जून-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: June 1, 2016

1-सौदा

 दहेज में मोटी रकम की आस लगाये गोपीचन्द शर्मा अपनी पत्नी एवं बेटे कुन्दन के साथ रमाकान्त के द्वार पर हँसते–मुस्कुराते पहुँचे । रमाकान्त जी ने बहुत आदर–सत्कार के साथ उन्हें अपने ड्राइंग–रुम में बिठाया । इतने में रमाकान्तजी की पत्नी पार्वती भी मन में प्रसन्नता के भाव लिए गोपी बाबू की पत्नी से मिलीं ।

गोपी बाबू अपनी पत्नी एवं बेटे कुन्दन के साथ सोपफे पर बैठ गए और ठीक सामने रमाकान्त जी सहित पार्वती भी बैठ गयीं। हँसते–मुस्कुराते औपचारिक बातों का सिलसिला शुरू हो गया। इतने में सेवकराम ट्रे में पानी लिए उपस्थित हुआ तो दीनू कुछ मिठाइयाँ एवं नमकीन लिये हाजि़र हुआ। सोफों के मय रखी मेज़ इन औपचारिक वस्तुओं से सज गई ।

रमाकान्त जी ने नमकीन, मिठाइयों एवं बिस्कुटों की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘गोपी बाबू ! जल ग्रहण किया जाए ।’

फ्हाँ ! हाँ !! क्यों नहीं ! पर… वो बिटिया दिखाई नहीं दे रही है ?”” अभी वो कुछ और आगे कहते कि शालिनी अपनी भाभी के साथ सौम्यता लिए पोशाक में आयी और भाभी ने उसे कुन्दन के सामने बिठा दिया। पीछे–पीछे सेवकराम आया और मेज पर चाय आदि रखकर एक तरपफ जाकर स्टूल पर बैठ गया ताकि रमाकान्त जी के बुलाने पर तुरन्त उपस्थित हो सके ।

गोपी बाबू, उनकी पत्नी और कुन्दन मेज पर रखी सामग्री का औपचारिकता से सदुपयोग करने लगे। चाय का सिप लेते हुए उन्होंने कुन्दन की ओर मुखातिब होते हुए कहा, फ्बेटा ! लड़की को ठीक से देख लो, पसंद आए तो लेन–देन की बात करें।’ यह बात शालिनी के स्वाभिमान को बुरी तरह आहत कर गयी और वह सोपेफ से उठ खड़ी हुई और गोपी बाबू से मुख़्ाातिब होते हुए बोली, फ्मि शर्मा ! मैं प्रदर्शनी में रखी कोई बिकाऊ वस्तु नहीं हूँ, जिसे आपका बेटा पसंद या नापसंद करेगा । पसंद, नापसंद जो करुँगी, मैं करूँगी।’

‘बेटा !ये हमारे अतिथि हैं……’

‘पापा !जो नारी को सामान समझे वो कैसा अतिथि….।’ गोपी बाबू के चेहरे का रंग कभी लाल तो कभी पीला होने लगा ।

‘यही नहीं ! इसके साथ मेरी कुछ शर्तें भी हैं, जिन्हें आप द्वारा मान लेने पर ही आगे बात होगी ।’

‘वो क्या हैं?’ स्तब्ध् होते हुए गोपी बाबू ने पूछा ।

‘यदि मेरी शादी आपके लड़के से हो जाती है, तो यह हमारे यहाँ घरजमाई बनकर रहेगा । सारी कमाई मेरे माता–पिता के हाथ में देगा, मेरे माता–पिता जो कहेंगे, इसे करना पड़ेगा । दहेज लेना–देना दोनों जुर्म है। उसका तो प्रश्न ही नहीं उठता । यदि मेरी शर्तें मंजूर हैं तो ठीक, वरना जिस दरवाज़े से आप लोग आए हैं, जा सकते हैं।’

‘बेटा ऐसा नहीं कहते !’ रमाकान्त जी बेटी को समझाने के ख़्याल से कहा ।

फ्नहीं पापा !जो लोग नारी को सामान समझें उनके साथ …..।’

(माधुरी, मार्च 1952)

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2-करमजली

राधेश्याम शुक्ल पाँच बेटियों के पिता हैं। पंडिताई का  धन्धा करते हैं। किसी तरह घर का गुज़ारा चलता है। राधे जी की पत्नी बेटियों की शादी हेतु जब–जब टोकती तो कहते, पंडिताइन देखती रहो बेटियों की शादी अच्छे–अच्छे घरों में, वो धूम–धाम से करूँगा कि लोग देखते रह जाएँगे ।’

