नवम्बर-2017

देशरिश्वत का फण्डा     Posted: July 1, 2015

सेवा निवृत्त जनरल चावला प्रत्येक वर्ष हेमकुण्ड साहब मत्था टेकने आते थे। इस वर्ष आपदा के कारण यह क्रम टूट गया। मन में मलाल रह गया। किन्तु कुछ दिनों बाद किसी कार्यवश उन्हें जोशीमठ आना पड़ा। यहाँ आकर उन्हें ज्ञात हुआ कि गोविन्दघाट गुरुद्वारा में हेमकुण्ड साहब की अरदास आरम्भ हो गई है, साथ ही साथ मरम्मत का कार्य जोरशोर से हो रहा है। सब कुछ अपनी आँखों से देखने, सुनने और अनुभव करने के साथ ही गुरुद्वारा में माथा टेकने के लोभ से वह गोविन्दघाट आ पहुँचे। शाम का समय था, चारों ओर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।मुख्य द्वार के पास खड़े सिपाही से पूछा– ‘भाई ! पार्किंग !’
हाथ में पकड़े डण्डे को झुलाते हुए उसने कहा– ‘यात्रा तो बन्द है और पार्किंग में सिर्फ़ पत्थर ही पत्थर हैं अभी।’
‘मैं तो सिर्फ़ गुरुद्वारे में मत्था टेकना चाहता हूँ।’
‘तब तो आप गाड़ी यहीं सड़क किनारे लगा दीजिए। मैं हूँ ना।’
‘धन्यवाद’– कहकर जनरल साहब ने टूटे–फूटे, ऊँचे नीचे, पत्थरों से भरे रास्ते को पार कर गुरुद्वारा में मत्था टेका। ग्रंथी साहब से आपदा के भीषण रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव सुने। लौटकर जैसे ही कार का दरवाजा खोला, यमदूत की तरह सिपाही ने कहा– ‘साहब ! पचास रुपये।’
‘किस लिए ?’
‘गलत जगह गाड़ी पार्क करने के लिए।’
‘तो तुम मुझ से रिश्वत माँग रहे हो।’
‘आप जो भी समझिए। नहीं देने पर चालान होगा।’
जनरल साहब उसके इस बदले व्यवहार को समझ नहीं पाए फिर भी बड़े प्यार से उसे समझाते हुए बोले– ‘देखो ! अगर तुम्हें चाय की तलब लगी है, तो होटल चलकर तुम्हारे साथ चाय पी सकता हूँ। चाय के साथ बिस्कुट केक भी इच्छानुसार खिला सकता हूँ। खाना भी खिला सकता हूँ। पर रिश्वत के नाम पर फूटी–कौड़ी भी नहीं दूँगा। यह मेरे उसूलों के खिलाफ है।’
‘पर मेरा तो हक है।’
ऐसी पवित्र जगह पर सरकारी वर्दी की तौहीन करते तुम्हें शर्म नहीं आती ?’
‘शर्म कैसी ?’ पुलिस में भर्ती के लिए सारी योग्यताएँ होने के बावजूद पचास हजार देने पड़े, जिसके लिए पिता को खेत गिरवीं रखना पड़ा।पहले उसे छुड़ाना है। दो साल से इसी वीरान सुनसान जगह पर तैनात हूँ। यहाँ से निकलकर किसी अच्छी जगह पोस्टिंग कराने के लिए मुझे फिर कम से कम पचास हजार देने होंगे, नहीं तो घर परिवार से दूर न जाने कितने सालों तक यहाँ पड़ा सड़ता रहूँगा। मुझे उसका भी जुगाड़ करना है। यह सब मेरी तनख्वाह और आपके चाय–बिस्कुट से तो सम्भव नहीं है। अगर सिपाही
रिश्वत नहीं लेगा तो अपने सीनियर और सिस्टम को सपोर्ट कैसे करेगा ? लेगा, तभी तो देगा।’
जनरल साहब को सिपाही का ‘रिश्वत का फण्डा’ तो समझ में आ गया, लेकिन वह बहुत आहत हुए। मन ही मन कुछ सोचते हुए बोले– ‘चलो, चाय पीते हैं, एक चाय तो बनती है।’
चाय की चुसकियाँ लेते हुए जनरल साहब ने कहा– ‘कितना आसान तरीका इज़ाद किया है लोगों ने, अपनी समस्याओं और विवशताओं के समाधान के लिए– रिश्वत देना और रिश्वत लेना। लेकिन इसका अन्त कहाँ जाकर होगा, क्या यह सोचा है तुमने कभी ?’
‘नहीं सर।’
‘चलो मैं बताता हूँ। तुम,अनजाने में ही रिश्वतखोरों की एक पूरी पीढ़ी तैयार करने में मदद कर रहे हो। परिवार के बच्चे,अन्य सदस्य, नाते रिश्तेदार एवं जान पहचान वाले तुमसे यही गलत शिक्षा लेंगे। सोचो, अगर हर परिवार इसी रास्ते पर चल पड़ा तो देश को डूबने के लिए चुल्लू भर पानी नहीं, पूरा समुद्र भी कम पड़ जायेगा।’
‘मैंने तो कभी ऐसे सोचा नहीं सर।’
‘तो अब सोचो, अभी भी वक्त है। तुम्हारा यह वीराना मिजोरम, नागालैण्ड और अरुणाचल प्रदेश के वीहड़, दुर्गम जंगलों से तो लाख गुना बेहतर है, जहाँ तैनात हर सिपाही के सिर पर प्रतिक्षण मौत के साये मँडराते रहते हैं और महीनों परिवार से सम्पर्क नहीं हो पाता। राशन चुक जाने पर पेड़ की जड़ों और पत्तियों को उबालकर खाना भी पड़ जाता है। मैं स्वयं इन परिस्थितियों का गवाह हूँ। समस्याएँ एवं विवशताएँ कहाँ नहीं हैं ? अगर भर्ती के समय तुमने रिश्वत नहीं दी होती, तो आज तुम माँगते नहीं।’
चाय का आखिरी घूँट भरकर उठते हुए जनरल साहब ने कहा– ‘चलो जो हो गया, सो हो गया; लेकिन आगे के लिए फण्डा बना लो–ना रिश्वत दूँगा, ना लूँगा।तब कभी किसी के आगे आँखें नीची करने की नौबत नहीं आएगी।” इतना कहकर जनरल साहब चाय के पैसे देने लगे।
सिपाही ने आगे बढ़कर उनका हाथ रोक लिया– ‘साहब ! आँखें खोलने के लिए एक चाय तो बनती है।’ जनरल साहब ने मुस्कराकर अपना हाथ खींच लिया।
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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