अगस्त-2017

देशरात की परछाइयाँ     Posted: May 1, 2015

इस बार चुनाव आयोग का डंडा कुछ ज्यादा ही तेजी से घूमा ।कोई जलूस नहीं, कोई धूम-धड़ाका नहीं, दीवारों पर पोस्टर भी नहीं ।बस, चौपालों पर छोटी-छोटी सभाएँ, जैसे ये विधान सभा के चुनाव न होकर ग्राम पंचायत के चुनाव हों |
अब वोट पड़ने में सिर्फ सात घण्टे शेष रह गये हैं ।यह झुग्गी-झोपड़ियों का छोटा-सा इलाका है मगर वोट यहाँ बेहिसाब ठुँसे पड़े हैं ।पूरे इलाके में मरघटी सन्नाटा छाया हुआ है मगर कुछ परछाइयों की बेचैन चहलकदमी और फुसफुसाहटें इस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश में हैं |
परछाइयों की पदचाप चारों तरफ फैलती जा रही है ।असली चुनाव प्रचार जोरों पर है ।भरे हाथ परछाई हर झुग्गी में घुस रही है और आश्वस्त कदमों से लौट रही है |
रात के गहराने के साथ-साथ परछाइयों की तेजी और बेचैनी बढ़ती जा रही थी मगर पौ फटते ही वे न जाने कहाँ दुबक गई हैं !
सुबह के दस बज रहे हैं ।सूरज आसमान में काफी ऊपर आ चुका है ।इलाके के पोलिंग बूथ पर एक विकट स्थिति पैदा हो गई है ।वोटिंग के लिए लम्बी लाइन लगी है…लाइन में लगे बहुत-से वोटर नशे में झूम रहे हैं…हुडदंग होने का खतरा बढ़ता जा रहा है…|
चुनाव अधिकारी बेचैन है…वह बार-बार मोबाइल के बटन दबा रहा है…बार-बार सुचना दी जा रही है…व्यवस्था बनाये रखने के लिए अतिरिक्त फोर्स की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुईं तेजी से आ रही हैं…|
रात की परछाइयाँ चिन्ता में डूबीं, बेचैन तथा सहमी हुईं एक तरफ खड़ी हैं ।
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