‘ये सुनते–सुनते तो बड़ी बेटी पैंतीस पूरे कर रही है।’

‘चिन्ता न करो । सब काम अपने समय पर होता है, इनकी शादियाँ भी होंगी ।’

पंडिताइन मन–मसोस कर रह जाती । जब दिल ज़्यादा दुखता तो सिसक पड़ती ।

बेटियों की शादी न हो पाने से एक दिन घर के कोने में पंडिताइन दुखी–उदास पड़ी थी कि पड़ोस की चौधराइन ने कहा, ‘सुना पंडिताइन ! श्रीवास्तव की बेटी दुसाध फौज़दार के बेटे के साथ मंदिर में शादी करके ससुराल चली गई ।

राधे के कान में जब यह बात पड़ी, ‘करमजली थी वह लड़की, जो किसी ग़ैर जात के लड़के से शादी करके चली गई। देखना मैं क्या शान से अपनी बेटियों की शादी करूँगा ।’

यह सुनकर लड़की की माँ कहती है, ‘करमजली वह नहीं ,यह हैं। यह भी किसी को पसंद कर–कराकर शादी कर लेती ,तो बाकी चार का रास्ता भी खुल जाता । तुम सपने देखते रहो । दिन में खुली आँखों देखे सपने भी कभी पूरे होते हैं ? अपनी औक़ात भी देखनी चाहिए ।’

पत्नी के मुँह सच सुनकर आज पहली बार राधे भी रो पड़े और निकल पड़े अपनी औक़ात के अनुसार लड़का देखने ।

(हुंकार, जनवरी 1945)

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3-हानि

छेदीलाल की एकमात्र लड़की थी । जब वह पैदा हुई तो छेदीलाल बहुत दुखी हुआ था कि एक ही संतान, वह भी बुढ़ापे में हुई, लड़का हो जाता तो कुल तर जाता । यही बातें सोच–सोच छेदीलाल हमेशा परेशान रहता । उसकी परेशानी को देखकर उसकी पत्नी चितिया उसे कहती, ‘ईश्वर पर भरोसा रखो, उसने जो दिया है, अच्छे मन से स्वीकार करो । क्या पता यही हमारा कुल तार दे।’

कैसी बातें करती हो, लड़की भी कभी कुल–तारण हो सकती है?’

‘ईश्वर की कृपा से सब हो सकता है।’

छेदीलाल का दुख तो कम नहीं हुआ किन्तु चितिया ने अपनी बेटी को सीने से लगाया और भरपूर प्यार देते हुए उसे खूब पढ़ाया–लिखाया ।

धीरे–धीरे छेदी को भी अपनी बेटी रधिया पर प्यार आने लगा और उसका दुख क्रमश: कम होने लगा । रधिया मेधावी थी  बैंक में  ऑफ़िसर बन गयीई । छेदी के बुरे दिन कटने लगे। घर सँवरने लगा। किन्तु अब उसे दूसरा दुख सताने लगा ।

चितिया ने पूछा, ‘रधिया के बाबू अब क्यों उदास रहते हो ?’

‘रधिया जवान हो गयी है, अब इसकी शादी करनी पड़ेगी । शादी के बाद यह अपने ससुराल चली जाएगी । आज यह जो कमाई हमें देती है, कल ससुराल में देगी, तो फिर हमारा क्या होगा ?’

‘देखो जी ! ईश्वर पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा।’

‘क्या ठीक हो जाएगा ! यही अगर बेटा होती तो शादी के बाद भी लड़के की कमाई इसी घर में रहती । यह हमारी कितनी बड़ी हानि हुई है।’

माता–पिता के संवाद बेटी के कानों में पड़ रहे थे । वह अपने पिता के पास आयी, ‘बाबू ! आप कतई चिन्ता न करें । मैं शादी उसी व्यक्ति से करूँगी जो मुझे आपकी देखभाल से रोकेगा नहीं, आप निश्चिंत रहें। मुझे पता है आप लोगों ने किस कठिनाई से मुझे पाला–पोसा है।’

छेदी की आँखें भर आईं और उसने वात्सल्यभाव से आज पहली बार बेटी को गले से लगा लिया ।

(बिजली, दिसम्बर 1955)

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4-गुरु–दक्षिणा

अधमरा–सा ललन पाण्डेय गाँव में अपनी टूटी–फूटी मड़ैया में अकेला पड़ा था। ईश्वर से अपने मरने की दुआएँ माँग रहा था कि रामेन्द्र सिंह ने उस मड़ैया में प्रवेश किया। रामेन्द्र ने ललन पाण्डेय का चरण–स्पर्श करते हुए पूछा, ‘गुरुजी ! तबीयत ठीक नहीं है क्या ?’

