नवम्बर-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2017

1-सेवाभाव

गाड़ी धीरे-धीरे प्लेटफार्म छोड़ रही थी और बाबू जी शीशे से हीक भर बेटे को निहार लेना चाहते थे। समय को कौन जाने? अस्सी पार कर चुके पहले भी छोटे के पास आया करते थे,दोनो लोग। परंतु कभी अकेले वापस न गए थे। लाख समझाते कि स्टेशन तक छोड़ दो बाकि…डायरेक्ट गाड़ी है तो कोई चिंता नहीं। मगर जी आधा हो जाता तथा बेटा घर तक सकुशल पहुँचाने जाता। अब उसके पास समय कहाँ  तमाम भवद्वंद…ऑफिस, संस्थाओं के बुलावे, सोसायटी की मीटिंग्स। घर गाँव छोड़े बीस साल बीत चुके थे। अपनों के लिए बहुत कुछ करने की ख्वाहिशें लेकर सर्विस ज्वाइन की थी। अपनपौ अपने तक सिमट रहा था और जो नये अपने हो रहे थे वे कितने स्थायी, विश्वसनीय….?

नई दुनिया में वह अब नया नहीं था। एडजस्टमेण्ट और कोपअप को आत्मसात् करने की कला इस लाल में निखर रही थी। घर-बाहर दफ्तर और चार भले लोगो में परिस्थिजन्य सुपात्रता प्राप्त कर ली थी; इसलिए कहीं भी उसके प्रति मुखर दशा न होती। आधुनिक आदर्श करेक्टर बाबूजी का यह छोटका।

राजधानी एक्सप्रेस के सेफ क्लास में बिठा देने से श्रवण कुमारीय कर्त्तव्य की इति श्री संपन्न हो रही थी। बाबूजी के पास सामान कुछ विशेष था नहीं। एक कुर्ता-धोती पहनते थे दूसरा बैग में। घर से आते वक्त जरूर, अचार, मेथउरी, चना के साग ओर अमावट से एक झोला भर गया था। बड़ी बहू ने भतीजों के लिए कुछ कपड़ा-लत्ता भी भेजे थे।

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“गजब होइगा, चाय दिहिसि बनावै के?’’

बैरा नाश्ता रख चला गया था। सब कुछ फास्ट और फटाफट निपटाने वाले कब का ब्रेकफास्ट निपटा चुके थे। बाबूजी पहली बार अकेले। उठकर पानी भी न लेत थे मगर अब…। दुबे जी, किरपा को बता आए थे कि अबकी लंबे समय के लिए जा रहे हैं। सुबह-शाम टहलने के यही साथी थे। सुख-दुख इन्हीं से मगर जी न लगा।

पाँच बजे तड़के मिलन की जीवन चर्या शुरू हो जाती। बहू-बेटे मिलकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते। दो बेटे….. और इन्हीं में छिकर मारते। डाट-डपट, प्यार दुलार से खटपट-खटपट करते बॉय-बॉय। स्कूल जाने का प्रथम अध्याय संपूर्ण होता। मिलन के पास मिनट-मिनट का हिसाब। योगा और न्यूज एक साथ निपटते। पानी और चाय में गैप हो ही नहीं पाता और ब्रेकफास्ट का अलार्म। बड़ी तेज गति से काम करने की आदत। एक नौकरी करते हुए डॉक्टरेट तक की भारी डिग्रियाँ, समय प्रबंधन का प्रमाण थीं। बाबू जी से बात कम करने की आदत शुरू से ही थी और बहू, ’बहू’ ही।

पेपर रखा है…

खाना खा लीजिए…….

टी वी देख लीजिए…….

मैं मार्केट जा रही हूं……

देख लीजिएगा….

कुछ निश्चित संवाद, निश्चित समय पर ही एकपक्षीय। उनको सुनने समझने का वक्त कहाँ ? यहाँ  शहर में मंगरी-षुक्रवारी बाजार न थी।

