अक्तुबर-2017

अध्ययन -कक्षलघुकथाओं में स्त्री-विमर्श     Posted: August 1, 2017

स्त्री विमर्श का आरम्भ कईं लोग देह मुक्ति से करते है, कि कम से कम स्त्री को अपनी देह का अधिकार तो मिले, अपनी देह का मनचाहा उपयोग कर सके। भूंमडलीकरण, कॉरपोरेट जगत, बाजार ,विज्ञापन, मीडिया और साम्राज्यवादी पूंजी के गठजोड ने अपने हित पोषण  के लिए स्त्री को मुक्ति दी है, लेकिन उसे वस्तु से व्यक्ति नही बनने दिया है। उसे देह की आजादी का फलसफा पढाकर वह एक बडा बाजार रच रहा है ब्रिटनीस्पीयर्स ने अपने जननांगो का  प्रदर्शन छायाकारो के समक्ष किया, तो  किसी ने अपने कौमार्य की अर्न्तराष्ट्रीय बोली लगवा दी। धन की शक्ति के आगे वह निर्वसन होकर अपने चित्र खिंचवाती है। इस संर्दभ में विजय माल्या के कलेंडर देखे जा सकते है। विज्ञापनो की दुनियॉ  स्त्री की एक बिंदास कामुक  छवि प्रस्तुतकर रही है। लेकिन यहॉ हमारा मंतव्य देह दर्शन से नही है, न ही यौनिकता की आजादी से है। भारतीय परिवार पितृसत्ता और सामंती मूल्यों से मुक्त नही हुआ है ,न  ही  परिवार में कोई जनतंत्र  है।

निश्चित ही भारत मे स्त्री, दूसरे की सम्पति है।उसके बारे में सारे निर्णय पुरुष ही लेते हैं।कहॉ आना -जाना है, किससे बात करना है   किससे नही, क्या पहनना है, कैसे बैठना – उठना है, सुबह कितने बजे उठना है, सब्जी क्या बनाना है, फोन पर बात करनी है या नही, आगे पढ़ना है या नही ,कौनसा विषय लेकर पढ़ना है, नौकरी करना है या नही , किससे विवाह करना है। उसे अपने बारे में निर्णय लेने का कोई हक ही नही  है। ड्रांइगरूम में शोभा की वस्तु है, लेकिन घर के सारे ‘धतकरम’ उसे ही करना है, उसके प्रत्येक कार्य की जिम्मेदारी का मूल्याकंन उसी समय हो जाता है। इतनी देर कहॉ गई थी ,क्या कर रही थी, एक टोह लेती ऑख बराबर स्त्री का पीछा करती है। तमाम तरह के बंधनो में बंधी स्त्री एक खुली जेल में रह रही है, थोड़ा बहुत सम्मान तभी मिलता है जब  वह पुत्रों को जन्म दे और उनके पालन पोषण में जीवन खपा दे। आज कि स्त्री अपनी अस्मिता की तलाश में है।, अपने व्यक्तित्व को संवारने  की कोशिश में है। पिता के घर में वह पराया धन है और पति के घर में , उसे कभी भी घर से निकलने को कहा जा सकता है। उसके घरेलू कार्य का आर्थिक मूल्याकंन एक नौकरानी की तनखा  से ज्यादा नहीं है। घर में बहू क्या आई ‘नौकरानी'(सूर्यकांत नागर) की छुट्‌टी कर दी गई ।

आदर्शवादी व भाववादी लोग स्त्री विमर्श में सबसे पहले स्त्री को देवी कहते है, या देवी सर्वभुतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता, जहॉं नारी की पूजा होती है वहॉ देवता रमते है, मॉ वंदनीय है, मॉ के कदमो में जन्नत है, लेकिन भारतीय परिवारों की वास्तविकता से वे रूबरू नहीं होते है, स्त्रियों पर कारित घरेलू हिंसा में वे स्वयं सलंग्न होते है। उसे सम्पति का अधिकार नहीं है, कानून ने दिया है, लेकिन उसने अभी तक प्राप्त नहीं किया है। दहेज के लिए बहुओं को जलाने का सिलसिला कानून बनने के बाद भी रुका नहीं है, कन्याओं को कोख में ही समाप्त करने का षडयंत्र हमारे ही परिवार चलाते है। नारी की अपनी कोई अस्मिता नहीं है, वह संबंधो में ही व्यक्त होती हैं चैतन्य त्रिवेदी अपनी कथा ‘संबंध जिए जाते है’ में कहते है ‘स्त्री खालिस स्त्री रह कर नही जी सकती ,खालिस स्त्री को पुरुष से नहीं बचाया जा सकता है, परम्परा के अनुसार विवाह कर मॉं बनो वरना बलात्‌ भी उसे मॉ बनाया जा सकता है। स्त्री के लिए खतरे तभी तक है, जब तक स्त्री, स्त्री है, संबंधो में बंधकर वह सुरक्षा महसूस कर सकती है।

