अगस्त-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: December 1, 2015

1-नूर

नूर मोहम्मद कारखाने के बिजली विभाग में इलेक्ट्रिशियन की नौकरी करता था। किसी भी विभाग में मशीन बन्द हो जाने या बिजली खराब हो जाने पर, वह अपने हेल्पर के साथ तुरन्त खराबी दूर करने पहुँच जाता। कम समय में बड़ी से बड़ी खराबी दूर करने में वह माहिर था।
एक दिन वह कपड़ा–खाते में एक स्विच को रिपेयर कर रहा था कि अचानक लूम मशीन का शटल मशीन में से से निकला और तीर की तरह नूर मोहम्मद के मुँह पर जा टकराया। उसके चेहरे पर गहरे घाव हो गए और एक आँख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।
उस घटना के करीब दस वर्ष बाद एक दिन नूर मोहम्मद ने मन से काम न करने पर अपने हेल्पर रामधन को डाँटा दिया। रामधन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने बदला लेने की नीयत से नूर मोहम्मद के खाली टिफिन में एक बल्ब रख दिया। साथ सिक्योरिटी–विभाग में भी खबर कर दी कि नूर बल्ब चुरा ले जा रहा है।
गेट से बाहर निकल रहे मजदूरों की रोजमर्रा की तलाशी के दौरान जब नूर मोहम्मद का टिफिन खोला गया, तो उसमें एक बल्ब बरामद हुआ। उसके नाम चोरी का केस बना ओर दूसरे दिन कारखाने से हिसाब बना दिया गया। नूर मोहम्मद को उसकी कर्मठता और ईमानदारी का ईनाम मिल गया था। उसे लग रहा था कि उसकी दूसरी आँख का नूर भी बुझ गया है।
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2-अनुशासन

कारखाने के जनरल मैनेजर सोमदेव जितने धर्म–परायण थे, अनुशासन लागू करने में उतने ही कठोर। कारखाने में उत्पादन शुरू हुए अभी मात्र दो वर्ष ही हुए थे,लेकिन बीड़ी–सिगरेट के जुर्म में उन्होंने बीस से अधिक मजदूरों को कारखाने से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उच्च अधिकारी भी कारखाने के गेट के बाहर जाकर ही सिगरेट पी सकते थे वह भी चोरी–छुपे।
कारखाने के डॉयरेक्टर लाला झावर मल कारखाना चालू होने के बाद पहली बार हाल ही में लगे पायलट प्लान्ट का उद्घाटन करने जा रहे थे। उनके लिए दिल्ली से पर्सनल मैनेजर सिगरेट के दो टिन लेकर हवाई जहाज से आए थे। लाला जी चेन–स्मोकर जो थे। फीता काटते ही उन्हें सिगरेट की तलब लगीं । फैक्टरी के अन्दर टिन पहुँचने में थोड़ा समय लग रहा था। लाला जी चिल्लाए, सोमदेव सिगरेट! सोमदेव द्वारा तत्परता से सिगरेट निकालना,लालाजी के होठों से लगाना और फिर लाइटर से सुलगाना, यह एक नयनाभिराम दृश्य था, जो उद्घाटन में शामिल सभी अधिकारियों व मजदूरों की आँखों के कैमरे में हमेशा के लिए कैद हो गया।
कारखाने का कानून, एक दिन के लिए ही सही, तीन सौ साठ डिग्री के कोण में घूम गया था।
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3-प्रस्ताव

