जून-2017

अध्ययन -कक्षलघुकथा में शिल्प की भूमिका     Posted: June 1, 2017

 

शिल्प ही किसी रचना की ताकत है और रचनाकार की पहचान भी | शिल्प यानि गढ़न, अंदाजे -बयाँ, कहन पद्धति, रचना कौशल, रचनाकार द्वारा स्वयं को तलाशने की बेचैनी | लघुकथा के संदर्भ में बात करें तो हम कह सकते हैं कि इस बेचैनी के चलते ही लघुकथाकार प्रस्तुति के ऐसे नये-नये ढंग आविष्कृत करता है जिनके द्वारा वह पाठकों के दिलोदिमाग तक अपनी राह बना सके | वैसे शिल्प लघुकथाकार का आंतरिक लोकतन्त्र है जिसके अंतर्गत उसे यह निर्णय करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है कि किसी कथ्य विशेष के लिए कौन-सी कहन पद्धति अपनायी जाय | यहाँ कोई नियम-कायदे, कोई शास्त्र काम नहीं देते | दूसरी ओर कई बार ऐसा भी होता है कि कथ्य अपने साथ रूप भी लेकर आता है | यह रचनाकार के अंतस की एक विस्मयकारी घटना है | जब अवचेतन में कोई कथ्य उमगता है तो इसके साथ ही प्रस्तुति का एक अमूर्त खाका भी चमक उठता है | परंतु जब यह परिघटना नहीं होती है, तब लघुकथाकार को अपना मार्ग स्वयं तलाशना पड़ता है |

एक लघुकथाकार के लिए रूप की तलाश बहुत टेढ़ा काम है | वह उपन्यासकार या कहानीकार की तरह निश्चिंत होकर कल्पना के घोड़े नहीं दौड़ा सकता | वह इस प्रकार का एक भी वाक्य, एक भी शब्द, एक भी दृश्य, एक भी चित्रण, एक भी संवाद, एक भी हाव-भाव समाविष्ट नहीं कर सकता जो लघुकथा की कसावट को लुंजपुंज कर दे | यहाँ तक कि उसे एक कवि की भाँति इस बात के प्रति भी सचेत रहना पड़ता है कि कहाँ अर्द्ध विराम आएगा, कहाँ पूर्ण विराम और किस स्थान पर प्रश्नवाचक व विस्मयादिबोधक चिह्न लगाये जाएंगे | उसे यह भी ध्यान रखना होता है कि कहाँ पैराग्राफ बदलना है और कि उसकी लंबाई कितनी रखनी होगी | इस तरह लघुकथा को उस मंज़िल पर पहुँचाना होता है जहां यदि एक शब्द भी निकाल दिया जाय तो लगे कि इमारत ढह जायेगी | सब कुछ बहुत कसा हुआ, सुगठित, मितव्ययता के साथ | शकुंतला किरण अपने शोध ग्रंथ ‘हिन्दी लघुकथा’ में ठीक ही लिखती हैं;

‘लघुकथा एक प्रकार से कम आय वाले एक अर्थशास्त्री का अपना निजी बजट है, जिसे वह प्रबुद्धता के साथ बहुत सोच-विचारकर इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का सार्थक उपयोग हो सके |’

लघुकथा के तीन अंग होते हैं; क्या(कथ्य), कैसे(शिल्प) और क्यों( लक्ष्य, दृष्टिकोण या विचार) | शिल्प कथ्य और लक्ष्य के मध्य एक सेतु का कार्य करता है | शिल्प जितना आकर्षक होगा पाठकों की आवाजाही भी उतनी ही अधिक होगी | इस सेतुबंध के लिए लघुकथाकार कई-कई शैलियों का सहारा लेता है यथा वर्णनात्मक, संवादात्मक, प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक, आत्मकथात्मक आदि | कुछ लघुकथाकार पत्र शैली, डायरी शैली व नाटक शैली का भी प्रयोग करते हैं, यद्यपि इस तरह के उदाहरण कम ही हैं | अनेक लघुकथाओं में जातक कथा, लोककथा, फैंटेसी, फ्लैश बैक, पौराणिक आख्यान के कथा शिल्प भी प्रयुक्त हुए हैं जिनके माध्यम से समसामयिक परिदृश्य का खूबसूरती से उद्घाटन हो सका है |

