अगस्त-2017

दस्तावेज़समाज को सही दिशा देती लघुकथाएँ     Posted: March 1, 2015

आधुनिक लघुकथा का जन्म सातवें दशक से माना जाता है। प्रारम्भिक लघुकथाएँ आक्रोश से भरी होती थीं। ये लघुकथाएँ पारिवारिक व TAPISHसामाजिक स्तर की विसंगतियों को लेकर चली थीं। इनके अन्त मारक होते थे। इनमें व्यंग्य को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता था । कसाव का भी विशेष ध्यान रखा जाता था। कालान्तर में लेखक विसंगतियों को लेकर तो लिखते रहे, किन्तु आक्रोश से कुछ परे हो गए । इसके कारण धारदार लघुकथाओं को कमी खटकने लगी । मारक अंत भी प्रभावशाली अंत में परिवर्तित हो गया ।
एक नया मोड़ आया । लघुकथाएँ मनोवैज्ञानिक व भावना- प्रधान लिखी जाने लगीं । लघुकथा के विकास में कई तरह के परिवर्तन आए और आगे भी आते रहेंगे । एक जीवन्त विधा की यह निशानी होती है।
नरेन्द्र कुमार गौड़ एक जागरूक लेखक है और पैनी दृष्टि रखते हैं। अपनी ऐसी दृष्टि के कारण इन्होंने अपनी पारिवारिक व सामाजिक लघुकथाओं में नवीन दृष्टिकोण भ देने का प्रयास किया है। इनके दो लघुकथा-संग्रह ’अहसास’ तथा ’प्रतिबिम्ब’ पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं।
इनका प्रस्तुत संग्रह ’तपिश’ अधिकतर पारिवारिक व सामाजिक विषय लिए है। इनकी लघुकथा ’विरासत’ में बेटा अपने पिता के पुष्तैनी काम को सम्भालता है और माता-पिता के साथ रहता है। इसमें वह अपने आप पर गर्व महसूस करता है। वह दूसरे भाइयों की तरह नौकरी करने के लिए दूसरे शहरों में नहीं जाता है। इस रचना में माँ-बाप की देख-रेख का महत्त्व तथा पिता के व्यवसाय को सम्भालने की बात की गई है। ‘ऐसा समधीं’ लघुकथा में जवाँई का पिता अपने समधी की पुत्री के विवाह में उसके बिना माँगे दो लाख की सहायता करता है। इससे पारस्परिक सम्बन्धों में जुड़ाव पैदा होता है। ‘माँ की छवि’ लघुकथा में बेटी अपने झगड़ालू माता-पिता के कटु सम्बन्धों को ठीक करने में प्रयासरत होती है। ‘कलेजे का टुकड़ा’ भावुकता से भरी व नारी जाति के पक्ष में लिखी पारिवारिक लघुकथा है। यहाँ पिता अपने कलेजे के टुकड़े अपनी बेटी के बारे में कल्पना करके कि वह कुछ समय बाद विवाहित हो अपने ससुराल चली जाएगीं, भावुक हो उठता है ;किन्तु उसी समय उसका अपनी पत्नी की ओर भी ध्यान जाता है कि वह भी तो किसी की बेटी है। इससे उसकी उसके प्रति आत्मीयता जाग उठती है।
’पति और साहित्यकार’ में जहॉ साहित्यकार की घर में बेकद्री की बात उठाई गई है, वहां उससे भी अधिक उसकी पत्नी का यह वाक्य ‘मैं आपको साहित्यकार पहले और पति बाद में मानने लगी तो घर नहीं चल पाएगा और मैंने घर चलाना है।’ इस बात की घोषणा करता है कि साहित्यकार का घर में साधारण आदमी बनकर रहना चाहिए और बाहर उसकी लेखकीय पैठ होनी चाहिए । ‘ठाकुर सा’ब की होली’ में पौत्र द्वारा अपने दादा ठाकुर की होली न खेलने की आन को सहज में तुड़वाने की बात की गई है। इससे पारिवारिक सौहार्द्र बढ़ता है। ’फेस-बुक’ लघुकथा में नरेश द्वारा अपने माता-पिता से प्रभावित होकर अपने जीवन में प्रगति करने की बात ’फेस-बुक’ पर पढ़कर अशोक बहुत प्रभावित होता है और उसे अपना वास्तविक दोस्त मानता है। इस संग्रह की मुख्य शीर्षक से सम्बन्धित लघुकथा ’तपिश’ में पुत्र द्वारा उसके पिता की गर्मी में रही तपिश से उत्पन्न उसके भीतर की तपिश को अन्य बुजुर्ग की सहायता करके कुछ कम करने की बात की गई है। ’बिटिया का जन्मदिन’ में बिटिया अपने जन्मदिन पर माता-पिता