कभी-कभी……’पानी लाव, पान कहाँ  है, झोला..रुपइया…हाँ  अउर का रहिगा..’  बाजार की यह लंबी तैयारी उन्हें कुछ बरस पहले ले जाकर खड़ा कर देती। अब करने के लिए कुछ नहीं। सब कुछ उपलब्ध। उनकी पसंद नापसंद पीछे छूट गई थी.. बहुत पीछे। उनके लिए पूरा एक कमरा यहाँ  भी था और बड़े विलास के घर पर भी। दोनों जगह गृह विभाग गृहणियों का था हिमाकत करना…..। टूट से गये थे। एक दिन जब सुबह घूमने गये तो पूरा सामान ऊपर षिफ्ट कर दिया गया। आये तो पोती ने कहा था ’बाबा, आप का आसन ऊपर लगा दिया है। बिस्कुट,नमकीन, चना, गुड़ सब कुछ रख दिया गया है। आपको बार-बार मांगना न पड़े।’ बाबूजी दुखी नहीं हुए थे उन्हें इसका आभस हो गया था। वे ऊपर पदोन्नत कर दिये गये थे। छत पर बैठे रहते….। वहीं खा पी कर पड़े रहते। मिलन और बेटी सुरेखा को रोज एकबार दबी आवाज में ’हालचाल लेना था…।’ बेटों की इच्छाओं, खुषियों को अपना मान लेने का मान समाज में आदर्ष परिवार के रुप में हो रहा था।

एक ही बार कहा था कि लाला टिकट करा दो और मिलन षाम को दफ्तर से लौटते वक्त तत्काल की टिकट ले आया था। बहू निष्चेश्ट थी…। जब अपना खून…..।

खुद पांचवी जमात से आगे स्कूल न देखा था। मगर बच्चों की तालीम में खून पसीना एक कर दिया था। बिटेऊ, हाँ  यही नाम था उकी पत्नी का। ऐसी केमेस्ट्री कि…..। आज तो बात-बात में वाद-विवाद तर्क-वितर्क। एक राम कहेगा दूसरी रहीम। औपचारिकताएं बनावटीपन पति-पत्नी तक में।

‘तुम कबो हियां रहयो कबो हुवां।’

‘तुम कहाँ  जइहो?’

‘हम तो चली जाब…….।’

शायद पूर्वाभास था उन्हें जानलेवा कैन्सर का?

संतोषी,     शान्त , मिलनसार     ,नात-ग्वांत और बाबूजी का ’लाला’ नाम तो कभी लिया ही न था, आते वक्त चुप्प, घुर मुहाँ  विलास।

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’एक रोटी अउर तो एक रुपिया। बिटेऊ घैरि से गरम-गरम रोटियां निकालतीं और  बाप-बेटे में प्रतियोगिता होती। तब मिलन और सुरेखा छोटे-छोटे थे। पता न अब काहे……। एक जबरि कुकुरि और उसी की खिदमत। पहले वाली बात और थी….। बाबू जी गुस्सा पीना सीख गये थे …………………।

‘गुस्सा न होय कबौ। धेरिया-बहुरिया आदमी कै बात तो तरे नहीं धरतीं तो फिरि……। लरिका सुनिहैं तो….। कलह न होय पावै।’

सिर पर काल रुपी कैंसर का इलाज दिल्ली कराने जाते वक्त इत्ता ही तो बोल, बतला पाई थीं।

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बी चवालिस

हाँ  यही है।

डोर टू डोर कूरियर सेवा से बाबू जी का ट्रेन टिकट आ गया था। अगले महीने के उन्तीस का कन्फर्म। मिलन को बाहर जाना था सो छोटी बहू ने फरमान पास कर दिया था कि घर की रखवाली के लिए बाबू जी को बुला लिया जाए।

बाबू जी ने गंगाराम कैलेण्डर में उन्तीस नवंबर पर पर गोला लगा लिया था ताकि जाने की तारीख सबको दिखती रहे।

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2-जंगल जलेबी

चेक वन टू थ्री…….चार्ली…..चार्ली…..चार्ली दिस इज जैक पॉट कालिंग।

सिपाही निर्मल बख्श वायरलेस पर लगातार कॉल दे रहा था बट डेस्टिनेशन से नो रिप्लाई। कमाण्डर नन्हके सिंह का फौलादी ऑर्डर कि उन्हें लेट नाइट डिस्टर्ब न किया जाए। यह उनके रेस्ट का टाइम। हाँ  ’रेस्ट’ यही शब्दावली इनके लिए प्रयोग की जाती है जब ये महँगे सोमरसों से धुत्त हो नाइट इन्ज्वाय करते हैं। सोते तो सिपाही हैं- देश के प्रहरी ! बड़े अधिकारियों के कृते कनिष्ठ उनकी जगह ,जहाँ  इनका नाम पद लिखा होता है- जलेबी बिठा देता है।