रामेन्द्र को पहचानते हुए–‘अब इस बुढ़ापे  में तबीयत क्या अच्छी और क्या खराब । अब तो ऊपर जाने की इच्छा है, बस ईश्वर मेरी प्रार्थना सुन ले ।’

‘ऐसा क्यों कहते हैं गुरुजी ! सुधीर और उसका परिवार कहाँ है? आप यहाँ अकेले ?’

‘बेटे अपना–अपना भाग्य है। मास्टर की नौकरी मिलते ही यहाँ से बदली करवाकर किसी दूसरे जिले में चला गया है।’

‘आपको साथ नहीं ले गया ?’

‘मुझे साथ ले जाना ही होता तो यहाँ से उसे बदली कराने की क्या ज़रूरत थी ? यह तो भला हो गाँव वालों का कि जैसे–तैसे दिन कट रहे हैं।’

यह सुनकर रामेन्द्र की आँखें गीली हो आईं –‘गुरुजी ! आप मेरे साथ चलें । आप आश्वस्त रहें, आपको कोई कष्ट नहीं होने दूँगा ।’

‘ज्सब अपना खून ही अपना न हुआ तो…… ।’

‘गुरुजी !आपने सुधीर एवं मुझे साथ–साथ पढ़ाया है। गुरु–शिष्य होने के नाते मेरा भी तो आप पर कुछ हक़ बनता है। मैं आपकी एक न सुनूँगा और आपको यहाँ से लेकर जाऊँगा । आपकी सेवा करके थोड़ी–बहुत गुरु–दक्षिणा चुकाने का अवसर मुझे मिलना चाहिए ।’

ललन पाण्डेय सोच में पड़ गये। क्या करें, क्या न करें ! फिर सोचकर बोले, ‘बेटा लोग क्या कहेंगे ? अपना बेटा तो …. और तुम्हारे साथ …. ।’

‘ललन भैया । कोई कुछ नहीं कहेगा । रामेन्द्र ठीक कहता है… तुम्हें पता है, यह इन्कम टैक्स में बड़ा अफसर बन गया है। तुम्हारा ख़्याल रखेगा । सुख से जीवन कट जाएगा ।’ यह ललन पाण्डेय का पड़ोसी माखनलाल था ।

अब यदि प्रभु की यही इच्छा है और तुम लोगों की यही राय हो तो रामेन्द्र जैसा ठीक समझो …’

ललन पाण्डे को लगा जैसे उनमें नयी स्फूर्ति आ रही है और रामेन्द्र के चेहरे में उन्हें अपना चेहरा दिखने लगा ।

(अजन्ता, अगस्त 1949)

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5-पुश्तैनी धन्धा

पंडित लक्ष्मण प्रसाद के पिता दीनानाथ शास्त्री पहुँचे हुए पंडित थे। अपने गाँव के अलावा आसपास के गाँवों में भी उनकी अच्छी ख्याति थी । लोगों को उनकी पंडिताई पर बहुत विश्वास था ।

पंडित जी की बड़ी इच्छा थी कि उनके चारों बेटे पढ़–लिखकर अपने पुश्तैनी काम को ही आगे बढ़ाएँ । उनके बड़े तीनों बेटे पढ़ने–लिखने में बहुत मेधावी थे। इन तीनों से उन्हें बड़ी अपेक्षा थी । मगर उन तीनों बेटों का कहना था, ‘इतना पढ़–लिखकर भी यही काम करें ?’ इस काम से इंकार करके वे अच्छी–अच्छी सरकारी नौकरियों पर लग गए ।

पंडित जी बहुत दुखी हुए । बड़े बेटे ने कहा, ‘पिताजी ! छोटा पढ़ा–लिखा नहीं, क्यों नहीं इसे अपने साथ इस धंधे में लगा लेते हैं ?’

