती । पवित्रा की अधिसंख्य लघुकथाओं में ऐसी ही ताकत है ।
‘आँगन से राजपथ’ की लघुकथाओं में कई प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं । रूढ़िभंजक स्वर तो मुख्य है ही । इसके अलावा पारिवारिक स्थितियाँ (शुभ-अशुभ, कथनी-करनी, तूने क्या किया, जागरूकता, अगर-मगर, दारू की खातिर, दायित्व, उलाहना, दखल, झापड़, डुकरिया आदि ), जाति व्यवस्था का दंश (स्टेटस, एक और फतवा, मजबूरी), भ्रष्टाचार और व्यवस्था का विरूप (कानून सबके लिए, लोकतन्त्र, सजा, पाल्यूशन चैक, उसका तर्क, दो नुकसान, सौतेला व्यवहार, बेईमान कौन, समाज सेवा), नारी सशक्तिकरण (दबंग, काहे का मरद, अच्छा किया), अन्य सामाजिक/समकालीन संदर्भ (बेचारा रावण, बवाल क्यों, टी आर पी का चक्कर, रानी झांसी अवार्ड, उलझन, वो किराये का था, घर ना तोड़ो ) को भी इन लघुकथाओं में कथ्य बनाया गया है ।
‘शुभ-अशुभ’ पवित्रा अग्रवाल की प्रथम लघुकथा है जो 1994 में मनोरमा में प्रकाशित हुई थी । यह इतनी परिपक्व है कि कहीं से भी प्रथम लघुकथा नहीं लगती । इसका कारण संभवतः यह है कि पवित्रा मूलतः कहानीकार हैं । उनकी प्रथम कहानी 1974 में नीहारिका में छपी थी और प्रथम कहानी संग्रह ‘पहला कदम’ 1997 में प्रकाशित हुआ था । यह महज एक संयोग नहीं है कि जो भी रचनाकार कहानियाँ लिखते-लिखते लघुकथा लेखन में प्रवृत्त हुए हैं उनकी लघुकथाएँ भाषा, शिल्प और कथ्य की दृष्टि से दमदार होती हैं । कहानी असीम धैर्य, कठोर अनुशासन और सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता की दरकार रखती है । इन तीनों औजारों से लैस होकर जब कोई रचनाकार लघुकथा विधा में हाथ आजमाएगा तो निश्चित रूप से उसकी लघुकथाएँ पाठकों का ध्यान आकर्षित करेंगी ।
पवित्रा ने अलग ही शिल्प विकसित किया है । वे अपनी लघुकथाओं में लेखक के रूप में लगभग अनुपस्थित रहती हैं । परिस्थितियाँ और पात्र बोलते हैं, लेखक चुप रहता है । उनकी लघुकथाएँ वर्णनात्मक नहीं, चित्रात्मक होती हैं । यहाँ तक कि पवित्रा अपनी तरफ से परिवेश का चित्रण भी नहीं करती । पात्रों के आपसी घात-प्रतिघात, संवाद और मुद्राओं से ही सब साफ हो जाता है । यह लेखकीय तटस्थता बहुत महत्त्वपूर्ण है । लेकिन भूल से या असावधानी से जहां भी यह तटस्थता टूटी है, लघुकथा की कसावट में भी टूटन दिखाई दी है । उदाहरण के लिए ‘तूने क्या दिया’ का यह आरंभ, ‘लालची स्वभाव की शगुन अक्सर अपने पति को ताने देती रहती थी । हमेशा उसके निशाने पर होते थे उसके ससुराल वाले |’ यहाँ लेखिका तटस्थ नहीं रह पातीं । वे अपनी ओर से सूचित करती हैं कि शगुन लालची स्वभाव की है कि वह सदैव ताने देती रहती है वगैरह वगैरह । खुशी की बात है कि ऐसी लघुकथाएँ संग्रह में बहुत कम हैं, इक्का-दुक्का, बस । पवित्रा की लघुकथाओं की सामर्थ्य सटीक संवाद योजना में निहित है । संवाद इतने टटके हैं कि पाठक आरंभ से ही बंध जाता है । ‘एक और फतवा’ का आरंभ इस संवाद से होता है, ‘फरजाना, योगा को चलोगी ?” यह छोटा-सा प्रश्न पाठकों में अकूत जिज्ञासा जगा देता है। इसी प्रकार सजा के इस आरंभ पर गौर करिए, ‘पत्नी ने कहा-तुम भी अजीब आदमी हो, तुमने जज साहब पर भी सौ रुपये का फाइन ठोक दिया |’ पत्नी का संवाद पूरी लघुकथा को एक ही सांस में पढ़ने के लिए बाध्य कर देता है । संग्रह की अधिकांश लघुकथाएँ संवाद प्रधान हैं । यद्यपि इस प्रकार की लघुकथाओं में लेखक परिवेश का चित्रण नहीं कर पाता । परंतु पवित्रा ने इस कमी को भी कहीं-कहीं संवादों के माध्यम से दूर करने की कोशिश की है । ‘स्टेटस’ का यह संवाद इस बात का साक्ष्य है, ‘अब तक तो कुर्सियों पर बैठती थी । मुझे अच्छा तो नहीं लगता था किन्तु यह सोचकर चुप बैठ जाती थी की बड़ी मुश्किल से तो मिली है…आज टीवी पर फिल्म आ रही थी । उसे देखने के लिए वह सोफ़े पर बैठ गई । पिंकी ने टोक दिया कि सोफ़े पर नहीं कार्पेट पर बैठ जाओ…|”
