जून-2017

संचयनलघुकथाएँ     Posted: November 1, 2015

1.भय
रामप्रसाद पल्लेदार के पोते ने बहुत जिद की। वह कहीं से चॉक का टुकड़ा और छोटी–सी पेन्सिल ले आया। कहने लगा, ‘‘मैं भी स्कूल जाऊँगा। मुझे किताब दिलाओ। कॉपी लाओ, बस्ता लाओ।’’
रामप्रसाद इन बातों को रोज अनसुना कर देता है। वह जब भी सौरभ के भारी बस्ते को अपने कन्धे पर लादता है तो सोचता है, पोते की पढ़ाई के लिए इतना सामान कहाँ से जुटाएगा और पोते पर स्कूल जाने की खब्त सवार है।
रामप्रसाद ने झल्लाकर कई बार पोते को मारा–पीटा भी लेकिन दिन–प्रतिदिन पोता उद्दण्ड होता जा रहा है। जब भी रामप्रसाद सौरभ को बस से उतारता है, उसके बस्ते को उठाता है, उसका पोता उस भारी बस्ते पर झपटता है, किताब–कॉपी निकालने के लिए।
अब तो रामप्रसाद को भय लगने लगा है कि किसी दिन उसकी गैरहाजिरी में उसका पोता सौरभ के बस्ते को ही न ले उड़े।
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2-अब नाहीं

‘‘भगवान् कसम, मनैं नेम है साहब, इब मैं यो काम काई नीं करता। कुछ नीं करता। बस कपड़ों पै प्रैस करके गुजारा करूँ।’’
‘‘…….’’ नए दारोगा की आँखें संवादहीन न थीं।
‘‘माई–बाप कदी वर्दी प्रेस करवानी हो तो लेता आऊँगा, बस यो ही काम आ सकूँ इब तो मैं।’’
‘‘हरामजादे, झूठ तुम्हारे खून में समाया रहेगा जन्म भर। तेरा रिकॉर्ड बोल रहा है, साले तू अफीम,चरस,गाँजा सारी चीजें बेचता है। मुझे आज इस थाने में पन्दरवाँ दिन हो गया, एक बार भी नहीं आया!’’
‘‘साहब, जब धन्धा छोड़ दिया ,तो के करूँ आ कै? जब कमाई थी तो थाने की चौथ न्यारी सबसे पहले जावै थी, आपैई। थाने नै मेरे से कोई शिकायत नीं थी। इब बताओ…..’’
‘‘हाँ–हाँ,बताऊगाँ। भूतनी के, अपना धन्धा छोड़कर हमारा धन्धा चौपट करवा दो। जरा बताइयो, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? तेरा धन्धा तब ही बन्द हुआ ,जब मैं इय थाने में आया। साले, तुम लातों के भूत बातों से नहीं मानते। एकाध बार कचैहरी के चक्कर कटवा दूँगा, तो सारा धन्धा खूब चल पड़ेगा? बोल ससुरे….।’’
‘‘के करूँ साहब, बात यो नहीं है।’’
‘‘और क्या है? कल से कोई बात नही सुनूँगा। चौथ थाने में पहुँच जानी चाहिए हफ्ते बाद, समझे, धन्धा चालू करो या मरो।’’
‘‘साहब साठ से ऊपर हो गया, पोरस थक गे, अब नहीं होगा।’’
‘‘अरे ससुरे बूढ़े, भोतई कर्मठोक है तू तो। अरे भई, तेरी कोई औलाद तो होगी?’’
‘‘जी छोरी थी, ब्याह दी।’’
‘‘और घरवाली?’’ बु्ढ़िया को इंगित कर नए साहब ने पूछा।
‘‘ना जी, यो तो निरी गऊ है जी। इसने कदी भी मेरे धन्धे में साथ नहीं दिया।’’
‘‘बस देख लो, और मैं नहीं सुनना चाहता, हमें भी आखिर कुछ चाहिए, पिछले कागजातों का पेटा भरने के लिए। कुछ धन्धा करो, म्हारा भी कुछ हो। समझे!’’ आँखें तरेरकर नया दारोगा गुर्राया। बूढ़े के इन्कार करने से पूर्व ही डण्डा तन चुका था, मगर जर्जर हाथों ने उस डण्डे को हवा में ही थाम लिया।
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3-शिनाख्त

