अगस्त-2017

देशलिहाफ़     Posted: December 1, 2015

इतने सालों के साथ के बाद इतना तो मैं समझ सकता था कि कोई तो बात जरूर है कि कभी कभी रीना अपनी किसी ख्याली दुनिया में अक्सर गुम हो जाती है। हाँ, वैसे शिकायत नहीं कोई मुझे उससे। पर कभी- कभी महसूस होता है कि दस साल की शादी के बाद भी ,कहीं कुछ तो था- एक इन्विज़िबल -सा गैप जो हमें अच्छे दोस्त बनने से रोकता- सा रहा था।
आज फिर लेटे- लेते यही ख्याल आ रहा था।
“सुनिए,एक बात कहनी थी आपसे-बालों में कंघा फिराते वह बोली।
नींद को बमुश्किल अपने से दूर करते,लिहाफ के एक कोने से मुँह निकाल मैंने पूछा “हाँ कहो,क्या हुआ?
“वो दिन में चाचाजी का फोन आया था…कुछ दिनों में यहाँ आने की बात कर रहे थे…”
“अरे लो ,आज तुम आज इसी सोच में डूबी हुई थी क्या ?…अच्छा है। पर तुम तो महान हो सच्ची। मायके से कोई आए, तो औरतें कितनी खुश हो जाया करती हैं। पर एक तुम हो। शाम से ही कितना अजीब बिहेव कर रही हो। ये चाचाजी तो पहले भी तुम्हारे घर काफी आया जाया करते थे न। बढ़िया है।चलो आओ…लाइट ऑफ कर दो। ”
लेकिन क्या इतनी -सी ही बात थी बस?फिर रीना सारी रात करवटें क्यों बदलती रही थी।
“ओहो राधा!बिटिया को क्यों ले आई हो साथ में? इसे स्कूल भेजा कर न। इतना समझाती हूँ ,तुझे पर समझ ही नहीं आता।”रीना की आवाज़ ने मुझे सन्डे सुबह सुबह जगा दिया। और मैं रजाई में दुबके- दुबके गर्म चाय के कप का इंतज़ार करते ,उनकी बातचीत सुनने लगा।
“अरे दीदी!बस ऐसे ही हमरे पाछे चली आत है।”
“मुझे सब पता है। ऐसे ही धीरे धीरे पूरे काम बच्चियों के सर डाल देते हो तुम लोग।”
“कुछ नईं होगा दीदी वाको ।”
” अच्छा अच्छा ये पिंकू का पुराना स्वेटर इसे पहना दो तो पहले।चलो दोनों जने भी चाय पी लो।”
“स्ब्ब्बे कोठियाँन वाली में आप ही सबसे नीक हो दीदी। सुनो कोई पुराना- उराना कम्बल।।सूटर,साल वाल हमरे वास्ते भी पड़ी हो तो …”
चाय सुडकते मुझे हँसी आ गयी।
“बस हो गया तुम्हारा माँगना शुरू!पुरानी चीजें हम रखते ही कहाँ है बता तो। और इस समय तो तुम्हे पैसे भी नहीं दे पाएँगे…
“अरे क्कोनो बात नाही ।जाड़ा कट ही जाई जाईसे तैसे। असल में एक रजाई तो बा हमरे पासे। पार साल तक बिट्टी,हम,ई और मुन्ना तो ओमे ही दुबक जाइत थे। परे बिट्टी अब न आ पहिये।ऊपर से गाँव से रिश्ते के चाचा आई के चाह रहे हैं न कछु काम ढून्ढहे खातिर…तो हम सोचे रहे…”
“तो अब क्या करेगी?
अरे ऊ च्चाचा आपन बिस्तर उस्तर भी तो लाइ न। इत्तना जाडा म्में का ऐसे ही आ जाई ?सो ई बिटिया को हम ओके साथ ही पौढा देब। ठीक बा न बिटिया?
दीदी?…दीदी…दीदी…का हुआ? भैय्याजी जल्दी इधर आओ तो…जल्दी,देखो दीदी को का हुई गवा ।”राधा बौखलाई सी जोर से चिल्ला रही थी।
मैं लिहाफ फेंक लम्बे डग भरता रसोई की तरफ दौड़ पड़ा।और भौंचक्का रह गया। ये रीना ही थी या कोई और?उसकी तो पूरी की पूरी भावभंगिमा ही बदल गयी थी। चेहरा बुरी तरह तमतमाया हुआ था, होंठ काँप रहे थे। तना हुआ बदन अजीब तरह से थरथरा रहा था। आँखों में आँसू छलक आये थे।”क्या हुआ रीना?मैंने बेहद घबराते हुए पूछा। पर उसने मेरा हाथ झटक दिया।
“जाइये,वो जो नया लिहाफ बनकर आया है उसे ले आइये।”
इतनी सर्द आवाज़ थी उसकी ,कि क्यों , किसलिए वगैरह पूछने की हिम्मत नहीं हुई मेरी। चुपचाप लाकर उसके सामने रख दी।
“ले राधा,ले जा इसे। ये सिर्फ तेरी बिटिया के लिए है। हमेशा वह इसी में सोएगी और अकेले। और तुम जो दिन भर मुन्ना -मुन्ना करती रहती हो,ध्यान इसका भी रखा करो। ये कुछ न भी कह पाए,तो भी इसके इशारे समझो।और खबरदार!!जो इसे कब्भी किसी मामा,दादा चाचा के साथ।”
और कटे तने सी रीना कुर्सी पर ढह गयी।अब वह अवश सी ।।हिचकियों से रोये जा रही थी। कभी उसकी पीठ, तो कभी सर सहलाते हुए मैं सोच रहा था।। इस समय दिल का भारी बोझ उतर जाने से कौन ज्यादा सुकून महसूस कर रहा है।राधा, रीना या मैं?
-0-
chhavisamar@gmail.com

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-
    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-
    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine