अगस्त-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2017

1-रोज़मर्रा

सुरेश नहाते हुए गुनगुना रहा था और सोच रहा था, ‘ये सुचेता है न रोज़ ही कुछ-न-कुछ कमी निकाल देती है। कभी शर्ट ठीक नहीं लग रही, तो कभी मौज़े ढीले हैं, कभी मूँछ छोटी-बड़ी है, तो जूतों पर पॉलिश नहीं। कपिल शास्त्री-फोटोकभी कुछ-कभी कुछ। आज देखता हूँ, कैसे निकालती है। योजनाबद्ध तरीके से चल रहा हूँ अब तक, आगे के सब काम भी ठीक से निपटा सकता हूँ।

—पर आज काम भी बहुत सारे हैं। बेटी की स्कूल फीस भरनी है, क्रेडिट कार्ड का पेमेंट करना है, कार की, मकान की किश्त बैंक में जमा करनी है, बिजली, टेलीफोन का बिल भरना है। साढ़े दस तक बैंक खुल जाते हैं, दस बजे तक हर हाल में घर से निकल जाऊँगा।’

उसने गुसलखाने से निकलते ही गीज़र चालू कर दिया था, टूथ पेस्ट टयूब को पिचकाकर बचे-खुचे पेस्ट को निकालकर ब्रश किया था। शेविंग के बाद आफ्रटर शेव भी लगा लिया था। नहाने के लिए अंडरगारमेंट और तौलिया पहले ही बाथरूम में लटका लिये थे। गरम और ठण्डे पानी को मिलाकर नहाने लायक बना लिया था।

नहाकर निकला तो बगल में पाउडर भी लगा लिया। तौलिया लपेटे-लपेटे ही पूजा भी कर ली। डायनिंग टेबिल पर नाश्ता तैयार था, सो वह भी कर लिया। पेंट-शर्ट पहनने के बाद ऊपर की जेब में मोबाइल, पेन, पढ़ने का चश्मा और गॉगल डाल लिए। पर्स,रुमाल और कुछ खुल्ले पैसे पेंट की जेब में याद से रख लिये। हर जगह बाइक खड़ी करने के लिए लगते ही हैं।

कमर पर हाथ लगाकर टटोला, बेल्ट भी लगा लिया है। घड़ी कलाई पर है। जूते-मोज़े डटा, अपना बैग और हेलमेट उठाया, दीवार पर लटके हुए कई गुच्छों में से बाइक की ही चाबी निकाली— और फिर सुरेश ने सुचेता को आवाज़ दी कि वह जा रहा है, दरवाज़ा बंद कर ले।सुचेता ने अंदर से आवाज़ लगाई, आ रही हूँ। सुरेश निश्चिंत था कि आज तो सुचेता कोई कमी नहीं निकाल पाएगी।

अगले ही पल कमर में साड़ी खोंसे, सुचेता सामने खड़ी थी। वह और दिनों की अपेक्षा शांत थी, लेकिन मुस्कुरा रही थी। सुरेश खुश था कि आज वह आखि़रकार सफल हो ही गया।पर सुचेता की मुस्कुराहट देखकर उससे रहा नहीं गया। बोला, ‘क्या बात है, तुम मुस्कुरा क्यों रही हो?’

सुचेता बोली, ‘एक मिनट रुको’- और वापस अंदर चली गई।

‘अरे यार, मुझे देर हो रही है और तुम हो न कि बस कुछ न कुछ, टोक ही देती हो’- सुरेश झल्लाया।

सुचेता आईना लिये लौटी। सुरेश के हाथ में पकड़ाते हुए बोली, ‘ज़रा इसमें भी तो देख लीजिए, आप कितने सुंदर लग रहे हैं।’