‘‘देखो भाई साहब, एफ.आई.आर. तो लिख लेंगे, हमें क्या ऐतराज है और अगर बदमाश पकड़ में आ भी गए तो मैडमजी का हार बरामद हो, न हो। मिल भी गया तो वह उसी समय इनके गले में नहीं आ जाएगा, बदमाशों की शिनाख्त के लिए मैडम को एक–दो बार थाने आना पड़ेगा। पेशी पर भी अदालत के चक्कर लगाने पड़ सकते है। आप तो जानते ही हैं ये लोग जमानत पर रिहा होकर इसी सडक के दिन–भर चक्कर लगाते हैं। स्कूल आने–जाने के लिए मैडम के लिए भी यही रास्ता है। इनकी सुरक्षा के लिए हर समय तो पुलिस नहीं रह सकती ना। सोच लो ये सब…’’
थाने में बैठे उस पुलिस कर्मचारी की बात सुनकर मैं सोच रही थी कि मेरी पीठ की तरफ से आई तेज रफ्तार बाइक पर सवार उन युवकों को कैसे पहचानूँगी जो मेरे गले का हार झटककर ले गए। उस समय हक्की–बक्की मैं खुद को सँभालती, उनके पीछे दौड़ती या उनकी पीठ से उनकी पहचान बनाती। और सच पूछो तो पुलिसवाले की बात मुझे धमकी–सी लगी। मैं पति के साथ, स्कूल से छुट्टी करके, कहाँ–कहाँ के चक्कर लगाऊँगी और वे भी प्राइवेट नौकरी से कब तक छुट्टी लेंगे!
‘‘कोई बात नहीं, देख लो, सोच लो, फिर एफ.आई.आर. लिखवा लेना’’, पुलिसवाले ने कहा।
‘‘अच्छा साहब, हम कल आएँगे’’, कहकर मैं तेज कदम बढ़ाते हुए अपने पति के साथ थाने से बाहर आ गई।
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4-अनलिखा

लंच–बॉक्स खुलते ही, मेरे चहुँ ओर शुद्ध घी में तली सब्जी की एक महक फैल गई, जिसका स्वाद मैंने उसे खाकर और निकट बैठे एक मजदूर ने सूँघकर लिया।
वह बैठा किसी को खत लिख रहा था। लिखते–लिखते उसने एक–दो बार मेरी तरफ देखा तो मुझे कुछ अटपटा–सा लगा। मैंनें एक रोटी उसकी ओर बढ़ा दी। उसने कहा, ‘‘नहीं बाबूजी, हम खाते हैं।’’ हालाँकि साफ जाहिर था कि वह कभी खा पाता है, कभी नहीं। दिन–रात मशीनों पर काम करके उसे न तो खाने का अवकाश ही मिलता है और न स्वाद ही।
मैंने फिर आग्रह किया तो उसने कहा, ‘‘चार रोटियाँ खा चुकने के बाद मुझे एक रोटी देने का आपका आशय?’’ इसका उत्तर यद्यपि मेरे पास नहीं था, किन्तु मैं बोला, ‘नहीं खा लो, अगर तुम बुरा न मानो, मैंने केवल औपचारिकतावश पूछा था इसे कुछ और न समझो।’’
उसने मेरे हाथ से रोटी ले ली और तुरन्त बड़ी शालीनता से कहा, ‘‘बुरा न मानें, मैं आपकी यह रोटी अनौपचारिकता से लौटाता हूँ । अपनी रोटी मैं वक्त पर खा चुका हूँ।’’
मैं हड़बड़ाकर पीछे हटा तो वह भी मुस्कराता हुआ चला गया।
जिस पुरजे पर वह खत लिख रहा था, वह वहीं रह गया। लिखा था–माँ, वहाँ हल चलाकर शाम की रोटी नसीब हो जाती थी। यहाँ न सोने का समय है, न तुम्हें याद करने का, और रोटी खाने का तो न समय है और न पैसे।
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5-प्रतिक्रियावादी

