जून -2018

संचयनलघुकथाएँ     Posted: June 1, 2018

1.जिन्दगी

डमरू बजाकर सन्तो ने मुहल्ले के लोगों को अपनी उपस्थिति से अवगत कराया। धीरे-धीरे बूढ़े,जवान,स्त्री-पुरुष और बच्चे-बच्चियों की भीड़ सन्तो के चारों तरफ वृत्ताकार घेरे में खड़ी हो गई।
भीड़ इकट्ठी होने पर सन्तो ने अपने झोले के अन्दर से एक बड़ी और एक छोटी चादर निकाली। छोटी चादर को उसने जमीन पर फैला दिया और उसके ऊपर अपने बेटे बन्तो को चित लिटाकर बड़ी
चादर से ढक दिया और पुनः जोर-जोर से डमरू बजाने लगा।
डमरू बजाते हुए तमाशाइयों की तरफ मुखातिब हुआ, ‘‘हुजूर…..माई-बाप! आपने बहुत सारे मदारियों और जादूगरों को देखा होगा…..लेकिन आज में आप लोगों को जो खेल दिखाऊँगा वो जिन्दगी और मौत का खेल होगा…..’’ इतना कहकर वह एक बड़े-से झोले में हाथ डालकर कुछ टटोलने लगा। फिर अधमुँदी आँखों से आसमान की तरफ देखते हुए कुछ बुदबुदाया और उस बदरंग झोले के भीतर से एक लम्बे फल का छुरा निकालकर तमाशाइयों को दिखाते हुए बोला, ‘‘यह छुरा मैं अपने बच्चे के पेट में घुसेड़ दूँगा और दो मिनट के अन्दर ही इसकी आँत बाहर निकालकर दिखाऊँगा।’’
उसने एक बार फिर जोर-जोर से डमरू तमाम तमाशाइयों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। इशारा पाकर बच्चोें ने भी तालियाँ पीटीं।
फिर एक झटके से उसने चादर के नीचे हाथ डाला और बन्तो के पेट को खरबूजे की तरह चीर डाला।
बन्तो चादर के नीचे दर्दनाक रूप से चीखा। खून से लथपथ आँत को देखकर तमाशाइयों के रोंगटे खड़े हो गए। पलभर को वातावरण में आश्चर्यजनक सन्नाटा छा गया।
लेकिन सन्तो की इस सफलता पर बच्चे-बच्चियों ने तालियाँ बजाईं और जवान स्त्री-पुरुष, बड़े-बूढ़ों ने उसकी मैली-कुचैली चादर पर अठन्नी-चवन्नी डालकर अपनी हमदर्दी का इजहार किया।
तमाशा खत्म होते ही लोगों की भीड़ तितर-बितर हो गई। तब सन्तो इत्मीनान से चादर पर बिखरे सिक्कों को उठाकर गिनने लगा, ‘एक,दो….पाँच…तीस….पचास।’ वह बेहद खुश हुआ और इस खुशी में बन्तो को भी शरीक करने के खयाल से उत्साहित स्वर में बोला, ‘‘बन्तो देख…बेटा आज तो पूरे पचास रुपये हुए।’’
लेकिने बन्तो पर इस का कोई प्रभाव नहीं दिखा। वह निस्पन्द और निस्पृह भाव से बाप की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘बा….बापू, अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा…..’’
‘‘क्यों नहीं रहेगा मेरे साथ…तू तो मेरा बेटा है।’’
‘‘फिर भी मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा…और रहूँगा भी तो कल मरूँगा नहीं…..मुझे रोज-रोज मरना अच्छा नहीं लगता…..।’’
‘‘अबे’’,सन्तो ने कहा, ‘‘पागल हो गया है क्या! मरेगा नहीं तो जिन्दा कैसे रहेगा?’’
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2.मन्त्री का कुत्ता