आईने में अपनी शक्ल देखते ही सुरेश बुरी तरह झेंप गया। दरअसल वह आज कंघी करना तो भूल ही गया। उसके बाल चिड़िया का घोंसला हो रहे थे। सुचेता ने  उसकी अगली प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए बगैर, अपनी कमर में खुँसा कंघा निकाला,एड़ियाँ उचकाकर थोड़ी ऊपर उठी, सुरेश का सिर झुकाया और बाल सँवारने लगी।

सुरेश ने भी सुचेता के गालों पर हौले से एक मीठा चुम्मा रख दिया।

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2-व्हाइट  कॉलर   जॉब

सुबह-सुबह मुँह अँधेरे ही सैंपल्स से लबालब भरा पच्चीस किलो का डिटेलिंग बैग उठा प्रकाश अपने मैनेजर के साथ जब बस में चढ़ा ,तो वह ठसाठस भरी हुई थी। पीछे वाली लंबी सीट पर भी बत्तीसी जमी हुई थी। एक आध दाँत टूटने के इंतज़ार में वे दोनों वहीं खड़े हो गए। अगला गाँव आने पर एक की जगह खाली हुई तो उसने मैनेजर को बिठा दिया। एक ग्रामीण अपनी कुछ बकरियों को लेकर भी चढ़ गया। एक और गाँव आने पर उसे भी मैनेजर के पास ही जगह मिल गयी। मैनेजर का प्रवचन शुरू हो गया,

‘ऐसे तो नहीं चलेगा! इंटीरियर्स का बिज़नेस बढ़ाना पड़ेगा, रिटेल ऑर्डर बुकिंग बढ़ानी पड़ेगी, प्रेस्क्रिप्शन्स बढ़वाने होंगे, इस साल एक करोड़ का टारगेट ओवर शूट करना ही है, तुम्हें  ज़िम्मेदारी लेनी ही होगी, नए प्रोडक्ट्स तो स्थापित करने ही हैं, पुराने भी डाउन नहीं होने चाहिए।’

डीज़ल, बकरियों की गंध, सड़कों के गड्ढों के उछाल और उसकी बकबक से जी मिचलाने लगा। उसे लगा कोई बिजली की तरह उसके दिमाग़ में घुसकर उसे चार्ज करने की कोशिश कर रहा है और वो मेन स्विच ऑफ कर देना चाहता था। इसी कोशिश में लगा जैसे मध्यमवर्ग और मध्यमवर्ग के बीच ही कैक्टस की दीवार उग आई हो। व्हाइट अलग, कॉलर अलग और जॉब अलग-अलग छितर से गए थे।

बस स्टैंड पर उतरकर दोनों ने मुँह धोकर रुमाल से मुँह पोंछा, चाय पी और जेब में रखी टाई लगाकर, छोटी कंघी से बाल संवारे और तीनों को फिर जोड़ लिया। मुस्कुराते हुए डॉक्टर के कमरे में दाखिल होते हुए अभिवादन किया, ‘वैरी गुड मॉर्निंग सर।’

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3-बॉडी  गार्ड

मोहित जैसे ही काम से घर लौटा, अटका हुआ दरवाज़ा खोलकर, चौके में काम कर रही पत्नी नेहा की खुली हुई घनी काली जुल्फें हटाकर, सुराहीदार गर्दन में प्यार से हाथ फेरते हुए उसे पीछे से अपनी मज़बूत बाँहों में भींच लिया, कामाग्नि भड़काते इस स्पर्श को पाकर उसने भी शरीर ढीला छोड़ दिया और चेहरा उसकी और घुमाकर होंठ अधखुले छोड़ दिए, जिनके मिलते ही मदहोशी के आलम में अभी आँखें मुँदी ही थीं कि तभी अचानक चटाचट-चटाचट पीठ पर पड़ती नन्हीं हथेलियों के दर्द से अरे-अरे करते हुए न चाहते हुए भी छोड़ना पड़ा।