लघुकथाकार के रचना-कौशल का अनुमान उसके द्वारा दिए गये शीर्षक से ही हो जाता है | शीर्षक न केवल ध्यानाकर्षक व उत्सुकता जगाने वाला बल्कि लघुकथा के  केन्द्रीय  विचार का संवाहक भी होना चाहिए | बलराम अग्रवाल की एक लघुकथा का शीर्षक है  ‘आखिरी उसूल’ | इस शीर्षक से एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है जो लघुकथा को पूरा पढ़ने के लिए प्रेरित करती है | इसी प्रकार निम्न शीर्षक भी बहुत कुछ कह जाते हैं, अभी बहुत कुछ शेष है(सूर्यकांत नागर), कलेजा बंदर का(सतीश राठी), कैसी बदनामी(रेणु चन्द्रा), रामदीन का चिराग(गोविंद शर्मा), अयोध्या में खाता बही(हरिशंकर परसाई), उंगली के पोरों पर उतरे आँसू(पारस दासोत), भ्रम के बाज़ार में(संतोष सुपेकर), अनंत में अम्मा हँसती है(मुकेश वर्मा), कपों की कहानी(अशोक भाटिया) आदि | जाहिर है इनमें से कुछ शीर्षक काव्यात्मक हैं, कुछ व्यंग्यात्मक तो कुछ कथात्मक हैं |

लघुकथा का आरंभ और अंत भी शिल्प का एक अहम हिस्सा है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता | लघुकथाकार इन दो बिन्दुओं को लेकर जितना ऊहापोह में रहता है उतना मध्य को लेकर नहीं | प्रभावी आरंभ और सटीक समापन अलग कौशल की अपेक्षा रखते हैं | आरंभ के लिए प्रेमचंद का यह कथन लघुकथा के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कहानी के लिए, ‘कहानी वह ध्रुपद की तान है जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा दिखा देता है , एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूरित कर देता है , जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता |’

लघुकथा का आरंभ चाहे संवाद से हो, चाहे वर्णन से या फिर चरित्र-चित्रण से; परंतु कुछ ऐसे हो कि इसमें रचनाकार का सम्पूर्ण रचना-कौशल दिखाई दे; ‘ध्रुपद की तान’ की तरह | सुकेश साहनी अपनी लघुकथा ‘बिरादरी’ का आरंभ यों करते हैं;

“बाबू |” मैं कार से उतरा ही था कि अपने बचपन का सम्बोधन सुनकर चौंक पड़ा | किसी पुराने परिचित से सामना होने की आशंका मात्र से मेरे कान गर्म हो उठे…|’

यह आरंभ एक साथ कई बातों की ओर संकेत कर देता है | यह कि कथानायक बड़ा आदमी बन गया है | वह अपने बचपन से पीछा छुड़ाना चाहता है | यानी एक किस्म का झूठा बड़प्पन उसके भीतर घर कर गया है | पाठक देखना चाहेगा कि इस अहंकार का क्या हश्र होता है ; खण्ड-खण्ड होता है कि और भी परवान चढ़ता है |

आगाज़ बता देता है कि अंजाम क्या होगा | यानी आरंभ देखकर अंत का अनुमान लगाया जा सकता है | परंतु पाठक के मन-मस्तिष्क पर वे लघुकथाएँ सदा के लिए अंकित हो जाती हैं जिनका समापन उसकी कल्पना के विपरीत बिन्दु पर जाकर होता है | जरूरी नहीं कि ऐसा अंत चमत्कारिक हो, प्रतीकात्मक या प्रश्नाकुल कर देने वाला हो | बल्कि सहज भी हो सकता है | उदाहरण के रूप में हम रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘ऊँचाई’ लघुकथा ले सकते हैं | इसका आरंभ इस तरह होता है-

‘पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी-“लगता है बूढ़े को पैसों की जरूरत आ पड़ी है, वरना यहाँ कौन आने वाला था ! अपने पेट का गड्ढा भरता नहीं , घरवालों का कहाँ से भरेंगे ?” मैं नज़रें झुकाकर दूसरी ओर देखने लगा |’

इस आरंभ को देखकर पाठक अनुमान लगाता है कि पिताजी यहाँ बस एक-दो दिन के ही मेहमान हैं | बहू के पटकों-झटकों से अपमानित व बेटे की उपेक्षा का शिकार होकर बेरंग ही गाँव लौट जायेंगे | परंतु लघुकथाकार बड़ी कुशलतापूर्वक कहानी को अलग ही अंजाम पर पहुँचाता है | पिताजी घर की हालत देखकर कुछ मांगने की बजाय सौ-सौ के दस नोट बेटे को थमा देते हैं |

लघुकथा के मध्य भाग पर काम करते हुए सदैव यह खतरा रहता है कि अनावश्यक विस्तार न हो जाए, लघुकथा अपने शिल्प का अतिक्रमण करते हुए कहानी के क्षेत्र में प्रवेश न कर जाए, लफ़्फ़ाज़ी का शिकार न हो जाए, रूप के बोझ तले दबकर कराह न उठे | मध्य भाग रीढ़ की हड्डी है | लघुकथा की रीढ़ नाजुक होती है, इस पर कहानी की तरह अधिक बोझ वांछित नहीं है | इसीलिए निष्णात लघुकथाकार ऊपर वर्णित शैलियों के दायरे में रहते हुए भी संक्षिप्तता, सांकेतिकता व कलात्मकता का संतुलन बनाए रखता है | कभी-कभी तो वह रूढ़ कथा शैलियों के पार जाकर बिलकुल मौलिक कथा पद्धति आविष्कृत कर लेता है जो मील का पत्थर सिद्ध होती हैं | गुलशन बालानी की लघुकथा ‘गुप्त सूचना’ का शिल्प देखते ही बनता  है | यहाँ कथ्य केवल तीन फोन कॉल में सिमटा हुआ है | प्रथम फोन किया जाता है दारोगाजी को यह बताने के लिए कि सेठ ज्वालाप्रसाद के गोदाम में दो नंबर का माल पड़ा   है | दूसरा फोन सेठ को किया जाता है कि आपके गोदाम में छापा पड़ने वाला है | तीसरा फोन पुनः दारोगा को किया जाता है कि सेठ की कोठी पर शराब व शबाब का इंतजाम है, आ जाइए | इन तीन फोन संवादों से दलाल, दारोगा व सेठ का चरित्र तार-तार हो जाता है | लघुकथा सिर्फ आठ पंक्तियों की है |

कुशल लघुकथा शिल्पी अधिक विस्तार में न जाकर केवल कुछ संवाद, पात्रों के हाव-भाव या प्रतीक से ही अपनी बात कह देता है | उसे अलग से चरित्र या परिवेश चित्रण की आवश्यकता नहीं पड़ती | आनंद बिल्थरे की संवाद शैली में रचित लघुकथा ‘पक्की रिपोर्ट’ के आरंभिक कुछ संवादों से ही परिवेश के साथ-साथ पात्रों के चरित्र साकार हो उठते हैं-

“हजूर, रिपोर्ट लिखानी है |”

“अबे, काहे की रिपोर्ट ? कच्ची लिखूँ या पक्की ?”

“मैं कच्ची-पक्की क्या जानूं सरकार | गई रात डाकू मेरी जवान बेटी को उठाकर ले   गए |”

“अबे, तो हम क्या करें ? तू ने पहले रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाई कि तेरी जवान बेटी भी  है ?”

ज़ाहिर है कि संवाद थाने में  दारोगा व गरीब नादान व्यक्ति के मध्य है | दारोगा काइयाँ है, वह येन-केन-प्रकारेण गरीब लाचार व्यक्ति को टरकाना चाहता है | संवाद, विधा के अनुरूप चुटीले और संक्षिप्त हैं | संवाद शैली में पारस दासोत ने प्रचुर लघुकथाएँ लिखी हैं जो उनके संग्रह ‘मेरी आलंकारिक लघुकथाएँ’ में संकलित हैं | इनकी लघुकथाओं में आये संवाद टटके, संक्षिप्त और मारक हैं |

‘वॉक आऊट’(संतोष सुपेकर) में टोपियों और जूतों की दो विरोधाभासी स्थितियों को लेकर टोपियाँ अर्थात बड़बोले राजनेताओं पर जबर्दस्त कटाक्ष किया गया है | यह लघुकथा निर्जीव वस्तुओं के मानवीयकरण की अच्छी मिसाल है | इस शिल्प का उपयोग यों तो कई लघुकथाकारों ने किया है परंतु यहाँ जिस सधे हुए अंदाज में अपनी बात कही गई है वह उद्धरणीय बन पड़ी है |

अशोक भाटिया ने ‘तीसरा चित्र’ में शिल्प का एक सुंदर प्रयोग किया है जिसमें वृद्ध पिता अपने कलाकार पुत्र को तीन चित्र बनाने के लिए कहता है | पुत्र उच्च, मध्य व निम्न वर्ग के तीन चित्र बनाता है | तीसरा अर्थात निम्न वर्ग का चित्र सिर्फ पेंसिल से बनाया जाता है | पूछने पर पुत्र कहता है कि यहाँ तक आते-आते सारे रंग समाप्त हो गए थे | यह लघुकथा संकेत रूप में बहुत बड़ी बात कह जाती है | घनश्याम अग्रवाल ने अपनी लघुकथा ‘सरकारी गणित’ में सर्वथा मौलिक प्रयोग आजमाया है | यहाँ सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को टेबल नंबर 1 से 6 पर रखी फाइलों के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से बेनकाब किया गया है | इस लघुकथा में कोई कथा नहीं है और न ही कोई पात्र | फाइलें ही पात्र हैं और उनमें कैद रिपोर्ट ही कथा |

शिल्प की दृष्टि से निम्न लघुकथाएँ भी उल्लेखनीय हैं; मधुदीप की ‘समय का पहिया घूम रहा है’(नाटक शैली), गोविंद शर्मा की ‘दो बूँदें’, ‘अंगूर खट्टे हैं’(प्रतीकात्मक), अशोक भाटिया की ‘समय की जंजीरें’(इतिहास का पात्र के रूप में आना), श्यामसुंदर दीप्ति की ‘मूर्तियाँ’ (दृश्यात्मक), पारस दासोत की ‘आदमी’(संवाद शैली), सुरेश तन्मय की ‘एकलव्य’ (पौराणिक), हरिशंकर परसाई की ‘जाति’(वर्णनात्मक), जसवीर चावला की ‘कौआ’(जातक कथा), माधव नागदा की ‘प्रत्युत्तर’(पत्र शैली), ‘मुझे ज़िंदगी देने वाले’(डायरी शैली), घनश्याम अग्रवाल की ‘आज़ादी की दुम’(व्यंग्यात्मक), उपेंद्रनाथ अश्क की ‘गिलट’(फैंटेसी), कुमार नरेंद्र की ‘व्यापारी’(फ्लैश बैक) आदि |

दरअसल शिल्प का उपयोग जमूरे की डुगडुगी के रूप में नहीं होना चाहिए | शिल्प मकबरे के ऊपर की नक्काशी नहीं बल्कि उस भवन की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना होता है जिसमें ज़िंदगी की हलचल निवास करती है | यहाँ विचारों की गरमाहट, मानवीय संवेदनाओं की खुशबू, लोकजीवन के संघर्ष, रिश्तों के बनते-बिगड़ते समीकरण और समाज की धड़कनें आबाद रहती हैं | इन सबके बिना खालिस शिल्प का कोई अर्थ नहीं | डॉ.विद्या भूषण के अनुसार, ‘कथ्य शिल्प की नोक पर चढ़कर ही पाठक के मर्म को भेद पाता है | किन्तु जहां शिल्प की नोक कृत्रिम और खुरदरी होती है वहाँ वह पाठक के मर्म को न भेदकर स्वयं रचना को ही भेद जाती है |’

शिल्प का कार्य है लघुकथा को अधिक से अधिक संप्रेषणीय बनाना ताकि इसमें समाहित युगीनबोध ठीक उसी रूप में पाठकों तक पहुँच सके जिस रूप में लघुकथाकार चाहता है | कहना न होगा कि आज का लघुकथाकार शिल्प की भूमिका के प्रति सचेत है |

(दृष्टि: सम्पादक अशोक जैन से साभार)

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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