जुलाई-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: July 1, 2017

1-शाब्दिक बलात्कार

‘‘ऊ! समाज कहां जा रहा है? रोज-रोज वही खबरें। 16 दिसंबर की हैवानियत के बाद बने कानून से लगा था कि अब———लेकिन नहीं——-’’ पाठक जी अपनी बेटियों के लिये चिंतित हैं।

‘‘आई-ए-एस- हो या रिक्शेवाला, बाप हो या भाई। सामने मां हो या बेटी। न कोई शर्म, न कोई लिहाज। घर हो या बाहर, रात-दिन हर वक़्त । तेरी माँ की——तेरी बहन की——जुबान नहीं थकती। दिल नहीं भरता। शाब्दिक बलात्कार की और क्या परिणति होनी थी?’’ अलका जी ने पाठक जी पर सीधा वार किया था।

‘‘तुम मुझे कह रही हो न?’’ पाठक जी तुनक गए थे।

‘‘क्या गलत कहा? और जब आप गाते हैं ‘भर फागुन बुढ़वा देवर

लागे——’ फागुन खत्म होने के बाद बूढ़े को बाप और ससुर बनने में दिक्कत तो होगी ही, तो कुछ तूफान तो उठेगा और बेटियों के बाप को तो डर लगेगा ही।’’ अलका जी का क्षोभ बयान हो गया था।

‘‘——’’

‘‘मुश्किल तो है ही। दूसरे के बेटी-बहन से जब तक शाब्दिक बलात्कार होता रहेगा, उस हौलनाक माहौल में पले बच्चे और क्या सीखेंगे? क्या आप आज के बाद शाब्दिक बलात्कार से तौबा करेंगे? बोलिए?’’ अलका जी उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर उठकर जा चुकी थीं।

सवाल अब भी कमरे में गूँज रहा है।

-0-

2-लिहाज

‘मुंबई वाले राजू भैया आ हैं और रोमा भाभी भी। भैया को सिर्फ चार दिनों की छुट्टी मिली थी। तू तो भैया की शादी में अपने गाँव गई थी। तू अभी चल, भाभी को देख लेना। वो लोग कल रात की ट्रेन से जा रहे हैं।’-वसुधा खरीदारी करके लौट रही थी कि तभी उसे रास्ते में अनु मिल गई थी।

‘नहीं वसुधा, आज नहीं। कल दोपहर को पक्का आऊँगी भाभी को देखने। तस्वीर में कितनी खूबसूरत दीखती हैं न? अब खुद देख लूँगी।’ अनु सचमुच खुश हो गई थी।

‘बस खूबसूरत ही हैं, लिहाज तो जरा नहीं। मुंबई में रहने का ये मतलब तो नहीं होता। पता है, पापा के सामने भी मैक्सी पहने रहती हैं।’ वसुधा ने होंठ सिकोड़ कर अपनी नाराजगी व्यक्त कर दी थी।

‘‘पर वसुधा, अंकल के सामने तू भी तो मैक्सी पहने रहती है न?’’

‘तो क्या हुआ? ये मेरा मायका है, ससुराल तो नहीं? भाभी! श्वसुर का लिहाज करना चाहिए कि नहीं?’ वसुधा झुँझला गई थी।

‘बुरा मत मानना वसुधा! लिहाज़ तो सबको करना चाहिए। अंकल के सामने, अरुण और वरुण भैया के सामने, बाहर से आने वाले लोगों और रिश्तेदारों के सामने तू भी तो मैक्सी पहने रहती है। एक श्वसुर से ही ‘लिहाज’ होना चाहिए? बड़े भाई से नहीं? दूसरे बड़ों से नहीं?’ अनु से गलत बात बर्दाश्त नहीं होती।

‘‘मुझे देर हो रही है।’’ वसुधा आगे बढ़ गई थी।

-0-

3-पूजा

‘‘देखो भैया, तुम्हें कोई नहीं पूछ रहा। आज तो मेरी और रिया की पूजा होगी। ‘कुँवारी पूजन’ के लिए आंटी बुलाने आई थीं। हमें नये कपड़े भी देंगी और पैसे भी। खाना तो खिलाएँगी ही। अगर तुम भी लड़की होते न तो—–’’ रिया की खुशी छलकी पड़ रही है।

‘‘चुप कर, बड़ी आई पूजा करवाने वाली। एक दिन पूजा हो गई तो क्या? घर में जूठे बर्तन तो तुम दोनों ही धोती हो? खाना तुम्हीं दोनों को बनाना पड़ेगा, मुझे नहीं। आज के बाद क्या ये काम नहीं करोगी देवियो? मैं क्यों लड़की बनता? मुझे तो आज भी ऐश करना है, कल भी और हमेशा ही। क्या समझी? अब बताओ, जा कहाँ रही हो देवी जी?’’