भारत के संदर्भ में स्त्री विमर्श में बडी-बडी बहसें और बडी-बडी बातें करने की बजाय ,छोटी छोटी बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। जो करोडों स्त्रियों के जीवन में कुछ फर्क ला सके । ‘दूध’ कथा में चित्रा मुद्‌गल यह दर्शाती है कि घर में दूध पुरुषो के लिए है, अवसर पाकर बेटी दूध पीने लगती है तो मॉ उसे बुरा भला कहती है। ‘दूध पीकर तुझे कौनसा लठैत बनना है, यानी शारीरिक रूप से उसे कमजोर बनाए रखना ताकि पुरुष की संरक्षा में रहे । बेटी ने मॉ से सवाल पूछा ”मै जन्मी तो दूध उतरा था तुम्हारी छातियो में। तो मेरे हिस्से का दूध घर के मर्दों को पिला दिया” मॉं फक्क सी देखती रही, लडकी क्या बोलती है ! लेकिन अब लड़की को बोलना होगा अपने मुठी भर आसमान के लिए, जब बेटी को ही नही मिलता दूध तो बहुओ को क्या मिलेगा !

बेटे के जन्म पर थालियॉ बजाकर सूचना दी जाती है प्रफुल्लित उछलती-कूदती दादियॉ घर-घर मिठाईयॉ बांटती है और बेटी के जन्म पर, केवल मुंह लटकाने का काम किया जाता है। बेटों के लिए मंदिरो और मजारो पर मन्नते मांगी जाती है, अभी तो धनी लोग थाइलैंड जाकर आई.वी.एफ.तकनीक से बेटा लेकर आते है क्योंकि वहॉ इस तरह की कानूनी मनाही नहीं है ।

वंश आगे बढाने की चिंता इतनी ज्यादा है कि भारतीय परिवार इसके लिए कुछ भी कर सकते है, ”दूधो नहाओ पूतो फलो” का आशीर्वाद भारत में ही दिया गया है सुकेश साहनी की कथा ‘तृष्णा’ की सास का कथन -‘अब देखो बहू ने तीसरी लौंडिया जनी है, दो क्या कम थी बाप की छाती पर मूंग दलने के लिए । अशोक भाटिया की कथा में पत्नी, पति के ‘भीतर का सच’ भॉंप कर प्रति प्रश्न करती है अच्छा एक बात बताओ अगर हमारा पहला बच्चा लड़का होता तो भी क्या दूसरे के बारे में सोचते लेकिन पति बराबर जोर दे रहा था । अगर लड़की हो गई तो? का प्रश्न   मुंहबाये खडा है ‘देसराज ने उसी चक्कर में पॉच लड़कियॉ पैदा कर अब पछता रहे है’, लेकिन पितृसत्तात्मक परिवारो के मर्दवादी सोच से न स्त्री मुक्त हो पा रही है, न पुरुष ।

