अक्तुबर-2017

अध्ययन -कक्षसतीशराज पुष्करणा जी की लघुकथाएँ     Posted: July 1, 2016

हम सबने एक कहावत बहुत बार सुनी होगी-देखन में छोटी लगे, घाव करे गम्भीर- अगर मैं कहूँ कि यह कहावत एक अलग ही अर्थ में लघुकथा की विधा पर बिल्कुल सटीक बैठती है, तो शायद मेरी बात से आप सब भी इत्तेफ़ाक़ रखेंगे। अपने शिल्प और गठन में लघुकथा अपने नाम के अनुरूप भले ही छोटी होती हो, पर कथ्य और भाषा के साथ-साथ पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने के मामले में यह भी किसी कहानी या उपन्यास सरीखी वृहद कलेवर वाली रचना से उन्नीस नहीं साबित होगी…बस शर्त यह है कि इस विधा को अपनाने वाला इसके सृजन में किसी प्रकार का समझौता या भेदभाव न रखे।

लघुकथा जितनी सशक्त विधा है, उतना ही अपने अस्तित्व के लिए इसे बीच-बीच में संघर्ष भी करते रहना पड़ा है। इसके विरोध में स्वर उठाने वालों ने न केवल इसे छोटीकहानी का नाम दिया, बल्कि इसे कहानी का ही एक कटा-छँटा रूप साबित करने की पुरज़ोर कोशिश की गई। उनके अनुसार लघुकथा लेखकों में धैर्य का अभाव है और अपनी बात को विस्तार से कह पाने की क्षमता में कमी, जिसकी वजह से शीघ्र नाम कमाने की लालसा में लघुकथा सृजन किया जाता है। परन्तु विरोध करने वाले लाख विरोध करते रहें, इसके समर्थकों और साधना में जुटे साहित्यकारों ने हर स्थिति में लघुकथा के उत्थान के लिए अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए इस विधा में अपना रचनाकर्म नहीं छोड़ा।

सच तो यह है कि लघुकथा खुद में एक स्वतन्त्र विधा है। इसमें संवेदना है, साहस है, वैचित्र्य है। एक सशक्त लघुकथा चन्द शब्दों में ही अपने पाठकों में विभिन्न भावनाओं का संचार कर देती है। लघुकथा पढ़ते समय कभी वह आह्लादित होता है, कभी विचलित, कभी किसी पात्र या स्थिति के प्रति घृणा और जुगुप्सा से भी भर उठता है तो कभी उसमें एक तीव्र आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है। हाँ, यह ज़रूर है कि कुछेक ऐसे भी लोग इस क्षेत्र में आए ,जिन्होंने लघुकथा के नाम पर महज फ़िकरेबाज़ी को तरज़ीह देते हुए चुटकुलों या लतीफ़ों को ही लघुकथा बनाकर प्रस्तुत कर दिया। इससे लघुकथा की विश्वसनीयता पर कई तरह के प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। लघुकथा के नाम पर चुटकुले या लतीफ़े परोसने वाले लोग यह नहीं समझ सकते कि लघुकथा का फ़लक इनसे कहीं अधिक विस्तृत और व्यापक है। लतीफ़े गुदगुदाते हैं, जब कि लघुकथा झकझोर डालती है। कुछेक विद्वानों का मानना है कि लघुकथा अनादिकाल से अपने एक अलग ही रूप में हमारे बीच मौजूद रही है-पंचतन्त्र, हितोपदेश, कथा-सरित्सागर और जातक कथाओं के रूप में; जिनके माध्यम से हमारे पूर्वज अपने संस्कार आगे की पीढ़ी में रोपते थे।

इसकी जड़ें भले ही अतीत में रही हों, लेकिन इसका आज का स्वरूप इसकी अपनी स्वतन्त्रा पहचान है, कुछ कहानीकारों को जो लघुकथा लिखने में सक्षम नहीं को छोड़कर लघुकथा की स्वतन्त्रा पहचान से असहमति हो सकती है

वर्तमान समय में हमारे बीच कई ऐसे साहित्यकार रहे हैं, जिन्होंने पूरी लगन और समर्पण के साथ इस विधा के उत्थान में अपना योगदान दिया है। कुछ प्रबुद्ध लेखकों के नाम मुझे याद आ रहे हैं, जिन्होंने इस विधा को अपने सशक्त कलम से सजाया-सँवारा। जिनमें मुख्य रूप से डॉ. शंकर पुणतांबेकर, विक्रम सोनी, सतीशराजपुष्करणा,सुकेशसाहनी ,बलराम, प्रेम गुप्ता ‘मानी,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,कमल चोपड़ा, रूप देवगुण, बलराम अग्रवाल, पृथ्वीराज अरोड़ा, सतीश राठी, राजकुमार गौतम, हीरालाल नागर, शराफ़त अली खान, उर्मि कृष्ण,आदि के नाम मुझे याद आ रहे। हालाँकि इनमें से कुछ साहित्यकारों ने साहित्य की अन्य विधाओं में भी बहुत उल्लेखनीय कार्य किया है, परन्तु इससे इनका लघुकथा के प्रति इनकी संलिप्तता को नकारा नहीं जा सकता।

वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में श्री सतीशराज पुष्करणा जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी साहित्य की इस विधा की साधना में लगा दी और इसको एक नई ऊँचाई तक पहुँचाया। उनकी अनेकानेक लघुकथाओं में से मेरे सामने कुछ लघुकथाएँ हैं, जिन्हें मैने अपनी अल्प-बुद्धि से समझ कर उन पर कुछ शब्द लिखने का चुनौतीपूर्ण कार्य करने का साहस किया है। आशा करती हूँ कि अपने गुरुजनों के आशीर्वाद से मैं इस कार्य में थोड़ा-बहुत सफ़ल हुई हूँगी।

हम सब इंसान होने के नाते अनगिनत इंसानी दुर्बलताओं से समय-समय पर ग्रसित होते रहते हैं। कभी उन पर विजय पा लेते हैं तो कभी-कभी उनके हाथों पराजित भी हो जाते हैं। पर इंसान होने की सार्थकता तो इसी बात से है कि हम उन दुर्बलताओं के लिए समय रहते चेत जाएँ और उन पर काबू पा लें। ऐसी ही कुछ मानसिक दुर्बलताओं के उभरने और वक़्त रहते चेत कर उन पर सफ़लतापूर्वक विजय प्राप्त करने की अलग-अलग घटनाएँ पुष्करणा जी की कई लघुकथाओं में हमारे सामने अपनी पूरी सार्थकता से प्रस्तुत होती हैं; जैसे- जैसे-‘आग’ शीर्षक लघुकथा में लगभग अध्ेड़ावस्था को पहुँच चुकी एक एक कुँवारी महिला अपने से कई बरस छोटे घर के नौकर के प्रति ही मन में दैहिक खिंचाव महसूस करती है, परन्तु इससे पहले कि वह अधमता की गर्त में गिरे, खुद को सम्हाल लेती है। हालाँकि इस लघुकथा के अन्त में उस महिला का अपने नौकर को दूसरे ही दिन निकाल देने का निर्णय कहीं-न-कहीं उसकी मानसिक इच्छाशक्ति की कमज़ोरी को दर्शा जाता है। इस लघुकथा को पढ़कर पाठक यह भी अन्दाज़ा लगा सकता है कि वह महिला एक बार तो सम्हल गई, पर सम्भवतः भविष्य में वह अपने को न सम्हाल सके।

मन के साँप- लघुकथा भी कुछ ऐसी ही कथा के इर्द-गिर्द बुनी गई है, बस फ़र्क इतना है कि ‘आग’ में एक अविवाहित युवतीका भटकाव है तो इसमें पत्नी के मायके जाने पर एक पुरुष का अपनी नौकरानी के लिए ग़लत भाव आने के बावजूद समय रहते चेत जाने का ज़िक्र हुआ है। ‘आग’ के विपरीत इस लघुकथा का पात्र मुझे ज़्यादा दृढ़ इच्छा शक्तिवाला लगा, क्योंकि वह नौकरानी से अपने कमरे का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लेने  की ताक़ीद करता है। इससे पाठक के समक्ष एक बात तो पूरी तौर से स्पष्ट हो जाती है कि उसके मन में जो भी दुर्भावना उठी, वह क्षणिक थी और भविष्य में ऐसी किसी परिस्थिति के आने पर वह पहले ही सम्हल जाएगा।

‘मृगतृष्णा’ के मुख्य पात्र एक विधुर अधेड़ है जो अनजाने ही अपने बेटे के लिए आए एक रिश्ते के लिए खुद को ‘लेकर सपने सजा लेते हैं, परन्तु वस्तुस्थिति ज्ञात होते ही सम्हल जाते हैं।

“वह तो ठीक है, पर ज़रा लड़के से भी तो पूछ लो कि उसे कहीं कोई एतराज़ तो नहीं होगा? या फिर…।”

बात को बीच में ही काटते हुए बोले,”अरे! लड़के से क्या पूछना। मरजी मेरी चलेगी या उसकी? बाप मैं हूँ या वह?”

“नहीं यार! फिर भी जिसे जीवन गुज़ारना है, उसकी राय जानना तो बहुत ही ज़रूरी है।”

इतना सुनते ही उन्हें लगा जैसे घड़ों ठण्डा पानी पड़ गया हो और वह दिवा-स्वप्नों की दुनिया से बाहर आ गए।

उपर्युक्त लघुकथा अपने अन्दर एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी समेटे हुए है। एक पुरुष का मनोविज्ञान, जो आमतौर पर एक स्त्राी की मानसिकता से नितान्त भिन्न होता है। एक तरपफ विध्वा हो जाने के पश्चात् सारा जीवन अकेले गुज़ार लेने वाली प्रायः स्त्रिायाँ आमतौर पर अपने पुनर्विवाह की बात करना तो दूर, उसकी कल्पना से भी खुद को दूर रखती हैं, वहीं एक पुरुष अक्सर समान परिस्थितियों में भी अपने पुत्रा की बजाय पहले अपने विवाह की तैयारी शुरू कर देता है।

समस्त पुरुष जाति का प्रतिनिध्त्वि करते शीर्षक के साथ पुष्करणा जी ने ‘पुरुष’ में एक पुरुष के मन की स्वाभाविक चंचलता को इंगित किया है, जो महज दो स्त्रिायों का वार्त्तालाप सुनकर, बिना उन्हें देखे ही उनकी ओर एक अजीब किन्तु सहज आकर्षण महसूस करने लगता है, परन्तु जैसे ही उनमें से एक युवती उसे ‘अंकल’ कहकर सम्बोध्ति करती है, उसे अपनी अवस्था का अहसास होता है और वह बिलकुल शान्त हो जाता है। इस तरह के क्षणिक भटकाव से बहुत सारे पुरुष कभी-न-कभी दो-चार होते हैं, परन्तु ये उनके अन्दर का मर्यादित आत्मबोध् ही होता है, जो वक़्त रहते उन्हें सम्हाल लेता है। इस तरह की परिस्थितियाँ कोई मनोविकार नहीं, बल्कि बहुत सहज-स्वाभाविक मानसिक स्थिति यानी मनोविज्ञान को प्रस्तुत करती हैं।

इन लघुकथाओं के अतिरिक्त इसी तरह के किसी भटकाव और नियन्त्रण को लेकर दो और लघुकथाएँ भी मेरी नज़रों से गुज़री, यथा- अंतश्चेतना, और अमानत का बोध।

हमारे समाज में परिवार का एक बहुत अहम स्थान है, और यह परिवार बनता है पति-पत्नी से…उनसे ही जुड़े अन्य रिश्तों से…। पति-पत्नी के बीच अक्सर विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हो जाने के बावजूद उसके मूल में जो आपसी सामंजस्य, प्रेम और दायित्व-निर्वाह की एक कोमल और मीठी-सी भावना होती है, उसकी भी बड़ी खूबसूरत अभिव्यक्ति पुष्करणा जी की कई लघुकथाओं में हुई है, जैसे- आत्मिक बन्धन, जीवन-संघर्ष, बीती विभावरी, मन के अक्स, अपनी-अपनी विवशता, निष्ठा, झूठा अहम, स्वभाव, आकांक्षा ।