निर्मल बख्श पिछले दो महीने से सीमाओं की रखवाली कर रहा है। अगली सुबह अगली जिंदगी। पड़ोसी के भरोसे मौत का भरोसा हर क्षण। देश की इस सरहद पर कोई सैटेलाइट सिस्टम काम नहीं करता। सारी आवृत्तियों पर हैवी जामर। नीचे कार्यालय से जवानों के घर-परिवार से ’ऑल नार्मल’ रिसीव कर इधर भी ’ऑल नार्मल’ तसदीक कर दिया जाता। यह ’ऑल नार्मल’ रुटीन था। प्राब्लम तो उस दिन हुई थी जब हेडक्वार्टर को ऑल नार्मल कनवे कर दिया गया ,मगर उसी दिन लैण्ड स्लाइडिंग और बर्फीले तूफान से तीन जवान….। अगला डिटेल चार्ज लेने पहुँचा था, तो पोस्ट अनमैण्ड ! स्निफर डॉग्स ने बर्फ सूँघकर…मानुष- गंध। और शहीदों का पूरे सम्मान के साथ…….।

नन्हके सिंह ने सर्विस बुक में बहादुरी के कई इंदराज पुख्ता किए थे। तमाम विशेष अलंकरणों के चलते ही उन्हें फ्रंट का चार्ज दिया गया था। जबान से निकला हर लफ्ज…….एक्जीक्यूट और डन। यहाँ  ’नो शब्द’ का अस्तित्व नहीं । सूचनाधिकार का प्रवेश यहाँ  वर्जित। जैसे मर्जी जोतो। जब कभी दिल करता हेलिकॉप्टर से बर्फ का नजारा ले लेते । इसके लिए पेपर्स भरे जाते-इंस्पेक्शन कंप्लीटेड। ’ऐनी प्राब्लम ?’ प्रति उत्तर में सिपाहियों का जवाब ’नो प्राब्लम.. सर।’

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हू कम्स देयर ? कौन है वहाँ …? तीन बार भी पूछने पर कोई जवाब नहीं। सेफ्टी कैच फॉरवर्ड और ट्वन्टी राउण्ड….।

बगल के गांव के गड़रिए भटकी भेड़ों को हेरते-हेरते….। ये न अंग्रेजी जानते थे न हिंदी। निर्मल बख्श माथा पीटकर रह गया।

……पाप का बोझ सबल को नही सताता।

‘शहीद जग्गा सिंह को वीरता चक्र मरणोपरांत।’ गणतंत्र दिवस परेड पर रौबीली कमेन्ट्री।  …..हमारे जाँबाज सिपाही तमाम विषम परिस्थितियों में शत्रु का डटकर मुकाबला करते हैं।

’प्वाइण्ट 235 चौकी पर चार घुसपैठियों ने कमाण्डर नन्हके सिंह पर उस समय धावा बोल दिया जब वे इस चौकी का निरीक्षण करते हुए जवान का वेल्फेयर ले रहे थे। माइनस 20 डिग्री पर तैनात कमाण्डर सिंह ने अपने अदम्य साहस और पराक्रम से तुरंत मोर्चा सँभालते हुए इन्हें वहीं मार गिराया। अपनी बहादुरी का लोहा मनवाते हुए उन्होंने राष्ट्र की एकता-अखण्डता पर आँच न आने दी। उन्हें इस साहस पूर्ण वीरत्व पर महावीर चक्र से सम्मानित किया जाता है। कमाण्डर नन्हके सिंह…।’

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सिपाही निर्मल बख्श की ड्यूटी अब पीस एरिया में लग गई है। गणतंत्र दिवस का सीधा प्रसारण चालू है……….

‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की……………………।’

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3- गुरु

 टोपी बिल्ला आई का, वोट रविन्दर भाई का।

रविन्दर दद्दा आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं।

जेठ माह की की लू में चुनाव प्रचार करते कार्यकर्ता। हलक सूख रहे थे। घंटा भर हो चला था चिल्लाते-चिल्लाते। ’कहाँ  मर गए स्साले……कहे थे ग्यारह तक आ जाएँगे। मोबाइल लगाव तो करन भाई..।’

टॅूऽ….टूँऽ…..बिजी बता रहा है।

’वह देखो गर्दा दिख रही है……’

……….रविन्दर भाई का……साथ हैं।’जोशीली आवाजें गूँजने लगीं। स्कार्पियो, बोलेरो का काफिला। माला-फूल और जय-जयकार।