आपस में न लड़े-इस रूप में मानना चाहती है। ‘हियर एड’ में हियर एड का सहारा लेखक लेखक ने बहुत ही कलात्मक ढंग से घर में बुजुर्ग की उपेक्षा का वर्णन किया है। ‘सजा या पुरस्कार’ में एक अनपढ़ औरत पढ़ी-लिखी साहित्यकार बहू को अखबार में छपने पर बुरा-भला कहती है। अनपढता एक अभिषाप है, इसमें यह बतलाया गया है। ‘घर नहीं टूटेगा’ में अगर घर के सदस्यों में आपस में सब ठीक-ठाक है, इस ओर संकेत किया गया है। इस प्रकार पारिवारिक स्तर की वे लघुकथाएँ किसी न किसी उद्देष्य को लिए हुए है।
सामाजिक लघुकथाओं में ’सिगरेट का धुऑ’ धूम्रपान के विरूद्ध लिखी रचना है। ‘मदारी’ में यह बतलाया गया है कि पुराने खेलों का महत्त्व अब कम होता जा रहा है। बच्चे अब मदारी का खेल न देखकर अपना ध्यान टी.वी. व इंटरनेट की ओर अधिक लगा रहे हैं। ‘विद्यादान या व्यापार’ ट्यूशन के विरुद्ध लिखी रचना है। इसके कारण विद्यार्थियों में अब अपने अध्यापकों के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है। ’उपेक्षित’ लघुकथा वृद्धों के प्रति उपेक्षा भाव को दर्शाती है। इसमें लेखक ने वृद्धों की तुलना खंडित मूर्तियों से की है। ‘इलाज’ में निर्धन व्यक्ति के प्रति दुर्व्यवहार दिखाया गया है। सेठ अपने नौकरी को उसके बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं देता और अपनी कार को सही करवाने के लिए पैसे खर्चने में परवाह नहीं करता ।
‘मंदिर का जन्म’ में भगवान के मंदिर में भेदभाव होता है, यह बतलाया गया है। जिस सेठ ने मंदिर बनवाया, उसे बिना पंक्ति में लगे पहले प्रसाद दे दिया जाता है। ‘फ्लैश बैक’ वेश्यावृत्ति पर आधारित लघुकथा है। वेश्या का जब शरीर ठीक नहीं रहता, तो उसे किसी दूसरे काम से गुजारा करना पड़ता है। ‘देवी-देवता’ लघुकथा में इस ओर संकेत किया गया है कि लड़की तो देवी कहला सकती है; किन्तु लड़का देवता नहीं न सकता । यह रचना पुरुष जाति पर व्यंग्य करती है। ‘स्त्री-चऱित्र’ में भी व्रत का आधार बनाकर यह सूचित किया गया है कि पत्नी, पति के लिए बहुत कुछ करती है किन्तु पुरुष का उधर कोई ध्यान नहीं जाता । ‘प्रेरणा-स्रोत’ में संजीव की नौकरी छूट जाती है तो वह और किसी काम के लिए प्रयास नहीं करता, किन्तु एक व्यक्ति की कैंटीन बंद हो जाती है तो वह तुरन्त दूसरे काम के लिए रिक्शा खरीदने का प्रयास करता है। दूसरा आदमी संजीव के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाता है।
