अक्तुबर-2017

मेरी पसन्दसंवेदनाओं को उकेरते हुए     Posted: June 1, 2015

लघुकथा की रचना प्रक्रिया और उस प्रक्रिया में अपनाए जाने वाले अनुशासन, आदि के बारे में भी पढ़ा,जिनमें – लघुकथा और सामान्यजन, बिम्ब, प्रतिबिम्ब, प्रतीक–योजना, नेपथ्य, लाघव, यथार्थ घटना और कथा -घटना,कल्पना की उड़ान, कथा- भाषा, परिवेश, शिल्प और शैली, वाक्य- संयोजन और शब्द प्रयोग, दृश्य- संयोजन एवं संवाद योजना, शीर्षक, लेखक विहीनता, सम्पूर्णता आदि प्रमुख बिन्दु हैं। (सरस्वती सुमन–जुलाई–सितम्बर 2011– लघुकथा विशेषांक–बलराम अग्रवाल/पृ0 152–157) इतना ही नहीं कई अन्य लघुकथा विशेषज्ञों के लेख भी पढ़े, जिन्होंने लघुकथा -लेखन सम्बन्धी दिशा– निर्देशों का अपनी – अपनी तरह से उल्लेख किया है। जब मैंने इन सभी लघुकथा मर्मज्ञों, विशेषज्ञों को पढ़ा ,तो मेरे तो होश ही उड़ गए। मैंने लघुकथाएँ लिखीं, लेकिन कभी कोई मानदण्ड नहीं अपनाए। किसी परिभाषा पालन नहीं किया। शायद इसीलिए बड़ा लघुकथाकार नहीं बन सका। कोई बात नहीं। लघुकथा के सम्बन्ध में मेरा अर्थ तो सिर्फ़ इतना ही है कि जो मन को छू जाए वही सार्थक रचना है ;फिर चाहे वह लघुकथा हो, कथा हो या फिर कविता। इतिहास गवाह है, समाज के वर्चस्वधारी लोगों ने सामान्यजन के रहन -सहन से लेकर जीवन मृत्यु तक नियम कानून बना दिए। जीवन दूभर हो गया। जीवन का यथार्थ परोसते हुए, मन में अंदर तक समाई भावनाओं को झकझोरते हुए, संवेदनाओं को उकेरते हुए और जिससे चारों दिशाएँ महकने लगें, मेरी दृष्टि में वही सर्वोत्तम लघुकथा होगी।
सआदत हसन मंटो मेरे आदर्श रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ –उलाहना, मिस्टेक (वर्तमान साहित्य–अक्तूबर 2012/पृ0 42) ऐसी लघुकथा हैं, जो भावनाओं के साथ साथ मस्तिष्क को भी झकझोरकर रख देती हैं। लघुकथा धमाका नहीं है। लघुकथा जमाने जमाने तक अपने पाठकों पर छाई रहती है और मन में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे सहजता से नहीं मिटाया जा सकता। वह तो संवेदनाओं का हाहाकार है। एक लघुकथा पर विचार करने में कई बार छह–छह महीने भी लग जाते हैं।
सुकेश साहनी ज्वलंत और सार्थक विषयों पर लघुकथाएँ लिखते हैं। उनकी लघुकथाएँ एक दो पंक्ति की नहीं होती। पूरी तरह से धैर्यपूर्वक, बिना किसी जल्दी के लिखी गई लघुकथा सुकेश साहनी की ही होती है।शिनाख़्त, चादर, दाहिना हाथ, ओए बबली, लाफिंग क्लब महल और झोपड़ी, वायरस, प्रतिमाएँ घंटियाँ, कुआँ खेादने वाला, मास्टर और ग्लेाबल विलेज सशक्त रचनाएँ हैं।
कुछ और लघुकथाओं ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया , जिनमें रामेश्वर काम्बोज की विजय जुलूस, नवजन्मा , सतीशराज पुष्करणा की अँधेरा,मन के साँप,जमीन से जुड़कर, बलि का बकरा, पत्नी की इच्छा, कमल चोपड़ा की बहुत बड़ी लड़ाई, खेलने के दिन,डाका , अशोक भाटिया कि पानी आदि रचनाएँ प्रभावित करती हैं ।

कालीचरण प्रेमी अब इस दुनिया में नहीं हैं। तब मुझे कलम पकड़ना भी नहीं आता था। कहानियों पर पी -एच डी की थी। कहानियाँ ही लिखना चाहता था, लेकिन प्रेमी जी ने ही मुझे लघुकथा लेखन की ओर मोड़ा। उनकी सब लघुकथाओं में से एक लघुकथा का जिक्र करना चाहूँगा।उनकी लघुकथा आँसू समाज में फैले सामाजिक वर्चस्व की कथा है। सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमता का करुण क्रंदन है।
इस लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि निश्चित और गिने चुने शब्दों में ही सारी कथा को समेटने का साहस लघुकथाकार ने किया है। संवाद बहुत थोड़े हैं; लेकिन बड़े- बड़े उपन्यासों पर भारी पड़ रहे हैं। जैसा कि लघुकथा के आलोचक अपनी परिभाषाओं में बताते हैं -प्रेमी जी की लघुकथा ‘आँसू’ उन पर खरी उतरती है। जहाँ तक मेरी बात है ,तो मैं लघुकथा में किसी भी प्रकार का बंधन स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूँ। मैं तो सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूँ कि जो लघुकथा मन को छू जाए, जिसे हम चाहकर भी न भुला पाएँ ; वही लघुकथा मेरे लिए सर्वोपरि है। प्रेमी जी की ‘आँसू’ वही है। जब हम लघुकथा के अंत तक जाते हैं ,तो अनायास ही हमारे चारों ओर वर्चस्व की दीवार खड़ी हो जाती है। यही समाज का यथार्थ है और जातिगत क्रूरता का सच भी। यह लघुकथा प्रेमी जी ने न जाने कितने दिन पहले लिखी होगी; लेकिन समाज में व्याप्त ऊँच -नीच की कँटीली दीवार आज भी ज्यों की त्यों है। जाति का सच आज भी वैसे का वैसा है। कहीं कोई बदलाव नहीं। हाँ भेदभाव के रूप बदल गए हैं। डर का साम्राज्य आज भी वैसा ही है। अंतिम पंक्ति देखें, ‘…….. और उस रात हरिया अपने जवान बेटे की मौत पर रो भी नहीं सका।’ (सृजन संवाद अंक 5/2012–लघुकथा विशेषांक /पृ-86) गाँवों और शहरों में सामाजिक दबदबा वैसा ही है। और जब सब कुछ वैसा ही है तो प्रेमी जी के ‘आँसू’ वैसे क्यों न बहें। भाषा पर उनका पूरा नियंत्रण है ही। ‘आँसू’ की सार्थकता आज भी है जितनी रचना के समय में रही होगी। शायद इसीलिए प्रेमी जी के ‘आँसू’ मेरे पसंद बने।