इस श्रेणी में पुष्करणा जी की एक लघुकथा ने विशेष रूप से मुझे प्रभावित किया, वह है ‘विश्वास’शीर्षक लघुकथा, जिसमें एक पत्नी का अपने पति के प्रेम पर इतना अटूट विश्वास होता है कि जब उसकी बीमारी से मानसिक रूप से बेहद दुःखी होकर उसका पति उसे दवा के नाम पर ज़हर देने चलता है, तो पत्नी बेहद निश्चिन्तता से ये बात उस पर ज़ाहिर कर देती है कि अगर वो कभी उसे ज़हर भी देगा, तो वो भी वह बेहद खुशी से ग्रहण कर लेगी। पत्नी का अपने ऊपर ऐसा विश्वास देखकर पति को तुरन्त अपनी सम्भावित ग़लती का बोध होता है और वह एक जघन्य कृत्य करने से बच जाता है। आप भी देखिए ज़रा:-

इससे तो अच्छा है-पत्नी को जीवन से ही मुक्त कर दिया जाए। और उसने ज़हर की एक शीशी खरीद ली ।

घर पहुँचा। पत्नी ने लेटे-लेटे मुस्करा कर पूछा,”आ गए?”

“हाँ।” वह बोला,”तुम दवा ले लो।”

“इतनी दवाइयाँ रखी हैं, किसी से भी कुछ लाभ तो नहीं हुआ। मैं नहीं खाऊँगी अब कोई भी दवा।”

पति बोला,”आज मैं तुम्हारे लिए बहुत अच्छी दवा लाया हूँ। इससे तुम अच्छी हो जाओगी ।”

पत्नी पुनः मुस्करई,”तुम नहीं मानोगे। अच्छा लाओ! अब तुम मुझे ज़हर भी दे दो, तो पी लूँगी।”

उसी क्षण पति के हाथ से शीशी छूट कर ज़मीन पर गिर कर चूर-चूर हो गई।

आज हम युवा पीढ़ी को अक्सर उसकी संवेदनहीनता के लिए कोसते हैं। माँ-बाप या अन्य रिश्तों के प्रति इनमें पनप रहे तिरस्कार का वर्णन आज के साहित्य में बहुत प्रचुरता से होता है। ऐसे में बच्चों में माता-पिता के प्रति कर्तव्य-बोध और प्रेम-सम्मान को दर्शाती लघुकथाएँ किसी शीतल, सुगन्धित बयार की तरह मन प्रफ़ुल्लित कर देती है। पुष्करणा जी की इतनी सारी बेहतरीन लघुकथाओं में से इस श्रेणी के अन्तर्गत मुझे दो लघुकथाएँ नज़र आई; यथा-भविष्य निधि, और जीवन ।

‘जीवन’शीर्षकलघुकथामेंबेटियोंकोबेटोंसेकमतरनमानिए, ऐसे एक सन्देश के छुपे होने का भी अहसास मुझे हुआ। बस एक बात खुद भी एक बेटी होने के नाते मुझे खली, कि इसमें किसी बेटी को बेटा समझ कर पालने-पोसने की बात कही गई है। अपने आसपास यह बात हम लोग अक्सर बहुत सामान्य रूप से सुनते और कहते रहते हैं, परन्तु मुझे लगता है कि बेटी को ‘बेटी’ समझकर ही पालना चाहिए…बस उसे दिए जाने वाले अवसर किसी बेटे से कमतर नहों, फिर वो बेटी अपने माता-पिता को किसी ‘बेटे-सा’अहसासनहींकराएगी, बल्कि एक संतान द्वारा माँ-बाप के प्रति निभाए जाने वाले फ़र्ज़ को पूरा करने वाली सिर्फ़ एक औलाद होगी।

“कमाल कर दिया पापा ! आप जब हमें बेटा समझ कर ही पाल-पोस एवं पढ़ा-लिखा रहे हैं तो यक़ीन रखिए…आप निश्चिन्त हो जाइए।” प्रेरणा ने अपने माता-पिता के दुःख पर आशा का फ़ाहा रखा।

“हाँ पापा! दीदी ठीक कह रही हैं। आज लड़का-लड़की में अंतर नहीं है, बल्कि लड़कियाँ लड़कों से अधिक अपने दायित्व को समझती हैं…”

फ्भविष्यनिध्य िमें बूढ़े माँ-बाप की सेवा करते हुए बेटे को अहसास होता है कि कभी उसका भी ऐसा ही वक़्त आएगा,

‘भविष्य-निधि’में बूढ़े माँ-बाप की सेवा करते हुए बेटे को अहसास होता है कि कभी उसका भी ऐसा ही वक़्त आएगा,

जब उसे अपने बच्चों के सहारे और सेवा की ज़रूरत पड़ेगी। वह सोचता है कि यदि वह अभी से अपने बच्चों में ऐसे अच्छे संस्कार रोपेगा, तो उसका खुद का ही भविष्य सुरक्षित होगा।

रिश्ते भी अपने हर रंग-रूप में हमारे आसपास बिखरे होते हैं, कभी कुछ खट्टे, तो कभी कुछ मीठे से…। ऐसे ही खट्टे-मीठे से कुछ रिश्तों की कहानियाँ बुनी गई हैं इन कुछेक लघुकथाओं में- भँवर, जिसमें कुछ मीठे हो सकते रिश्तों के दरमियाँ पनप रही तल्खी है…।

‘समन्वय’ शीर्षक लघुकथा में सिर्फ़ एक ज़िन्दगी ही नहीं, बल्कि सात जन्मों के लिए बँधने वाले शादी के पवित्र रिश्ते का फ़ैसला उससे होने वाली लाभ-हानि का आकलन करने के पश्चात लिया जाता है।