पता नहीं किसी कमरे से दौड़ती हुई बेटी रिंकू आई और इन अप्रत्याशित प्रहारों से अपनी मम्मी को बचाने का प्रयास करने लगी।बढ़ती बच्ची को इन स्पर्शों से शिकायत ही नहीं सख़्त ऐतराज़ भी था। उसे लगता था कि पापा-मम्मी को बेवजह परेशान कर रहे हैं।

मम्मी भी रिंकू का पक्ष लेते हुए शरारत भरे अंदाज़ में बोली, ‘अब मुझ तक पहुँचना, तुम्हारे लिए इतना आसान नहीं है, ये मेरी बॉडी गार्ड है।’

बच्ची ने इस प्रतिष्ठापूर्ण पद से नवाज़े जाने पर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया।

‘अच्छा! तो हमारे प्यार का सबसे बड़ा दुश्मन तो, हमारे घर में ही पल रहा है, वैसे तो तुम दोनों मेरे दो हाथ की हो पर क्या करूँ! मैं भी प्यार के हाथों मज़बूर हूँ, कई बार हार कर खुशी मिलती है।’ मोहित ने शैतानी भरे अंदाज़ में अपनी बात रखी और बोला,’प्यार, ऐसे तो बहुत मुश्किल हो जाएगी, इस कबाब में हड्डी को कुछ समझाओ।’

नेहा ऐतराज़ जताते हुए बोली,’मेरी प्यारी बच्ची को प्लीज़ हड्डी मत बोलो’ और उसे समझाते हुए निर्देश दिए कि अब से जब मैं बोलू, तब ही आक्रमण करना, अन्यथा नहीं।अपने अधिकारों में कमी होते देख रिंकू भी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए बोली, ‘लेकिन जब पापा आपको परेशान करते हैं, तो आप खुद मना नहीं कर सकतीं!’

एक पल को नेहा अनुत्तरित रह गयी मानो बच्ची ने उसे इस षड़यंत्र में शामिल होने पर रंगे हाथ पकड़ लिया हो ।फिर स्वयं मासूम बनते हुए जवाब दिया, ‘क्या करूँ! तेरे पापा मेरे पति भी तो हैं।’

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4-आगंतुक

जनवरी की कड़कड़ाती ठण्डी रात में जब बाज़ार से सामान लेकर लौट रहा था तो आठ दस सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पहले पड़ाव पर पहुँचते ही, पोर्च में से जहाँ कई दुपहिया वाहन खड़े रहते हैं, कूँ-कूँ की आवाज़ आई। देखा तो एक छोटा गब्दुल्ला-सा पिल्ला गाड़ियों के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था। वो अभी कुछ दिनों पहले ही पैदा हुआ था और अपनी माँ, भाई-बहनों से बिछुड़कर हमारे अपार्टमेंट में पनाह ढूँढ रहा था।

फ़्लैट्स के सभी परिवार अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे और अब यहाँ सिर्फ मैं और वह ही आमने-सामने थे। मैंने अपने दोनों होंठ भींचकर और साँस अंदर खींचकर पुचकार की आवाज़ निकाली तो उसकी कूँ-कूँ बंद हो गई और दो चमकीली आँखें मुझे आशा-भरी निगाहों से देखने लगीं। ऐसी ही आवाज़ मैं अपनी बेटी के लिए निकालता था, जब वो बच्ची थी और जब वह मचलकर रोती थी।

मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा रह गया। दुविधा में था कि ऊपर जाऊँ या नीचे। अगर उसे ऊपर उठा कर ले गया तो श्रीमतीजी का कोपभाजन तो बनना पड़ेगा और अगर उसकी माँ उसे ढूँढते हुए आई तो वह निराश होगी, परंतु यहाँ छोड़ा तो भूख से वो सुबह तक मर जाएगा।

मैं जब उसकी ओर बढ़ा तो वह मुझसे डरकर, घिसट-घिसट कर फिर गाड़ी के पीछे छुपने लगा ;परंतु कमज़ोरी के कारण ज़्यादा दूर नहीं जा पाया। मैंने उसे दूसरे हाथ में उठा लिया।

