दिसम्बर-2017

मेरी पसन्दलघुकथा और गद्य कविता जुड़वाँ बहनें हैं शायद     Posted: June 1, 2016

  लघुकथा में विचार,भाव,अनुभूतियों को सघन संवेदना के साथ प्रस्तुत करने की बड़ी चुनौती होती है . यह चुनौती ही लघुकथा के स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण करती है .यह लेखक के रचनात्मक व्यक्तित्व की एक तरह से परीक्षा होती है .लघुकथाएँ कहानियों की तरह ही व्यवस्था पर चोट करती हैं .यह अलग बात है कि इनका हथौड़ा एक ही पड़ता है .लघुकथा में दो टूक बात होती है .लेखक की साफगोई अर्थात सीधे सीधे संवाद करने की कला ही लघुकथा है . कभी लगता है कि लघुकथा और गद्य कविता जुड़वाँ बहनें हैं . शरीर अलग आत्मा लगभग एक . लघुकथा लेखक में विवेक ,समझ ,अंतर्दृष्टि होनी चाहिए . ऐसी कि सीमित दायरे में असीमित को समेट ले . लघुकथाएँ कटपीस की तरह होती हैं . हर रंग , हर पोत में शानदार होती हैं . कम में ज्यादा कहती हैं. लघुकथा जैसे भोंहों के हलके से इशारे की कला .यहाँ अनावश्यक टीम टाम नहीं होती है.ये चोट करती हैं तो उस पर मलहम भी लगाती हैं . यह तभी संभव है जब वे संवेदनाओं के साथ लिखी गई हों . सिर्फ यादों के सहारे सोच समझ कर ही नहीं बल्कि गुनकर लिखी गयी होती हैं . लघुकथा आकार में छोटी हो सकती हैं अर्थ में नहीं . लघुकथा में एक बांकपन होता है . अर्थात ””ट्विस्ट इन द टेल”” होता है .जिस से मन पर गहरी छाप पड़ती है . छोटी होते हुए भी लम्बे समय तक याद रहती है .
राजेन्द्र यादव लघुकथा को चुटकला कहते हैं . और कहते हैं कि लघुकथा कहानी की बीज कथा है . यह लघुकथाओं के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाना है . अगर इस बात को सच माना भी जाये तो फिर उन प्रसिद्ध ,बड़े लेखकों के लिए क्या कहेंगे जो बहुत बाद में मुड़कर इधर आते हैं . यह चुटकला भर नहीं है . यह चुटकी लेती है या फिर च्यूंटी काटती है, जिससे व्यक्ति तिलमिला उठता है .
लघुकथा आसमान से औचक टूटता कोई सितारा है जो आपकी कोई ख्वाहिश पूरी करने का विश्वास दिलाता है . सितारा तो पल भर अपनी चमक दिखा लुप्त हो जाता है पर लघुकथा नहीं । जाड़े में ठिठुरते किसी राहगीर को जंगल में दिख जाये एकाएक कोई अलाव -यह लघुकथा है .पहले प्यार की पहली नजर , बच्चे की किलकारी या फिर पहला रोना . सीमा पर युद्ध के लिए जाते सिपाही की आँखों की चमक या फिर मुड़ कर देखने पर आँखों में दिखे झिलमिलाता सृष्टि भर स्नेह . जीवन की अटूट इच्छा , मरकर भी . रात के सूनेपन में अचानक सुनाई पड़े जैसे वो खिलखिलाहट जो बरसों पहले कभी सुनी थी .पर आज भी यूँ ताज़ा है जैसे अभी अभी सुनी है , यह लघुकथा है .वह दौड़ती-भागती बदली की तरह औचक तपती दोपहर में बरस जाती है .और मन सौंधी खुशबू से भर उठता है. विभिन्न रंगों के खास पलों को माँडनों की तरह माँड देना ही लघुकथा है .
आज मैं आपसे ऐसी दो लघुकथाओं की बात करूँगी ,जो सीधे जीवन से,हृदय से निकलकर आती हैं, एक करूण आर्द्र पुकार की तरह ,आपको भीतर तक भिगो जाती हैं । मुरलीधर वैष्णव की ””रोंग -नंबर”” तथा राकेश माहेश्वरी ””काल्पनिक”” की ””दाँत कुचरनी””।
””रोंग नंबर”” में मानवीय संवेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है ।घर से भागी ,पछताती ,पिता से माफी माँगती ,रोती गिड़गिड़ाती लड़की का चित्र देखिए । लगता है जैसे चित्रकार ने कोई ऐसा चित्र बना दिया है जो गलती करने के बावजूद सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाता है । पाठक लड़की और पिता की भूमिका में आए अजनबी के प्रति हमदर्दी से भर उठता है । सोचता है अनजाने में लड़की से गलती हुई है ।उसे अपनी भूल का एहसास हो चुका है । उसे माफ कर देना चाहिए ।सबक यह भी मिलता है कि उस लड़की की तरह और लड़कियों को बिना सोचे समझे भावुकता में बहकर ऐसे निर्णय नहीं लेने चाहिए जो बाद में जी का जंजाल बन जाएँ ।लेखक ने यहाँ पाठक की कल्पना के लिए बहुत गुंजाइश छोड़ी है । मुझे लगता है यह लड़की प्रेम के छलावे का शिकार हुई है ।ऐसे ही बहुत सारी भोली भाली लड़कियाँ जाल में फँसकर रह जाती हैं । इस लड़की को एक अच्छा इंसान मिल गया पर औरों को मिल जाएँ यह जरूरी नहीं है । लेखक यह भी संदेश देता है ,बल्कि लघुकथा कहूँ तो ज्यादा ठीक रहेगा कि अभी भी मानवता जिंदा है । प्रेम जिंदा है ।लघुकथा के छोटे से दायरे में इतनी बारीक बुनावट प्रशंसनीय है ।लड़की ने ””रोंग नंबर”” डायल नहीं किए बल्कि ””राइट नंबर”” डायल किए ।
””दाँत कुचरनी”” की माँ की हँसी रुला जाती है ।देखिए बेटा कितने बरस बाद अपनी माँ से मिला है । माँ के मुँह में दाँत थे तब गया था विदेश और अब जब उसके सब दाँत जा चुके हैं मुँह पोपला हो चुका है तब वह लौटकर आया है । ऐसे में जब वह माँ को सोने की दाँत कुचरनी देता है तो माँ हँसती हैं पर मुझे लगता है वह भीतर बहुत रोती है उसका दिल बहुत उदास होता है तभी तो सिर्फ हँसती ही नहीं बल्कि ज़ोर से हँसती है ।अक्सर सुनने में आता है और महसूस भी किया है कि ज्यादा ज़ोर की हँसी में कहीं न कहीं पीड़ा समाई होती है ।वह हँसी होती ही पीड़ा छुपाने के लिए है ।समय पर माँ को सोने की जगह लकड़ी की दाँत कुचरनी मिल गई होती तो क्या बात थी पर नहीं मिली । मिली तब जब दाँत नहीं रहे ।चार पाँच पंक्तियों की इस कथा में बहुत सारी बातें लेखक ने कह दी हैं जैसे कि समय के साथ हर रिश्ता अपनी चमक खो देता है । उसका खिंचाव, उसका प्रेम , उसका अपनापन, उसकी सघनता ,उसकी गहराई कम होती चली जाती है । पैसा और महत्वाकांक्षाएँ कहीं न कहीं ममता और प्रेम के बीच बड़ी तेजी से आ रही हैं .कभी कभी इन सबके चलते हम इतनी देर कर देते हैं कि जरूरतें ही समाप्त हो जाती हैं । वक्त आगे सरक जाता है । हम पीछे रह जाते हैं । समय हमारे देखते देखते ही इतना बदल जाएगा कभी सोचा भी नहीं था ।पर इस समय की यह सबसे बड़ी सच्चाई है ।
-0-1- रोंग नंबर : मुरलीधर वैष्णव

””””पापा प्लीज … फोन नहीं रखना , मैं जानती हूँ मैंने आपका विश्वास तोड़ा है । मैं बहुत पछता रही हूँ कि घर से भागकर मुंबई आ गई … मैं यहाँ बहुत परेशान हूँ, पापा !…मैं तुरंत घर लौटना चाहती हूँ । पापा प्लीज … !एक बार … सिर्फ एक बार कह दीजिए कि आपने मुझे माफ कर दिया !””””उसने फोन पर हैलो सुनते ही गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया था ।
”””” बेटी तुम कहाँ हो ?तुम जल्दी ही घर लौट आओ । मैंने तुम्हारी सब गलतियाँ माफ कर दीं ….””””कहकर उसने फोन रख दिया ।
पचास वर्षीय वह कुँवारा -प्रौढ़ सोचने लगा कि उसकी तो शादी ही नहीं हुई ,यह बेटी कहाँ से आ गई ?लेकिन वह तत्काल समझ गया था कि किसी भटकी हुई लड़की ने उसके यहाँ रोंग नंबर डायल कर दिया था । बहरहाल , उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी आवाज उस लड़की के पिता से मिलती -जुलती थी और उसने उसे रोंग नंबर कहने की बजाय ठीक ही जवाब दिया था ।
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2-दाँत कुचरनी : राकेश माहेश्वरी ””काल्पनिक””
कई वर्षों से विदेश में रह रहे बेटे को अपनी माँ से मिलने का मन हुआ और वह हिंदुस्तान आ गया । अपने बेटे को अनायास अपने सामने देखकर माँ भाव विभोर हो गई ।उसने उसे अपने गले से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगी । तभी बेटे ने अपनी जेब से एक डिब्बी निकाली और अपनी माँ को देते हुए बोला ,””””रख लो माँ सोने की है ,मैं तुम्हारे लिए लेकर आया हूँ ।”””” माँ ने डिब्बी खोलकर देखी और ज़ोर से हंस पड़ी। हँसते समय उसका खुली हुई डिब्बी सा पोपला खुला हुआ मुँह दिख रहा था। उसके हाथों में सोने की दाँत कुचरनी दबी हुई थी ।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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