अगस्त-2017

मेरी पसन्दविसंगतियों से साक्षात्कार     Posted: January 1, 2016

‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल) के अनुसार हिन्दी गद्य साहित्य की शुरूआत उन्नीसवीं सदी के पांचवे दशक में हुई और हिन्दी कथा साहित्य की शुरूआत भारतेन्दु युग से मानी जाती हैं। इस युग में अन्य गद्य विधाओं के साथ लघु रचनाएं भी लिखी गई जो आगे चलकर लघुकथा के नाम से प्रचलित हुई । लघु आकार के कारण इसे पंचतंत्र की कहानियों, हितोपदेशों, बोधकथाओं, नीति कथाओं, जातक कथाओं व पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ना उचित नहीं। कथा और शिल्प की दृष्टि से लघुकथा का स्वरूप उनसे अलग है।
लघुकथा हिन्दी साहित्य की नवीनतम विधा है। लघुकथा कम शब्दों में मनोभावों को व्यक्त करने की क्षमता रखती है। आज के आपाधापी युग में लोगों के पास साहित्य पढ़ने का समय नहीं है, ऐसे में कम समय में कम शब्दों में लघुकथा समाज की विसंगतियों से साक्षात्कार कराती है। इस कारण वर्तमान में लघुकथा अधिक लिखी व पढ़ी जा रही है।
मेरा साहित्य के प्रति रुझान देर से हुआ। साहित्य में मेरी रुचि लघुकथाओं से ही हुई। लघुकथा की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति से मैं चमत्कृत हुआ और पत्र–पत्रिकाओं से लघुकथाओं को पढ़ने लगा। कई पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक पढ़े। ‘लघुकथा डॉट काम‘ में निरंतर महत्वपूर्ण लेख और लघुकथाओं को पढ़ने लगा। लेखों से लघुकथा की तकनीक का ज्ञान हुआ और लघुकथा लिखने को प्रवृत्त हुआ।

लघुकथा का आकार छोटे भले ही हो ; लेकिन उसकी अभिव्यक्ति बहुत गहरी होती हैं। प्रेमचन्द, विष्णु प्रभाकर, सआदत हसन मण्टो, हरिशंकर परसाई, उपेन्द्र नाथ ‘अश्क’, खल़ील जिब्रान से लेकर वर्तमान लघुकथाकारों– रमेश बतरा,सतीशराज पुष्करणा, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,बलराम अग्रवाल, अशोक भाटिया, सुभाष नीरव, रूप देवगुण, रामकुमार आत्रेय, रामनिवास मानव, कमल चोपड़ा विकेश निझावन, शील कौशिक, राधेश्याम भारतीय, मधुदीप, श्यामसुन्दर अग्रवाल, श्यामसुन्दर ‘दीप्ति’, माधव नागदा, रामकुमार घोटड़, रामयतन यादव आदि को पढ़ा। इनकी कई लघुकथाएं मर्म को झकझोर करने वाली है।

