जून-2017

मेरी पसन्दसमकालीन लघुकथा में यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति     Posted: April 1, 2016

 

   हिन्दी लघुकथा का विस्तृत और बहुआयामी इतिहास हमें इसकी विकासमान परम्परा से परिचित कराता है जिसमें अनेकानेक लघुकथाकारों ने अपनी अदभुत लघुकथाओं से हिन्दी कथासाहित्य की श्री वृ​द्धि की है।आधुनिक हिन्दी कथासाहित्य में भारतेंन्दु हरिश्चन्द्र और प्रेमचन्द  से लेकर आज के सैंकड़ों लघुकथाकार इस विकास-यात्रा में मील के पत्थर की तरह अवस्थित हैं।इन लघुकथाकारों ने अपनी उत्कृष्ट लघुकथाओं के माध्यम से अपने समय समाज और संस्कृति के प्रति  न केवल सजगता का परिचय दिया है; बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति जनचेतना को जगाने का कार्य भी बखूबी किया है।तभी तो हिन्दी में विविध विषयों जैसे सामाजिक विषमता ,भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था और सांस्कृतिक एकता व सहिष्णुता जैसे ज्वलंत विषयों को लेकर उत्कृष्ट लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं।ऐसे अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ मुझे इतनी प्रिय हैं कि मैं नगर के स्कूलों के छात्रों द्वारा पोस्टर लेखन प्रतियोगिता में इन लघुकथाओं का उपयोग करता रहता हूँ ।इन्हीं पसंदीदा लघुकथाओं में से आज मैं दो महत्त्वपूर्ण लघुकथाकारों की एक-एक रचना यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा जो आज के संदर्भ में मुझे बहुत मार्मिक प्रभावशाली और प्रासंगिक लग रही हैं ।पहली लघुकथा है वरिष्ठ व्यंग्यकार व कथाकार डा. शंकर पुणतांबेकर की आम आदमी और दूसरी  लघुकथा वरिष्ठ कथाकार व हाइकुकार श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की धर्मनिरपेक्ष।

इन दोनों रचनाओं में समकालीन यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति हुई है।इन लघुकथाओं में अपना वर्तमान धड़क रहा है।दोनों कथाकारों की व्यापक दृष्टि और गहरी संवेदनाओं से जुड़ी ये दोनों लघुकथाएँ हमारे अंतस् को झकझोर कर रख देती हैं और हमें कुछ देर ठहर कर सोचने को विवश करती हैं। आम आदमी एक प्रतीकात्मक लघुकथा है ,जिसमें हमारे देश में आजादी के बाद से लेकर अब तक लोकतंत्र के नाम से चल रहे सुविधाभोगी एवं महत्वाकांक्षी वर्ग के प्रपंचों का यथार्थ व्यंग्यपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है । यह वर्ग अपने स्वार्थ के लिए भोलीभाली आम जनता को कभी देशभक्ति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर कभी भाषा या जाति या किसी अन्य विषय पर भावावेश में बहा कर अपना उल्लू सीधा करता रहता है।

इस लघुकथा में नदी के बीच में यात्रियों से भरी नाव पर एक संकट आता है तब नाव के लिए त्याग और समर्पण हेतु सभी स्वार्थी  और सुविधाभोगी तत्त्व  तो पीछे दुबक जाते हैं और अपने अपने तर्कों से आम आदमी के भीतर देशभक्ति भड़काकर नाव की रक्षा के लिए मर मिटने का झूठा जोश भरते हैं और इसके फलस्वरूप वह भोला भाला आम आदमी नदी में कूद जाता है और वे अपने आपको बचा लेते हैं।निस्संदेह यह अत्यंत सारगर्भित और उद्देश्यपूर्ण रचना है।

