अक्तुबर-2017

मेरी पसन्दलघुकथा से पहचान की यात्रा     Posted: May 1, 2016

मेरी लघुकथा से पहचान  की यात्रा लंबी है । मैंने  घर में साहित्य  पढ़ने -लिखने का वातावरण पाया ।बाबूजी  अंग्रेजी नावेल पढ़ते थे । बंगाल में मुझे  सांस्कृतिक वातावरण मिला । देश – विदेश की लोक कथाओं व पंचतंत्र की कहानियों की पुस्तकें भी खूब पढ़ीं । उन्हीं दिनों से कलम काग़ज़ का चस्का पड़ा । एक दिन   कथा – कहानी लिखने लगी।पर आधा -अधूरा  रहा शौक । सन 1972 गंभीरता से लघुकथा लिखने की शुरूआत हुई । 1973 में  जनसंसार साप्ताहिक  से जुड़ी। दीपा दी व उपहार लघुकथा  लिखी जो जनसंसार ने  छापी । कहानी के लिए  कई पत्र मिले । जिनमें एक पोस्ट कार्ड भोपाल से  लघुकथाकार. कृष्ण कमलेश  जी का था । लघुकथाओं वाली कई पत्रिकाएँ आने लगीं ।जिनकी मैं नियमित  पाठक बनी । तब से लघुकथा विधा को जानना शुरू  किया । उस समय  मैं इसे अन्य  विधाओं के समान ही समझती थी और आज भी लघुकथा का बराबरी का दर्जा  मानती हूँ । ।कभी शंका नहीं की ।एक विश्वास पैदा हो गया था ।
सारिका ,सरिता,साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि में छपने वाली सारी बोध कथाएँ व लघुकथाएँ ””””””””””””””””चाट डालती””””””””””””””””। विवाह  से छह माह पूर्व अपना मिलाजुला कहानी संग्रह अकाल ग्रस्त रिश्तेका प्रकाशन करवाया । जिसमें छोटी कहानियाँ व लघुकथाएँ  थीं । हड़बड़ी संग्रह में स्पष्ट  थी । ।सन् 1976 में लगा विवाह होने पर शायद न लिख  पाऊँ।
1977 में पंजाब, हरियाणा,दिल्ली, पटना ,हिमाचल ,राजस्थान,  बंगाल आदि राज्यों से निकलने वाली पत्रिकाओं व संग्रहों में छपने लगी ।सन्1977 में पिताजी  के साथ गाजियाबाद जाना हुआ ।तब आ.जगदीश कश्यप जी व महावीर प्रसाद जैन जी मिलने आए । अजमेर की लघुकथाकार मित्र  शकुंतला किरण जी ने लघुकथा लेखन पर कई बार  चर्चा की ।मैं बहुत प्रभावित हुई। 1978 में अवध नारायण मुद्गल जी का पत्र मिला  कि मेरी कथा छाप रहे हैं। उस दौरान कमलेश्वर जी ने कथायात्रा   पत्रिका  प्रारंभ की ।उसमें कथा के लिए सादे काग़ज़ पर हस्त लिखित पत्र मिला ।मेरे लिए सब अकल्पनीय  था ।एक लघुकथा ,जो कुछ लंबी थी ,डरते हुए  भेज दी । वो कथायात्रा    के दूसरे अंक में प्रकाशित  हुई ।
अब 2009 से फिर कलम पकड़ी है ।
इतने सालों में लोग भूल गये।जब से महेन्द्र सिंह  महलान ,अंजना अनिल जी, राजकुमार घोटड़ जी व उषा अग्रवाल जी के संकलनों में लिया गया।मैं अपने नये लघुकथाकार से बहुत  असंतुष्ट हूँ । बहुत  सारे लघुकथाकारों को निरंतर पढ़ रही हूँ ।फेस बुक के आभासी जगत से जुड़ी । आज भी लगातार मुझे हौसला मिल रहा है । मेरे साथी प्रतिष्ठित लघुकथाकारों का । विधा के विकास  के लिए लगातार अच्छे  लघुकथा संग्रहों का प्रकाशन, कार्यशालाएँ , हर वर्ष आयोजित  होने वाले लघुकथा सम्मेलन, गोष्ठियाँ ,अकादमियों द्वारा मान्यता देना , कथा वाचन के खुले मंच से दर्शकों व  श्रोताओं के सीधे संपर्क में आने वाले सफ़ल कार्यक्रमों के आयोजन ने लघुकथा विधा  को प्रतिष्ठित करवाने में बड़ा  योगदान  दिया है। ।
नये कथाकारों में मुझे बहुत से नवोदित कथाकारों की कथाओं ने प्रभावित किया है ।उनमें से दो लघुकथाकारों   अंतरा करवड़े  की  प्रेमव नवोदित कथाकार छवि निगम की लघुकथा   लिहाफ़  ने मेरे मर्म को छू लिया ।