तिपाई पर उकडू बैठा विदेशी नस्ल का कुत्ता अपनी लम्बी जीभ को लपलपाता हुआ कूलर की ठण्डी हवा का मजा ले रहा था। और वहीं तिपाई के पास ही सोफे पर अधलेटे मन्त्री के इर्द-गिर्द बैठे लोग कुत्ते
के हाव-भाव और संस्कार की चर्चा में अपना कीमती मन्तव्य जाहिर करने में लगे थे। तात्पर्य यह कि लोग कुत्ते की प्रशंसा के फूल नहीं समा रहे थे।
उसी समय कमरे में एक और आदमी आया और अभिवादन की मुद्रा में अधलेटे अधेड़ मन्त्री के बिलकुल करीब खड़ा हो गया।
मन्त्री ने गर्व से अपनी मूँछ की ऐंठन को दुरुस्त किया और करीब खड़े अपने खास आदमी पर रोब जमाने के लहजे में कहा, ‘‘रामदीन देखो, इस बार अमेरिका से यही कुत्ता लाया हूँ।’’
‘‘जानते हो रामदीन……’’ मन्त्री ने कहा, ‘‘यह दुर्लभ नस्ल का कुत्ता पूरे दस हजार डॉलर का है….’’
वह इस बार भी चुप रहा। कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जबान तक आए शब्दों को काबू में रखते हुए एक बार फिर उसने कुत्ते को देखा, कुत्ते को देखकर वह मुस्कराया लेकिन आँखों में निराशा की हल्की धुन्ध उतर आई।
‘‘क्यों रामदीन’’, उसकी आँखों में छाई उदासी के धुँधलके को देखकर मन्त्री ने पूछा, ‘‘तुम्हें कुत्ता पसन्द नहीं आया?’’
मन्त्री की बात सुनकर उदासी की धुन्ध उसके पूरे चेहरे पर फैल गई, जो अब तक आँखों में सिमटी थी। उसने धीरे-से हलक में अटके शब्दों को बाहर की तरफ खिसकाया, ‘‘सर वो…..वो बात नहीं….कुत्ता पसन्द आया…..बहुत पसन्द….मगर….’’
‘‘मगर क्या…..?’’ मन्त्री चौंके।
‘‘मगर मैं यह सोच रहा था कि मेरे रहते आपको कुत्ता पालने की जरूरत क्यों पड़ गई?’’
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3.वोट की कीमत

अचानक सेठ की कार में कुछ खराबी आ गई। ड्राइवर कार को सड़क के किनारे खड़ी करके उसे ठीक करने लगा। कार जिस गाँव के निकट खड़ी थी वह शहर से सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पर था। सेठ कार के अन्दर से उत्सुक नजरों से गाँव की झुग्गी-झोंपड़ियों को देखने लगा।
ड्राइवर पूरी तल्लीनता से कार की खराबी दूर करने में लगा हुआ था।
उसी समय एक बूढ़ा आदमी कार के निकट आकर खड़ा हो गया। कोटरेां में धँसी उसकी आँखों से भूख झाँक रही थी।
बूढ़े की फटेहाल स्थिति पर तरस खाकर सेठ ने अपना लंच बॉक्स खोला और उसमें बचा पराँठा-हलवा एक कागज में रखकर उसे पकड़ा दिया। बूढ़ा पराँठों पर टूट पड़ा। विद्युत गति से उसने हलवे और पराँठे पेट के हवाले कर दिए।
सेठजी का यह दृश्य बेहद मनोरंजक लगा। इसलिए पराँठा समाप्त होने पर बिस्किट के कुछ टुकडे बूढ़े के आगे डाल दिए।
बूढ़ा क्षणमात्र में उसे भी चट कर गया। फिर उत्सुकता और प्यार से सेठ को देखने लगा। मगर करीब की आँखों में उगनेवाले प्यार की पहचान तो सेठ को थी नहीं, उसने समझा, बूढ़ा कुछ और खाने को माँग रहा है।
वह बोला, ‘‘अरे भई, अब कुछ नहीं है, जो था सो दे दिया…।’’
खादी के धवल वस्त्रों से ढके सेठ के थुलथुल शरीर को बूढ़े ने गौर से देखा। तब सेठ ने पुनः कहा, ‘‘अब कुछ नहीं है मेरे पास, जो कुछ भी था तुम्हें दे दिया….।’’
‘‘मुझे अब कुछ नहीं चाहिए बाबूजी, मेरा पेट भर गया…ले…लेकिन…’’
‘‘लेकिन….बाबूजी आपने तो यह बताया ही नहीं…कि…आपका चुनाव चिह्न क्या है?….’’
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4.पानी का खेल

