अगस्त-2017

संचयनशादी का शगुन     Posted: June 1, 2015

शादी का शगुन
गन्दी-सी पोटली उठाकर वह अन्दर तक चला आया, तो एक साथ कई जनों ने उसे दुरदुरा दिया-“कम़जात, अन्दर कहाँ चला आ रहा है ! चल, बाहर बैठ।”
“इसकी यह मज़ाल कि शादी के मंडप तक चला आए। कमीन है, तो बाहर बैठे। जो सबको मिलेगा, इसको भी मिल जाएगा।” एक ने कहा।
“माँजी ने सिर चढ़ा रखा है इसको। इसकी औरत यहाँ नौकरानी है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सरभंग ही हो जाने दें।” क्रुद्ध होते हुए किसी दूसरे ने कहा।
शादी के शुभ अवसर पर मुझे यह आक्रोश अच्छा नहीं लगा। अतः सबको शान्त करते हुए, समझाने के स्वर में, कहा-“अरे अन्दर आ गया है, तो क्या हो गया ! यह क्या कह रहा है, ज़रा सुन तो लो।”
फिर विनम्रता और प्रेम से मैंने उससे पूछा-“क्यों, क्या बात है
भाई ? किससे मिलना है ?”
“दादी सा नै।” अपमान से आहत स्वर में उसने कहा।
“वह तो नहीं हैं, बाज़ार गई हैं।” मैंने बताया-“कब तक लौटेंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।”
“फेर थे यो सामान दादी सा नै दे दीज्यो।” अपनी पोटली मेरी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा-“कह दीज्यो, रामेसर देर गयो ला, भागवन्ती नै भूवा सा कै खातर भेज्यो ला।”
दूसरों को यह बात बुरी लगी। कमीन को दें या उससे लें ! पर मैंने, उसका मन रखने के लिए, पोटली रखवा ली।
थोड़ी देर बाद माँजी आ गईं, तो पोटली खोली गई। उसमें सौ-डेढ़ सौ रुपयों की एक सूती साड़ी थी, एक पैकेट चूड़ियाँ थीं, ‘मेकअप’ का कुछ सामान, जो गाँव में मिल सकता था, वह भी था और साथ में थे शगुन के इक्कीस रुपए।
शगुन का सामान देखकर सबको साँप सूँघ गया था।

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