जब से भ्रूण परीक्षण की पद्धति विकसित हुई है तबसे ही लड़की को कोख में नष्ट करने का षडयंत्र चल रहा है।, नतीजन सेक्स अनुपात काफी घट गया है विशेष तौर पर पंजाब, हरियाणा, बिहार, यू.पी राजस्थान, और मध्य प्रदेश में । नारी एक ‘निरीह इंसान'(डॉ मुक्ता) है ‘तुम गर्भपात करवा लो अन्यथा हम तुम्हें घर से निकाल देंगे’, सास ने बहू से कहा और आज्ञाकारी पुत्र मॉ के पक्ष में खडा रहा। इस लेख के लेखक की कथा   ‘क्या मै ने ठीक किया’ में असीम दबाब व दमन से उत्पीडित औरत तीसरे कन्याभ्रूण को लेकर पिता के घर आ जाती है, स्त्रियॉ साहस जुटा रही है’ ‘फैसला'(सीमा शकुनि) के पति का अभिमत है ‘अगर कन्या भ्रूण की सूचना हो तो तुम अच्छी तरह जानती हो कि तुम्हें क्या करना है, वही जो दो बार पहले कर चुकी हो, हमारे समाज में प्रथम लड़की होना अशुभ माना जाता है’ और ऐसी जननी से रिश्ते तोड़ कर उसे पीहर भेज दिया जाता है’। पति को पत्नी के स्वास्थ्य की चिंता नही, दो बार गर्भपात होने पर भी तीसरे बार गर्भपात करने को कह रहा है कैसा निर्मम है मर्दवादी सोच लेकिन स्त्री साहस जुटाकर फैसला करती है कि इस बार मैं ऐसा नही करूंगी मै अपनी बेटी को जन्म दूंगी। अनिता वर्मा की ‘निश्चय’ में भी स्त्री कन्या को जन्म देने का ‘निश्चय’ करती है।

नरेन्द्र कौर छाबड़ा की कथा ‘युक्ति’ में अजन्मी पुत्री का पत्र है वह लिखती है ‘मॉ मैं मरना नहीं चाहती, मैं भी इस दुनिया में आना चाहती हूं’ वह मॉ को उससे निजात पाने की युक्ति बतलाती है ‘मुझे जन्म देकर किसी अनाथालय में दे देना, निःसन्तान दम्पत्ति मुझे अपनी बेटी बना लेंगे मुझे मॉ-बाप मिल जायेंगे और तुम्हें मुझसे मुक्ति’। अमानवीयता की हद तक हमारा जेण्डर प्रफरेन्स है। अन्जू दुआ जैमिनी की कथा ‘पहली’ में मॉ स्त्री की दयनीय स्थिति देखकर दूसरी लड़की को जन्म नहीं देना चाहती । प्रतिवर्ष हजारों स्त्रियां दहेज हत्या की शिकार हो जाती है या स्वयं मृत्यु का आलिंगन कर लेती है । हसन जमाल बताते हैं कि एक ‘जौहर’ तो पद्‌मिनी के समय हुआ था अब नये किस्म के जौहर का चलन चल पडा है, नित्य नयी दुल्हनें जलने लगी हैं अगुआ की गई स्त्री के बरामद होने पर मॉ-बाप उसें स्वीकार नहीं करते ‘चंगुल’ (कमल चौपड़ा) स्त्री का कसूर न होते हुए भी उसे दूसरों के अपराध का दंश भोगना पड़ता है।

भारतीय परिवारों में बुराई का ठीकरा हमेशा औरत पर फोडा जाता है । बेटी की दूसरी शादी कराने के इच्छुक माता पिता के सामने ‘बहू का सवाल’ (बलराम) की संतानोत्पत्ति में उनका बेटा अक्षम, यह जानकर क्या वे उसकी दूसरी शादी करवा देंगे  दोहरे मापदण्ड स्त्री पुरुष के लिए और यही से जेण्डर असमानता के प्रश्न मुख्य हो जाते हैं ।

यौन शोषण की गाथाऐं लघुकथाओं में अलग-अलग ढंग से व्यक्त हुई है । ‘औरत का दर्द’ (श्यामसुन्दर अग्रवाल) की मॉ बेटी को न घर पर छोड़ सकती है न काम पर ला सकती है, घर पर पिता की कुदृष्टि है तो काम पर ठेकेदार की । ‘पाप के सॉप’ (सतीश दुबे) की नौकरानी कुदृष्टि रखने वाले गृहस्वामी को लताड़  कर चली जाती है। पवन शर्मा की कथा में ‘लड़की’ सैक्सुअल हैरेसमेन्ट करने वाले को सबक सिखाने की ठान लेती है । पुलिस वाले पति व बेटे की जमानत के बदले बहू की अस्मत चाहते हैं (आजादी-मोहन राजेश) । ‘गुरु दक्षिणा’ (नीतू) में गुरु शिष्या से रति कर्म करना चाहते है। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की कथा ‘स्क्रीन टेस्ट’ की युवती फिल्मी दुनिया के चकाचौंध के प्रति आकर्षित होकर घर से भागती है और अन्ततः देह मर्दन का शिकार हो जाती है। स्त्रियाँ हमेशां पुरुषों के ‘भय'(कमला चमोला) से आशंकित होती है ।

