जून-2017

देशविजेता     Posted: April 1, 2015

मुकेश शर्मा
राजनाथ आज बहुत खुश था। आज फारेस्ट रेंजर की नौकरी के लिए लम्बी दौड़ की परीक्षा थी और राजनाथ को पूरा भरोसा था कि वह इस दौड़ में सबको पछाड़ देगा। राजनाथ ने साक्षात्कार का टेस्ट तो पार कर लिया था, लेकिन आज शारीरिक क्षमता साबित करने के लिए पंद्रह कि.मी. की दौड़ में पूरे विश्वविद्यालय में राजनाथ का कोई साथी नहीं था।
ऐसी प्रतियोगिताओं में वह तीन बार विश्वविद्यालय के स्वर्ण–पदक जीत चुका था।
कॉलेज छोड़ने के बाद अगले पाँच वर्षों तक वह उन स्वर्ण पदकों और प्रमाण–पत्रों को लेकर यहाँ–वहाँ घूमता रहा, लेकिन यह स्वर्ण–पदक उसे नौकरी न दिला सके। कहीं सुविधा–शुल्क चल जाता तो कहीं राजनीतिक सिफारिश। विश्वविद्यालय के स्वर्ण–पदक के लिए दौड़ने वाला राजनाथ नौकरी के लिए भी दौड़ता ही रह गया था।
लेकिन आज उसे पूरा यकीन था कि वह इस दौड़ में जीतकर दिखाएगा और इस बार उसकी नौकरी पक्की।
कभी कुछ नया कर दिखाने की ललक उसका उत्साह बढ़ाती तो कभी विकलांग पिता, बूढ़ी माँ और जवान बहन के चेहरे उसकी आँखों के आगे घूम जाते। राजनाथ दृढ़ था–आज वह यह मौका हाथ से नहीं जाने देगा। सीटी की आवाज सुनते ही राजनाथ की तन्द्रा भंग हो गई। दौड़ के लिए सभी प्रत्याक्षी कतार में खड़े हो चुके थे।
अगली सीटी बजते ही सभी प्रत्याक्षी दौड़ने लगे। नौ,दस कि.मी. के बाद मात्र छह सात प्रत्याशी ही दौड़ में रह गए थे। पसीने से तर राजनाथ हांफने लगा था। दौड़ते–दौड़ते उसे सब कुछ घूमता दिखाई दे रहा था। जरा–सा सँभलते ही बाबूजी माँ और बहन का चेहरा आँखों के सामने आ जाता और राजनाथ की गति और बढ़ती जाती। दौड़ के आखिरी पड़ाव पर राजनाथ आवेग में रुक न सका और वहीं दौड़ के आखिरी सिर पर बंधी रस्सी में उलझ कर गिर गया। शेष प्रत्याक्षी बहुत पीछे रहे गए थे। उसके बाद क्या हुआ, उसे कुछ पता न चला।
आँखें खुलीं तो खुद को अस्पताल में पाया। जब नर्स ने उसे बताया कि वह पूरे चार घटे बेहोश रहा है तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। दो दिन अस्पताल में ही इलाज चलता रहा। दौड़ के परिणाम आज के अखबार में छपने थे। चेहरे पर मुस्कुराहट लिए राजनाथ ने साथ मेज पर रखा अखबार उठा लिया। परिणाम देखते–देखते राजनाथ पसीने से भर गया। अखबार में प्रथम,द्वितीय और तृतीय विजेता के रूप में जिन तीन युवकों की तस्वीरें थीं, वे इस दौड़ में शामिल ही नहीं थे।
राजनाथ पूरी ताकत से चिल्लाया–‘‘नहीं! दौड़ मैंने जीती है, अव्वल मैं आया था’’ चिल्लाने की आवाजें सुनते ही डॉक्टर,नर्स, अभिभावक सभी उसके कमरे की ओर दौड़े। राजनाथ अभी भी चिल्ला रहा था। अनेक प्रयासों के बाद भी राजनाथ का चिल्लाना न थमा तो चारों ओर से नर्सो ने राजनाथ को दबोच लिया। डॉक्टर को तुरन्त नींद का इंजेक्शन देना पड़ा।
‘‘पागल…’’ डाक्टर ने नाराजगी भरी दृष्टि से राजनाथ की ओर देखा। आक्रोश से राजनाथ की मुट्ठियाँ अभी भी भिंची हुई थीं, दाँत कसे हुए थे।

गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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