सितम्बर-2017

संचयनसंचयन     Posted: April 1, 2017

1-ग्लानि- सुधीर द्विवेदी 
“नमस्कार !! मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ ?” उसके मोबाइल के स्पीकर पर कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव का मीठा स्वर गूँजा। उसने मोबाइल अपने और करीब कर लिया।
“जी मै आपकी क्या मदद कर सकती हूँ..?” स्वर पुनः उभरा।
“करने को तो बहुत कुछ कर सकती हैं पर… !” थोड़ी देर के लिए दूसरी तरफ़ सन्नाटा छा गया ।
“जी प्रोडक्ट से सम्बन्धित कोई सहायता या शिकायत यदि हो तो दर्ज कराएँ ।” स्पीकर पर अब अधिक सधा हुआ स्वर सुनाई दिया ।
“अजी कभी एकान्त में मिलिए तो शिकवे भी हों, शिकायत भी… ” उसे शगल करने की सूझी, उसके अंदर का जानवर जैसे जाग उठा।
“जी अवश्य.! आपकी पूरी सहायता की जाएगी। क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ ? ” दूसरी तरफ़ का स्वर और अधिक संयत हो गया था, पर उसकी मिठास कम नहीं हुई थी।
“हम तो आशिक हैं …!!” वह फुसफुसाया …।
“अच्छा..!! तो फिर उनका भी नाम बता दीजिए जिनके आप आशिक हैं ? उनके बारे में जानकर आपकी इस बहन को अति-प्रसन्नता होगी।” उस पार के स्वर में सन्तुलन के साथ मानो शहद का जादू था। वह अचानक अर्श से फर्श पर आ गिरा। अनायास ही उसकी आँखें मुँद गईं।
दो चोटियोँ में पीला रिबन बाँधे, खनकती हँसी लिये एक मासूम छवि उसकी भीग आई आँखों में झलक आई। कटाक्ष था या आत्मीयता ? पर न जानें क्यों उसे इन शब्दों में यह अंतर ढूँढने का मन नही किया ।
“माफ कीजिएगा… ” भर्राए गले से यही शब्द निकले। लेकिन तब तक लाइन कट गई थी।Top of Form

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2-जगह

एक दूजे के हाथ में हाथ डाले बेंच पर बैठे हुए हम दोनों को न जाने कितना समय और बीत जाता अगर पीछे से किसी ने छड़ी से मेरे पीठ को ठकठकाया न होता। इस अत्प्रत्याशित घटना से मैं चौंक उठा।
मैंने अचकचा कर बैठे-बैठे ही पलटकर देखा तो बिलकुल साधारण परन्तु साफ-सुथरे कपड़े पहने एक बूढा आदमी खड़ा हुआ था। मैंने जलती हुई नजरों से उसे ऊपर से नीचे तक घूरा पर वह अविचल खड़ा रहा। मेरा तन-बदन सुलग उठा।
“क्यों ..? क्या परेशानी है..?” मेरे लहजे में जवानी की गर्माहट थी। यह सब देख मेरी प्रेमिका सहम गई थी। भौचक्की वह कभी मेरी तरफ देखती तो कभी उस बूढ़े आदमी की ओर। उसका इस तरह सहम जाना मुझसे न देखा गया, मैंने फौरन उसका हाथ अपने हाथों में कसकर थाम लिया।
बूढ़ा आदमी अब भी अपलक मेरी ओर ही ताक रहा था। उसकी ढिठाई ने मेरे अंदर के युवा अहम को और उकसा दिया। भला अपनी प्रेमिका के सामने खुद को इस तरह उपेक्षित होता मैं कैसे देख सकता था? मैं बैंच पर बैठे-बैठे ही पलटा और उस बूढ़े आदमी से लगभग सटते हुए उसके सामने झटके से उठ खड़ा हुआ। वह दो कदम पीछे होते हुए जरा लड़खड़ाया ,पर फौरन ही सम्हल भी गया। मैंने अपना प्रश्न फिर दोहराया। बूढ़े आदमी ने मेरी बात को अनसुना कर दिया और वापस जाने का उपक्रम किया।
मैं लगभग चीख उठा, “सुनाई नहीं दिया क्या..?” मारे क्रोध के मेरे शरीर के साथ-साथ मेरे स्वर भी काँप रहे थे। जवाब में पहले तो वह बूढ़ा आदमी मुस्कुराया फिर अचानक गम्भीर होते हुए अपनी छड़ी से इधर-उधर, हमारे द्वारा फेंके गए चिप्स वगैरह के खाली पैकेट की ओर इशारा कर दिया। फैली गन्दगी की ओर निगाह जाते ही मेरी प्रेमिका का चेहरा उतर गया ,पर मेरे गुस्से का पारा अब उफान पर था, “क्यों ये जगह तुम्हारे बाप की है क्या ?” अपनी भँवे उचकाते हुए मैं फिर गुर्राया।
बूढ़े आदमी ने आगे बढ़कर मेरा कन्धा थपथपाया,मुस्कराया फिर मेरी प्रेमिका की ओर देखते हुए संयत स्वर में बोला, ” नहीं ! हम सब की है..।” और पलटकर आगे बढ़ गया।

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3-सुमिरन
नियम-कायदे की बिलकुल पक्की रहीं अम्मा। सुबह मुँह-अँधेरे ही उठकर स्नानादि कर भोले बाबा को जल चढ़ाती, फिर पूरे बगीचे में टहलकर फूल चुनती। कुछ देर साँसों की गति को नियंत्रित कर ईश-सुमिरन करतीं ,तब कहीं पानी पीतीं। घर की बहू-बेटियों को भी उनकी यही हिदायत थी कि खबरदार जो सूर्योदय से पहले कोई न जागा। मानस-देह पाए हो ,तो नियम-संयम से रहना ही चाहिए। परिवार के सभी सदस्य इस नियम का पालन करते सिवाय बहू के।

रोज सवेरे की खटर-पटर से बहू की नींद खराब हो जाती, ‘इन बूढ़ों के नियम-कायदे के चक्कर में मेरी नींद की बरबाद हो जाती है। भगवान जी ये नहीं कहते कि चार बजे सुबह से घण्टी बजाने लगो।’ उसका भुनभुनाना अक्सर अम्मा सुन भी लेतीं ,पर उन्हें कोई फर्क न पड़ता। ऊपर से वे चार बातें अलग से सुनाकर बहू को छेड़ देतीं ‘खाय-खाय के मुटाय रही हो ..भोगोगी तब न कहना।’ अम्मा के ये शब्द सुन बहू के नख-शिख सुलग उठते।’

‘देहातिन कहीं की.. ।’ बड़बड़ाते हुए वह मुँह पर रजाई और जोर से तान लेती ।

बहू को कई दिनों से चक्कर आ रहे थे और कमजोरी भी लग रही थी। बहू ने अपना मेडिकल चेकअप कराया तो डॉक्टर की बात सुन सन्न रह गई। बुझे मन से घर आकर पूरे दिन वह गुमसुम रही। न ही कुछ खाया न पिया ।

उसे इस तरह गुमसुम देख, शाम को अम्मा से जब न रहा गया तो उन्होंने चुटकी ली, “का हुआ ? ई गुब्बाड़ा काहे बनीं बैठी हो..।” अम्मा तो उसे छेड़कर हँसाना चाहती थीं ,पर बहू की आँखों से टप-टप आँसू टपक पड़े।

“का हुआ मेरी गुलफाम परी ?” अम्मा ने पुचकारते हुए ठुड्डी पकडकर उसका चेहरा अपनी ओर घुमा लिया।

“हाई ब्लड-प्रेशर बताया है डॉक्टर ने,” सुबकते हुए बहू बमुश्किल बोल पाई। अम्मा पास आई और बहू को छाती से चिपकाते हुए बोली, “देख बिटिया ये धरम-करम,नियम-संयम मनुष्य के फायदे के लिए ही बने हैं कि इंसान भगवान को खुश करने के लोभ में ही सही, पर इनका पालन करके स्वस्थ रहे।”