-मैंने पिछले दो वर्षों में कई उभरते  व स्थापित होने की प्रक्रिया में ईमानदारी से सृजन में जुटे लघुकथाकारों की लघुकथाएँ पढ़ी । मुझे  बड़ी प्रसन्नता  हुई  जब मुझे  उनमें असीम संभावनाओं के अंकुर प्रस्फुटित होते परिलक्षित  हुए  ।इमैं उनमें से अपनी पसंद के दो लघुकथाकारों की एक -एक  लघुकथा पर चर्चा करूँगी ।
पहली लघुकथा  अंतरा करवड़े जी की प्रेम , दूसरी नवोदित लघुकथाकार  छवि निगम जी  की  लिहाफ़
अंतरा करवड़े  जी की मैंने कई  लघुकथाएँ पढ़ीं  ।  प्रेमकथा पाश्चात्य युवा वर्ग में प्रेम के  प्रतीक  के रूप में  जाने  वाले पर्व  वेलेंटाइन डे की है । जब युवा  वर्ग चॉकलेट, गुलाब का फूल, कार्ड तोहफ़े दे कर प्यार  का इज़हार  करते हैं  और जो  ऐसा नहीं कर पाते उन के रिश्ते  टूट जाते हैं ।
आज  हमारी नई पीढ़ी इसी  पाश्चात्य संस्कृति की देन वेलेंटाइन डे  का अंधानुकरण कर रही है । नित नये  दिवस – पर्वों जो पश्चिमी संस्कृति  के हिस्सा  हैं , उन्हें  मनाने की होड़ मची है । अपनी संस्कृति के प्रमुख  पर्वों में भी डी.जे . संगीत ,भोंडे नृत्य , पहनावा , दिखावा आदि सम्मिलित हो गये हैं । जो प्रेम को  बिल्कुल  सतही बना देते हैं । ये आज की  अपसंस्कृति की ही  देन है ।
अंतरा जी ने सामाजिक  सरोकारों पर अपनी कलम बखूबी  चलाई  है । उनकी चिंता व नई पीढ़ी से सीधा सरोकार  कथा के माध्यम से मुखर हुआ है । उनकी नई पीढ़ी  के लिए चिंता ,उनका  दायित्वबोध उन्हें और  संवेदनशील कथाकार  बना देता है ।
हमारी संस्कृति  प्रेम के रुहानी पक्ष को उजागर करती है ,जो शाश्वत  है । अंतरा जीने बड़ी  खूबी से कथ्य चुना । और दो पीड़ियों के प्रेम के कथा – स्वरूप को सरल भाषा- शैली , कथानक में पिरो  कर  सशक्त लघुकथा रच डाली ।
मोनिका देव से प्रेम करती थी । वो वेलेंटाइन डे ,प्रेम पर्व के एक इवेंट के आयोजन में भाग लेने पहुँची । वो अपने प्रेमी देव का इंतज़ार करती रही  , ताकि वो उसे अपना परफॉर्मेंस दिखा सके ।
बाहर दो गुटों में झगड़ा हो गया । लाठीचार्ज हुआ व तनाव का माहौल हो गया । मोनिका  के साथ पकी उम्र की माँजी भी वहाँ फँस गई  । मोनिका उनका  सही आकलन नहीं कर सकी । उसने सोचा ये बूढ़ी  वेलेंटाइन डे व प्रेम दिवस  को क्या  जाने ?  माँजी झगड़े से चिंतित  थीं । तभी बाहर झगड़ा बढ़ा और  लाठीचार्ज  होने लगा।  देव वहाँ आया ।पर संकट में मोनिका को  अकेला छोड़कर वो कायर प्रेमी वहाँ से खिसक लिया । हाँ उसके भाई  को अवश्य सूचित  कर दिया । प्रेम का ये  कायर व छिछला रूप था ।

माँजी को लेने उनके सत्तर वर्षीय पति भी चिंतित हो घबराते हुए ,  किसी तरह वहाँ पहुँचे । पकी उम्र  के परिपक्व , गंभीर प्रेम की बानगी देख , मोनिका को सच्चाई समझ में आ गई । दोनों बुजुर्ग  हाथ पकड़े   एक दूसरे में अपना विश्वास  जताते कुछ देर  खड़े रहे ।
वे दोनों पकी उम्र के बुजुर्ग , वे दोनों सुरक्षित  निकले और  मोनिका  को भी उसके भाई  तक सुरक्षित  पहुँचा कर अपना कर्तव्य निभाया। सच्ची प्रेमानुभूति ने उन्हें बहुत  उदार हृदय बना दिया  था ।देव भी तो मोनिका को इसी तरह बाहर निकाल सकता था । सच्चा प्रेम तो त्याग की भावना से संचित होता है ।ओढ़े हुए दिखावटी प्रेम की कलई मुसीबत की कठिन घड़ी में खुल ही गई  ।
अंतरा जी ने दो वरिष्ठ नागरिकों के परिपक्व व रूहानी प्रेम के समानांतर ही उधार की पाश्चात्य नकल ,वेलेंटाइन डे की पोल खोल , नई पीढ़ी को अपनी भारतीय संस्कृति को समझने व अपनाने  का संदेश दिया है। कथा की भाषा में प्रवाह है। जो पाठक को प्रारंभ से अंत तक बाँधे रहता है ।अंतरा जी  की कथा भारतीय जीवन  मूल्यों को अपनाने का अनुपम व सकारात्मक  संदेश देती है ।और हमें गंभीरता से  विमर्श व चिंतन करने को बाध्य  करती है ।

मेरी दूसरी पसंद बनी हैं नवोदित  छवि निगम जी की संवेदनशील लघुकथा लिहाफ़
मैंने उन्हें  ज्यादा नहीं  पढ़ा है । पर उनकी लिहाफ़ लघुकथा ने मुझे भीतर तक झिंझोड़ दिया ।  वे प्रतीकों व संकेतों के माध्यम से अनकहे को पाठक तक पहुँचाने में  सफ़ल हुईं हैं ।
उनका कथ्य नवीन नहीं  है ,  पर कथा की भाषा-शैली , कथानक , संवाद , चरित्रों के मनोभावों व अंतर संघर्ष का सशक्त प्रस्तुतिकरण  कथा को दमदार  व पैना बना रहा है ।
लघुकथा में समसामयिक  कथानक नारी शोषण को लिया गया है ।  लेखिका ने अनकही को सांकेतिक भाषा में  कहने में सफ़लता हासिल  की है ।
छवि जी ने नायिका रीना की मनःस्थिति व तनाव जनित गुस्से को  चाचा जी के आने की खबर से जोड़ा  है । उनके आगमन कि खबर से वो असहज हो उठी थी । इससे स्पष्ट  हो रहा है कि रीना पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उसके व पति के बीच एक  इन्विज़िबल गैप  है । वे दस सालों के वैवाहिक जीवन  में  अच्छे  दोस्त नहीं बन सके थे । रीना बचपन की  किसी  अप्रिय घटना को नहीं भुला सकी थी ।  जिसने उसके व्यक्तित्व  को ही घायल कर दिया  था । उसका वर्तमान अतीत की छाया से मुक्त नहीं हो सका था  ।
कोई भी  अनहोनी या यौन शोषण की घटना ,मासूम बच्चियों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देती हैं  । वे इसका  विरोध नहीं कर पाती ।
माँ – बाप बेटी – बेटों में फ़र्क करते हैं । इसके लिए उनकी रुढ़िवादी सोच जिम्मेदार  है । राधा भी  बेटी -बेटे में पक्षपात करती  थी । रीना ने जब ये सुना कि राधा गरीबी के चलते बेटी को चाचा वाला  लिहाफ़ ही उढ़ा के सुला देगी । वो यौन शोषण जैसी अनहोनी से  शंकित हो आवेग व गुस्से से काँप उठी ।उसे इतना आक्रोशित होते देख पति हैरान रह गये । कामवाली राधा की बेटी से रीना का  सरोकार उसकी अतिरिक्त संवेदनशीलता है । जो उसे सभी बच्चियों से जोड़ती है । इसलिए राधा की बात सुनते ही रीना  आवेग व गुस्से से काँपने लगी। वो अपना नया लिहाफ़ राधा को दे कर फूट – फूट कर रोने लगी ।
पति , राधा व कामवाली बाई तीनों के दिल का  बोझ उतर गया था । ये पंच लाइन अनकहा कह गयी है । छवि जी और अंतरा जी  की लेखनी आने वाले सालों में और धारदार होगी । और लघुकथा की वे सशक्त हस्ताक्षर हो कर उभरेंगी । मेरी अनेकों शुभकामनायें उनकी धारदार कलम को ।

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1-प्रेम -अन्तरा करवड़े

वह प्रेम दिवस का आयोजन था। लाल रंग के गुलाबों¸ दिल के आकारों की विभिन्न वस्तुएँ। रंग बिरंगे और अपेक्षाकृत स्मार्ट परिधानों में युवक युवतियाँ अपने तईं इकरार – इजहार आदी कर रहे थे। कोई झगड़ रहा था तो किसी का दिल टूट रहा था। कोई बदले की भावना से गुस्सा हुआ जा रहा था तो किसी के कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

मोनिका भी एक प्लांड़ इवेंट प्लेस पर अपने परफॉर्मंस की बारी का इंतजार कर रही थी। उन्हीं के फ्रेंड्‌स क्लब ने ये आयोजन किया था। इसमें थी मौज मस्ती और नाच गाना। फूल¸ कार्ड¸ गिफ्ट्‌स¸ चॉकलेट सभी कुछ उपलब्ध था। उसे इंतजार था देव का। जिसने पिछले वैलेंटाईन पर ही उससे अपने प्रेम का इजहार किया था। उसके बाद से साल भर दोनों यूँ ही मिलते आ रहे थे। उसे विश्वास था कि उसकी परफॉर्मंस तक देव जरूर आ जाएगा।

अचानक बाहर कुछ शोर सुनाई दिया। सभी ने बाहर जाकर देखा। दो गुटों में झगड़ा हो रहा था। कारण जो भी कुछ रहा हो लेकिन पुलिस पहुँच चुकी थी। आतंक और तनाव का माहौल था। समझदार लड़कियों ने घर की राह पकड़ने में ही खैर समझी। लेकिन मोनिका वहाँ पहुँचती तब तक देर हो चुकी थी। वह रास्ता बंद कर दिया गया था। सारा यातायात दूसरी ओर मोड़ दिया गया था।

मोनिका जहाँ देव का इंतजार कर रही थी वहीं एक पकी उम्र की माँ-जी भी खड़ी थी। उसे देखते ही हठात्‌ बोल पड़ी। “इतनी गड़बड़ में क्यों रात गये घर से निकली हो बेटी?” मोनिका ने उपेक्षापूर्ण दृष्टि से उन्हें देखा। उसे लगा कि इन माँ-जी को वह क्या समझाए कि आज प्रेम दिवस है। आज नहीं तो कब बाहर निकलना चाहिये। आपके जमाने में नहीं थे ये वैलेंटाईन डे वगैरह। आप तो अपने पति की चाकरी करते हुए ही जिंदगी गुजारिये। उसे वैसे भी इस दादी टाईप की औरत की बातों में कोई रूचि नहीं थी।

लेकिन वह स्वयं इस हादसे के कारण घबराई हुई सी सब दूर बस देव को ही ढूँढ़ रही थी। उसे विश्वास था कि वह उसे इस मुसीबत से निकालने के लिये जरूर आएगा। सारे वाहन वहाँ से हटवा दिये गये थे। काफी देर तक जोर जोर से आवाजें आती रही। लाठी चार्ज होने लगा था।

पुलिस किसी को भी उस घेरे के अंदर से जाने देने को तैयार नहीं थी। तभी मोनिका ने देखा¸ देव किसी पुलिसकर्मी से उलझ पड़ा था। वह उसे अंदर नहीं आने दे रहा था। “ओह देव प्लीज मुझे निकालो यहाँ से।” मोनिका चीख पड़ी थी। लेकिन देव कुछ भी नहीं कर पा रहा था। बार बार अपने मोबाईल से किसी को फोन करता जा रहा था। शायद उसने मोनिका के भाई को फोन कर सारी स्थिती बता दी थी और स्वयं वहाँ से निकल गया था। मोनिका अविश्वास से उसे जाते हुए देखती रही। क्या यही उसका विश्वास था?

तभी पास खड़ी माँ-जी खुशी से बोल पड़ी¸ ””आ गये आप!”” मोनिका ने उनकी दृष्टि का पीछा किया। एक बूढ़े से सत्तर के लगभग के बुजुर्ग¸ काफी ऊँची रेलिंग को बड़ी मुश्किल से पार करते हुए माँ-जी तक पहुँचे।

दोनों घबराए हुए से पहले तो एक दूसरे का हाथ पकड़े हाल चाल पूछते रहे।

“मुझे तो सामने के वर्माजी ने खबर की। उन्होने कहा कि जल्दी से तुम्हें घर ले आऊँ। यहाँ कोई फसाद हो गया है। तुम्हें अकेले नहीं आने देंगे।” वे काफी घबराए हुए थे।

“लेकिन अब घबराने की जरूरत नहीं है। मैं आ गया हूँ ना। वो पुलिसवाले को देखा¸ किसी को भी अंदर आने नहीं दे रहा था। सबसे झगडने पर ही तुला हुआ है। इसीलिये मैं उस रेलिंग को पार कर आ गया। यहाँ से बाहर जाने के लिये कोई पाबंदी नहीं है। चलो अब जल्दी से निकालते है।” उनकी साँस फूलने लगी थी।

मोनिका कुछ कहती इससे पहले ही माँ-जी ने उसे भी अपने साथ लिया और बाहर निकलकर उसके भाई के हाथों में सुरक्षित सौंप दिया। मोनिका को लगा कि देव खुद भी तो यही कर सकता था!

वह सोचती रही। उन दोनों का वैलेंटाईन डे के बगैर का¸ पका हुआ प्रेम विश्वास और आपसी समझ। ये सब उन थके चेहरों की आँखों में चमक रहा थी जिसके आगे सारे युवा जोड़े फीके नजर आ रहे थे।