कारखाने के नए डॉयरेक्टर पुरुपति बिंगानियाँ जब से कम्पनी के नीति–निर्धारक बनने लगे थे, डॉयेरेक्टरों और प्रबन्धकों के बीच एक हड़कम्प की स्थिति बनती जा रही थी। वे डॉयरेक्टरों की बैठक में नये–नये प्रस्ताव लेकर आते, जिन पर सहमति बनाना कठिन हो रहा था। इस बार वे एक नया प्रस्ताव लेकर आए थे।
उनका प्रस्ताव था कि कारखाने की चल–पूँजी में से एक हजार करोड़ रुपए निकाल लिए जाएं। उस एक हजार करोड़ रुपए की पूँजी से एक कारखाना शहर से दूर खोला जाए, जिसकी लागत ओवर–बिलिंग कर के तीन हजार करोड़ रुपये दिखाई जाए। इस तरह दो हजार करोड़ रुपए का मुनाफा कारखाना चालू होने से पहले ही कमा लिया जाए। फिर कारखाना आगे चले इससे कम्पनी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
प्रस्ताव में शामिल था कि उनके प्रस्ताव से असहमत होने वाले पुराने प्रबन्धकों,आडिटरो,सी ए आदि से त्याग–पत्र ले लिए जाएँ। नए प्रबन्धकों में युवा–इंजीनियरों व एम बी ए को हाई–पैकेज देकर नियुक्त किया जाए। मजदूरों का वेतन तीन–गुना कर दिया जाए,जिससे वे इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट से बाहर हो जाएँ तथा भविष्य में किसी कानून के जरिए प्रबन्धकों को कोई चुनौती न दे सकें। प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया था और उस पर अमल की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं।
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4-चेहरे की चमक

नेता रामभरोसे लाल का नाम बँधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाने वाले मसीहा की तरह प्रचारित हो गया था। उन्होंने अनेक बार पत्थर खदानों,नकली दवाईयाँ,नकली सराब और कई अन्य नकली माल बनाने वाले कारखानों से बँधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाई थी, जिसकी खबरें अखबारों में उनके फोटो के साथ छपी थीं।
शहर के माने हुए सेवा–संस्थानों, सेठ–साहूकारों ,विदेशों से सहायता पाने वाले एन जी ओ और क्लबों ने उन्हें उनके इस महान सामाजिक कार्य के लिए सम्मानित किया था। वे कच्ची बस्तियों में जाते तो लोग उन्हें मालाओं से लाद देते।
पिछले दिनों उन्होंने करीम नगर झुग्गी–झौंपड़ी का दौरा किया। वहाँ उन्होंने बताया कि सरकार गरीबों को मुफ्त दो बीघा जमीन बाँट रही है। जिसे चाहिए, उसे फार्म भरने और वकीलों से कागज तैयार करने के लिए एक हजार रुपए जमा करा दे। बस्ती के अधिकतर मजदूर रोजदारी मजूरी करते थे। एक हजार रुपये उनके लिए बड़ी रकम थी ,फिर भी उधार–सुधार करके, बचत के पैसे निकालकर करीब 20 मजदूरों ने सप्ताह में नेताजी को पैसे पहुँचा दिए। आस–पास के करीब 50 गाँवों में भी इसी तरह फार्म भरे गए।
करीब एक माह बाद नेताजी ने मजदूरों को बताया कि उनकी फाइलें तैयार हो गई हैं और सरकारी दफ्तर में शीघ्र ही पेश कर दी जाएँगी। उन्होंने सबसे दो रिवेन्यू टिकिट लगे कागजों पर अँगूठे लगवाए। एक में उन्हें जमीन मिलने और दूसरे में अपने बेटे के नाम करा लेने की इबारत लिखी हुई थी। जमीन मिलने की आस में मजदूरों के चेहरे खिले–खिले रहने लगे।
मजदूरों की फाइलें बनती रहीं। नेता रामभरोसे लाल की जै के नारे बस्तियों में लगते रहे। इस तरह शनै:–शनैं: लोकप्रियता की सीढ़ियों पर चढ़कर वे पहले एम एल ए और बाद में मंत्री बन गए।
अब नेताजी शहर में ही बड़े सरकारी बगले में पुलिस की सुरक्षा के बीच रहते हैं। बँधुआ जीवन से मुक्ति पाने वाले मजदूर पुन: अपने मालिकों के बँधुआ बन गए। उनके चेहरों की चमक बुझती गई। नेताजी के चेहरे की चमक पहले से अधिक बढ़ती चली गई।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    -सम्पादक द्वय

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