जुलाई-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: March 1, 2017

1-रंग

“तू जानता भी है, छोटे, कि तू क्या बोल रहा है? ऐसा अनर्थ हमारे कुल में ना कभी हुआ, ना होगा। दद्दा आप समझाइए इसे।”

किसी गहरी नदी की सी गंभीरता लिये ही देखा था उन्हें बचपन से। मुँह अँधेरे उठकर घर के कामों में जुटी, हर आवाज़ पर दौड़ती, सबकी जरूरत का ख्याल करती, सफ़ेद लिबास में लिपटी शांता बुआ। चार भाई और भाभियों, और उनके हम सब बच्चे। सबकी आदतों से परिचित बुआ की आवाज़ ,तो कभी-कभी ही सुनाई देती। इतनी शांत बुआ झगड़े की वज़ह भी हो सकती हैं, विश्वास ही ना हुआ था। पर बड़े चाचा की आवाजों से पूरा दालान गूंज रहा था।

“बहन हम सबकी नौकरानी बनकर रह गई ,उसमे अनर्थ नहीं है? दुबारा घर बसने में अनर्थ हो जाएगा?” ये छोटे चाचा का स्वर था।

“आप एक बार सोचिए तो सही, दद्दा,” अब तक चुप खड़े मँझले चाचा भी छोटे चाचा के समर्थन में उतर आए थे।

पिताजी ने थोड़ा समय माँगा था सोचने के लिए। इस बीच घर की स्त्रियों ने भी मौन आहुति डाल दी थी छोटे चाचा के यज्ञ में।

घर में उत्सव मन उठा। सफ़ेद लिबास उतार, लाल जोड़े में लिपटी शांता बुआ की  आँखों में जीवन की ज्योति जल उठी थी।

तब पहली बार जाना नारी जीवन में लाल और सफ़ेद रंग का फ़र्क।

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2–महकती बगिया 

 खन्ना जी क्यारी में बैठे खुरपी चला रह थे, और बीच-बीच में सर उठा कर देखते भी जा रहे थे कि कोई आ तो नहीं रहा है। ऐसे तो निश्चिन्त। थे पत्नी नहा कर पूजाघर में गई थी तभी बाहर आए थे। मगर पत्नियों का क्या भरोसा? नज़र डालने चली आए कि सब ठीक तो है।

दरअसल, अभी दो माह पूर्व ही खन्ना जी की शल्य-चिकित्सा हुई थी, ह्रदय की। धमनियों में कुछ अवरोध जैसा हो गया था। चिकित्सीय सलाह के अनुसार उन्हें पूर्ण विश्राम करना चाहिए था। परन्तु खन्ना जी को अब बिस्तर पर टिक पाना असह्य हो गया था,, सो टहलने के बहाने बाहर आ, अपनी बागबानी में जुट गए थे। चुपचाप, चोरी-चोरी।

पत्नी पर नज़र रखते रहे पर बेटी को कैसे भूल गए जो अचानक प्रकट हो गई? चिल्लाकर माँ को पुकारने वाली ही थी कि खन्ना जी ने लपक कर उसका मुँह बंद कर आवाज़ वहीं रोक दी।

“क्या कर रही है? पिटवाएगी क्या?”

बेटी के आश्वस्त करने पर ही उसका मुँह छोड़ा। “छिः पापा, आपने मेरे मुँह में मिट्टी भर दी!” बिटिया ने नकली गुस्सा दिखाते हुए अपना मुँह झाड़ा।

“और तू! तू क्या कर रही थी? माँ को बुलाने वाली थी ना?” खन्ना जी भी लड़ गए।
“आप माँ से डरते हैं ये तो मैं जानती थी , मगर इतना डरते हो ,ये आज पता चला!” बिटिया खिलखिला रही थी।

आवाजें सुन श्रीमती जी भी बाहर आ गई। “क्या हो रहा है यहाँ, भई?”

पिता पुत्री ने समवेत स्वर में ठहाका लगाया। क्यारी के साथ-साथ खन्ना जी की पूरी बगिया महक उठी थी।

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3-अन्धकार

“सम्हाल कर माँ, देख गड्ढा है!”

“अब निगाह कम हो गई है, मुझे दिखा ही नहीं।”

“मैं हूँ न माँ, मेरा हाथ थामकर आ जा। बस अगली गली से रौशनी है।” मुख्य सड़क पार कर दोनों ने फिर सकरी गली पकड़ी।

“इधर से?”

