जून-2017

संचयनशिनाख्त     Posted: May 1, 2015

दंगों के बाद चौराहे पर एक लाश मिली थी, जिसकी पीठ में छुरा भोंका गया था।
‘‘लाँग वाली धोती तो पहनी नहीं है, जनेऊ भी नहीं है, बदन पर….। हिन्दू तो लगता नहीं है।’’
‘‘अचकन या अलीगढ़ कट पायजामा भी नहीं पहने है….। मुसलमान भी तो नहीं दिखता…।’’
‘‘अरे, अब नई पीढ़ी तो पैन्ट शर्ट पहनती है। ऐसे हिन्दू- मुस्लिम की पहचान थोड़े होगी।’’
‘‘तो, फिर ये…है…कौन?’’
‘‘अरे, होगा कोई गरीब आदमी। देखते नहीं बदन पर केवल कच्छा है….वह भी…फटा हुआ।’’
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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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