शीशा दरक गया- ऐसे दो मित्रों के आपसी रिश्ते को बयान करता है, जिसमें एक मित्र तो अवसर पड़ने पर अपने मित्र की निस्वार्थ भाव से सहायता कर देता है, पर जब उसी मित्र को मदद की आवश्यकता होती है तो दूसरा मित्र साफ़ तौर पर मना तो नहीं करता, परन्तु उस मदद की वजह से उसे किन परेशानियों का सामना करना पड़ा, यह बात साफ़ तौर पर जता देता है। लघुकथा के मध्य में ही पाठकों को उसकी इस पीड़ा का अहसास हो जाता है:-

“तुम्हें भाभी को नाराज़ करके नहीं आना था। यह मेरा काम था…मैं अकेला ही आ जाता।” बहुत दुःखी मन से उसने स्वप्निल को कहा और सोचने लगा-“स्वप्निल वे दिन भूल गया जब मैं उसके साथ सैंकड़ों बार अपने व्यवसाय, घर-द्वार की चिन्ता किए बिना दो-दो, तीन-तीन दिन उसके साथ कामों के लिए आता-जाता रहा हूँ। इसके लिए कितनी बार पत्नी ने घर में झंझट-बखेड़ा खड़ा किया। मगर मैंने स्वप्निल से कभी इसकी चर्चा तक नहीं की। क्या यह प्यार, मित्रता, समर्पण, भावात्मक लगाव…सब कुछ एकतरफ़ा ही था? क्या यह स्वार्थ नहीं है? क्या यह सम्बन्ध इकहरा नहीं है?”

इस लघुकथा के माध्यम से पुष्करणा जी ने लगभग हर पाठक के मन की किसी न किसी ऐसी याद को ज़रूर छुआ होगा, जब हम तो किसी के लिए भावात्मक रूप से कुछ महसूस करते हुए अपना फ़र्ज़ निभा देते हैं, पर वक़्त पड़ने पर वही इंसान या तो हमसे कन्नी काट लेता है या फिर अपने किए बूँद भर कार्य के लिए गागर भर अहसान जता देता है।

‘नकलीचेहरा’ शीर्षक लघुकथा में हमारे-आपके, सबके जीवन में कभी न कभी खुल कर सामने आने वाली रिश्तों की कटु सच्चाई बड़ी सटीकता से दिखाई गई है। लघुकथा के मुख्य पात्र की पत्नी कैंसर से ग्रसित होकर मृत्यु-शय्या पर पड़ी अपने जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन रही होती है और ऐसे में जब वह अपने सगे-सम्बन्धियों के पास किसी सहायता की उम्मीद में जाता है, उसे हर जगह से निराशा हाथ लगती है। पत्नी की मृत्यु के पश्चात वही सब तथाकथित अपने लोग शोक जताने आ जाते हैं।

हमारी ज़िन्दगी के इन तमाम रिश्तों की पोल सी खोलती ये लघुकथाएँ कहीं न कहीं झकझोर देती हैं।

रिश्ते सिर्फ़ खून से ही नहीं बनते। हम स्वयं भी कई रिश्ते चुनते हैं। ये मन से बँधे रिश्ते कभी क्षणिक होते हैं तो कभी जीवनपर्यन्त चलते हैं। कई रिश्तों को तो हम कोई नाम भी नहीं दे सकते, वह या तो दर्द का रिश्ता होता है या इंसानियत का।

इंसान का इंसान से तो कई रिश्ते देखते हैं हम अक्सर, पर एक इंसान और एक मूक जानवर के प्यारे से रिश्ते को दर्शाया गया है-दायित्वबोध- में ।

दो छोटे बच्चों के बीच पनपे एक मासूम से रिश्ते की दास्तान है-सबक- जिसमें दो नन्हें बच्चों के बीच खेल-खेल में हुए झगड़े के कारण दोनो के परिवारवाले आपस में बैर-भाव पाल लेते हैं, जब कि वे बच्चे सब कुछ भूलभाल कर फिर एक ही रहते हैं। इस लघुकथा में माता-पिता को अपने बच्चों से अपनी ग़लती सुधारने की शिक्षा मिलती है।

“फिर भी क्या! झगड़ा तो हम दोनो का था। और हम दोनो ने आपस में कभी बोलना तक बन्द नहीं किया। हम दोनों तो हर रोज़ उसी तरह साथ-साथ खेलते हैं। तो फिर आप बड़े, बिना किसी झगड़े के आपस में बैर-भाव क्यों रखते हैं?”

बच्चे का यह मासूम, लेकिन कितना सार्थक और सटीक सवाल क्या हम सभी को अपने नज़रिये के बारे में एक बार फिर सोचने पर मजबूर नहीं कर देती?

‘माँ’शीर्षकलघुकथामेंट्रेन यात्रा में ठण्ड से बेतरह काँपते एक युवक को जब एक अनजान वृद्धा से ओढ़ने के लिए शॉल मिलती है, तो उसे उस वृद्धा में अपनी माँ नज़र आती है।

वह लगभग चौंकते हुए उठी,”अरे! तुम तो काँप रहे हो।” और उसने झट से सिरहाने रखी अपनी बड़ी सी शॉल निकाली और बहुत ही सहजता से उसकी ओर उछाल दी।

“ले, ओढ़ ले ! काफ़ी ठण्ड है बेटा।”

उसे लगा वह वृद्धा कोई और नहीं उसकी अपनी माँ है। फिर उसके जेहन में विचार कौंधा-“माँ,…माँ ही होती है। उसका कोई एक चेहरा नहीं होता।”

‘उपहार’ शीर्षक लघुकथा में एकगुरु-शिष्य का अनमोल रिश्ता है, जिसमें एक मेधावी छात्रा रंजना को उसके कोचिंग टीचर निर्मल बाबू उसकी सारी फ़ीस लौटा देते हैं, ताकि वह आगे पढ़ सके। सिर्फ़ इस लघुकथा में ही रंजना अपने गुरु के लिए श्रद्धा से नहीं भरती, बल्कि एक पाठक का मन भी समाज में मौजूद ऐसे अध्यापकों के लिए नतमस्तक हो जाता है।