इसी तरह” हिमांशु” जी की लघुकथा धर्मनिरपेक्ष चुटीले व्यंग्य से लैस एक मार्मिक कथाबिम्ब है।यह लघुकथा हमारे सामाजिक जीवन में धार्मिक घृणा से उपज रही  हिंसा और अमानवीयता के अँधेरों का खुलासा करती है।इस लघुकथा के जरिये हिमांशु जी समाज में बढ़ रही कट्टरता उन्माद और आतंकवाद की विकराल स्थिति और उसके खतरे को रेखांकित करते हैं और इसके खिलाफ अपना व्यंग्यभरा आक्रोश व्यक्त करते हैं।आज जब ये क्रूर शक्तियां सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता के हमारे पुरातन ढाँचे को गिराने पर उतारू हो गई हैं और मनुष्य  बर्बर राक्षस की तरह व्यवहार करने लगा है तब ऐसी लघुकथाएँ क्रांतिकारी कबीर की निर्भीक परम्परा को आगे बढ़ाती जान पड़ती हैं जो आज की जरूरत भी है।वास्तव में ये दोनों लघुकथाएँ अपने समय की ध्वनियाँ हैं।दोनों कथाओं में जो अर्थविस्फोट होता है उसकी गूँज पाठक के दिलोदिमाग को झिंझोड़ देती है।इसलिए हम इन्हें सचेत लघुकथाएँ भी कह सकते हैं।इनकी भाषा की कसावट इतनी पुख्ता है कि जिसमें न अनावश्यक वाक्यस्फीति  निर्मित होती है न ही कहीं कृत्रिमता मिलती है और न कथाक्रम में कोई झोल नजर आता है।इन दोनों रचनाओं के कथानक स्वाभाविक प्रवाह लिये हुए हैं।कहने का तात्पर्य यह है कि इन दोनों लघुकथाओं का अभीष्ट वर्तमान सामाजिक विसंगतियों को उजागर करते हुए मनुष्यता में गहरी और अटूट आस्था व्यक्त करना है।

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1-आम आदमी

डा. शंकर पुणतांबेकर

नाव चली जा रही थी।मझधार में नाविक ने कहा नाव में बोझ ज्यादा है कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छानहीं तो नाव डूब जाएगी।

अब कम हो जाए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते जो जानते थे उनके लिए भी परले पार जाना खेल नहीं था।

नाव में सभी प्रकार के लोग थे  डाक्टरअफसरवकीलव्यापारीउद्योगपतिपुजारीनेता के अलावा आम आदमी ।डाक्टरवकीलव्यापारी ये सभी चाहते थे कि आदमी पानी में कूद जाए।वह तैर कर निकल ही जाएगा।वह तैर कर पार कर भी सकता है लेकिन हम नहीं।

उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहातो उसने मना कर दिया।बोला मैं जब डूबने को हो जाता हूं तो आप में से कौन मेरी मदद को दौड़ता है;जो मैं आपकी बात मानूँ ?

जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं मानातो ये लोग नेता के पास गएजो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था।इन्होंने सबकुछ नेता को सुनाने के बाद कहा आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगातो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे।

नेता ने कहा नहींनहीं ऐसा करना भूल होगी आम आदमी के साथ अन्याय होगा।मैं देखता हूँ उसे।मैं भाषण देता हूं।तुम लोग भी उसके साथ सुनो।

नेता ने जोशीला भाषण दिया जिसमें राष्ट्र देश इतिहास परम्परा की गाथा गाते हुएदेश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ ऊंचा करके कहा हम मर मिटेंगे लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे —नहीं डूबने देंगे  —नहीं डूबने देंगे —

यह सुन कर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी में कूद पड़ा ।

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2-धर्मनिरपेक्ष

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

शहर में दंगा हो गया था।घर जलाए  जा रहे थे।छोटे बच्चों को भालों की नोक पर उछाला जा रहा था।

वे दोनों चौराहे पर निकल आए।आज से पहले उन्होंने एकदूसरे को देखा न था।उनकी आँखों में खून उतर आया।उनके धर्म अलग-अलग थे।

पहले ने दूसरे को माँ की गाली दी दूसरे ने पहले को बहिन की गाली देकर धमकाया।दोनों ने अपनेअपने छुरे निकाल लिए।हड्डी को चिचोड़ता पास में खड़ा कुत्ता गुर्रा उठा।वे दोनों एक दूसरे को जान से मारने की धमकी दे रहे थे।हड्डी छोड़कर कुत्ता उनकी ओर देखने लगा।उन्होंने हाथ तौलकर एक दूसरे पर छुरे से वार किया।दोनों छटपटाकर वहीं गिर पड़े।जमीन खून से भीग गई।

कुत्ते ने पास आकर उन्हें सूँघा।कान फड़फड़ाए।बारीबारी से दोनों के ऊपर पेशाब किया और फिर सूखी हड्डी चबाने में लग गया।

-0- sameep395@gmail.com]

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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