“हाँ, माँ, थोड़ा अँधेरा है मगर रास्ता छोटा है। जल्दी पहुँच जायेंगे। पहले ही देर हो गई है ना!”

एक कर्कश स्वर सुनाई दिया, “कहाँ चली गईं थीं तुम दोनों धंधे के टाइम?”

“मंदिर गईं थीं, आज मंगलवार है ना।” ये माँ का स्वर था।

“कितनी बार कहा है कि धंधे के टाइम पर इस चमेली को अपने साथ मत उलझाया कर?” कर्कश स्वर कुछ धीमा हो चला था- “जा तू तैयार हो जा, चमेली।” बेटी से कहा गया था।

“रास्ते में अँधेरा होता है… बिटिया का हाथ पकड़ कर पार कर लेतीं हूँ न, इसलिए लेकर गई थी।” माँ अब भी सफाई दे रही थी- “वो जवान है, उसकी नई नज़र है।”

“कभी तुम भी तो जवान थीं, तुम्हारी नज़र भी तेज थी, तब तुमने मेरा हाथ थामकर इस अंधकार को पार क्यों ना कर लिया था, माँ?”

कमरें में कपड़े बदलती चमेली की बुदबुदाहट किसी के कानों तक ना पहुँच सकी।

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 4-आस्था

 सुबह-सुबह ऑफिस के लिए तैयार होती दिव्या ने छोटी सी काली बिंदी माथे पर सजाई, बालों का सुरुचिपूर्ण जूड़ा बनाया और एक नज़र बरामदे में बैठी कनखियों से उसे ही देख रहीं सासू माँ पर डाली।

“ज़रा सा सिंदूर भी लगा लिया कर, भली-मानस,” सासू माँ ने मजाकिया लहज़े में दिल की बात कही, “शुभ होता है।”

“पर माँ बारिश का मौसम है। चार बूँदें भी गिर गई तो ऑफिस में बंदरिया बन कर पहुँचूँगी।” अपना टिफिन पैक करते हुए दिव्या ने हँसकर कहा।

“और ये काली बिंदी मुझे नहीं भाती।।। बिंदी लाल होती है सुहाग का प्रतीक”- सासू माँ ने फिर कहा।

“ओहो, मम्मा! मैचिंग हैं! आप भी क्या पुराने लोगों जैसी बात कर रही हो, माई यंग लेडी।” कह कर सासू माँ के गाल पर चुम्बन जड़कर, दिव्या शरारती बच्चे की तरह भागती हुई निकल गई।

पति निखिल ट्रेनिंग पर देश से बाहर था। सास-बहू प्यार से वक्त गुज़ार रहीं थीं। शाम को दिव्या घर वापस आई, निखिल के आगमन की खुशखबरी लेकर। सास बहू टीवी के सामने बैठी थी, कि अचानक उसके विमान के राह भटक कहीं अनजान स्थान पर उतरने की सूचना से जैसे  दोनों के प्राण ही निकाल गए। मगर थोड़ी ही देर में निखिल से फोन पर बात होने से जान में जान आई।

सासू माँ उठ कर ईश्वर को धन्यवाद स्वरूप दीपक जलाने लगीं, तभी उनकी निगाह दिव्या पर पड़ी जो आईने के सामने खड़ी माँग में सिंदूर सजा रही थी।

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5-इस बार भी

 “हर साल भाई को राखी डाक से भेज देतीं हूँ। इस बार सोच रहीं हूँ उसकी कलाई पर बाँधने चली जाऊँ।” विमला ने सकुचाते हुए अपने मन की बात पति से कही। पति की चुप्पी को अनुमोदन जान आगे बोल उठी, “आप चिंता मत करो, मैंने कुछ रुपये बचा कर रखें हैं। फल, मिठाई, और भाई के लिए एक कमीज आराम से आ जाएगी। आप बस आने-जाने का टिकट करा देना मेरा। सुबह जाकर रात तक वापस आ जाऊँगी।”

पति को अब भी चुप देख पूछ बैठी, “क्या कहते हो, चली जाऊँ?”

पति ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ खत उसकी ओर बढ़ा दिया, जो उसकी नवब्याहता बहन ने अपनी ससुराल से भेजा था। पहली बार राखी का त्यौहार ससुराल में मना रही बहन ने अपने भाई को बुलाया था।

विमला उठकर रोली चावल की पुड़िया के साथ राखी का धागा लपेट, लिफाफे में रखने लगी। अपनी राखी फिर डाक से भेजने के लिए।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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