‘मेरी पसंद‘ के अन्तर्गत मैं अपनी पसंद की लघुकथाओं में से दो पर चर्चा करना चाहूँगा। पहली लघुकथा ‘नवजन्मा‘‘ और दूसरी ‘कपों की कहानी‘। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की ‘नवजन्मा‘ मेरी सर्वाधिक पंसदीदा लघुकथाओं में से है। समाज में लड़कियों के प्रति भेदभाव पर केन्द्रित ‘नवजन्मा‘ एक बेहतरीन लघुकथा है। भावहीन समाज पर यह लघुकथा एक गहरा चाँटा है। लड़की पैदा होने पर घर में एक मातम–सा छा जाता है। सबके चेहरों पर मायूसी पुत जाती है। व्यंग्य– बाणों को सुनकर पिता तनावग्रस्त हो जाता है; लेकिन सबसे अधिक दु:खी नवजात की माँ होती है, जैसे उसने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। नवजात का पिता जिले सिंह जब मनदीप के कमरे में जाता है , तो वह उसका सामना नहीं कर पाती और डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुँह अपराधभाव से दूसरी ओर घुमा लेती है। एक हृदयविदाकरक दृश्य उपस्थित होता है। जब कथानायक तीर की तरह मनदीप के कमरे से बाहर निकलता है , तो एक आशंका उत्पन्न होती है, लेकिन जब वह ढोल वाले को लाकर आँगन में आ खड़ा होता है ,तो एक सुखद अहसास होता है।ढोल बजने लगता है। सबसे अधिक खुशी मनदीप को होती है, जब जिले सिंह मनदीप के कमरे में प्रवेश करता है और नवजात को प्यार करते पति के चेहरे पर जब उसकी नज़र पड़ती है , तो उसकी आँखों के सामनेउजाले का सैलाब उमड़ पड़ता है। उसकी आँखों से खुशी के आँसू छलकते हैं ; जिन्हें वह इस बार नहीं पोंछती है। इस प्रकार लघुकथा नाटकीयता के साथ सुखांत को प्राप्त होती है। लघुकथा चलचित्र की तरह एक जीवन्त दृश्य पेश करती है। लेखक ने लघुकथा को अत्यन्त कुशलता के साथ बुना है और यथार्थ चित्रण किया है। कसे हुए वाक्य, मन को भेदने वाले संवाद, दृश्य संयोजन, सम्प्रेष्णीयता, पात्रानुकूल भाषा रचना को मर्मस्पर्शी बनाते हैं।
‘कपों की कहानी’ अशोक भाटिया जी की एक मनोविश्लेषक लघुकथा है। कथा नायक वर्तमान समय के अभिजात्य वर्ग के विचारों का वाहक है ,जो वैचारिक स्तर पर तो दलित वर्ग के प्रति समरसता का ढोंग करता है; परन्तु व्यावहारिक स्तर पर अपनी जाति श्रेष्ठता के मोह में फँसा है। कभी वह सफाईवालों के लिए अपने से छोटे कप निकालता है तो कभी क्रैक पड़े कप। आधुनिक जीवन में जहाँ पैसा मुख्य हो गया है, स्वर्णो का दलितों के प्रति दृष्टिकोण में अभी तक अपेक्षित बदलाव नहीं आया है, विशेषकर देहात में। हालाँकि वोट की राजनीति के कारण हर राजनैतिक पार्टी दलित वर्ग की तुष्टीकरण की नीति पर चल रही हैं ; लेकिन वास्तव में उसके विपरीत है। लघुकथा में यथार्थपूर्ण चित्रण है, ढोंग को उघाड़ती हुई एक स्पष्ट संदेश देती है।
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1.‘नवजन्मा”- रामेश्वर काम्बोज ”हिमांशु”

जिले सिंह शहर से वापस आया तो आँगन में पैर रखते ही उसे अजीब–सा सन्नाटा पसरा हुआ लगा। दादी ने ऐनक नाक पर ठीक–से रखते हुए उदासी भरी आवाज में कहा, ‘‘जिल्ले! तेरा तो इभी से सिर बँध गया रे। छोरी हुई है।‘ जिले सिंह के माथे पर एक लकीर खिंच गई।
‘‘भाई, लड़का होता तो ज्यादा नेग मिलता। मेरा भी नेग मारा गया।‘ बहन फूलमती ने मंुह बनाया, ‘‘पहला जापा था। सोचा था, खूब मिलेगा।‘
जिलेसिंह का चेहरा तन गया। माथे पर दूसरी लकीर भी उभर आई।
माँ कुछ नहीं बोली। उसकी चुप्पी और अधिक बोल रही थी। जैसे कह रही हो–जूतियाँ घिस जाएॅंगी ढंग का लड़का ढूँढनें में। पता नहीं किस निकम्मे के पैरों में पगड़ी रखनी पड़ जाए।
तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुमा। बाहर की आवाजें वहाँ पहले ही पहुँच चुकी थीं। नवजात कन्या की आँखें मुँदी हुई थी। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुंह अपराध भाव से दूसरी ओर घुमा लिया।
जिलेसिंह तीर की तरह लौटा और लम्बे–लम्बे डग भरता हुआ चौपालवाली गली की ओर मुड़ गया।
‘‘सुबह का गया अभी शहर से आया था। तुम दोनों को क्या जरूरत थी इस तरह बोलने की?‘‘ माँ भुनभुनाई। घर में चुप्पी छा गई।
कुछ ही देर में जिलेसिंह लौट आया। उसके पीछे–पीछे संतु ढोलिया गले में ढोल लटकाए आँगन के बीचों–बीच आ खड़ा हुआ।
‘‘बजाओ! जिलेसिंह की भारी–भरकम आवाज गूँजी।
तिड़क–तिड़–तिड़ धुम्म, तिड़क धुम्म! ढोल बजा।
मुहल्लेवाले एक साथ चौंक पड़े। जिलेसिंह ने आलमारी से अपनी तुर्रेदार पगड़ी निकाली जिसे वह शादी–ब्याह या बैसाखी जैसे मौके पर ही बाँधता था। ढोल की गिड़गिड़ी पर उसने पूरे जोश से नाचते हुए आँगन के तीन–चार चक्कर काटे। जेब से सौ का नोट निकाला और मनदीप के कमरे में जाकर नवजात के ऊपर वार–फेर की और उसकी अधमुँदी आँखों को हल्के–से–छुआ। पति के चेहरे पर नजर पड़ते ही मनदीप की आँखें के सामने जैसे उजाले का सैलाब उमड़ पड़ा हो। उसने छलकते आँसुओं को इस बार नहीं पोंछा। बाहर आकर जिलेसिंह ने वह सौ का नोट संतु ढोलिया को थमा दिया।
संतु और जोर से ढोल बजाने लगा–तिड़–तिड़़–तिड़ तिड़क धुम्म, तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म! तिड़क धुम्म्म!
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2.‘कपों की कहानी”-अशोक भाटिया