“मैने तुम्हें दस महीने पढ़ाया…दो सौ रुपए की दर से, दो हज़ार हुए…जो रुपये तुमने मुझे दिए…वही नोट ज़्यों के त्यों हैं…। मैं टीचर होने से पूर्व एक आदमी हूँ…पारिवारिक आदमी। मैने गरीबी झेली है…मैं ऐसे बच्चों का दुःख दर्द समझता हूँ…। हाँ, इन पैसों से तुम आगे भी पढ़ाई जारी रख सकती हो…।”

आत्मबल हो तो हम किसी भी परिस्थिति से निपतने, उससे साहसपूर्वक जूझ सकते हैं। कुछ ऐसी ही प्रेरक भावनाओं से ओतप्रोत लघुकथाएँ भी पुष्करणा जी की सशक्त कलम से निकली हैं। मन में ऐसा ही साहस जगाती लघुकथा है-विवशता के बावजूद- जिसमें ट्रेन में कुछ टुच्चे लोगों की अवांछनीय हरकतों को कुछ देर तक निरीहतापूर्वक बर्दाश्त करते रहने के बाद एक युवती किस प्रकार महज अपने आत्मबल के दम पर उनका सशक्त विरोध करके पूरी स्थिति ही पलट देती है, यह निःसन्देह क़ाबिले-तारीफ़ है। पीड़ित युवती में किस तरह बदलाव आता है, ये देखिए:-

धीरे धीरे उस युवती का चेहरा सख़्त होने लगा। उसके मन में यह बात आई कि मैं क्या कुत्तों से भी गई गुज़री हूँ?

यह विचार आते-आतेउसका चेहरा धीरे-धीरे तमतमा उठा और उसने आव देखा न ताव, अपनी पूरी शक्ति से उस थुलथुल व्यक्ति को ऐसा धक्का दिया कि वह बर्थ से नीचे जा गिरा। और वह दहाड़ी,”कमीने! लगता है तुम किसी इन्सान की नहीं, अन्य जीव की सन्तान हो।”

वह इस हमले के लिए तैयार नहीं था। इतने में गाड़ी में चल रहे बन्दूकधारी सिपाही भी आ गए, और उस कोच में बैठे यात्री भी सक्रिय हो उठे।

यही आत्मबल हम -बदलते प्रतिबिम्ब- के रिक्शाचालक में देखते हैं जो किसी भी हाल में अपना रिक्शा चलाने का रोजगार जारी रखने का निर्णय लेता है, तमाम विषमताओं के बावजूद…।

लौटते वक्त उसने निर्णय कर लिया था कि जब दया और विवशता की बैसाखियों पर ही ज़िंदा रहना है, तो फिर भीख मांगना ही क्या बुरा है। किन्तु सोच के इस क्रम में उसका पौरुष जाग उठा था और तत्काल लिए निर्णय के लिए उसने अपने को बहुत धिक्कारा था। सोचते-सोचते वह एकाएक चीख-सा उठा,”नहीं ! मैं दया और विवशता के सहारे नहीं चलूँगा, मैं लडूँगा, संघर्ष करूँगा…इसजीवनसे। आज के बाद मैं बिना अपना अधिकार लिए किसी को नहीं छोडूंगा ।”इस चीख के साथ ही वह एकाएक उठ कर बैठ गया था और उसकी मुट्ठियाँ स्वत: भिंच गई थी । इस समय वह अपने को एकदम हल्का महसूस कर रहा था…बिलकुल तनाव-मुक्त । उसके चेहरे पर संतोष के भाव उभर आए थे ।

‘इक्कीसवीं सदी’ शीर्षक लघुकथा में भी एक युवा इंजीनियर किस प्रकार भ्रष्टाचार से लड़ने का संकल्प लेता है, यह बहुत प्रेरणास्पद है।

अग्रज ने कहा,”देखो ! अब देश में सभी बेईमान हो गए हैं, तो तुम ईमानदार रहकर ही क्या कर लोगे !”

प्रत्युत्तर में इंजीनियर ने बहुत दृढ़ निश्चयी होते हुए कहा, “भैया ! मैं और तो कुछ नहीं कर सकता, किन्तु बेईमानी की इतनी लम्बी गिनती में कम-से-कम एक अपनी गिनती और तो नहीं जुड़ने दूँगा।”

अपना संकल्प व्यक्त करते हुए वह गौरव का अनुभव कर रहा था ।

‘भीतर की आग’ में भी सुदीप नामक पत्रकार अपने आदर्शों से समझौता किए बग़ैर भ्रष्टाचार और दबावों से जूझने का निर्णय लेता है। इस लघुकथा मेंहमलेखक के अन्दर के जुझारूपन और स्वाभिमान की भी थोड़ी सी आग देखते हैं । आज हमारा समाज इस कदर भ्रष्टाचार की दलदल में गले तक डूबा हुआ है कि जिस कलम की ताकत से बड़ी बड़ी तानाशाही का तख्ता पलटा जा सकता है, आज वही कलम चंद नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के हाथों बिक कर किस तरह बेबस कर दी जाती है। ऐसे में सुदीप के माध्यम से पुष्करणा जी ने उन मुट्ठी भर ईमानदार कलम के सिपाहियों में एक अलख जगाने की बहुत अच्छी और सराहनीय कोशिश की है।

‘दिया और तूफ़ान’ में ससुराल में प्रताड़ित होकर माँ के पास आई मेघना अपनी भीषण अस्वस्थता के बावजूद एक दिये को तेज़ हवा में संघर्ष करते देख खुद भी अपने बच्चों के लिए लड़ने का साहस अपने अंदर संजो लेती है।

-दिया जलाया ही था कि ज़ोर से हवा चलने लगी…। मेघना की दृष्टि दीये पर जाकर केन्द्रित हो गई…। वह देखने लगी कि इतनी तेज़ हवा में दीया अपना अस्तित्व बचाने हेतु किस तरह से संघर्ष कर रहा है…। उसे मानो संघर्ष का गुरू-मंत्र मिल गया हो।

हम अक्सर अपने अधिकारों के प्रति तो बहुत जागरुक रहते हैं परन्तु अपने कर्तव्यों के प्रति बेहद उदासीन होते हैं। फिर चाहे वो कर्तव्य सामाजिक हों या पारिवारिक, पर जब यह उदासीनता एक सषक्त कलम के माध्यम से हमारे सामने आइना रखती है तो बहुत करारा झटका देती है।

‘ख़ुदगर्ज़’  शीर्षक लघुकथा में एक व्यक्ति अपने बच्चों पर गलत असर पड़ने के बारे में फ़िक्रमन्द होकर उनके सामने तो ध्रूमपान नहीं करता, पर वही शख़्स अपने मित्र के यहाँ उसके बच्चों की मौजूदगी में भी सिगरेट पीने के वक़्त एक बार भी नहीं सोचता कि उसके इस आचरण का उन बच्चों पर भी बुरा असर पड़ सकता है। ज़रा देखिए यह किस प्रकार हमारे सामने एक सवाल प्रस्तुत करती है-

उनकी ओर संकेत करते हुए पहले मित्र ने दूसरे को उत्तर दिया,”क्या इन बच्चों को तुम अपने बच्चों-सा नहीं समझते?”

इस उत्तर ने दूसरे को जड़-सा कर दिया।

यह लघुकथा हम सब में अचेतन में ही व्याप्त अपने-पराये की भावना को बड़ी खूबी से प्रदर्शित कर देती है।

ऐसा ही एक करारा तमाचा पड़ता है-उच्छ्लन- शीर्षक लघुकथा के माध्यम से,जिसमें आधुनिकता की अंधी दौड़ में लड़खड़ा रहे एक युवक को मानो होश तब आता है, जब वह अपनी ही बहन केसाथ किसी अन्य युवक के द्वारा वैसा ही व्यवहार करते हुए देखता है, जैसा वह खुद किसी अन्य युवती के साथ करने का इच्छुक था। इस लघुकथा की अंतिम पंक्ति कुछ देर के लिए पाठक को स्तब्ध-सा करते हुए बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है…”तो क्या हुआ? मैं भी किसी की बहन हूँ, डॉर्लिंग…।”

 

अपने आसपास के जाने-अनजाने लोगों के प्रति हमारा भी कुछ नैतिक कर्तव्य होता है, पर अपने अन्दर के भय के चलते हम उनसे मुँह ही मोड़े रहते हैं। चाहे अन्दर ही अन्दर हमें कितनी भी ग्लानि क्यों न महसूस हो, पर आगे बढ़ कर असामाजिक तत्वों का विरोध करने का साहस हममें नहीं होता। कुछ ऐसी ही कहानी है- नपुंसक- की, जिसमें ट्रेन के डिब्बे में छेड़छाड़ का शिकार हुई महिला की मदद करने कोई आगे नहीं आता।

हमारे समाज में विकास करने का दावा करने वाली सरकारी योजनाएँ और कार्य की असलियत क्या होती है, इस पर से पर्दा उठाती लघुकथा है-परिभाषा- जिसमें बहुत सारे सरकारी स्कूल किस तरह बहुधा सिर्फ़ सरकारी दस्तावेज़ों पर ही चलते हैं, यह बहुत सशक्तता से दर्शाया गया है।

उन्होंने अपने रिश्तेदार से पूछा,”गाँव के दूर वृक्ष के नीचे अकेली यह झोपड़ी किसकी है?”

उत्तर में उन्होंने कहा,”सुनते हैं, यह स्कूल है।”

“कितने बच्चे पढ़ते होंगे इसमें?”

“बच्चे! यही कोई चार-छह बच्चे प्रतिदिन आते हैं, और कुछ देर इधर-उधर खेल-वेल कर अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं।”

“यहाँ के मास्टर साहेब कौन हैं?”

“मास्टर साहेब को तो कभी देखा ही नहीं। तो फिर कैसे पता चलता कि वे कौन हैं?”

“फिर, यह कैसा स्कूल है?”

“सरकारी है!”

इस लघुकथा का सबसे सटीक अन्त मेरे विचार से यही आखिरी डॉयलाग हो सकता था, पर पुष्करणा जी ने इसका अन्त इस पंक्ति से किया है- शिक्षा पदाधिकारी सरकारी स्कूल की परिभाषा सुन कर अवाक् रह गए।

सामाजिक असमानता पर लोगों की कथनी और करनी में हम प्रायः बहुत अन्तर देखते हैं। इसी बात को परिलक्षित किया गया है-हाथी के दाँत- शीर्षक लघुकथा में।

यही सत्य एक और लघुकथा में दिखाया गया है-बदबू-जिसमें एक निम्न जाति वाले से दोस्ती रखने में तो पात्र को कोई एतराज़ नहीं, परन्तु उससे रिश्तेदारी की बात सोचना भी उसे अत्यन्त अपमानजनक प्रतीत होता है। इस एक संवाद ने पूरी मानसिकता की पोल खोल दी है-

“क्या बकते हो तुम! अरे, कभी यह तो सोचा होता…कहाँ हम उच्च जाति के, और कहाँ तुम ! दोस्ती का हर्गिज़ यह अर्थ तो नहीं कि तुम हमारी इज्ज़त से ही खेलने लगो ।”

पुष्करणा जी मानव मन के भी सूक्ष्म विश्लेषक हैं। ‘रंग जम गया’ शीर्षक लघुकथा में एक पहलवान लड़ने की इच्छा न होते हुए भी महज अपनी हँसी उड़ने के भय से मैदान छोड़कर नहीं हट पाता। परन्तु जैसे ही उसे एक अन्य युवक के बीच-बचाव के कारण सम्मानपूर्वक लड़ाई छोड़ने का मौका मिलता है, वह झट से मान जाता है।बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा-वाली कहावत चरितार्थ हो गई। पहलवान भी जैसे चाह रहा हो। पीछे हटते हुए बोला,”तुम बीच में न आ जाते तो आज इसकी ख़ैर नहीं थी।”

हमारा समाज किस प्रकार झूठ के आवरण में छिपे सत्य को देख कर भी अनदेखा कर देता है, उसे बड़ी ही सहजता से-बोफ़ोर्स काण्ड-शीर्षक लघुकथा में दर्शाया गया है। यद्यपि मेरे विचार से इस लघुकथा का शीर्षक कथ्य के हिसाब से कुछ और होता तो ज़्यादा अच्छा होता।

हम अक्सर महसूस करते हैं कि समाज बदल रहा, मंथर गति से ही सही, परन्तु लोगों की सोच भी बदल रही है…और सही दिशा में बदलनी चाहिए भी। एक सजग इंसान की तरह पुष्करणा जी ने भी इस बदलाव को महसूस किया तभी तो उन्होंने ऐसी ही सार्थक पहल की प्रेरणा देती लघुकथा रची है-कुमुदिनी के फूल- जहाँ एक बेटा अपनी विधवा माँ के त्यागों के नीचे कहीं गहरे दब गई उसकी एक इच्छा का सम्मान करते हुए उसके पुनर्विवाह की पहल करता है।

हमारे भारतीय समाज में बच्चों के प्रति दायित्व निर्वाह करते हुए किसी विधुर का पुनर्विवाह करना बहुत सहजता से स्वीकार्य है, वहीं अगर एक स्त्री समस्त कर्तव्यों और मर्यादाओं का पालन करते हुए ऐसा सोचने का साहस भी करती है ,तो उसे चारित्रिक रूप से गिरा हुआ मान लिया जाता है। ऐसे में पुष्करणा जी की यह लघुकथा एक ठण्डी बयार की तरह मन को सहला जाती है। समाज की सोच को अपनी कलम की धार से एक नई दिशा देना एक साहित्यकार का प्रथम कर्तव्य होता है, जिसमें अपनी ऐसी लघुकथाओं द्वारा पुष्करणा जी पूरी तौर से खरे उतरे हैं।

एक पुरानी कहावत है- रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई-कुछ-कुछ इसी की याद दिलाती लघुकथा है, बाहर लौटते वक़्त उन्हें अपने ऊपर बड़ी कोफ़्त हो रही थी…नवाबी ख़त्म हो गई मगर फिर भी रुतबा अभी बाकी है…अब चाटो इस रुतबे को और मिटाओ अपनी भूख ।

कभी-कभी परोपकार करने की अपनी स्वभावगत विशेषता के चलते यदि हम किसी का भला करते भी हैं, तो समाज में दिनो-दिन बढ़ती जा रही आपराधिक मनोवृत्ति हमको कितनी दुविधा में डाल देती है, इसका बहुत सशक्त निरूपण किया गया है-उधेड़बुन- में, जिसमें मानवती बारिश में भीग रहे एक अधेड़ व्यक्ति को दयावश घर के बरामदे में बिठा कर चाय-नाश्ता तो करवाती है और कुछ पुराने वस्त्र देती है, ताकि वह ठण्ड से बच सके, परन्तु साथ-ही-साथ घर में अकेली होने के कारण उसे उस अधेड़ से डर भी लगता है। अन्ततः उसे विदा करके ही वह चैन की साँस ले पाती है। लगातार पाठकों को अपने में बाँधे रहने वाली यह लघुकथा एक बार फिर पुष्करणा जी की सूक्ष्म विवेचन दृष्टि की परिचायक है।

कुछ अन्य लघुकथाएँ जो विभिन्न मुद्दों का निर्वहन बड़ी कुशलतापूर्वक करती हैं, उनके नाम कुछ इस प्रकार हैं- वापसी, श्रद्धाजलि, मरुस्थल, सज़ा, टेबल-टॉक, ऊँचाई, महानता, बदलती हवा के साथ, बेबसी, इबादत, बदलता युग, सिला फ़र्ज़, पुरस्कार, रंग, सिफ़ारिश, मास्क लगे चेहरे, लाज, रक्तबीज, काँटे ही काँटे, परिस्थिति, कुंजी, आतंक, हित, दरिद्र, नई पीढ़ी, ज़मीन की शक्ति, स्वाभिमान, काठ की हाँडी, बलि का बकरा, जयचंद, पिघलती बर्फ़, ज़मीन से जुड़ कर, चूक, आकाश छूते हौसले, आदि ।

सही दिशा- शीर्षक लघुकथा समाज के सामने साम्प्रदायिकता से सम्बन्धित एक बहुत बड़ा सवाल उठाती है, जिसका जवाब शायद जानता हर कोई है, पर वक़्त आने पर मानता नहीं। कोई भी संवेदनशील पाठक इसे पढ़ कर कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य कर देगा।

…सहायतार्थ सेना आई। टुकड़ियों ने मलबे हटा कर लाशें निकालने के क्रम में ही उस डिब्बे के मलबे को हटाया। देखा- एक ब्राह्मण महाराज लुढ़के पड़े थे, उनके मुँह के ऊपर ही हरिजन का मुँह और बगल में चिर-निद्रा में सोये मौलवी साहब का दाहिना हाथ ब्राह्मण महाराज के दाहिने हाथ में जंजीर की भाँति गुँथा हुआ था।

सबका मिला-जुला रक्त, जाति एवं साम्प्रदायिकता की रूढ़ियों को मुँह चिढ़ता हुआ ठोस हो चुका था।

आज के युग में इंसान किस तरह सिर्फ़ अपना मतलब साधता है और उसके बाद गिरगिट की तरह रंग बदल लेता है, यह हम में से हर कोई कभी-न-कभी अनुभव कर ही चुका है। इसी को दर्शाती लघुकथा है-स्वार्थी- जिसमें अपना काम निकलने तक एक व्यक्ति अपने मित्र का समय तो बड़ी बेशर्मी से बर्बाद करता हुआ उसका काम भी बिगड़वा देता है, पर जब वही मित्र उसका काम हो जाने के बाद उससे रुकने का अनुरोध करता है, तो वह अपना समय बर्बाद होने की बात कहता हुआ बड़ी आसानी से अपना पल्ला झड़ लेता है।

