अगस्त-2017

देशवेल्यू     Posted: June 1, 2017

गोबर इकट्ठा करती माँ की नजर अजय पर पड़ी तो बोली – स्कूल तै आ गया? आज तै टैम का बेराई ना पाट्या? सारा काम पड्या है? चारा काटना है। आटा गूँथना है? मैं ऐकली सूँ न? तारी चाची की तै काम करन वाली हालत ना है! तेरा बापू तै शहर गया होया है अर चाचा खेत पै ट्यूबवैल धोरे पड्या होगा… तने बेरा है आपणीं भूरी भैंस ने कटड़ा दिया है?

खुशी से उछल पड़ा – कट्ड़ा? चाचे ने बता के आऊँ सूँ!

माँ उसे रोकती पुकारती रह गई लेकिन वह खेत की ओर भाग खड़ा हुआ। रास्ते में दो-एक जनों ने उसे रोककर टोका  – रै तूफान की ढाल कड़े भाज्या जा सै?

किसी की परवाह किए बिना अजय ने खेत पर पहुँचकर ही साँस लिया। चाचा पेड़ की छाँह में चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा था।

– चाचा…. चाचा…..

हड़बड़ाकर उठा चाचा – रै के चाला पाट ग्या?

– चाचा – अपणी भूरी भैंस ने कटड़ा दिया सै।

– कटड़ा?…. अच्छा ठीक सै….

– चाचा कटड़ा होया है कटड़ा होया कटड़ा….

– कोय बात ना?

हैरान था वह – चाचा तन्नै खुशी ना होई। उस दिन हफ्ता पहले जद चाची के छोरा होया तब तै तन्ने मेरे तांई खुश होके बीस का नोट दिया था। लड् डू खा लिये। अर आज….?

– बावले, इन्न में कटड़ा नई कटड़ी आच्छी होवे है। कटड़ी बड़ी होके दूध देवेगी – अर कटड़ा साला के करेगा??? झोटा बुग्गी भी चलने बन्द हो गये आज कल ते । अर कटड़ी तो भैंस बनके घास-तिनके खा के दूध जैसा अमृत देवे है। उनका तो गोबर भी काम आवे है। बाजार में ईब झोट्टों की कोई वैल्यू ही ना है….।

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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