जून-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: July 1, 2016

1-रंग

 अपनी परिस्थितियों से जूझते हुए आखिरकार सरला ने एक शासकीय विद्यालय में शिक्षिका बनकर अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी उठाना शुरू कर दी। वक्त गुजरने के साथ आज 20 सालों में दोनों बेटे युवा हो चुके हैं। सरला की पीड़ा अब भी आँखों पर लगे चश्में से झाँकती है, लेकिन अब वह स्वयं को फिर से सजने–सँवारने लगी है और यही परिवर्तन पास–पड़ोस में सुर्खियाँ बनने लगा है।

जब नहीं रहा गया तो एक सहशिक्षिका ने जिज्ञासा के साथ और चटपटे अंदाज में पूछ ही लिया – ‘‘कोई खास बात है ? हर दिन कुछ बदली–बदली सी दिखाई देती हो।’’

एक स्वाभिमानी और निर्भीक मुस्कान के साथ सरला ने केवल इतना ही कहा कि– ‘‘पहले समाज के लिए रंग छोड़े थे, आज बेटों ने मुझे फिर से रंग दिया है। वैसे भी जिस माँ के दो जवान बेटे हो, वह माँ विधवा हो ही नहीं सकती !’’

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 2-विश्वास

 ज्यादा बड़ा वृक्ष नहीं था वह, जिस पर गौरेया ने अपना छोटा सा घोंसला बड़े जतन से बनाया था। उसे देखकर लगता था यह एक आँधी में ही उखड़कर धराशायी हो जाएगा। कुछ शाखों, कुछ कोपलों और कुछ फूलों का गुलदस्ता ही तो दिखाई देता था दूर से।

गौरेया को सबने समझाया भी था कि यह सुरक्षित स्थान नहीं है, लेकिन उसे विश्वास था तो केवल उन जड़ों पर जिससे वह बँधा हुआ था और वह दिन आया जब उसके अपने घोंसले में बच्चे फुदकने लगे तभी मौसम बदला और तूफान ने तेज बारिश की आहट दी। मजबूत वृक्ष उखड़ गए, लेकिन उस पेड़ को कुछ न हुआ जहाँ गौरैया के बच्चे फुदक रहे थे।

और गौरैया के चेहरे पर विश्वास चमक रहा था।

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 3-पापा के मजबूत कंधे

बात इसी दशहरे की है, रावण दहन के लिए मैं और मेरा परिवार दशहरा मैदान गए थे, जहाँ विशालकाय रावण के पुतले को देखने के लिये पूरा शहर इकठ्ठा हुआ था। नन्हें बच्चे अपने पापा के कंधों पर और हाथों पर चढ़कर आतिशबाजी देखकर आनन्दित हो रहे थे। अपने बचपन के दिनों की यादें ताजा कर मुझे भी बड़ा आनन्द आ रहा था, लेकिन तभी न जाने कब इस पूरे जमघट में एक परिवार हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। अपने तीन छोटे–छोटे बच्चों के साथ उनकी माँ जो कि पहनावे से गरीब और साधारण शक्लो–सूरतवाली थीं, अपनी गोद में सालभर के बच्चे को उठाए थी एवं अन्य बच्चा जो पापा की उँगली पकड़े हुए था, रो रहा था, क्योंकि वह आतिशबाजी देखना चाहता था। उसके पापा ने उसे गोद में उठा लिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक बौने से कद–काठी का वह आदमी जिसे खुद कुछ नजर नहीं आ रहा है, वह अपने नन्हे -से बच्चे को कन्धों पर चढ़ाकर आसमान दिखा रहा है और वह चमक दिखा रहा है ,जिसे वह खुद देख पाने में असमर्थ है।

पापा ऐसे ही होते हैं मजबूत कन्धों वाले।

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 4-रिटायरमेंट

सेवानिवृत्त होते ही घर में समय काटे नहीं कटता। आखिर 35 सालों से समय की पाबंदी और जिम्मेदारियों का दबाव कब रिटायरमेंट ले आया शर्माजी को पता ही नहीं चला! पर अब सारे दायित्व पूरे हो चुके हैं।

एक दिन मन किया कि क्यों ना अपने पुराने कार्यालय जाकर सबसे यूँ ही मिल आएँ! समय हवा के झौंकों–सा होता है। एक कर्मचारी होकर जो सेवाएँ उन्होंने अपने कार्यालय को दी थी, वे अब कल की बात हो चुकी थी। रोजाना सलाम ठोकने वाला भृत्य आज उनसे ज्यादा व्यस्त था फिर भी नमस्ते सा. करके जो गया कि बाद में उसका पता ही नहीं चला। खैर, कुछ आत्मीयजन खुश थे तो कुछ अपने कार्य में व्यस्त थे। कुछ लोगों से मिलकर जाने लगे ही थे कि नए साहब की आवाज से पूरा  ऑफ़िस गूँज गया- ‘‘आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ कैसे हो सकती है ? मैंने सुना है इस ऑफ़िस से आज तक कोई भी जानकारी गलत नहीं पहुँची फिर अब क्या हुआ ?’’ सहकर्मी ने साहब को समझाते हुए कहा कि– ‘‘यह कार्य अब तक शर्माजी करते थे । वे रिटायर हो चुके हैं । इस बार की जानकारी एक नए वर्कर ने तैयार की है।’’

 शर्माजी ने वहाँ से घर जाना ही ठीक समझा, किन्तु उन्हें संतोष था कि– ‘‘अभी भी ऑफ़िस में उनके काम को याद किया जाता है!’’

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 5-रिस्क

 अपने बेटे को विदेश भेजने के लिए तब वे पहली बार एअरपोर्ट आए थे और उसके बाद आज जब वे अपने 16 वर्षीय पोते के साथ उसी बेटे को लंदन लेने के लिए जा रहे हैं। अजीब–सी कशमकश और अदृश्य घबराहट थी जिसे दर्शा नहीं पा रहे थे। सही भी तो है , जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन साइकल से ट्रेन पर सवार होकर गुजारा हो, उसके लिए इतनी महँगी और लम्बी दूरी की यात्रा वह भी हवाई यात्रा का खर्च कई परेशानियों का सबब तो होगा ही, लेकिन फिर भी अपनी सारी हिम्मत जुटाकर वे प्लेन में बैठे।

हवाई सफर शुरू होने के बाद सुन्दर और सभ्य एअरहोस्टेज से वे प्लेन की जानकारी लेने लगे। जैसे– ‘‘मैडम इस जहाज में अभी कितना पेट्रोल और बाकी है?’ होस्टेज ने कहा– ‘‘अभी हम धरती से 10000 फीट की ऊँचाई पर सफर कर रहे हैं और अभी इसमें 35 घण्टे का ईंधन और बाकी है।’’

मैडम, मान लीजिए किसी वजह से आपका प्लेन खराब हो जाए तो आप हमारी सुरक्षा कैसे करेंगी ? दूसरा प्रश्न सुनते ही होस्टेज मुस्कुरा दी– ‘‘सर सुरक्षा के यहाँ सभी इंतजाम हैं, आप फिक्र ना करें और आपकी पहली हवाई यात्रा सुखद ही होगी, ऐसी कामना करती हूँ। वैसे सर आप इतना विचार कर रहे हैं और फिर भी इतनी रिस्क लेकर आप लंदन जा रहे हैं, कोई खास बात है क्या सर?’’

‘‘हाँ, मैडम मेरा बेटा एक कम्पनी में कार्यरत है, किसी कारण से वह भारत नहीं आ पा रहा है, जिसके चलते मैं और मेरे बेटे का बेटा उसकी समस्या समाधान हेतु जा रहे हैं, क्योंकि जैसे मेरा बेटा अपने बेटे को यादकर परेशान है, वैसे ही मैं भी अपनी इस अवस्था में अपने बेटे को मिलने को बेताब हूँ ताकि कल को मेरा पोता भी मेरी तरह विदेशी नौकरी की दुहाई देकर अपना बचपन, जवानी और मेरा बुढ़ापा देखकर अपने पिता के प्रेम से वंचित न रह जाए।’’ इतना कहना ही था कि एअर होस्टेज स्तब्ध हो कुछ रुआँसी हो गई, अपने पिता को याद करके जो इन दिनों छत्तीसगढ़ के एक कस्बे में अकेले रहते हैं।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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