गिरगिटी रंग में रंगी आज की राजनीति में भ्रष्टाचार और अपराधी साँठ-गाँठ का एक अनुपम उदाहरण है-साँप और छुछुन्दर-जिसमें एक नेता द्वारा पाला गया अपराधी भस्मासुर की तरह उसे ही बर्बाद करने पर तुल जाता है और नेता को ही मजबूर होकर उसकी बात माननी पड़ती है।

भ्रष्टाचार सिर्फ़ राजनीति में ही नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी घुसपैठ बना चुका है। ‘छल-छद्म ’शीर्षक लघुकथा में मनुश्री इसी की झलक है, जो अपनी परिचित एक फ़र्ज़ी साहित्यिक संस्था से मिली नकली पुरस्कार राशि उसी संस्था को लौटाने का शिग़ूफ़ा छोड़ के खुद की उन्नति के रास्ते भी खोल लेती है। साहित्य-जगत में अब ऐसी घटनाएँ बहुत आम होती जा रही, जिसने निःसन्देह पुष्करणा जी जैसे साहित्य-साधक को इतना झकझोरा कि एक सशक्त लघुकथा का जन्म हुआ। “संस्था के पास इतना पैसा ही नहीं, वह तो मात्र दिखावा था। इससे मैं राज्यपाल की दृष्टि में एक बड़े साहित्यकार के रूप में आ गई…। सरकारी सम्मान मिलने की जब सूची बनेगी तो राज्यपाल तथा अन्य लोग मेरे नाम की सिफ़ारिश कर सकते हैं।” बेटी की दूर दृष्टि पर पिता को गर्व हो आया। अब उनका क्रोध काफ़ूर हो चुका था और उसका स्थान मुस्कान लेती जा रही थी।

सतीशराज पुष्करणा जी की मौजूदा लघुकथाओं की यदि मैं एक संक्षिप्त विवेचना करना चाहूँ तो हम यही पाएँगे कि उनकी लघुकथाएँ हमारे हृदय के किसी न किसी हिस्से को छूती ज़रूर हैं। उनका रचना-कार्य ज़िन्दगी के महज किसी एक पहलू को स्पर्श नहीं करता, वरन उन्होंने हर विषय पर अपनी कलम की धार पैनी की है। फिर चाहे वो राजनीति हो या सामाजिक भेदभाव, रिश्तों में बसा स्वार्थ हो या गहरा अटल विश्वास, विभिन्न परिस्थितियों से उपजी बेबसी हो या फिर इंसान का आत्मबल, हर किसी का बहुत सटीक वर्णन किया है उन्होंने। इंसानी स्वभाव और उसके मनोविज्ञान की भी बहुत गहरी और सूक्ष्म विश्लेषण-क्षमता पुष्करणा जी की लघुकथाओं में परिलक्षित होती है। कुछ लघुकथाएँ सम्भवतः अपने रचनाकाल की वजह से पुरानी विषय-वस्तु पर आधारित महसूस होती हैं, परन्तु फिर भी उनकी सामयिकता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि पुष्करणा जी नए युग के रंगों से अनजान हों। उनकी कई सारी लघुकथाएँ इस नए ज़माने की विडम्बनाओं को भी हमारे सामने उतनी ही सटीकता और गहराई से प्रस्तुत करती हैं।

कुल मिला कर हम सतीशराज पुष्करणा जी को एक ऐसे समर्पित लघुकथाकार की श्रेणी में रख सकते हैं जिन्होंने कथ्य के तौर पर ज़्यादा नए प्रयोग न करने के बावजूद अपनी रचनात्मकता के साथ समझौता नहीं किया है। कई बार एक बेहद मामूली- सी लगने वाली बात पर भी उन्होंने अपने कसे हुए शिल्प-भाषा-शैली के माध्यम से एक सार्थक लघुकथा हमारे सम्मुख पेश कर दी है, जिसके लिए वे निःसन्देह बधाई के पात्र हैं। इस सन्दर्भ में मुझे उनकी `स्वभाव ’शीर्षक लघुकथा का जिक्र करना उचित प्रतीत होता है, जिसमे लगभग हर इंसान में मौजूद प्रशंसा की चाह का बहुत सहज ढंग से वर्णन किया गया है । बातचीत में प्रयुक्त संवाद बिलकुल वैसे हैं जैसे हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं । पुष्करणा जी ने अपने संवादों की इस सहजता को बरकरार रखने के लिए अंगरेजी के शब्दों का भी प्रयोग करने से गुरेज़ नहीं किया है…। जैसे कि पति-पत्नी के बीच के ये कुछ संवाद:-

अभी बातचीत चल ही रही थी कि ललित बाबू की बीवी ने अपने पति को संबोधित करते हुए कहा, “ज़रामेरे क्लाइंट की एक एप्लीकेशन तो लिख दीजिए, इतने में मैं कोर्ट जाने की तैयारी कर लेती हूँ ।”

पुष्करणा जी की अधिकतर लघुकथाएँ इसी तरह अपने पाठकों के सामने कभी प्रत्यक्ष, तो कभी परोक्ष रूप से कोई न कोई ऐसा सवाल खड़ा कर देता है, जिस पर वह कुछ सोचने पर मजबूर हो जाता है । बस कुछेक लघुकथाएँ थोड़ी सामान्य रचनाएँ कही जा सकती हैं, पर उनकी संख्या नगण्य ही है । उनका लघुकथा संसार बहुत विस्तृत कहा जा सकता है ।

हाँ, यदि वे नई और आधुनिक दुनिया के कुछ नए कथ्य और विषय भी थोड़ा अधिक चुने तो उनके इस अनूठे रचना-संसार में एक पाठक के तौर पर मुझे जो थोड़ी सी कमी खली, वह दूर हो जाएगी…इस बात में लेशमात्र भी संशय नहीं…।

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( सम्पादित रूप)

 

 

 

 

 

 

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