अभी बस की पंक्ति में आकर खड़ा ही हुआ था कि एक तटस्थ भाव से घूरते नवयुवक भिखारी ने साधिकार हाथ फैला दिया–‘‘कुछ पैसे दो।’’
गठे शरीर का नवयुवक और इस ढंग से भीख माँगे! उसके व्यवहार से मेरी भौंहे तन गई–‘‘कुछ काम करके नहीं खा सकता’’ मैं अनुमान लगा रहा था कि वह लज्जित होकर चला जाएगा।
‘‘भाई साहब, मैं काम की तलाश में हूँ , तब तक तो खाने को चाहिए न! आप ही यह कृपा कर दें, मुझे कोई काम दिला दें।’’
विचार–गोष्ठी की चख–चख से ऊबकर निकलते हुए सोचा भी नहीं था कि ऐसे ढीठ भिखारी से पाला पड़ने वाला है। साम्यवादी चिन्तक होने के नाते सप्ताह में चार बार कभी दिल्ली, कभी बाहर भाषण–गोष्ठी में साम्यवादी–विदेशी संस्थानों के अनुदान पर आना–जाना लगा रहता है। भिखारी को टालने की गर्ज से कहा, ‘‘मैं खुद ही काम की तलाश में हूँ।’’
अब भिखारी के ताज्जुब में आने की बारी थी। उसने अपनी आँखों का क्षेत्रफल बढ़ाकर मेरे उजले झकाझक कपड़ों,जूतों,सूटकेस, पान सिगरेट और चमेली के तेल की सुगन्ध का तादात्म्य मेरी बेरोजगारी से लगाने का असफल–सा प्रयास किया।
दो बेरोजगार विपरीत स्थिति में आमने–सामने थे।
सहसा उसका तटस्थ भाव घृणा में बदला।
उसके माथे पर सलवटें पाकर मैंने सोचा, ऐसे भिखारी अक्सर बुरा मानकर चले जाते हैं। किन्तु वह झल्लाया, ‘‘देने हों तो दो, क्यों अपने व्यर्थ–चिन्तन में मेरा समय भी बर्बाद करते हो?’’
गजब है! मेरा सोच व्यर्थ और इस टुटपूँजिए का समय मूल्यवान। काश! हाथ में पकड़ी सिगरेट कोड़ा बन जाती तो उसकी पीठ पर खूब निशान जमाता, गिनता और भूल जाता।
मैं पीछा छुड़ाने के लिए लाइन से बाहर निकलकर सीधा फिर विचार–गोष्ठी में पहुँचा। वहाँ वही वाद–विवाद, शोर–शराबा था। सीधे तनकर मैंने कहा, ‘‘व्यवहार–रहित चिन्तन व्यर्थ है और हम सभी पालतू कुत्ते यहाँ भौंकने के लिए रुके हुए हैं।’’ लगभग सभी ने आँखें तरेरीं। कुछ मेरी ओर लपके। मैं मुड़ा तो एक नवयुवक ने कहा, ‘‘कैच हिम, काउण्टर रेवोल्यूशनरी, ही इज फुलिश, रास्कल, स्काउण्ड्रल, रिएक्शनरी….’’
जब मैं उनकी पहुँच से बाहर हो गया तो मुझे सुनाई दियास, ‘‘लेट हिम गो, ही हैज गॉन मैड।’’
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
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    -सम्पादक द्वय

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