‘बेटे, इसमें भी तो शिक्षा एवं मेधा की आवश्यकता होती है, और रघुवीर में न शिक्षा है, न मेधा ।’

‘उसे साथ–साथ रखकर सिखाते चलिए ! दो–चार सालों में सीख जाएगा ।’

पंडितजी दुखी हुए। अपने पास अन्य कोई विकल्प न देखकर वह रघुवीर को साथ रखने लगे। जहाँ जाते, उसे साथ ले जाते और धीरे–धीरे उसे अपने  धन्धे का कौशल भी बताते जाते ।

साल भर भी ठीक से नहीं सिखा पाए थे कि पंडित जी चल बसे ।

रघुवीर उदास हो गया। तीनों बड़े भाइयों से भी उसे उपेक्षा ही मिली । विवश होकर वह गाँव से कलकत्ता चला आया।

एक–दो दिन इधर -उधर मारा–मारा फिरा, फिर एक मंदिर में पनाह ली । पंडित होने के नाते उसे पुजारी का स्नेहभाव मिला और अब जो कुछ पिता से साल भर में सीखा था उसके आधार पर पुजारी को सहयोग करने लगा ।

एक दिन वह बड़ा बाजार से गुज़र रहा था कि एक भिखमंगे पर उसकी नज़र पड़ी, उसे लगा यह तो गाँव के मनुआ का बेटा है।

‘अरे मनुआ !तू यहाँ ?’

‘हाँ !गाँव से यहीं आकर बाबू यही धन्धा करते थे । उनके बाद मैं भी इसी धन्धे में आ गया ।’

‘अरे !यह कोई धन्धा है । मेहनत मज़दूरी कर और इज़्ज़त की जि़ंदगी गुज़ार ।’

‘रघुवीर भैया ! बुरा न मानना । तुम अपने पिता की इच्छा से अपने पुश्तैनी धन्धे को आगे बढ़ाने में लगे तो मैं अपने पिता की इच्छा से उनके धन्धे को आगे बढ़ाने में क्यों नहीं लग सकता ?….. धन्धा आखिर धन्धा होता है चाहे भीख माँगने का हो या पंडिताई करने का ।’

(अजन्ता, जुलाई 1950)

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6-भीख और शौक

कॉलेज में पढ़ रहे चार लड़कों में गहरी मित्रता हो गई। चारों के घरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी । जितना पैसा अभिभावक भेजते उससे पढ़ाई–लिखाई, हॉस्टल और मेस तक का काम किसी तरह चल जाता, मगर उनके पहनने, खाने–पीने आदि के शौक पूरे नहीं हो पाते थे।

उन चारों ने सोचा क्यों न हम चारों मिलकर सरस्वती–पूजा, दुर्गा–पूजा के अतिरिक्त कभी बाढ़–सुखाड़ के नाम चंदा वसूली का काम करें ? करना कुछ नहीं है एक रसीद–बुक तैयार करा लेनी है या रेडिमेड बाज़ार से खरीद लेनी है।

‘दुकानदारों से अच्छी–खासी वसूली हो जाएगी । वैसे भी सारे प्राय: दुकानदार स्टूडेण्ट्स से डरते हैं, उनकी इसी कमज़ोरी का फायदा उठाना है और अपने शौक पूरे करने हैं ।’

दो सालों तक उनका यह काम अच्छा चला। सारे शौक पूरे करने के बाद भी अच्छे–खासे पैसे बच जाते । जीवन का आनंद मिल रहा था । चारो खुश थे ।

‘सरस्वती पूजा’ के अवसर पर चंदा माँगते–माँगते एक दिन वे एक ऐसी दुकान पर चंदा माँगने पहुँच गए, जिसका मालिक दो पैरों से विकलांग था ।

लड़कों ने जैसे ही रसीद आगे बढ़ाई । उसने हँसते हुए कहा, ‘बेटा बुरा मत मानना ! आप स्टूडेण्ट्स की तोड़–फोड़ के डर से दुखी मन से दुर्गा–पूजा, सरस्वती–पूजा या बाढ़–सुखाड़ हेतु जब भी चंदा माँगने आते हो, देता हूँ । किन्तु तुम सोचो! क्या तुम लोग मुझसे भी गये गुज़रे हो । मैं विकलांग होकर भी भीख नहीं माँगता और तुम लोग सकलांग होकर भी अपने शौक पूरा करने हेतु भीख माँगते फिरते हो ।’

‘हम भीख माँगते हैं …. या चंदा ?’

‘मैं जानता हूँ !तुम कोई कार्यक्रम नहीं करते, बस अपने शौक पूरे करते हो ।’

इतना कहकर उसने गल्ले से दो रुपये देने हेतु निकाले किन्तु लज्जित होते हुए स्टूडेण्ट्स ने पैसे नहीं लिये … रसीद वहीं फाड़कर लौट गए ।

(माधुरी, जनवरी 1948)

प्रस्तृति :डॉ सतीशराज पुष्करणा,मो :08298443663,09431264674

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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