जनवरी-2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: December 1, 2017

1-तार

पति जैसे ही दफ्तर से लौटा, पत्नी फौरन चाय-पानी लेकर आ गई। पति बोला-‘‘तीस साल हो गए हमारी शादी को, अगर कभी देर-सबेर भी हो जाए, तो तुम उसी समय चाय-पानी तैयार रखती हो, उधर बहू है अगर बेटा दस मिनट भी लेट हो जाए ,तो फोन कर-करके पूरा घर सिर पर उठा लेती है, पर तुम कैसे जान जाती हो मेरे आने का सही समय।’’

पत्नी-‘‘जैसे तुमने अभी मेरी आहट जान ली ,वैसे मैं भी तुम्हारी आहट पहचान लेती हूँ, हमारा प्रेम उस जमाने का है,जब मोबाइल नहीं था। मोबाइल के बेतार से बड़े हृदय के तार हैं, बहू इस जमाने की है। मैं उस जमाने की हूँ, अब जमाना बदला है तो प्रेम के तार भी बदल गए है।’’

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2-गेंद

बैंक में हाहाकार मचा था। नोट बदलने के लिए, नगदी निकासी के लिए लोग एक दूसरे पर गिर-पड़ रहे थे। सपेरे की पत्नी सुनीता चौथे दिन लाइन में लगी, लस्त-पस्त हो रही थी। नौवाँ महीना उसके पेट को चल रहा था। अपना जमा धन ही निकालने के लिए लोग नाकों चने चबा रहे थे।

सुनीता की बूढ़ी सास बड़ी  उम्मीद लिये बहू को लाइन में लगाए थी, तभी सुनीता की सूरत बिगड़ने लगी, चेहरे पर हवाइयाँ  उड़ने लगीं, फिर चकराते हुए गश खाकर धराशायी हो गई। नई दुनिया में नये मेहमान के आने की दस्तक थी। सास ताड़ गई, फौरन भीड़ हटाते हुए अपनी मैली-कुचैली शाल से पर्देदारी की रस्म निभाई फिर कुछ महिलाएँ भी इस सनातन परम्परा में सहयोग के लिए आगे बढ़ गईं। पुण्य के कार्य में कुछ पुण्यात्माएँ जुड़ीं….फिर कहाँ-कहाँ की सदाएँ बैंक में गूँज  उठीं। जैसे बसंत के नए किसलय फूट पड़े हों।…खजांची आ गया खजांची आ गया….फिर चुहलबाजी के बहाव में भीड़ का उफनता तूफान जाता रहा। फिर कुछ स़्त्री- हृदय इंसान जच्चा-बच्चा की रक्षा की फरियाद मन ही मन ईश्वर से करने लगे, फिर खबर छपी। उनकी फरियाद ऊपर वाले ने सुनी। मुख्यमंत्री ने प्रसूता को दो लाख दिए, कहा-ऐसी नोटबंदी किस काम की….प्रसूताएँ बैंकों की लाइन में बच्चे जन रही हैं। उनका बयान राजनीति के एक पाले से फेंकी गई वह गेंद थी ,जिसे दूसरे पाले वाले ने तीसरे पाले में डाल दिया, तीसरे पाले में जाती हुई यह गेंद फिर राजनीति के दलदल में समा गई। बिला गई।

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3-प्रार्थना

कालेज के लिए जैसे ही घर से निकला, सात साल की भाँजी छत से झाँककर बोली –“मामा चीज लाना’’-कुछ कदम बढ़ा ही था कि तीन साल की दूसरी  भाँजी दरवाजे से झाँककर बोली-“ मामा अड्डू लाना।”

मुड़ा ,उन्हें देखा। उनकी आँखों की मासूमी हृदय के तारों को झंकृत कर गई। कल शहर में कर्फ्यू था,कल उनकी चीज नहीं आ पाई थी। दूध से वंचित रह गईं।आज शाम को इन्हें चीज और दूध मिल जाए, मैं यह प्रार्थना ईश्वर ,अल्ला से करते हुए जा रहा था। ऐसा लग रहा था, मेरी भाँजियों की आँखें मेरा पीछा कर रही हैं, मैं बेचैन था,वे आँखें चीज और दूध नहीं अमन माँग रही थीं। शहर ही नहीं पूरे देश का अमन।

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4-एक पाती आपके नाम

ऐ! बाबू लोगों आप लोग बड़े आदमी हैं-आप लोगन के पास पैसा कौड़ी खूब भरा होगा। आप जहाँ चाहें, वहाँ बच्चों को पढ़ा लें, पर मैं एक गरीब मजदूर की लड़की हूँ,-प्राइमरी स्कूल में रोज पढ़ने जाती हूँ, -मेरी डिरेस आपको देखकर क्या अच्छी लगती है,खाकी सलवार खाकी कुर्ता, खाकी दुपट्टा जैस पूरा-पूरा होमगार्ड बना दिया हो, बच्चों को रंग-बिरंगे कपड़े भाते हैं, ये बात आप नेता मंत्री क्यों नहीं जानते, पोलिस्टर के मिले ये कपड़े गर्मी में बिल्कुल देह चीरते हैं और ठंडक में चपाचप बर्फ से जान लेते हैं-फिर क्यों इन्हें हमारे सिर पर थोपा गया है। ये पैसा वाले लोग क्या जानें हमारे दिल का दर्द, उनकी औलादें तो रोज रंग-बिरंगे कपड़े पहने सकती हैं, पर मेरे नसीब में यह खाकी,खाकी,मुआ यह खाकी ही लिखा है, देखकर जी जलता है, पर पहनूँ न तो क्या करूँ,…खाना भी मिलता है उसमें भी काट कपट, कभी मैली दलिया, कभी सड़े फल, कभी मरी-गिरी दशा में बिल्कुल पनियल चावल की मांड़- सा दूध जैसे सारी महँगाई हमारे खाने पर टूट पड़ी हो, ऊपर से मास्टरों की झाड़ सुनो, झाड़ू लगाओ, कूड़ा उठाओ, मिट्टी यहाँ पड़ी है, झौआ उठाओ, वहाँ डालो, जैसे दुनिया भर के मजदूर मर गए हों…टका खर्च न हो बस बच्चों से करा लो मजूरी-हम गरीबन की सुनने वाला कोई नहीं। हम मरे लोग हैं, कौन हम पर तरस खाएगा, मैं यह फरियाद आप सभी पैन्ट बुशर्ट वाले बाबू लोगों से कर रही हूँ। कभी-कभी तो मन होता है हम गरीबन की जिसने यह दशा बिगाड़ी है, मैं उस नामुराद के सामने जाऊँ फिर चीख-चीखकर कलेजा फाड़कर दर्द की सारी दरिया बहा दूँ।ऐसी-ऐसी बहाऊ जिसमें सब के सेब बह जाएँ। मैं गरीब हूँ -सारी लड़कियाँ दलित होती हैं इसलिए दलित हूँ। मेरे गाँव में न तो बत्ती है, न सड़के ढंग से बनी है, अगर मास्टर साहब जी ढंग से पढ़ा ही देते तो मेरे परिवार का बड़ा भला हो जाता। वो तो बस मोटर साइकिल नचाते रहते हैं, जैसे मौत के कुँए में मदारी नचाता है। इन मदारियों ने हम लोगों को जमूरा बना रखा है, कोई गाँव में मर जाए तो छुट्टी, कोई शादी ब्याह हो तो छुट्टी चुनाव हो तो छुट्टी, कभी-कभी इनकी भी दादियाँ -नानियाँ  मरती रहती हैं। हम कब पढ़ें,कैसे पढ़ें बेटियाँ , कैसे बढ़ें बेटियाँ । अभी खाना खाने के लिए बर्तन बाँटे गए, उस पर भी मंत्री जी का नाम गोदा। पूरा दिन सती हुए भूखे प्यासे तब शहर  से कोई डी.एम.,सी.एम, आए और हमारे  फोटू खिंचवा-खिंचवा खींसे निपोरते हुए हमें बर्तन सौंपे जैसे बर्तन न हों हीरे-मोतियों का दान कर रहे हों।

गरीबों का सब मजाक उ़ड़ाते हैं, थरिया-गिलास भिखारियों सा प्रदान करके हमारी फोटू- सोटू अखबारों में छपा के हम गरीबों का मजाक ही तो उड़ाया गया है। इसे टाई कोट वाले बाबू लोग क्या जानें ,क्या जानें हमारी झोंपड़ी की कुप्पी में पड़े दमड़ी भर तेल का दर्द। अगर उनके बच्चों के साथ ऐसा होता तो? स्कूल में शौचालय दो हैं, पर उन पर भी ताले जड़े रहते हैं। मास्टर-मास्टरानियाँ सिर्फ अपने लिए खोलते हैं-फिर बंद कर देते हैं, मुआ शौचालय न हुआ, पूरा कुबेर का खजाना मालूम पड़ता है। हमें सू-सू या छि छि के लिए खेतों-मेड़ों  हरहा-गोरू सा भटकना पड़ता है। जिससे कभी-कभी तो कुछ लौंडे-लपाड़े हमसे बदतमीजी भी कर जाते हैं, इसे घर पर कहूँ, तो अम्मा कहती हैं तू इतना लीलती क्यों है, मास्टर से कहूँ तो कहते हैं उधर जाती क्यों है। तू है ही ऐसी,मैं ऐसी वैसी नहीं भोली-भाली एक मजदूर किसान की बेटी हूँ, मैं अपने दर्द की दास्ताँ मास्टर जी से लिखवा रही हूँ,-जो भाई बन्धु मेरे लिए कुछ कर सकते हों वो करें मैं इस उम्मीद का दिया लेकर आप शरीफों के दरवाजे बैठी हूँ। आपकी ही एक गरीब बिटिया हूँ।

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5-आशियाना

शहर में अचानक आए एक नये कुत्ते से शहर बोला, ‘‘तुम यहाँ क्यों आए हो?’’

कुत्ता-‘‘क्योंकि वहाँ  के लोगों ने मीट खाना बंद कर दिया था इसलिए यहाँ आया हूँ।’’

शहर-‘‘तुम पुराने शहर लौट जाओ।’’

कुत्ता -‘क्यों’?

शहर-‘‘क्योंकि यहाँ लोग मांस नहीं खाते ,पर एक दूसरे का खून पीते हैं, गोलियाँ खाते हैं, बम खाते हैं ,कभी हिन्दू के नाम ,कभी मुसलमान के नाम नेता यहाँ रोज दंगे भड़काते हैं।’’

कुत्ता-‘‘ठीक है मैं जा रहा हूँ-जहाँ जान पर ही बन आए, वहाँ मुझे एक पल नहीं रुकना। मैं उसी शहर जा रहा हूँ जहाँ से आया हू॥ वहाँ लोग मीट खाना तो बंद कर चुके हैं, पर बेज़ुबानों को रोटी देना नहीं भूलते।’’

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

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