आज फिर ऐसा ही हुआ। वह चाय बनाने रसोई में गया तो उसे फिर वही बात याद आ गई। उसे फिर चुभन हुई कि उसने ऐसा क्यों किया?
दरअसल उसके घर की सीवरेज पाइप कुछ दिन से रुकी हुई थीं। आप जानते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति घर में सहज रूप में नहीं रह पाता। यह आप भी मानेंगे कि यदि जमादार न होते तो हम सचमुच नरक में रह रहे होते। खैर,, दो जमादार जब सीवरेज खोलने के लिए आ गए, तो उसकी साँस में साँस आई । वे दोनों पहले भी इसी काम के लिए आ चुके हैं। एक आदमी थक जाता तो दूसरा बाँस लगाने लगता। कितना मुश्किल काम है! वह कुछ देर पास खड़ा रहा, फिर दुर्गंध के मारे भीतर चला गया। सोचने लगा कि इनके प्रति सवणों‍र् का व्यवहार आज भी कहीं–कहीं ही समानताशभरा दीखता है। नहीं तो, अधिकतर अमानवीय व्यवहार ही होता है। इतिहास तो जातिवादी व्यवस्था का गवाह है ही, आज भी हम सवर्ण इनके प्रति नफरत दिखाकर ही अपने में गर्व अनुभव करते हैं। यह संकीर्णता नही ंतो और क्या है?
उसके मन में ऐसा बहुत–कुछ उमड़ रहा था कि बाहर से आवाज़ आई,
‘‘बाऊजी? आकर देख लो।‘‘
वह उत्साह से बाहर गया। पाइप साफ हो चुकी थी।
‘‘बोला, पानी या फिर चाय?‘‘ उसने पूछा।
‘‘पहले साबुन से हाथ धुला दो।‘‘ वे बोले। शायद वे उसकी उदारता को जानते हैं। वह उनके प्रति अपनी उदारता को याद कर खुश होने लगा। हाथ धुलवाते हुए उसने जान–बूझकर दोनों के हाथें को स्पर्श किया ताकि उन पर उसकी उदारता का सिक्का जमने में कोई कसर न रह जाए। पैसे तो पूरे देगा ही, पर लगे हाथ एक अवसर मिल गया। बोला,‘‘ एक बार साबुन लगाने से हाथों की बदबू नहीं जाती। रसोई की नाली रुकी थी, तो मैंने कल हाथ से गंद निकाला था। उसके बाद तीन बार हाथ धोए, तब जाकर बदबू गई।‘‘
‘‘बाऊजी, हमारा तो रोज़ का यही काम है। थोड़ी चाय पिला दो।‘‘
वह यही सुनना चाहता था। यह तो मामूली बात है। इनके प्रति हमारे पूर्वजों द्वारा किए अन्याय के प्रायश्चित के रूप में हमें बहुत कुछ करना चाहिए। लेकिन क्या? यह वह कभी नहीं सोच पाया।
वह रसोई में बड़े उत्साह के साथ चाय बनाने में जुट गया। चाय का सामान डालकर उसने तीन कप निकाले। एक कप बड़ा लिया और दो छोटे, फिर सोचा–यह भेदभाव ठीक नहीं । उन्हे चाय की ज़रूरत मुझसे ज्यादा है। यह सोचकर उसने तीनों एक–से कप उठाए। ऐसे और कई कप रखे थे, लेकिन उसने एक कप साबुत लिया और दो ऐसे लिए जिनमें क्रैक पड़े हुए थे।
उधर चाय में उफान आया, तो उसने फौरन आँच धीमी कर दी।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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