बेटी ने दरवाज़ा खोला ,तो मेरे साथ आये इस नए आगंतुक को देखकर चौंक गई फिर खुशी से चिल्लाकर मम्मी को बुलाया। बेटी द्वारा उसके आगे परोसी गई दूध की कटोरी वो फौरन ही चप-चपकर पी गया। फिर दूसरी और तीसरी भी, जिसमें पत्नी ने कुछ ब्रेड के टुकड़े भी डाल दिए थे।

मैंने दवाइयों का एक कार्टन निकाला ,जिसमें कुछ पुराने टॉवल बिछा दिए। बेटी ने गौर से देखा और बोली, ‘पापा, ये रो रहा था और ठण्ड से काँप भी रहा था। दूध मिलते  ही वो चैन की नींद सो गया।’ और हम इस नए-नए मेहमान की आवभगत में व्हाट्सएप्प, फेसबुक, टी-वी-सीरियल सब भूल चुके थे।

पत्नी ने तिरछी नज़रों से देखा और कहा, ‘ले तो आए हो, अब तुम ही इसकी गन्दगी भी साफ करना।’

मैंने गहरी साँस ली! बेटी ने मेरी तरफ देखा और हम दोनों मुस्कुराए, जैसे कह रहे हों, ‘शुक्रिया, वह तो हम कर ही लेंगे।’

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5-ज़िन्दगी की छलाँग

भारी उमस के बाद काली घटा छायी,बादल गरजे,बिजली कड़की और बरखा रानी जमकर बरसी।

लोग बारिश रुकते ही घरों, दफ्तरों और फ़ैक्टरियों से निकल लिए थे। वह भी अपनी स्कूटी लेकर निकल लिया। शाम एकदम-से रात में तब्दील हो गयी थी। लौटते समय कॉलोनी की उस सड़क पर वह करीब-करीब अकेला ही था। सोडियम वेपर लैंप की पीली रौशनी में उसने देखा—आने-जाने वाली गाड़ियों से बेपरवाह एक बाल-मेंढक छोटी-छोटी छलाँगें लगाता सड़क के उस पार जाने की कोशिश कर रहा था। उसके, किसी तेज रफ़्तार गाड़ी के नीचे आ जाने की पूरी सम्भावना थी। उसे त्वरित निर्णय लेना था। एक पिद्दी-से मेढक के लिए उसे अपनी रफ़्तार पर लगाम लगानी चाहिए या निकल जाना चाहिए। उसकी पहली दो छलांगें बराबर दूरी की ही थीं। तीसरी छलांग में कुछ भी संभव था। यह कि वो स्कूटी निकलने से पहले पार हो लेता; और यह भी कि घूमते टायरों से टकरा जाता। उछलकर, हवा में रहने के दौरान मेंढक अपनी गति नियंत्रित नहीं कर सकता। वह स्कूटी की कर सकता था; मगर गति और दूरी का तालमेल उसकी तीसरी छलांग के साथ बिठाने में वह चकरा रहा था। फिर भी, उसने मेढक पर बराबर नज़र जमाए रखी। इस छलाँग का पड़ाव ठीक अगले टायर के सामने देखकर उसने दोनों ब्रेक दबा दिए। चीं…ऽ……की आवाज के साथ स्कूटी रुक गई। पूरी कोशिश के बावजूद भी, अगला टायर हल्का-सा छू ही गया। उसके छूते ही मेढक सड़क के उस ओर जा गिरा। एक पल के लिए वह सकते में आ गया। लेकिन तभी, लगभग अचेत हो चुके मेढक में कुलबुलाहट हुई। वह सीधा बैठा और उसने चौथी छलांग लगा दी—जिन्दगी की सबसे बड़ी छलाँग।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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