मई-2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: April 1, 2018

प्रबोध कुमार गोविल

1-निरुत्तर

                एक बार ईश्वर कहीं से गुज़र रहा था कि राह में उसे एक बच्चा मिला। ईश्वर ने बच्चे को अपना परिचय दिया और कहा कि मैं इसी तरह अपनी दुनिया देखने आता हूँ।

                बच्चे ने पूछा, ‘‘आप इतने सतर्क हैं, तो दुनिया इतनी खराब क्यों है?’’

                ईश्वर ने आश्चर्य से कहा, ‘‘क्या खराबी है, तुम मुझे झटपट बताओ, मैं तत्काल कुछ करूँगा।’

                बच्चा बोला, ‘‘देखो, अभी सुबह की ही बात है, पापा चॉकलेट लाए थे, पर मेरी बड़ी बहन ने बड़ीवाली तो खुद खा ली और छोटी मुझे दे दी।’’

                ‘‘ओह! तो यह बात है’’, ईश्वर ने कहा, ‘‘देखो, चॉकलेट मजेदार तो थी, पर उससे कभी-कभी दाँत भी खराब हो जाते हैं, इसलिए तुम खुश हो जाओ कि दीदी के दाँत ज्यादा खराब होंगे और तुम्हारे कम।’’

                बच्चा बोला, ‘‘अच्छा, तो तुम भी अपने को ऐसे ही समझाते हो!’’

                ईश्वर निरुत्तर होकर आगे बढ़ गया।

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2-सतंरगी सोच

                ‘‘बहू, कुछ है क्या खाने को….?’’

                ‘‘ओहो, सुबह दस बजे तो आधा किलो दलिया दूध में बनाकर दिया ही था। अब मुश्किल से तीन बजे है….रसोई है या कोई फैक्ट्री, जो आपके लिए चौबीस घण्टे चलती रहेगी।’’

                झन्नाटेदार आवाज सुनकर बूढ़ा सहमकर अपनी कोठरी में चला गया। बरतन साफ करते-करते मेहरी ने देखा कि कितने फल-मेवे डायनिंग टेबल पर पड़े-पड़े सड़ते रहते हैं, बासी होने पर फेंक दिए जाते हैं।

 बच्चे उन्हें देखते तक नहीं, पर दादाजी का मुँह तो बिना दाँत की बस्ती था, उनकी दाल तो खिचड़ी-दलिया से ही गल सकती थी।

                महरी को एक उपाय सूझा, उसने एक मुट्ठी मेवा सिलबट्टे पर पीसा और जरा से दूध में एक पके केले के साथ मसलकर बुढ़ऊ को पकड़ा दिया। वे सपड़-सपड़ खाने लगे।

                अब ये रोज का नियम हो गया। महरी रोज ये गरिष्ठ व्यंजन दोपहर में टीवी से चिपकी बहू की नज़र बचाकर दादाजी को दे देती।

                कभी बच्चे देख लेते तो सोचते, दादाजी का आई क्यू कितना कम हो गया है ,जो मम्मी की जगह महरी से न जाने क्या-क्या माँगकर खाते रहते हैं!

महरी सोचती,उसकी नौकरी भी ये, जिन्दगी भी ये। झाड़ू-बरतन करते-करते प्राण निकल जाएँगे, कुछ पुण्य भी तो कर ले!

बहू सोचती, पिताजी भी डाँट-डपट से काबू में आते हैं। देखो, अब कुछ नहीं माँगते, मैंने कैसी आदत छुड़ा दी!

शाम को दफ्तर से लौटकर बेटा सोचता-पिताजी की सेहत सुधरती जा रही है, बहू कितना खयाल रखती होगी उनका!

खुद दादाजी सोचते-सोचना-समझना क्या, दिन तो काटने ही हैं।

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3-एहसास

                रोते-रोते ममता के आँसू सूख गए। वह आखिर अपने  पति राकेश को नहीं मना पाई, उसी की खुशी के लिए भीतर उमड़ता सैलाब किसी तरह थामकर, उसकी बात मानकर वह ‘एबॉर्शन’ करवाने के लिए

 तैयार हो गई। राकेश ने अपने कैरियर का वास्ता देकर अभी इस बन्धन में न बँधने की इच्छा बार-बार जाहिर की थी।

                अगली सुबह राकेश और ममता चुप-चुप, खोए-से अपनी परिचित डॉक्टर महिमा मिश्रा के क्लीनिक पर जा रहे थे।

                उन्हें देखते ही डॉक्टर ने हौले-से मुस्कराकर अभिवादन किया और सोफे की ओर इशारा किया, ‘‘जस्ट ऐ मिनट प्लीज!’’

                वह किसी अधेड़-से व्यक्ति से बातें कर रही थीं, दम्पती बैठ गए।

                उस व्यक्ति का चेहरा जता रहा था कि वह घण्टों घुट-घुटकर रोता रहा है, आँखों के नीचे विषाद की काली झाइयाँ-सी खिंची थीं, ‘‘डॉक्टर, मेरा आँगन तो अब जैसे भूत का डेरा बन गया। चौदह बरस बाद

आस की किरण आई थी…सो भी कुदरत से देखी न गई……फूल से बच्चे ने जन्म भी लिया तो लाश की सूरत में…….’’ कहते-कहते उसका स्वर भीग गया।

                ‘‘धीरज रखिए-यह भी क्या कम है कि बच्चे की माँ की जान बच गई, वरना ऐसे हादसे में…..’’ डॉक्टर उसकी बीमार पत्नी के लिए दवा लिखने में मशगूल हो गई। उससे फुरसत पाकर वे राकेश की ओर मुखातिब हुई,

‘‘कहिए, कैसे आना हुआ?’’

                कुछ सकपकाकर राकेश ने कहा, ‘‘बस ऐसे ही, इधर से निकल रहे थे, सोचा आपसे मिलते चलें। कैसी हैं?’’

                ममता आश्चर्य से कभी डॉक्टर महिमा को, तो कभी पति राकेश को देख रही थी। उसके शरीर में भीतर, जैसे कहीं घण्टियाँ बजने लगीं…जैसे कहीं कलियाँ-सी चटखने लगीं…..जैसे….

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4-गमक

                वह चाबुक रोककर नीचे कूद पड़ा। उसके उतरते ही धीमी होती-होती घोड़ी भी रुक गई। ताँगा ठहर गया।

                घोड़ी का आगे वाला वह पैर जिसे बार-बार वह झटका देती थी, उसने सहलाते हुए उठाकर देखा। घाव काफी बढ़ गया था। कहीं-कहीं लहू की बूँदे भी छलककर उसे एक ताजे जख्म की-सी शक्ल दे रही थीं।

 जबकि वह जानता था कि जख्म ताजा नहीं है। पिछले बीस दिनों से देख रहा है वह उसे।

                उसने कुछ सोचकर जेब में हाथ डाला। मन-ही-मन हिसाब लगाया। फिर एकाएक स्टेशन जाने का इरादा मुल्तवी करके ताँगा वापस मोड़ लिया।

                कस्बे का जानवरों का अस्पताल सात बजे बन्द होता था। उसने रास्ते में एक बाबू से समय पूछा, साढे़ छह बजे थे। उसने चाबुक एक ओर रख दी। हाथ से घोड़ी के पुट्ठे सहलाता धीरे-धीरे ताँगा हाँकने लगा। पन्द्रह-बीस मिनट का रास्ता था।

                घोड़ी जब पैर को बार-बार झटका नहीं दे रही थी। उसने देखा, पन्द्रह मिनट के रास्ते में एक बार भी घोड़ी ने पैर नहीं फेंका। अस्पताल के सामने ताँगे से उतरकर उसने एक बार फिर से घोड़ी का पैर उठाकर देखा।

                कुछ रुककर उसने अपनी जेब में हाथ डाला। वह सिर खुजाने लगा। मालूम होता था जैसे कुछ सोच रहा हो।

                फिर वह अकस्मात् लपककर ताँगे पर सवार हो गया और उसने ताँगा स्टेशन की ओर मोड़ दिया। अब फिर से उसने चाबुक हाथ में उठा ली थी ओर वह कुछ गुनगुनाने लगा था।

                मन्थर गति से दौड़ती घोड़ी यह महसूस कर रही थी कि अब उसके मालिक की आवाज़ में उन दिनों-सी गमक नहीं है, जब वह रोज ही अपने सख्त मजबूत हाथों से रगड़-रगड़कर उसकी मालिश किया करता था।

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5-आहिस्ता-आहिस्ता

                उसकी ड्यूटी शहर के नए बने सिनेमा हॉल पर थी। शो-टाइम के अलावा सारा समय आराम-चैन से गुजरता। बातचीत करते ,बीड़ी पीते, इधर-उधर टहलते और भीतर चलनेवाली फिल्म की हीरोइन पर टीका-टिप्पणी करते।

                उस दिन बेशुमार भीड़ थी, ‘क्यू’ का कहीं अता-पता नहीं था। जवान छोकरों की धींगामुश्ती में हर ऐरे-गैरे का टिकट ले पाना नामुमकिन था। काफी देर तक वह दूर से खड़ा-खड़ा सारा माजरा देखता रहा।

                एक बड़े घर का दिखने वाला छोकरा लाइन के बीच में घुसा हुआ था और मधुमक्खी के छत्ते-सी घिर आई भीड़ में दाखिल होकर टिकट लेने की कोशिश कर रहा था।

वह हमेशा की भाँति लाठी घुमाता हुआ भीड़ पर लपका। हड़बड़ी मच गई। लोग निरन्तर तितर-बितर होने लगे।

उस रईसजादे की नजर भी उस पर गई ,पर वह अपनी जगह से हिला नहीं। जैसे ही वह उसके करीब पहुँचा, लड़के ने हौले से अपने हाथ से उसका लाठीवाला हाथ पकड़ लिया।

यह उसके लिए ख़ून खौला देने वाली बात थी। वह उफनना ही चाहता था कि हथेली को किसी कड़कते कागज की सरसराहट महसूस हुई। लड़का अपना टिकट ले चुका था और बचे हुए पैसे जेब में डाल रहा था।

अब वह भीड़ में लाठी घुमाने से पहले चेहरे, जेब और हथेलियाँ तौल लेने का गुर सीख गया है। अन्धाधुन्ध लाठी नहीं बरसाता।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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