जून-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: April 1, 2016

1-काला पानी

‘अरे राधेलाल,फिर चाय का ठेला! तुम तो अपना धंधा समेटकर अपने बेटे और बहू के घर चले गए थे।’

‘अरे सिन्हा साब!वो घर नही,काला पानी है काला पानी!सभी अपने ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हैं कि न कोई मुझसे बात करता और न कोई मेरी बात सुनता।बस सारा दिन या तो टी वी देखो या फिर छत और दीवारों को ताको।भाग आया।यहाँ आपलोगों के साथ बतियाते और चाय पिलाते बड़ा अच्छा समय बीत जाता है।अरे,आप किस सोच में पड़ गए?’

‘सोच रहा हूँ  कि मै तो तुम्हारी तरह चाय का ठेला भी नही लगा सकता।बेटा बहुत बड़ा अफ़सर जो ठहरा’-फीकी हँसी के साथ सिन्हा साहब ने चाय का प्याला होठों से लगा लिया।

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2-धर्मान्तरण
अम्मा साठ बरस की हो गयीं हैं और इतनी बीमारियों से ग्रस्त हैं ;लेकिन करवा चौथ वाले दिन क्या मज़ाल कि उन्हें कोई कुछ खिला दे। निर्जला व्रत ही करती हैं।
‘आज तो उन्हें सूप पिला के ही रहूँगी नहीं तो बहुत बीमार पड़ जाएँगी अम्मा” सोचते हुए उनके कमरे की तरफ बढ़ ही रही थी कि बाबूजी का कमरे में होने का एहसास हुआ। मैंने परदे की ओट से झाँककर देखा तो भावविभोर हो गई।
बाबूजी अम्मा को सीने से लगाए हुए समझा रहे थे।
‘मनोरमा क्यों अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रही हो। तुमने उम्र भर एक अच्छी पत्नी होने का धर्म निभाया है;लेकिन मै तो शुरू से तुम्हे अपनी पत्नी के साथ साथ अच्छा मित्र भी मानता आया हूँ। मेरी बात मान लो आज तुम अपना धर्मान्तरण कर लो।
‘धर्मान्तरण क्यों?’ अम्मा धीरे से बोली।
‘अरे पगली करवा चौथ का व्रत तो पति के लिए रखा जाता है न तुम्हारे धर्म में। मित्र के लिए तो नहीं।’
दोनों की खिखिलाहट पर मै भी मुस्कुरा उठी।

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3-दीवार

बरसों पहले बँटवारा हुआ। परिणामस्वरूप घर के आँगन के साथ साथ दोनों भाइयों के मन के आँगन में भी दिवार खडी हो गयी। आज दोपहर जब भूकम्प आया।सोहन अपने परिवार और गाँव वालों के साथ खुले मैदान की तरफ भागा।अचानक उसे अपने लकवाग्रस्त भाई का ध्यान हो आया। भाभी और बच्चे तो खेत में होंगे।सोचते हुए उलटे पाँव घर की तरफ लपका।भाई के पास पहुँचकर उसे कसकर बाँहों में भर लिया।

आँसुओं के जलजले में दिल की दीवार ढह गई।काँधे पर भाई को लिये बाहर निकल ही रहा था कि अचानक आँगन से कुछ भरभरा कर गिरने की आवाज आई।

धड़ाम…धड़ाम!!

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3-विरासत
बनारस के अस्सी घाट पर गंगाजी की संध्या आरती हो रही थी। लिली मंत्रमुग्ध सी उस दृश्य को देख रही थी।
सभी पंडों के बीच अशोक भी आसन पर खड़े होकर हाथों में बड़ा सा पंचमुखी दीपक लेकर आँखें बंद किए आरती कर रहा था। किसी नदी की ऐसी भव्य पूजा और आरती ,लिली के लिए अदभुत और अकल्पनीय बात थी। आरती खत्म होते ही लिली अशोक के पास पहुँची । अशोक ने लिली से पूछा “कैसा लगा ?”
“अदभुत”…लिली बोली । “एक बात पूछूँ अशोक ,इतने बड़े मल्टीनेशनल में काम करते हो, विदेश में रह चुके हो फिर भी ये सब? कैसे? ”
“लिली ,ये हमारी विरासत है, इसे संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है। कई पीढ़ियों से ये गंगा आरती हमारे खानदान की परम्परा रही है और मैं इस परम्परा को निभाकर अगली पीढ़ी को विरासत के तौर पर सौपना चाहता हूँ।वैसे इस लाल साड़ी में तुम भी बहुत खूबसूरत लग रही हो।” अशोक ने मुस्कुराते हुए कहा । लिली मुस्कुरा उठी आखिर वह भी अब इस विरासत का हिस्सा बनने वाली थी।