हरिशंकर परसाई जी की लघुकथा जाति ने मुझे जितना प्रभावित किया उतना आज तक की किसी भी लघुकथा ने नहीं किया। समाज में व्यवस्था का ऎसा नंगा रूप आज तक देखने को नहीं मिला। समाज की तथाकथित उच्च जातियाँ व्यभिचार तो सहन कर लेंगी ;लेकिन दो प्यार करने वालों के प्यार को स्वीकार करने में उनका जातिगत दंभ फन उठाए खड़ा हो जाएगा। अंतिम पक्ति तक जाते जाते तो परसाई जी सामाजिक वर्ण व्यवस्था की धज्जियाँ ही उड़ा देते हैं। और एक सफल लघुकथाकार का दायित्व भी तो यही है कि वह समाज का यथार्थ जनसामान्य के आगे ज्यों का त्यों परोस दे। परसाई जी का कला कौशल अद्वितीय है। बड़े बडे़ आलोचक उनके आगे चूँ भी न कर पाएँ । यही है लघुकथा लेखन। एक एक संवाद पर कड़ी नजर रखी है उन्होंने। अंतिम पंक्ति को प्रस्तुत करने का लालच मैं नहीं छोड़ पा रहा ‘…. इस पर ठाकुर साहब और पण्डित जी कहते हैं-”” …… होने दो। व्यभिचार से जाति नहीं जाती। शादी से जाती है।”” बिल्कुल नपे तुले शब्द कोई भाषायी चमत्कार नहीं, किसी भी तरह की होशियारी नहीं। कथानक बिल्कुल कसा हुआ। यही है लघुकथा लेखन। इसी को याद रखा जाएगा। ऎसी लघुकथाएँ बनेंगी धरोहर। यही कारण रहा कि परसाई जी की ‘जाति’ लघुकथा अपनी तीव्रता के कारण मुझे छू गई।
डा.पूरन सिंह, 240 बाबा फरीदपुरी , वेस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली 110008
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2- जाति-हरिशंकर परसाई
कारखाना खुला । कर्मचारियों के लिए बस्ती बन गई।
ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पंडित जी कारखाने में काम करने लगे और आसपास के ब्लाक में रहने लगे।
ठाकुर साहब का लड़का और पंडित जी की लड़की जवान थे। इनमें पहचान हुई । पहचान इतनी बढ़ी की शादी करने को तैयार हो गए।
जब प्रस्ताव उठा ,तो पंडित जी ने कहा, ऐसा कभी हो सकता है, ब्राह्मण की लड़की ठाकुर से शादी करे । जात चली जाएगी।
ठाकुर साहब ने भी कहा ऐसा हो नहीं हो सकता। पर जाति में शादी करने से हमारी जाति चली जाएगी ।
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़की–लड़के बड़े हैं, पढ़े लिखे और समझदार हैं, उन्हें शादी कर लेने दो। अगर शादी नहीं हुई ,तो वे चोरी छिपे मिलेंगे और तब जो उनका संबंध होगा वह व्यभिचार कहा जाएगा।
इस पर ठाकुर साहब और पंडित जी ने कहा-”” होने दो व्यभिचार। व्यभिचार से जाति नहीं जाती। शादी से जाती है।””
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आँसू – कालीचरण प्रेमी
ठाकुर साबह के घर आज मेहमान आने वाले थे। उन्होंने स्वागत सत्कार का पूरा इंतजाम किया था। कहीं कोई कोर–कसर बाकी नहीं रही गई थी। बस कुछ खटक रहा था तो पिछवाड़े से आती रोने धोने की आवाज।
हरिया का जवान लड़का बीमार चल रहा था। डॉक्टरों ने भी जबाव दे दिया है।
स्साला कहीं मर मरा न जाए। पूरा पिछवाडा गला फाड़के चीखेगा । अपने मेहमानों का मजा किरकरा हो जाएगा। आखिर क्या किया जाए। ठाकुर साहब चहल कदमी करने लगे थे।
‘भई हरिया’, कुछ सोच समझकर ठाकुर साहब पिछवाडे वाले मकान में जा धमके, ‘देख आज मेरे घर में बहुत बडे बडे आदमी आने वाले हैं। रोने पीटने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। थोड़ा सा ध्यान रखना।’
और उस रात हरिया अपने जवान बेटे की मौत पर भी नहीं रो सका।
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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