का करन कइसा चल रहा है इधर….सुने रहन कि कुछ वोट गड़बड़ा रहा है…..आ।आंय….अपै हिसाब से मैनेज करो हाँ । सब लोग आराम से प्रचार करिहैं……कोई कमी न रहै।

पुतान जाव देखि ल्यो……।

जीतेगा भाई जितेगा अबकी रविन्दर जीतेगा।

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ठण्डा पीकर कुछ देर ये लोग शान्त रहे। बाँट-बराव हो गया तो…….।

’मुहर तुम्हारी कहाँ लगेगी….ऊपर वाले खाने में।’

जोर-जोर चिल्लाओ आ ही रही होगी। कही थी बारह एक तक पहुँचेगी।

जागी है भाई जागी है……नारी शक्ति जागी है।

मशीनी रथों से उतरती नारी चिंतक। प्रार्थिनी स्वयं कैसे आतीं। तमाम जगहों पर कैंपेनिंग करनी थी।

सब ठीक है न करन सिंह?

बिलकुल चौकस चल रहा है बहन जी। खाली उधर कटइला पार का कुछ वोट……कर लिया जाएगा…. थोड़ा ध्यान देना पड़ेगा।

माँ और बेटी नारी है अबकी सब पर भारी है।

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’दस-दस रखो अभी बाकी हिसाब बाद में।’ करन सिंह के आदेशानुसार कार्यकर्ता आगे की कार्यवाही में लग गए।

’कम से कम दो घण्टा अब वो कमीने न आएँ,तो ही ठीक है….. थक गए यार…….।

अच्छा! खाली हराम का चाही..चलो..चलो….थोड़ा ….. जोर से…हाँ ….अइसे।

देश का नेता कैसा हो मंत्री चाचा जैसा हो।

मंत्री चाचा की क्या पहचान, पाँचवा खाना फूल निशान।

’……………फूल निशान।…………फूल निशान।…..

सफेद एम्बेसडर में सवार मंत्री चाचा। एस.पी, डी.एस.पी.,  अरोगा-दरोगा मिलाके बीस गाड़ी।

आशीर्वाद-आशीर्वाद..करन…और सब….? बड़ी पब्लिक इकट्ठा किए रहौ लखनऊ से हिंया तक। बड़ी मेहनत कर रहे हो…।

चाचा जो पहिले आप भेजे रहैं ऊ सब तो…..। अभी वोटिंग के पहिले जरूरत पड़ेगी।

’ठीक है…..अभी तो ई सब डीएम, एसपी…. आदमी आएंगे……।

जी चाचा

आशीर्वाद-आशीर्वाद..

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गया…..साला….लुच्चा। चलो आज का निपटान होइगा।

ये कार्यकर्ता नहरिया तक पहुँचे होंगे कि…….

तुम इतने गिर गए करन कि इस तरह कमाई करोगे? नैतिक-अनैतिक सब तरह से….थोड़ा कुल खानदान का ख्याल करते।

निवर्तमान सिविक्स प्रवक्ता वासुदेव अपनी नैतिक शिक्षा से करन की राह गेंस रहे थे।

ना गुरु जी आप लोग बिल्कुल अइसा नहीं सिखाए न ही हमारा संस्कार अइसा है। ये तो हम इन्हीं स्सा…. सबों से सीखे हैं। जीत कर ये भी तो……….।

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4-ई लोग

बड़े दिनों के बाद मिली है ये दारु…………..दे दारु।

दिन भर की झुलसती तपिश को तरावट देते ईंट भट्ठे के मजदूर ’देशी मसाले वाली’ में डूब जाना चाहते थे। ईंटों को खाँचों में ढालने वाले समाज के साँचों से दूर! यहाँ  बाप-बेटे, पुरुष-महिलाएँ भेदभाव से रहित वज्रयानी साधक होते हैं। इनकी संस्कृति दुनियावी तामझामों से बिल्कुल जुदा। आशाओं-आकांक्षाओं से परे है इन का फक्कड़ी जीवन। सिरकी और मोमिया के पारदर्शी घरों में रहने वाले निष्कपट, निरबैर। मन वाणी और कर्म का समरूपी भाव। बातों की खेती में नानक्वालिफाइड। जुदा-बाँट के नाम पर फटे-पैबंद, कथरी-गुदड़ी को तानकर ये घरों की जीरोलाइन तय कर लेते हैं, जिनसे रात-गहराते ही नियतश्रव्य और अश्रव्य भी श्रव्य हो जाता है। सेर भर आटा, आधा पाव दाल, छटांक-आधा छटांक रूपनरायन (तेल), अठन्नी-चवन्नी का मसाला, बीस पैसे की मजदूर बीड़ी और पाँच नए के कम्पट। यही जरूरतें और इनकी आपूर्ति हेतु वहीं बब्बू की दूकान। खरीददारी के शौकीन मालामाल जाते होंगे माल्स में, फिर माथा पच्ची कि क्या कैसे कंज्यूम किया जाय!  यहाँ  अपना विशिष्ट अर्थशास्त्र जब जरूरत तभी दुकान। सरकारें, योजनाएँ टटोलतीं, इनसे क्या…..तो उन्हें क्या! ’नित मारौ नित खाव’ इनके जीवन का उपजीव्य। न वर्तमान की फिकर न भविष्य की चिंता।

गंगा पार कर अमरू मुँह अँधेरे भट्ठा पहुँच गया था। गाँव के कोदई, कुंदरू ने खबर की थी कि आदमी की जरूरत है।

तुम लेट हो गए यही खातिर मालिक बंडई के लोगन का राखि लिहिन।

कोदई, कुंदरू उसे काम पर न रखे जाने से मन मसोसकर रह गए। बियाजू, पैसा लेकर वह बड़ी उम्मीद से यहाँ  आया था। बात-बतकही, टोला-मोहल्ला के हाल-चाल के साथ पीना-खाना हुआ। चुगलखोर घुड़कुवा मालिक को बता आया था कि अमरुवा अकेले आवा है, जनानी नहीं लावा। सो चिरौरी-बिनती, भइया-दादा, वसीला (सिफारिश) से पिरथी लंबरदार काहे पसीजते।

भंड़िया (मटकी), मेहड़िया (बड़े बखारी मटके) सब खाली! घर में रत्ती भर अन्न नहीं! दीया-बाती के लिए परी भर रोशनाई के लाले! एकदम अंधकार में घिरा अमरू का घर और जीवन। मकोइया को समझते देर न लगी कि पिरथी ने उसे क्यों नहीं रखा। मकोइया को एक ही बार देखा था उसने तबसे……। पनियाव (नाश्ता-पानी)  क्या करता पानी पी कर पत्नी के सामने बिफर पड़ा।

बहुत कहा-सुना, मकोइया। मगर पसीजा नहीं….स्ससुर।

कउनो बात नाहीं। रामराखन कोटेदार के पास चले जाते। सुना है कोटा में राशन आवा है। उतरवा आते तो अढ़ैया-पसेरी दे ही देते।

गया था, वहाँ  भी लेकिन कुछ नहीं हुआ। कह रहा था कि तुम हीक भर काम नहीं करते।

गरीब की कौन सुनता है। सारे ऐब तो मजलूमों में होते हैं। कर्मठता, ईमानदारी तो बड़ों की ही पहचान है। गरीबों के भाग्य में करम हैं और अमीरों-शोषकों के हाथ में कर्त्तव्य। पहिले की अनिश्चितता और दूसरे का सीमित दायरा।

सो जाव। सबेरे दीख जाई।

पटइला (साँकल) चढ़ाकर वह सोने का प्रयास करने लगी। परंतु ……। चेहरे पर कालारंग, हाथ में गुप्ती और कमर में रस्सी लटकाए अमरूआ को देख………

कहाँ जा रहे हो पहर रात में?

कोटा लाने…..।

मगर तुम तो कह रहे थे………..

तू सो जा मकोइया……

ईलोग…………..

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5-बगुला

 आचार्य हरगोविन्द ने विषय संबद्ध संकल्पना को टेबल पर रखने का निर्देश षारदा को कई दिन पूर्व दिया था। षोध विषय को न्यास देने में आचार्यजी को पाण्डित्य प्राप्त था। आापकी चरणरज मस्तकपर धारण करने वाले दर्शन निष्णात, विद्यावाचस्पति और विद्यावारिधि की उपाधियों से अलंकृत हो महाविद्याालयों, विष्वविद्यालयों में साहित्य की नव मीमांसा कर रहे थे।

कभी आचार्य जी भी पढ़ते-लिखते थे परंतु अब वे अध्ययन से आगे निकल चुके थे। मुखारविंद से जो उच्चारित होता वही साहित्य में नव प्रतिमानों के रूप में स्थापित हो जाता। विषय कोई भी हो आप सर्वज्ञ, सर्वविषयी विशेषज्ञ। कहीं कोई साहित्यिक जमघट लगता तो भीड़ बटोरने के लिए आचार्य जी का नाम ही पर्याप्त होता। गम्भीरता की पूरी बनावट-बुनावट। एक्जिक्यूटिव श्रेणी और पाँच सितारा सुविधाओं के बिना इनका ज्ञान अर्जित करना दुःसाध्य। पूरे शिक्षा जगत में इनके  आशीष के बिना कोई किसी तरह की आशा नहीं कर सकता था। तमाम सिफारिशों, आग्रहों और शारदा के विनयोपरांत आपने उसे शोध दृष्टि से अनुगृहीत करने की स्वीकृति दी थी।

इधर कुछ दिनों से प्रोफेसर एकनाथ की आत्मकथा की चर्चा पूरे देश में चल रही थी। हिकारत और अमानवीयता का जीवंत दस्तावेज थी यह आत्मकथा। शारदा ने अपने शोध विषय के रूप में इसका चयन कर अध्याय-उप अध्याय का खाका बनाया था।

क्या लिखी है……? इस सब पर हम काम नहीं करा पाएँगे। कोई दूसरा विषय सोचो। पहले सोचो कि साहित्य होता क्या है?

साहित्य मानव की विकासशील प्रवृत्ति के मार्मिक अंशों की कलात्मक अभिव्यक्ति है जिसमें किसी भी समाज-राश्ट्र की चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब होता है। इसका समाज से अन्तस्संबंध है। विचार चिंतन और विश्लेषणपरक भावों का औदात्यीकरण नाना रुपों में  छायांकित कर वाङ्ममय की विविध विधाओं का विकास होता है। इसके तत्वों में ग्रहणशीलता, कल्पना, भाषा, सौष्ठव और विराट का दर्शन होता है। संकीर्ण, सीमित घटनाएं-परिघटनाएँ साहित्य की कोटि में नहीं गिनीं जा सकतीं। शिल्प, रचनात्मक इहा और सौंदर्य से रहित लेखन प्रलाप नहीं तो क्या है? हृदय-आत्मा का परिष्कार और इन्हें अनहत तक की योगावस्था को पुश्ट करने वाली विधा पर विचार किया जा सकता है। प्रौढ़ ज्ञानवान पण्डित जनों के दिव्य पाण्डित्य, विश्लेषण और निर्धारण के पश्चात् ही कृति को साहित्यिक मान्यता मिलती है। यह सब और ऐसा लेखन   राम-राम…….! साहित्य की यह दुरवस्था!’

शारदा आचार्यजी के क्रोध से अभिज्ञ थी सो तुरंत आज्ञा लेना ही उचित था। दूसरी तरफ इस साहित्यिक कृति के बारे में आचार्य महोदय ने तफतीश की तो मालूम पड़ा कि ऐसी मौलिक रचनाओं पर शोध को प्रोत्साहित करनेवाली संस्थाएँ तथा शोध निर्देशक को मानदेय का प्रावधान है। मौका तो स्वर्णिम था परंतु प्रो. एकनाथ से बात करना आचार्यजी के सामंतशाही अहं को चोट पहुँचाने वाला था। बचपन से जीवन के इस तीसरे पड़ाव तक आचार्यजी खुर्राट सामंती परंपरा के पोषक रहे थे।

सिद्धांतों को स्वार्थानुसार तरमीम कर देने वाला ही विद्वान है। संस्कारवान् होना जड़ता, रूढ़िग्रस्तता नहीं तो क्या है? शब्दों की बाजीगरी से नैतिकता-अनैतिकता की परिभाषा रूप परिवर्तन कर लेती है।

डॉक्टर साहब नमस्कार! …… जी-जी अभी डायलिसिस पर हैं….। हम कह रहे थे आपकी आत्मकथा पर यहाँ विश्विद्यालय ने कुछ कार्य कराने का विचार किया है।

….नहीं-नहीं हम आप मिलकर ही समाज और साहित्य………। हम हम ऐसा नहीं सोचते………………….।’

कॉल कमप्लीट हो गई थी और आचार्यजी का कार्य भी संपन्न हो चुका था।

स्ससुर… एक नमस्कार से लाख रुपइया का मानदेय। समतापरक साहित्य सृजन का पुरस्कार…। आचार्य हरगोविन्द कॉफी हाउस में अपने मित्रों के साथ चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे।

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
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    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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