अप्रैल-2018

देशवह जो नहीं कहा     Posted: December 1, 2017

     सुबह 6 बजे

सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है, आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है, मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँ, वर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं– ‘सुनती हो चाय बनाओ, जल्दी से खाना लाओ, चादर नहीं झाड़ी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोई रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात को दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है ! आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होगे, फिर भी बाय!

सुबह 10 बजे

सुनो जानू, मीटिंग शुरू हो गई क्या? पक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनाया, चटखारे लेकर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गई थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूँगी। जब तुम घर होते हो ,तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं, या फिर कोई मैच; वह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे, वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा-सा सीरियल शुरू हो गया है, इसलिए बाय!

दोपहर 3 बजे

जानू, आज मैंने कई दिनों बाद फ़िल्म देखी। लगा था, जिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं, दिल अभी धड़क रहा है। पुरानी फिल्म थी, साहब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी है; गरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियाँ क्यों अच्छी लगती हैं? बेशक कोई बाहर वाली घास भी न डाले, पर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरे, आज सफाई तो की ही नहीं। चलो, अब थोड़ी सफाई कर ली जाय, फिर खाने के बारे में सोचूँगी। बाय!

शाम 7 बजे

जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घण्टे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजा, रोशनदान झाड़कर चमकाए। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलीं, सोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी, जो रात तुम्हारे लिए बनाई थी, उसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !

रात 11 बजे

सुनो जानू, शाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे था, पर कॉफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था ,सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थें, पर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानी, वही करेक्टर, वही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाइट!

रात 2 बजे

सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होगे, पर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनीं। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही ,इसलिए। कारण जो भी हो, पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत होकर सोना चाहिए न,  फिर भी नहीं सोई। तुमसे पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी;क्योंकि जब तुम घर में रहोगे ,तो यह घर तुम्हारा ही होगा।  तुम ही बोलोगे, तुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ़– ‘जी, आई जी, जी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।

-0-

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    chandanman2011@gmail.com

    रचनाएँ भेजने के लिए पता-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine