अक्तुबर-2017

मेरी पसन्दसर्वकालिक लघुकथाएँ     Posted: February 1, 2016

कहीं बैठे बैठे दृष्टि घूमी…. बादल का एक टुकड़ा सामने से गुज़रा, सड़क पर जाता कोई बालक दिखा, एक चेहरे पर कौंधी खुशी, कोने में पड़ी कोई वस्तु, कोई दर्द, कोई आवाज़, कोई लम्हा अंतस् में जा टकराया और जब शब्दों का जामा शिल्प की डोरियों में कसकर उभरा तो लघुकथा का आकार पा गया। लघुकथा के लिए जहां नाम के अनुरूप लघु होना आवश्यक है, वहीं कथ्य व शिल्प का होना भी महत्वपूर्ण है। एक भी अनावश्यक वाक्य या वर्णन इसके प्रभाव को नष्ट कर देता है, साथ ही किसी महत्वपूर्ण शब्द का न होना इसे प्रभावहीन बना सकता है। लघुकथा में सटीकता का बहुत महत्व होता है। सुगठित, सशक्त, तीव्र तथा झकझोरने वाली रचनाएँ ही जीवन से सच्चा साक्षात्कार कराने की क्षमता रखती हैं।

आज लघुकथा के क्षेत्र में बहुत कार्य किया जा रहा है, सर्वश्री विष्णु प्रभाकर, बलराम, सतीशराज पुष्करणा, मधुदीप, मधुकांत, सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, कमलेश भारतीय शकुन्तला किरण, अशोक भाटिया, उपेन्द्र प्रसाद राय, सुदर्शन रत्नाकर, कमल चोपड़ा, सुभाष नीरव, विक्रम सोनी, माधव नागदा, संतोष दीक्षित, सतीश दुबे, श्यामसुन्दर दीप्ति, श्यामसुन्दर अग्रवाल, बलराम अग्रवाल,रामयतन प्रसाद यादव आदि प्रमुख लेखकों ने सार्थक रचनाओं एवं कुशल सम्पादन से लघुकथा को दिशा प्रदान की है।
अपनी पसंद की लघुकथाओं पर विचार करना आरंभ किया तो बहुत सी लघुकथाएं स्मृति में उभर आई, कालीचरण प्रेमी की आंसू, सुकेश साहनी की दीमक व ठंडी रजाई, रवि प्रभाकर की लघुकथा “दंश’ रामेश्वर काम्बोज ”हिमांशु” की ऊँचाई, प्रियंका गुप्ता की भेड़िए आदि।
बहुत विचार करने पर यहां प्रस्तुति के लिए मैंने दो लघुकथाओं को चुना। यो दोनों ही लघुकथाएं ऐसे विषयों पर लिखी गई हैं ,जो किसी एक काल अथवा युग के नहीं, युगों- युगों से समाज में विद्यमान रहे हैं और संभवतः सदा ही रहेंगे।
पहली लघुकथा जिस पर मैं चर्चा करना चाहती हूँ वह है भारतेंदु हरिश्चन्द्र की अंगहीन धनी। श्री बलराम अग्रवाल जी ने भारतेंदु हरिश्चन्द्र की अंगहीन धनी या अद्भुत संवाद (सं. परिहासिनी, 1876) को पहली लघुकथाओं में माना है। यह सत्य है कि भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने इन्हें लघुकथा नहीं कहा फिर भी ‘अंगहीन धनी परिस्थितियों को गंभीरता के साथ प्रस्तुत कर स्थायी प्रभाव छोड़ती है और लघुकथा की कसौटी पर खरी उतरती है। यह पाठकों को अपने समय के सरोकारों से जोड़ती है और न सिर्फ तत्कालीन दासता पर कड़ी चोट के साथ साथ कुलीन वर्ग की अनकही दासता को उजागर करती है जो बलात दास्ता से एकदम विपरीत ओढ़ा हुआ ऐब है अपितु इस तरह प्रस्तुत की गई है कि यह सर्वकालिक है। हर उस युग में समान रूप से प्रभावी है जहां मनुष्य किंचित सुविधा व आलस्य के वशीभूत होकर छोटे से छोटे कार्य के लिए भी दूसरे का मुख ताकने का आदी हो जाता है। यह संपन्नताजनित दुराचार पर गहरी चोट करती है।

दूसरी लघुकथा, हाल ही में अयन प्रकाशन से छपे संकलन लघुकथा अनवरत में पढ़ी। रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी की लघुकथा स्त्री – पुरुष । समाज की संकुचित मानसिकता पर गहरी चोट करती यह लघुकथा एक साथ कई पहलुओं पर प्रहार करती है जैसे कि किसी भी स्त्री और पुरुष को आपस में बात करते देख सिर्फ संदेह नज़र से उन्हें देखना, निर्धन को हेय द़ष्टि से देखना और किसी महिला का ध्यान अपनी ओर न जाने पर पुरुष अहं पर चोट लगना। इस सुगठित कहानी का अंतिम वाक्य गहरे उद्वेलित कर जाता है। काम्बोज जी एक सुहृदय रचनाकार हैं जिन्हें आसपास की घटनाएँ प्रभावित करती हैं और उन्हीं पर वे लिखते भी हैं। लिखने के लिए उनके पास एक संवेदनशील हृदय है और यही कारण है कि वह जो भी लिखते हैं उसमें हर बार पढ़ने पर कुछ न कुछ नएपन का अनुभव होता है।

1-अंगहीन धनी – भारतेंदु हरिश्चंद्र
एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।
और नौकरों ने पूछा,“क्यों बे, हँसता क्यों है?”
तो उसने जवाब दिया,“भाई, सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उन सभों से एक बत्ती न बुझे। जब हम गए, तब बुझे।”

2. स्त्री–पुरुष-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
आज नीलम ने कक्षा से बाहर आकर कुछ पूछने का प्रयास किया। मैंने उसे उपेक्षा से टरका दिया। मुझे उसका रिक्शावाले से घुल–मिलकर बतियाना बुरी तरह अखर गया। मैं उसवेफ पास से ही निकला था पर ऐसा क्या कि उसे पता ही नहीं चला। न चाहकर भी मैंने उसे टोक दिया– ‘नीलम, मैं तुम्हें एकअच्छी लड़की समझता हूँ। किसी रिक्शावाले से इतना घुल–मिल जाना ठीक नहीं है।’
वह कुछ उत्तर न देकर फफक–फफककर रो पड़ी। उसका रोना और भी बुरा लगा। जवान लड़की, कहीं कुछ गलत न कर बैठे, यह आशंका मेरे मन में बार–बार पफन उठा रही थी।
वह भरी आँखों से बोली– ‘ठीक है सर, अब मैं कभी आपसे कुछ नहीं पूछूँगी।’
मुझे लगा– जैसे वह मेरी उपेक्षा करनेके लिए कमर कसकर तैयार हो गई है।
‘मेरी बला से!’ मैंने क्रुद्ध होकर कहा।
मैं छुट्टी के बाद घर के लिए लौट रहा था। स्कूल गेट के बाहर जमा भीड़ देखकर ठिठक गया। नीलम के रिक्शावाले के सिर से खून बह रहा था और वह अपने दुपट्टे का छोर फाड़कर पट्टी बाँध रही थी।
‘क्या हुआ नीलम?’ अनायास मेरे मुँह से निकल गया।
‘एक स्कूटर वाला पिताजी को टक्कर मारकर भाग गया।’
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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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