एक बड़े नगर का भीड़-भाड़वाला स्टेशन।
एक बन्द लिफाफा स्टेशन अधीक्षक की तरफ बढ़ाते हुए धीमी आवाज में कहा, ‘‘अग्रिम है साहब, पूरे पाँच हजार, बाकी बाद में पहुँचा दूँगा….।’’
‘‘ठीक है, अब आप जाइए, आपका काम हो जाएगा।’’ लिफाफा जेब के हवाले करते हुए स्टेशन अधीक्षक ने कहा।
वह स्टेशन अधीक्षक के कक्ष से बाहर निकलने हेतु मुड़ा ; लेकिन पलभर को रुककर उसने कुछ याद दिलाने के लहजे में फिर कहा, ‘‘साहब, टाइम याद है न, ठीक बारह से तीन के बीच, क्योंकि इसी समय पाँच
-छह एक्सप्रेस गाड़ियाँ एक साथ ठहरती है।’’
‘‘मैंने कहा न कि आप इत्मीनान रखें….’’
‘‘थैंक यू सर! आपने तो पहले भी मदद की है।’’
दो घण्टे बाद एक साथ कई एक्सप्रेस गाडियाँ आकर निर्धारित प्लेटफार्मों पर खड़ी हो गईं। भीषण गर्मी से प्यास के मारे व्याकुल हो रहे यात्री खाली डिब्बा, गिलास और बोतल लिये अफरातफरी में एक नल से दूसरे नल तक दौड़ते रहे मगर कहीं भी एक बूँद पानी न मिला।
तब देखते-ही-देखते यात्रियों की भीड़ प्लेटफार्मो पर अवस्थित चाय-पान की दुकानों पर उमड़ पड़ी ,जहाँ बिक्री के लिए ‘मिनरल वाटर’ की हजारों बोतलेें पड़ी थीं। देखते-ही-देखते हजारों बोतल पानी मुँहमाँगी कीमत पर बिक गया। कुछ देर बाद कोई युवती एनाउंस कर रही थी कि, ‘विद्युत आपूर्ति में व्यवधान पैदा हो जाने के कारण नलों में पानी सप्लाई नहीं हो सका…इससे यात्रियों को जो असुविधा हुई उसके हमें खेद है।’
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5.फिसलन

अपनी खिचड़ी मूँछों में ऐंठन देकर वह मुस्कराया। फिर रोबदार आवाज में पूछा,‘‘हाँ तो बताओ, रात में तुम्हारे यहाँ से कौन-कौन चीजें चोरी गई…।’’
इतना कहकर उसने एक रहजस्टर निकाला और टेबुल पर फैलाकर रपट लिखवाने हेतु आए हुए व्यक्ति को गहरी दृष्टि से देखा। रपट लिखने हेतु आए व्यक्ति के चेहरे पर उदासी की स्याही पुती थी। वह उदास
स्वर में बोला, ‘‘क्या-क्या बताऊँ साहिब! मेरी तो जन्मभर की कमाई लुट गई….।’’
‘‘फिर भी तुम चोरी गई चीजों के नाम नहीं बताओगे ,तो मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकूँगा…।’’
दारोगाजी ने पुनः उसकी आँखों में झाँका, जहाँ से आँसू की कुछ बूँदें टपकने को बेताब हो रही थीं।
तब उसकी मायूसी पर दयाभाव को लेप चढ़ाते हुए उसने धीरज बँधाया, ‘‘अरे भाई, धन के लए आदमी को इतना शोकग्रस्त नहीं होना चाहिए…..धन तो हाथ का मैल है….ं’’
फिर कुछ पल रुककर बहुत ही इत्मीनान भाव से ओंठों के नीचे चुटकीभर तम्बाकू दबाकर बोला, ‘‘हाँ, तो लिखवाओ…..।’’
‘‘जी लिखा जाए…दस तोला सोना, दस हजार के बरतन, फ्रीज और कलर टी.वी….।’’
वह अपनी बात अभी पूरी भी नहीं कर पाया था कि दारोगाजी की कलम अचानक रुक गई।
चौंककर पूछा, ‘‘क्या कहा, कलर टी.वी….! ले…लेकिन कलर टी.वी. तो तुम्हारे पास नहीं था….।’’
‘‘यह…यह आप कैसे कह सकते हैं कि मेरे पास कलर टी.वी. नहीं था?’’ उसने आश्चर्यचकित हो पूछा।
उसका यह प्रश्न दारोगाजी के चेहरे पर कील की तरह ठुक गया। अपनी जुबान की फिसलन के कारण दारोगाजी के ललाट पर परेशानी के भाव पसीने की बूँदों की शक्ल में छहरा आए थे। झेंप मिटाने के लिए वे बगलें झाँकने लगे। जीवन में पहली बार उन्हें आज चोरों की वफादारी पर शक पैदा हो गया था। वे क्रोध से मन-ही-मन तिलमिला रहे थे।
और वह बगैर रपट लिखवाए तेज-तेज कदमों से थाना परिसर से बाहर निकल गया।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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