बहू की सिसकियाँ और तेज हो गई थीं। अम्मा बहू की पीठ सहलाते हुए बोले जा रही थीं, “हम देहाती जरूर हैं पर ई नियम कायदे से चले हैं, तो देख हमका ! पचपन-साठ की उमर मा भी भले चंगे, बिल्कुल निरोगी..।” कहते-कहते अम्मा ने अपने काले बालों में मानों जबरदस्ती उग आए एक सफेद बाल को उखाड़ फेंका, तो बहू मुस्कुरा दी।

“मम्मी क्या सोचकर मुस्कुरा रही हो ? चलो ..! नहीं तो फिर कहोगी कि मैं मॉर्निंग वॉक के लिए टाल-मटोल करती हूँ।” बहू जो अब सास बन चुकी थी, अपनी बहू की पुकार सुन अतीत से वापस वर्तमान में लौट आई।

“आती हूँ …!!” जवाब देते हुए उसने भर आई आँखों को पोंछा फिर अम्मा की तस्वीर को प्रणाम करते हुए तेज कदमों से अपनी बहू के साथ-साथ चल दी।

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4-चूहे
ओफ..! कितने चूहे हैं उसके इर्द-गिर्द ? कोई इधर कुछ कुतर रहा है तो कोई उधर। कोई नीचे से भागता हुआ अलमारी के ऊपर जा चढ़ा है। लो अपने नुकीले दाँतों से एक चूहा उसकी बचपन की फोटो ही कुतरने लगा है।

हश..हश..!! की आवाज़ करते हुए उसने चूहों को भगाने के लिए ढेरों जतन किये पर सब बेकार । तब-तक एक अन्य चूहे ने उसके घर की दीवार में एक बड़ा सुराख कर दिया है।
चारों ओर से कुट-कुट की आवाज आ रही है। एक मरियल सा चूहा उसके हाथ को छूता हुआ निकल गया। लिजलिजे स्पर्श से वह घृणा से भर उठा। उसने झुँझलाते हुए हाथ झटक दिया। वह उठा। चारों ओर से उसे कुट-कुट की तेज़ आवाज सुनाई दे रही है।

वह अचकचाकर ज़ोर से चिल्ला पड़ा, “सब बर्बाद कर देंगे…..।”

“क्या हुआ..?” पास बैठे सहकर्मी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए पूछा।

“कुछ नहीं… शायद बुरा सपना था।” पसीने से लथ-पथ उसने, झेंपते हुए उत्तर दिया। थकान से उसकी आँख लग गई थी। थोड़ी देर वह कुर्सी पर ही बैठा रहा। लेकिन कुट-कुट की मद्धिम ध्वनि उसे अब भी सुनाई दे रही थी। घबराकर वह वाश-रूम में जा घुसा।

चेहरे पर पानीं के छींटे मारे। चेहरा पोंछते हुए उसने शीशे में अपना चेहरा देखा। उसे लगा उसकी ठुड्डी सिकुड़ रही है। उसके क्लीन-शेव चेहरे पर चूहों की लम्बी-लम्बी नुकीली मूंछें उग आई हैं। उसकी घबराहट और बढ़ गई। पस्‍त कदमों से वापस वह अपनी कुर्सी पर आ बैठा। कुट-कुट की कर्कश ध्वनि अब भी उसके कानों में गूँज रही थी।

परिचित ठेकेदारों के टेण्डर स्वीकृत करने की सुविधा-राशि उसे मिल चुकी है, पर कुट-कुट की कर्कश ध्वनि से ध्यान बँटाने के लिए वह उन फ़ाइलों को दोबारा उलटने-पलटने लगा।

धीरे-धीरे फ़ाइलों के कई पन्नों में उसकी कलम की लाल स्याही ने अपने निशान छोड़ दिए। टेण्डर, अब अस्वीकृत हो गए थे।

उसके माथे की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें थककर सीधी हो गई थीं। उसने शांत-भाव से दूसरे टेंडर की फ़ाइल खोल ली। कुट-कुट की ध्वनि अब बिलकुल भी नहीं सुनाई दे रही थी।

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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