अर्थात कमरे में कुर्सियाँ हैं, सोफा है, टीवी है, कार्पेट है । परिवेश आ गया है । इससे अधिक लघुकथा में न तो गुंजाइश है और न ही आवश्यकता । कुछ लघुकथाओं में पात्रानुकूल हैदराबादी संवाद न केवल लघुकथा की विश्वसनीयता और संप्रेषणीयता में वृद्धि करते हैं वरन पवित्रा अग्रवाल के लघुकथाकर्म को पृथक से रेखांकित करते हैं । मसलन ‘अच्छा किया’ का यह संवाद, ‘सुबह होतेइच मेरे कू खींच के हमारी अक्का के घर को ले के गया…अक्का और उसके मरद को गलीच-गलीच बाताँ बोला और मेरे कू वहीं च मारना चालू किया । फिर हम और अक्का मिलके उसको चप्पल से मारे |’
दरअसल ‘अच्छा किया’ संग्रह की उन सशक्त लघुकथाओं में से एक है जिनमें नारी अपनी सम्पूर्ण चेतना, स्वाभिमान और जुझारूपन के साथ सामने आती है । अन्य दो हैं ‘दबंग’ और ‘काहे का मरद |’ यद्यपि इन तीनों लघुकथाओं की नायिकाएँ निम्न मध्यवर्गीय अल्प शिक्षित औरतें हैं किन्तु परिस्थितियाँ व यातनाएँ उन्हें ऐसे मुकाम पर ला खड़ा कर देती हैं कि जिसे देखकर पढ़ी-लिखी नारीवादी महिलाएं भी दंग रह सकती हैं । ये स्त्रियाँ जिस मोड़ पर पहुँची हैं वह अविश्वासनीय नहीं है बल्कि उनकी अदम्य जिजीविषा और अस्मिता से उद्भूत है ।
संग्रह की कुछ लघुकथाओं में दोहराव अखरता है यथा ‘लक्ष्मी’ व ‘वाह देवी माँ’ या फिर ‘छूत के डर से’ व ‘झटका’ । कतिपय लघुकथाओं का निर्वाह ढंग से नहीं हुआ है और वे चुटकुला बनते-बनते रह गईं हैं जैसे संस्था, कल और आज, जुगाड़, इतना भारी आदि । अच्छे लेखक को निर्मम संपादक भी होना जरूरी है ।
रामेश्वर कामबोज ‘हिमांशु’ संग्रह की लघुकथाओं पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, ‘ये लघुकथाएँ आम आदमी के जीवन की रोज़मर्रा की व्यथाएँ और दुश्वारियाँ, संकीर्णताएँ और उससे उपजे अंतर्द्वंद्व को प्रस्तुत करती हैं । इनका कैनवास घर-आँगन से लेकर राजपथ तक फैला है |’
वैसे पवित्रा जी राजपथ को छोड़कर पगडंडियों पर भी चली हैं । उन्होंने आम आदमी के इतने छोटे-छोटे दुखों को कथ्य बनाया है जिन्हें हम आम तौर पर नज़रअंदाज कर देते हैं। सास-बहू के मध्य तनावपूर्ण स्थितियाँ और किसी एक पक्ष द्वारा रिश्तों को बचाए रखने की चिंता, कथनी और करनी में अंतर के विश्वसनीय चित्र, मीडिया का छद्म, साहित्य और समाज सेवा को भुनाने के बेशर्म प्रयास, बुद्धिजीवियों की बगुला भक्ति, ऊंच-नीच के बदलते समीकरण, शराबखोरी और बेतहाशा संतानोत्पत्ति के चलते मुश्किल होती जा रही जिंदगी आदि विषय संग्रह की लघुकथाओं में अलग ही ढंग-ढब के साथ विकसित हुए हैं । उम्मीद है इन लघुकथाओं को पढ़कर पाठक जरूर स्वयं को बदला हुआ पायेंगे ।
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आँगन से राजपथ( लघुकथा -संग्रह):पवित्रा अग्रवाल;पृष्ठ:104; मूल्य:220 रुपये ,संस्करण:2015, प्रकाशक : अयन प्रकाशन ,1/20 , महरौली नई दिल्ली -110030
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( माधव नागदा, लालमादड़ी(नाथद्वारा)-313301(राज)
मोब-09829588494)

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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