‘खून और पानी’ में नारी जाति पर अत्याचार दिखाया गया है। सास अपनी बहू को गालियॉ देती है। ‘दस रुपये’ लघुकथा दिहाड़ी कर रहे एक मजदूर की शोचनीय हालत को दर्षाती है। ‘भ्रष्टाचार’ रिश्वतखोरी की मुँह बोलती लघुकथा है। पुलिसवाला स्कूटर वाले से पॉच सौ रुपये लेकर उसका चालान नहीं काटता ।‘ड्राइवर’ रचना में ‘ड्राइवर’ को बस आराम से व ठीक ढंग से चलानी चाहिए, इस ओर संकेत किया गया है। ‘अच्छे-बुरे’ लघुकथा अच्छे व बुरे अध्यापक की पहचान करवाती है। ‘कीमत और क्वालिटी’ में यह बतलाया गया है कि सरकारी उपयोगी में आने वाली चीजें बढ़िया क्वालिटी की कोई नहीं खरीदता । वहाँ तो रिश्वत का बोलबाला होता है। ‘बड़प्पन का रंग’ लघुकथा यह दर्शाती है कि बड़प्पन के कारण व्यक्ति आम लोगों के साथ हेलमेल नही रख सकता । ‘दरियादिली और कंजूसी’ में एक व्यक्ति झूठी शाषान के लिए वेटर को 20 रुपये टिप के रूप में दे देता है और रिक्शावाले को 20 रुपये के स्थान पर 15 रुपये देता है। ‘नुकसान’ लघुकथा-शराब पीने से गुर्दे खराब हो जाते हैं, इसका वर्णन करती है। ‘समस्या -निदान’ में नेता लोगों पर व्यंग्य है। वे किसी भी समस्या का हल नहीं करने देते । ‘मौत के सौदागार’ वे डॅक्टर हैं, जो मरीज के मरने के बाद भी पैसे के लोभ में आई.सी.यू. में वैंटीलेटर पर कई दिन रखते है।
‘पुरुष मानसिकता’ में पुरुष अपने आपको स्त्री से कम नहीं समझता । अगर स्त्री नौकरी करती है तो बेकार पुरूश उससे षादी नहीं करवाना चाहता । ’संत और नषा’ में अगर कोई -संत नषा करता है तो वह संत कहलाने का अधिकारी नहीं है, यह बतलाया गया है। ‘ऐसा किसने बनाया’ लघुकथा इस और ईषारा करती है कि आज की जवान पीढ़ी का सत्यनाश करने वाले उनके अभिभावक ही हैं। वे ही उनके लिए टी.वी. व मोबाइल मुहैया करवाते है। असीम प्रेम, तबादला, भारतमाता व विवाह की वर्शगांठ, आदर्षवादी लघुकथाएँ हैं। ‘लोहा और सोना’ सफाई अभियान को लेकर लिखी गई लघुकथा है। एक बुजुर्ग द्वारा निस्वार्थ भाव से किसी पार्क का साफ करना हल सबके लिए प्रेरणादायक है। विशय नया है। ‘भक्त और भगदड़’ में धार्मिक स्थान में कैसे भगदड़ और नुकसान होता है, इसका वर्णन है। ‘लेखक’ लघुकथा में साहित्यकार की प्रषंसा की गई है और पुस्तक की कीमत बहुत अधिक होती है, इसकी भी चर्चा की गई है। ‘अपेक्षा के विपरीत’ लघुकथा में समाज में महिला व ड्राइवर अपनी टैक्सी में अपनी बेटी द्वारा गाई कविताओं की टेप लगाकर पीछे बैठी और ड्राइवर को गलत समझने वाली महिलाओं को हतप्रभ कर देता है। नए विषय को लेकर लिखी गई यह आदर्शवादी रचना है। ‘फायदे में भांजी’ लघुकथा में आदर्शऔर यथार्थ का टकराव प्रदर्शित किया गया है। एक वृद्ध की एक के स्थान पर दो टिकटें लेना, क्योंकि इससे पहले एक दिन बस में भीड़ होने के कारण वह टिकट नहीं ले पाया था, आदर्शवाद का बढ़िया उदाहरण है। उसी समय कंडक्टर अगले स्टाप में उतरने वाले रोहन से 10 रुपये की जगह 5 रुपये लेकर बिना टिकट उसे उतरने देता है।
ऐसा समधी, अपेक्षा के विपरीत, लोहा और सोना, फायदे में भांजी, नुकसान आदि विषयों में नयापन है। ‘विश्वास’ और प्रेरणास्रोत’ लघुकथाओं के अन्त बहुत अच्छे हैं। -0-

तपिश(लघुकथा-संग्रह): नरेन्द्र कुमार गौड़,पृष्ठ:96, मूल्य: 250 रुपये,प्रकाशक: सूर्य भारती प्रकाशन, 2596 , नई सड़क दिल्ली-110006

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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