उसे समझ आ गया था। यही सच्चा प्रेम था।

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2- लिहाफ – डॉ छवि निगम


इतने सालों के साथ के बाद इतना तो मैं समझ सकता था कि कोई तो बात जरूर है कि कभी कभी रीना अपनी किसी ख्याली दुनिया में अक्सर गुम हो जाती है। हाँ वैसे शिकायत नहीं कोई मुझे उससे। पर कभी कभी महसूस होता है कि दस साल की शादी के बाद भी ,कहीं कुछ तो था- एक इन्विसिबल सा गैप जो हमें अच्छे दोस्त बनने से रोकता सा रहा था।
आज फिर लेटे लेते यही ख्याल आ रहा था।
सुनिए,एक बात कहनी थी आपसे-बालों में कंघा फिराते वह बोली। नींद को बमुश्किल अपने से दूर करते,लिहाफ के एक कोने से मुहं निकाल मैंने पूछा “हाँ  कहो,क्या हुआ?
वो दिन में चाचाजी का फोन आया था…कुछ दिनों में यहाँ आने की बात कर रहे थे…”
अरे लो.आज तुम आज इसी सोच में डूबी हुई थी क्या ?…अच्छा है। पर तुम तो महान हो सच्ची। मायके से कोई आए  तो औरतें कितनी खुश हो जाया करती हैं। पर एक तुम हो। शाम से ही कितना अजीब बिहेव कर रही हो। ये चाचाजी तो पहले भी तुम्हारे घर काफी आया जाया करते थे न। बढिया है।चलो आओ…लाइट ऑफ
कर दो। “
लेकिन क्या इतनी सी ही बात थी बस?फिर रीना सारी रात करवटें क्यों बदलती रही थी।
ओहो राधा!बिटिया को क्यों ले आयी हो साथ में? इसे स्कूल भेजा कर न। इतना समझाती हूँ तुझे पर समझ ही नहीं आता।”रीना की आवाज़ ने मुझे सन्डे सुबह सुबह जगा दिया। और मैं रजाई में दुबके दुबके गर्म चाय के कप का इंतज़ार करते उनकी बात चीत सुनने लगा।
अरे दीदी!बस ऐसे ही हमरे पाछे चली आत है।
मुझे सब पता है। ऐसे ही धीरे धीरे पूरे काम बच्चियों के सर डाल देते हो तुम लोग।
कुछ नईं होगा दीदी वाको।
अच्छा  अच्छा ये पिंकू का पुराना स्वेटर इसे पहना दो तो पहले।चलो दोनों जने भी चाय पी लो।”
स्ब्ब्बे कोठियाँन वाली में आप ही सबसे नीक हो दीदी। सुनो…कोई पूराना उराना कम्बल..सूटर,साल वाल  हमरे वास्ते भी पड़ी हो तो….
चाय सुडकते मुझे हंसी आ गयी।
बस हो गया तुम्हारा माँ गना शुरू!पुरानी चीजें हम रखते ही कहाँ है बता तो। और इस समय तो तुम्हे पैसे भी  नहीं दे पाएँगे….
अरे क्कोनो बात नाही ।जाड़ा कट ही जाई जाईसे तैसे। असल में एक रजाई तो बा हमरे पासे। पार साल तक बिट्टी,हम,ई और मुन्ना तो ओमे ही दुबक जाइत थे। परे बिट्टी अब न आ पहिये।ऊपर से गाँव से रिश्ते के चाचा आई के चाह रहे हैं न कछु काम ढून्ध्हे खातिर…तो हम सोचे रहे…

तो अब क्या करेगी?
अरे ऊ च्चाचा आपन बिस्तर उस्तर भी तो लाइ न। इत्तना जाडा म्में का ऐसे ही आ जाई ?सो ई बिटिया को हम ओके साथ ही पौढा देब। ठीक बा न बिटिया?
दीदी?….दीदी…दीदी..का हुआ? भैय्याजी जल्दी इधर आओ तो…जल्दी…देखो दीदी को का हुई गवा …”राधा बौखलाई सी जोर से चिल्ला रही थी।
मैं लिहाफ फेंक लम्बे डग भरता रसोई की तरफ दौड़ पड़ा…और भौंचक्का रह गया। ये रीना ही थी या कोई और?उसकी तो पूरी की पूरी भावभंगिमा ही बदल गयी थी। चेहरा बुरी तरह तमतमाया हुआ व,होंठ कांप रहे थे। तना हुआ बदन अजीब तरह से थरथरा रहा था। आँखों में आँसू छलक आए  थे।”क्या हुआ रीना?मैंने बेहद घबराते हुए पूछा। पर उसने मेरा हाथ झटक दिया।
जाइये,वो जो नया लिहाफ बनकर आया है उसे ले आइये।”
इतनी सर्द आवाज़ थी उसकी ,कि क्यों , किसलिए वगैरह पूछने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। चुपचाप लाकर उसके सामने रख दी।
ले राधा,ले जा इसे। ये सिर्फ तेरी बिटिया के लिए है। हमेशा वह इसी में सोएगी…और अकेले। और तुम जो दिन भर मुन्ना मुन्ना करती रहती हो…ध्यान इसका भी रखा करो। ये कुछ न भी कह पाए,तो भी इसके इशारे समझो।और खबरदार!!जो इसे कब्भी किसी मामा,दादा चाचा के साथ….

और कटे तने सी रीना कुर्सी पर ढह गई….अब वह अवश सी ..हिचकियों से रोए जा रही थी। कभी उसकी पीठ, तो कभी सर सहलाते हुए मैं सोच रहा था….. इस समय  दिल का भारी बोझ उतर जाने से कौन ज्यादा सुकून महसूस कर रहा है….राधा, रीना…या मैं?

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
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    -सम्पादक द्वय

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