जुलाई -2018

मेरी पसन्दसमाज के दर्पण में झाँकती लघुकथाएँ     Posted: May 1, 2018

लघुकथा जैसी प्रभावशाली विधा से मेरी पहचान बाल्यकाल से ही हो गई थी | वास्तव में पिता की गोद में बैठ कर सोने से पहले प्रतिदिन एक नई कथा सुनना बचपन का सब से सुखद पल होता था| ज्ञानी पिता पुरातन जातक कथाएँ, हितोपदेश,पंचतंत्र आदि से चुन-चुन कर कथाएँ सुनाया करते थे और अंत में हमसे ही पूछते थे कि- आज क्या सीखा| उस समय की पढ़ी और सुनी लघुकथाएँ आज भी जीवन के हर मोड़ पर, हर पड़ाव पर प्रकाश स्तम्भ की तरह मार्ग प्रशस्त करती हैं | जीवन पथ पर चलते-चलते अनगिन लोक कथाओं से परिचय हुआ| इन लोक कथाओं पर आधारित कई लघुनाटक रंगमंच एवं रेडियो के माध्यम से प्रस्तुत करने का सुअवसर भी मिला| अत: यह विधा तो जीवन घुट्टी की तरह पालन- पोषण में साथ ही रही|

अब समय बदल गया है|  साथ ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी आज की पीढ़ी को सम्मोहित कर दिया है| लोग अच्छे साहित्य को न पढ़ते हैं, न उन्हें उनकी जानकारी है| यह स्थिति शोचनीय हो गई है| ऐसी परिस्थतियों में लघुकथा अत्यंत उपयोगी विधा है क्योंकि यह विधा बहुत ही सीमित शब्दों में जीवन से जुड़े तथ्यों, समकालीन एवं मनोरंजन के विषयों पर बहुत ही सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत करने का एक सशक्त माध्यम है| लघुकथा केवल अपने कलेवर के कारण ही पाठक के साथ सीधा संवाद नहीं बनाती है अपितु लघु आकार में होते हुए भी यह एक संवेदनशील पाठक के हृदय में कहीं गहरे उतर जाती है और उसके बाद पाठक उसी वातावरण में कुछ पल डूबता-उतराता रहता है| लघुकथा किसी विशेष पलों में उपजे भाव, आस-पास में घटी घटना विशेष, प्रकृति का कोई मनभावन कार्यकलाप या सामाजिक विसंगतियों को सधे हुए शिल्प में तराशने की एक प्रभावशाली अभिव्यक्ति है| पाठक के मन मस्तिष्क को उद्वेलित करना, उसकी अंतरात्मा में घर बना लेना अथवा यूँ कहें कि अंत तक आते –आते कौतूहल बनाए रखते हुए शब्द कौशल की सहायता से या संवादों के माध्यम से पाठक को स्तब्ध कर देना एक अच्छी लघुकथा का मूल तत्त्व है|

यूँ तो बचपन से सुनी/पढ़ी लघुकथाओं का अभी तक जीवन में प्रभाव है, किन्तु वर्तमान समय में इस विधा में समर्पित रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ कर इस विधा के महत्व और प्रभाव से दूर नहीं रहा जा सकता| नित्य कुछ अच्छा साहित्य पढ़ना मेरा स्वभाव है अत: पिछले कई वर्षों से बहुत से लघुकथाकारों की रचनाओं को पढ़ा है| लघुकथा.कॉम के सभी अंकों तथा गद्यकोश में प्रकाशित लघुकथाकारों में से कुछ नाम विशेष यहाँ उद्धृत करना चाहूँगी| सर्वश्री रमेश बत्रा सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, बलराम अग्रवाल,श्याम सुन्दर अग्रवाल ,  डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति, डॉ कमल चोपड़ा, सुभाष नीरव, डॉ सतीशराज पुष्करणा, माधव नागदा,प्रियंका गुप्ता, भावना सक्सेना आदि विशिष्ट रचनाकारों की कालजयी रचनाएँ मन के किसी कोने में घर करके बैठ गई हैं| प्रसन्नता इस बात की है कि इनमें से कुछ रचनाओं पर लघु फिल्में और वीडियो भी बनाए गए हैं| इसके साथ ही अन्य सभी लघुकथाकार सराहना के पात्र हैं जिनका नाम मैं यहाँ उद्धृत नहीं कर पाई| अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सआदत हसन मण्टो खलील जिब्रान, ओ हेनरी, सआदत हसन मंटो ने लघुकथा को साहित्य में एक विशिष्ट स्थान पर स्थापित किया है हिन्दी साहित्य पर दृष्टि डालें तो मुंशी प्रेमचंद, विष्णु प्रभाकर , जानकी वल्लभ शास्त्री , डॉ शंकर पुणताम्बेकर जैसे दिग्गज रचनाकारों ने लघुकथा को नए आयाम दिए हैं | वर्तमान समय में अनेक पत्रिकाएँ लघुकथा के प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अनेक लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं, जो लघुकथा की लोकप्रियता के परिचायक हैं।

लघुकथा के आकार एवं शिल्प पर दृष्टि डालें तो विशिष्ट बात यह है कि आकार में लघु होते हुए भी यह ‘सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर- लोकोक्ति को अक्षरश: चरितार्थ करती है| इस के पात्र अक्सर हमारे आस-पास के परिवेश से जुड़े होते हैं इसी लिए यह अधिक पठनीय और अपनी सी लगती है| लघुकथाएँ मानव मूल्‍यों की जीवन्‍त तस्‍वीरें प्रस्‍तुत करती हैं। छोटी होते हुए भी ये कथाएँ अपने आप में कल्‍पना का विस्‍तार समेटे हुए होती है कि पाठको को तनिक भर में विषय की गहराई तक पहुँचा देती है। यही कारण है कि लघुकथा अन्‍य विधाओं से अलग स्‍थान बना चुकी है और विकासशील विधा बन चुकी है।

मेरी पसन्द की ये  दोनों रचनाएँ आज हमारे आस-पास बिखरे सामाजिक, नैतिक एवं राजनैतिक मूल्यों के ह्रास पर तेज़ धार वाली तलवार की तरह वार करती हैं | दोनों रचनाएँ पढ़कर ऐसा प्रतीत हुआ कि कुछ वर्ष लिखी गई ये लघुकथाएँ मानो आज के कुत्सित वातावरण का जीवंत विवरण हो| ये समाज में लगे  भ्रष्टाचार और दुराचरण जैसे ग्रहण को शाब्दिक रूप देने में सफल हुई हैं| शायद इसी लिए ऐसी रचनाओं को कालजयी भी कहा जाता है|

पहली लघुकथा है प्रियंका गुप्ता द्वारा लिखी ‘भेड़िए’| जब यह कथा पहली बार पढ़ी थी तो इतनी प्रभावित कर गई कि अंतर्मन आर्द्र हो गया| कितने दिन तक मन में एक टीस- सी उठती रही| बहुत ही सरल और सांकेतिक भाषा में लेखिका एक अत्यंत गहन मुद्दे को चित्रित कर पाने में सफल हुई हैं| इस लघुकथा में न संवाद हैं, न बहुत से पात्र| यह एक ऐसे निरीह प्राणी की मनोव्यथा है जो शायद अपने आक्रमणकारी से लड़ भी नहीं पाया| यह लघुकथा केवल एक मेमने की नहीं है| मेमना और भेड़िया तो इस रचना में प्रतीकात्मक पात्र हैं| वास्तव में इसमें वे सारी कथाएँ, घटनाएँ समाहित हैं ,जो आज भारत में आए दिन हो रही हैं| यह ऐसी सशक्त रचना है जो अपने इर्द- गिर्द इतने प्रश्न बुनती है कि उनका समाधान ढूँढना कठिन हो जाता है| इसे पढ़ कर मन में कई प्रश्न उठते रहे -दानवी प्रवृत्तियाँ समाज में क्यों हावी होती जा रही हैं ? क्या न्यायायिक व्यवस्था ढीली है या नैतिक मूल्यों को लोग भूलते जा रहे हैं ? क्या सन्तान की परवरिश में कोई कमी रह रही है- आदि –आदि ? इस लघुकथा को पढ़कर अगर पाठक वर्ग एकजुट होकर समाज में होने वाले जघन्य अपराधों के विरुद्ध आवाज़ उठाए, तो तब शायद इस रचना का सही मूल्यांकन होगा|

दूसरी लघुकथा जो मैंने इस वृहद् निधि से चुनी है ,वह है श्री प्रेम जनमेजय जी की रचना ‘प्रमाण पत्र’| इस रचना ने मुझे इस लिए प्रभावित किया कि उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था के उस मुद्दे पर गहरी चोट लगाई है ,जो आज सरकारी काम- काज में एक घुन की तरह घर कर गई है| सरकारी तन्त्र में ‘रिश्वत’ एक ऐसा नासूर है, जो न भरता है ,न सूखता है | बस संक्रामक रोग की तरह ऐसा फैल रहा है कि न चाहते हुए भी बहुत से ईमानदार लोग भी उसकी चपेट में आ रहे हैं|

इस लघुकथा में केवल दो पात्र हैं और उनके छोटे-छोटे संवादों द्वारा ऐसा प्रभावशाली चित्र खींच दिया गया है कि पाठक को लगता है कि यह सामने ही घट रहा हो| रचना के अंत तक कौतूहल बना रहता है और अंत एकदम अप्रत्याशित-सा लगता है, क्योंकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि दूसरा पात्र विजिलेंस डिपार्टमेंट का है| आखिर हुआ तो वही ,जो हर दफ़्तर में हर रोज़ होता आया है| दोनों ही पात्रों ने रिश्वत के आदान-प्रदान से अपना काम निपटा लिया|

यह लघुकथा हमारी प्रशासनिक व्यवस्था पर एक सशक्त कटाक्ष है ,जो पाठक को अपने मन के अंदर इसका समाधान ढूँढने के लिए बाध्य करती है| प्रबुद्ध पाठक शायद सोचता भी होगा कि  ऐसी स्थिति में मैं तो ऐसा नहीं करूँगा| मैं अपने जीवन मूल्यों को बचा के रखूँगा| शायद यही इस रचना के लिखने का प्रयोजन है और यही इसका संदेश|

लघुकथाओं का एक पाठक होते हुए मैं यही कहूँगी कि दोनों ही रचनाओं का अंत मन को झकझोरता भी है और सामाजिक जागरूकता लाने के लिए प्रेरित भी करता है| दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई|

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1-भेड़िए-प्रियंका गुप्ता

माँ अक्सर अपने नन्हे-से मेमने को समझाती, घर के दूर तक अकेले न जाना| गहना अँधेरा, बिलकुल काला जंगल जिसमें खूँखार जंगली जानवर बसते हैं| बाकी तो सब ठीक है, शायद बख्श भी दें | पर भेड़िया तो जीव है, जिससे उसे सबसे ज़्यादा होशियार रहना है| अपनी आँख-नाक सब खुले रखने हैं| माँ जब काम पर जाए तो दरवाज़ा बंद करके घर के अंदर ही रहना है| मेहमान का भी भरोसा नहीं करना है बिलकुल| दूर से भी कभी भेड़िए के छुपे होने का डर हो तो भागकर, घर में घुस कर दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर लेने हैं|

माँ ने दुनिया देखी थी, जंगल देखा था, वो सब जानती थी| मेमना भी माँ की सब बात मानता था| यह बात भी मान ली| इसलिए अभी तक कहीं नहीं जाता था| किसी अजनबी तो दूर, जानने वाले से भी ज़्यादा बात नहीं करता था| माँ के जाते ही घर के सब खिड़की दरवाज़े बंद कर लेता था|

एक दिन जब माँ काम से लौटी, मेमना कहीं नहीं मिला| मिले तो बस कुछ खून के कतरे| माँ नहीं समझ पा रही थी कि उसके इतने आज्ञाकारी बच्चे का शिकार कैसे हुआ| शिकार होने तक मेमना भी नहीं समझ पाया होगा| माँ उसे घर के भेड़िए के बारे में बताना जो भूल गई थी|

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2-प्रमाणपत्र -प्रेम जनमेजय

पहला – नमस्कार, मुझे अपने बच्चे के जन्म का प्रमाणपत्र चाहिए|

दूसरा – ठीक है, इस फार्म को भर कर एक रुपया जमा करा देना, पन्द्रह दिन बाद मिल जाएगा|

पहला – पन्द्रह दिन? मुझे जल्दी चाहिए| एडमिशन फार्म के साथ देना है|

दूसरा- आप लोग ठीक समय पर जागते नहीं हैं और हमें तंग करते हैं| बड़े बाबू से बात करनी पड़ेगी, दस रुपये लगेंगे| एक हफ्ते में सर्टिफिकेट मिल जाएगा|

पहला- भाई साहब मुझे दो दिन में चाहिए| आप कुछ कीजिए, प्लीज़ |

दूसरा- ठीक है बीस रुपये दे दीजिए, लंच के बाद ले जाइए|

पहला- मैं विजिलेंस से हूँ, तो तुम रिश्वत लेते हो?

दूसरा- हुज़ूर माई बाप हैं| यह आज की कमाई आप की सेवा में हाज़िर है|

पहला- ग़लत काम करते हो और हमें तंग भी करते हो| तुम्हें सस्पेंड भी किया जा सकता है|

दूसरा- हुज़ूर, एक हजार दे दूँगा|

पहला – तुम तो मुझे धर्म संकट में डाल रहे हो| मुझे तुम्हारे बाल- बच्चों का ध्यान आ रहा है| परन्तु ड्यूटी इज़ ड्यूटी|

दूसरा- हुज़ूर दो हजार से ज़्यादा की औकात नहीं है|

पहला- ठीक है, ठीक से काम किया करो| आदमी को पहचानना सीखो| मुझसे मिलते रहा करो| तुम जैसे कुशल कर्मचारियों की देश को बहुत आवश्यकता है|

यह कहकर उसने हाथ मिलाया, संधि पर हस्ताक्षर किए और देश तीव्रता से प्रगति करने लगा|

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शशि पाधा,ई-मेल: shashipadha@gmail.com

 

 

 

 

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

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    बरेली–243122 (उ.प्र.)


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