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4-दगाबाज़
सीलन और बदबू से भरे हुए कलकत्ता की तंग गली के एक घर में बैठे हुए सोम की आँखों से बहते हुए आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी अभी अमेरिका से अपने दोस्त व्योम के घर पहुँचा है। कल ही उसकी मृत्यु की खबर पहुँची थी।
‘भाभी ये सब कैसे हो गया? मै जब अमेरिका गया था तब तो सब ठीक था। फिर ये सब कैसे? आपलोग इतनी दयनीय स्थिति में कैसे आ गए?आपलोगों का मकान,गाड़ी सब कहाँ है? इस छोटे घर में कैसे आ गए?’
‘अरे भैया हमलोग तो पाँच वर्षों से यहीं रह रहे हैं। कारोबार में बहुत नुकसान हो गया था। सबकुछ बेचकर यहाँ आना पड़ा। और यहाँ आने के बाद से ही उनकी तबियत ख़राब रहने लगी। पैसे भी नहीं थे हमारे पास उनका इलाज करवाने के लिए। सरकारी अस्पताल में इलाज हो रहा था।’

सोम सर पकड़ कर बैठ गया।

‘हे भगवान्!! कितना झूठा था भाभी, व्योम! मै जब भी फ़ोन पर उससे हालचाल पूछता था ,वो हमेशा खिलखिलाता हुआ ही जबाब देता था। कहता था मस्त ज़िन्दगी कट रही है। कभी आभास ही नहीं होने दिया अपने दु;खों का। एक बार तो अपने हालात के बारे में बताता। मैं उसके लिए अपना सब कुछ लुटा देता’

‘भैया वो कहते थे कि आपकी दोस्ती ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। आपसे आर्थिक मदद लेकर उसे खोना नहीं चाहते थे। कहते थे पैसा सारे रिश्ते ख़राब कर देता है।’

‘दगाबाज़ !! एक बार आज़मा के तो देखता।’
जोर से चीख पड़ा था सोम।अचानक उसे लगा व्योम की तस्वीर खिलखिला पड़ी।

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5-प्रत्युत्तर
राहत शिविर में चूल्हे के सामने बैठी, दर्द और चिंता से व्याकुल माया की आँखों से अविरल अश्रु बहे जा रहे थे।सामने हरिया सर झुकाए लकड़ियों के छोटे छोटे टुकड़े काट रहा था।हरिया उसके घर का वफादार नौकर था।जब से वह ब्याह कर अपने ससुराल आई उसने हरिया को यूँ ही सर झुकाये तल्लीनता से काम करते हुए ही देखा है।
‘हरिया’,माया ने उसकी तरफ देखते हुए कहा। “क्यों रे मुझे भी क्यों नही मर जाने दिया नदी में सबके साथ।बाढ़ से इतने लोग मर गए।पिताजी ,देवर,देवरानी,उनके बच्चे सब नाव में बैठे थे।नाव पलट गयी।कोई नही बचा।हाय!मै अभागी विधवा क्यों बच गयी?

‘मालकिन जीवन और मृत्यु तो भगवान के हाथ में है’-हरिया सर झुकाए हुए ही बुदबुदाया।

‘कैसे पहाड़ सा जीवन कटेगा सोचा है तुमने?बाढ़ में सबकुछ तबाह हो गया।कौन मेरा भार उठाएगा?कैसे मेरे घर का चूल्हा जलेगा?’माया आह भरती हुई बोली।
हरिया ने पहली बार मालकिन की तरफ सर उठाकर देखा।धीरे धीरे चलते हुए चूल्हे के पास आया,चूल्हे में लकड़ी सजाई और माया की आँखों में देखते हुए माचिस की तिल्ली जला ली।चूल्हे की लपटों में प्रत्युत्तर तलाशती माया को छोड़ बाहर निकल गया।

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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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