अक्तुबर-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: August 1, 2016

1-दु:ख

वह रिक्शे के  इंतजार में खड़ी थी। काफी देर तक कोई रिक्शा नहीं आया, तो वह पैदल ही चल पड़ी।

अचानक एक आदमी ने उसके पास आकर, उसके कंधे पर लटक रहे पर्स पर झपट्टा मारा। उसने पर्स हाथ से भी पकड़ रखा था, इसलिए वह आदमी पर्स लेने में सफल नहीं हुआ। वह आदमी उसके हाथ से छुड़ाने का प्रयास करने लगा। वह मदद के लिए चिल्लाने के साथ, उस आदमी की पकड़से पर्स छुड़ाने का प्रयास भी करने लगी। इस प्रयास में वह ज़मीन पर गिर गई। वह आदमी उस काफी दूर तक घसीटता हुआ ले गया।

इस दृश्य को देखकर सड़क से गुजर रहे लोग, जहाँ के तहाँ खड़े हो गए। वह पर्स छोड़ना नहीं चाहती थी, लेकिन वह आदमी उस से पर्स छीनकर ले जाने में सफल हो गया। दिन दहाड़े लूट की घटना की भनक लगते ही एक पत्रकार उसके पास जा पहुँचा।

‘‘पर्स में कितने रुपये थे ?’’ पत्रकार ने पूछा था।

‘‘पचास हज़ार रुपये। बेटे की स्कूल की फीस जमा कराने के लिए बैंक से निकालकर ला रही थी।’’

‘‘दु:ख की बात है, आपके पचास हज़ार रुपये चले गए।’’

‘‘मुझे रुपये जाने का उतना दु:ख नहीं है, जितना लोगों के तमाशबीन बने रहने का है। अगर एक भी आदमी ने मेरी मदद की होती, तो वह मेरा पर्स छीनकर नहीं ले जा सकता था।’’ वह बोली, ‘‘तमाशबीन बने रहे लोगों को सोचना चाहिए कि आज जो मेरे साथ हुआ, कल उनके साथ भी हो सकता है।’’

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2-बलि का बकरा

घूस लेने के आरोप में मंत्रीजी की कुर्सी पर खतरा मँडरा रहा था। किसी तांत्रिक ने मंत्री जी को सलाह दी–अगर बकरे की बलि दी जाए , तो उनकी कुर्सी बच सकती है।

कई बार से वह सांसद चुनकर आ रहे थे, लेकिन मंत्री नहीं बन पाए थे। जैसे तैसे मंत्री बने, तो साले साहब के पकड़े जाने पर उनकी कुर्सी छोड़ना नहीं चाहते थे अत: तांत्रिक के कहने पर बाज़ार से बकरा खरीदकर लाया गया। पूजा -अर्चना करने के बाद मंत्रीजी बकरे के सामने चारा डाल रहे थे।

हरे–हरे चारे को कौन बकरा छोडता है, लेकिन इस बकरे ने चारे की तरफ देखा तक नहीं। उसका मन चारा खाने को बिल्कुल नहीं कर रहा था। बकरे को भनक लग गई थी कि मंत्रीजी की कुर्सी बचाने के लिए उसकी बलि दी जाने वाली है।

बकरा सोच रहा था–रिश्वत मंत्रीजी के साले ने ली और जान उसकी जाएगी।

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‘‘माँ कहाँ है?’’ नरेश दुल्हन के साथ दरवाजे पर खड़ा था। बहन आरती की थाली हाथ में लिए खड़ी थी। उसके पीछे परिवार और गाँव की औरतें थी, पर माँ नज़र नही आ रही थी। माँ को उसकी शादी का कितना चाव था। माँ ने ही उसके लिए लड़की पसंद की थी। माँ को सामने न देखकर उसने पूछा था।

‘‘बेटा ,विधवा शुभ अवसर पर आगे नहीं आती।’’ गाँव की बूढ़ी काकी बोली थी।

‘‘ माँ, माँ होती है,सधवा या विधवा नहीं। नरेश बोला–‘‘जब तक बहू का स्वागत करने माँ नहीं आएगी। मैं दरवाजे पर ही खड़ा रहूँगा।’’

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3-परिभाषा

‘‘आज से यह आपके पति हुए। पत्नी का स्थान पति के चरणों में होता है।’’ फेरे सम्पन्न होने के बाद पंडित वधू से बोला–‘‘पति के पैर छुओ।’’

‘‘पंडितजी, पत्नी का मतलब है, अर्द्धांगिनी। पति आधा, पत्नी आधी मतलब दोनों बराबर।’’ वर- वधू को अपने गले से लगाते हुए बोला–‘‘पत्नी का स्थान पति के चरणो में नहीं, दिल में होता है।’’

दुल्हे की बात सुनकर पंडित को लगा आज उसकी पंडिताई बौनी पड़ गई है।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

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