बलराम अग्रवाल की कथा ‘अकेला कब तक लडेगा जटायु’ में छेड़छाड़  का विरोध करने वाले को ही मार दिया जाता है क्योंकि समाज कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर पाता । मर्द वह जो अवसर पाकर स्त्री की देह को बलात् हथिया ले जो ऐसा नहीं कर सके उसे वे ‘नपुंसक'(पृथ्वीराज अरोड़ा) सम्बोधित करते हैं इसी मर्दवादी सोच के कारण काकी नौकरी पर जाती विधवा को ‘कवच'(कनु भारतीय) यानी सुहाग के चिह्न धारण करने को कहती है ।

यौन शोषण के साथ-साथ स्त्री का आर्थिक शोषण भी है उसे मजदूरी कम मिलती है पति व उसके घर वाले स्त्री की कमाई हथियाने के कई हथकण्डे अपनाते हैं इस सन्दर्भ में रूपसिंह चन्देल की कथा ‘बैंक बैलेन्स’ देखी जा सकती है पत्नि अपनी कमाई से अपने भाई बहनों को नहीं पढ़ा सकती, माता पिता का इलाज नहीं करवा सकती यानि उसके पैसों पर भी उसका नियंत्रण नहीं है ।

कसौटी (सुकेश साहनी) में कार्पोरेट नियोजक ऐसी महिला कर्मचारी चाहते हैं जो कम से कम चालीस प्रतिशत नॉटी हो । नॉटी होने के मायने बॉस के साथ ट्‌यूर पर जाना, बॉस के दोस्तों को ड्रिन्क सर्व करना, रूम शेयर करना आदि । कॉर्पोरेट जगत धन का लालच फैंक कर शर्म हया के पर्दे उठा रहे हैं, कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाले सुधांशु और मंदिरा दस वर्षो से लिव-इन-रिलेशनशिप में हैं, दोनो आत्मनिर्भर हैं अपनी मर्जी से जीते हैं, लेकिन मंदिरा अब मॉ बनना चाहती है इसलिए वह सुधांशु से शादी करने को कहती है लेकिन सुधांशु शादी के लिए तैयार नहीं होता उसे लगता है कि वह छली गई है (वजूद-सतीशराज पुष्करणा) ।

स्त्री को हमेशा से दंगों मे हिंसा झेलनी पड़ी है, शाह आलम कैम्प की रूहें (असगर वजाहत) गुजरात के दंगों में मारी गई औरतों की व्यथा कथा कहती है रात के वक्त शाह आलम कैम्प में रूहें आती हैं अपने बच्चों के सिर पर हाथ फिरा कर कहती है ‘कैसे हो सिराज’, ‘तुम कैसी हो अम्मा’, ‘सिराज अब मैं रूह हूं अब मुझे कोई नहीं जला सकता’ । रूहें कैम्प में अपने बच्चों को ढूंढ रही है उन्हें अपने बच्चे नहीं मिले तो रूहें दंगाइयों के पास गई वे कल के लिए पेट्रोल बम बना रहे थे ‘अरे ये उस बच्चे की मॉ तो नहीं है जिसें हम त्रिशूल पर टाँग आए हैं’ कैम्प में एक बच्चा बहुत खुश रहता है ‘मैं बहादुरी का सबूत हूँ उनकी जिन्होंने मेरी मॉ का पेट फाड़कर मुझे निकाला था और मेरे दो टुकड़े कर दिए थे।

इन लघुकथाओं से गुजरते हुए यह महसूस हुआ कि यौन- शोषण व जैण्डर असमानता के विषय बहुतायत से मिलते है; लेकिन अन्य पक्षों पर कलम कम चलाई गई है समाज में हो रहे परिवर्तनों को उकेरने की चेष्टा भी कम हुई है, बाजार और भू-मण्डलीकरण किस तरह स्त्री का चेहरा विकृत कर रहा है उसके विषद विष्लेशण की आवश्यकता है लेखिकाओं को इस सन्दर्भ में निर्भीक अभिव्यक्ति करने की आवश्यकता है ,जो उनके लिए मुक्ति का मार्ग प्रस्तुत कर सके ।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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