जून-2017

देशविभाजक     Posted: October 1, 2015

“आदाब सर !”
थाना प्रभारी ने सर उठाकर देखा ,सामने कासिम खड़ा है ।
“आदाब !……कहो, कैसे आना हुआ कासिम ?”
“बस यूँ ही !….इधर से गुज़र रहा था , सोचा आपसे मुलाक़ात करता जाऊँ !”
“सब खैरियत तो है न ?”
“जी सर !……लेकिन …….” आगे की बात कहने के लिए वह हिम्मत जुटाने लगा ।
तक़रीबन बीस सालों की चाकरी में थाना प्रभारी सैकड़ों चेहरे पढ़ चुके थे । उन्हें कासिम का चेहरा पढने में देर नहीं लगी । चेहरे की सिलवटें उसके भीतर का दहशत बखूबी बयान कर रही थी ।
“घबराओ नहीं कासिम ! बेफिक्र होकर साफ़ साफ़ बताओ !”
“सर , इधर दो-तीन दिनों से मेरे मोबाइल में अलग अलग अनजान नम्बरों से कॉल आ रहे हैं ।”
“क्या कहते हैं वे ?”
“धमकी दे रहे हैं जान से मारने की ।”
थाना प्रभारी अपनी सारी इन्द्रियों को बटोरकर कुर्सी पे सँभल कर बैठ गए । उन्हें बेहद हैरत हो रही थी कि कासिम जैसे सीधे-सादे इंसान की जान के भी दुश्मन हो सकतें हैं ।
“क्यों कासिम , ऐसा तुमने क्या किया है ? क्या इलज़ाम लगा रहे हैं तुमपर ? ज़रा तफसील से बताओ ।”
“सर , मेरे घर की नौकरानी पिछवाड़े की नाली में रोज़ माड़ बहा देती थी । उसे चाटने के लिए मोहल्ले की गायें चली आती थीं । उन गायों को नाली से माड़ चाटते हुए देखना उसे अच्छा नहीं लगा । अब वह बाल्टी में माड़ उड़ेलकर पिछवाड़े में रख देती है ।”
“ये तो अच्छी बात है । गाय को माड़ पीने में सहूलियत होती है ।….लेकिन भई , धमकी भरे फोन का माड़ से क्या ताल्लुक ?” उन्हें यह मामला अबूझ पहेली सी लग रही थी ।
“वो सख्त हिदायत दे रहे हैं कि गायों को माड़ पिलाना बंद करो वरना नतीजा बुरा होगा ।”
थाना प्रभारी की हैरानगी में इजाफ़ा होता जा रहा था । बड़ा अज़ीब मामला है ।
“लेकिन गायों को रोटी-पानी देना तो बड़ा ही पुण्य का काम है । इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ?”
“उन्हें घोर आपत्ति है सर ।”
“क्यों भई माड़ ही पिलाया जा रहा है ….माड़ तो कोई गंदी चीज़ नहीं है ….।”
थोड़ी देर के लिए कासिम खामोश हो गया । कासिम की यह चुप्पी थाना प्रभारी को असहनीय लगने लगी । मामले को ज़ल्द-से- ज़ल्द समझने की उत्सुकता उन्हें इंतज़ार करने की इजाज़त नहीं दे रही थी ।
“हाँ, कासिम बोलो , उन्हें गायों को माड़ पिलाना क्यों नागवार गुज़र रहा है ?”
“सर , हम पर इल्ज़ाम है कि अपने घर का माड़ पिलाकर हम गायों का धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं ।”
थाना प्रभारी जैसे आसमान से गिरे । कुर्सी पर निढाल होकर अपनी आँखें मूँद लीं । मूँदी आंखों से वे पशु-पखेरुओं को भी बँटते देख रहे थे ।
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अपर बेनियासोल / पो. आद्रा / जि. पुरुलिया / पश्चिम बंगाल 723121 -0-

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