‘‘मैं आंटी को मना करने जा रही हूँ। मुझे नहीं करानी झूठ-मूठ की पूजा।’’ अब यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः का पहला पाठ सिया को समझ आ गया था।

-0-

4-अफीम

टी-वी- पर गाना आ रहा है-‘हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना——।’

‘‘नीना जी! समझ रही हैं न?’’ रमन रोमांटिक हुआ जा रहा है।

‘‘समझ रहे हैं। लेकिन इस गाने को अगर थोड़ा बदल दें तो?’’

‘‘बदल दीजिए, बदल दीजिए। हमने कब रोका है?’’

‘‘तुम्हें हमसे दहेज कितना, ये हम नहीं जानते मगर तुम शादी कर नहीं सकते दहेज के बिना——–।’’

‘‘सत्यानाश! आपने तो मूड का कचरा ही कर दिया।’’

‘‘हम थोड़े ही किए। हमें भी आपसे प्यार है। दीदी के देवर हैं। हमारे ही जाति के हैं। आपका घर-बार जाँचा-परखा है मगर दहेज के बिना बात तो बनेगी नहीं न?’’

‘‘बाद की बाद में देखेंगे। अभी तो जी लें। रमन ने बेशर्मी भरा जबाव दिया था।’’

‘‘हाँ, हाँ, आप तो अभी भी जिएँगे और बाद में भी मगर हमें जनाब दहेज की आग में जलना मंजूर नहीं। ये अफीम किसी और को चटाइए।’’ टी-वी- बंद करके नीना ने टेपरिकार्डर पर ‘खामोशी’ का कैसेट लगा दिया था, गाना आने लगा था-‘इश्क एहसास है ये रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो—–’

-0-

5-चापलूसी

वर्मा जी आज बड़े नाराज दीख रहे थे। रह-रह कर ताव खा रहे थे-‘‘जाने ये दूबे जी अपने को क्या समझते हैं? किसी की इज्जत की पोजीशन की तो कोई परवाह ही नहीं करते। इनकी तो निभेगी तो बस उसी से जो रात-दिन इनकी चापलूसी करता रहे। ये ठेका मुझे मिले या नहीं, मेरी बला से ,पर मुझसे नहीं होगी ये चापलूसी।’’

‘‘आप समझते क्यों नहीं? जो आदमी खुद रात-दिन चापलूसी करता हो, उसे भी तो यही पसंद होगा न कि उसकी भी चापलूसी की जाए, है कि नहीं? देखते नहीं सुबह चार बजे से छह बजे तक पूजागृह में बैठे गिड़गिड़ाते रहते हैं। फिर शाम को भी बिना नागा ‘छह’ बजे से आठ बजे तक ईश्वर के दरबार में हाजिरी बनाते हैं। हर साल नियम से वैष्णों देवी और तिरुपति जाते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं। हर साल आते रहने का वचन देते हैं ताकि उनके खजाने में वृद्धि होती रहे, रुतबे में कमी न आए।’’

—–

‘‘लोग उनकी चापलूसी करेंगे ,तो ही तो वो भी किसी को ठेका देंगे? इसी गुण पर रीझकर तो ईश्वर ने उन्हें ये रुतबा बख्शा हैं। आपको तो ये दिन में एक बार करना है। उस बिचारे को तो सुबह-शाम दोनों वक़्त ईश्वर के दरबार में हाजिरी देनी होती है। उनकी भी तो सोचो।’’ पत्नी ने समझाया था।

‘‘हाँ, भई, बात तो तुमने पते की कही है। चलता हूँ, जब चापलूसी ही करनी है तो दूबे जी की ही किए लेते हैं।’’

पत्नी के चेहरे पर इत्मीनान फैल गया था।

-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine