जनवरी-2018

देशसहमा सुख     Posted: October 1, 2016

कमरे में प्रवेश करते ही उन्होंने सरसरी निगाहों से चारो तरफ देखा। कोने में रखे रंगीन टीवी पर निगाह पड़ते ही खुशी की झुरझुरी सी उनके शरीर में उठ आयी-‘आह! कितनी मशक्कत से खर्च में कतरब्योंत कर मैंने यह टीवी खरीदा था थी। प्लास्टिक की चार कुर्सियों की जगह सेकेण्ड हैंड सोफा लगवा पाया था।’ उन्होंने सोचा।

उनके लिए नये वर्ष की शुरुआत भी बड़ी अच्छी हुई थी। डूबा पैसा वापस मिला था। आज एक गिफ्ट भी उनके नाम से निकल आया था। हालाँकि यह उनके लिए अप्रत्याशित घटना थी ; क्योंकि आजतक उन्हें एक धेला तक कहीं से नहीं मिला था।

जीवन के ये छोटे- छोटे सुख ही तो हम जैसे लोगों के हृदय को गतिशील रखे हुए हैं वरना…. । सुख के इस पल को पकड़ते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज दी।

– आती हूँ। आ गए आप? चाय के लिए पानी चढा़ रही हूँ।

-चाय बनती रहेगी,पहले आओ तो सही। एक खुशखबरी है।

पत्नी हाथ पोंछती हुई आई-‘हाँ कहिए।’

पत्नी के चेहरे पर उदासीनता देख उन्होंने स्नेहसिक्त हो कहा-‘आओ बैठो। अरे हम थोड़ी देर के लिए खुश नहीं हो सकते क्या?’

‘हाँ हाँ क्यों नहीं,जब घर फूँककर तमाशा देखा जा सकता है, तो हम खुश क्यों नहीं हो सकते? जानते भी हैं आप कि चीनी कितनी महँगी हो गई,चीजों के दाम कहाँ उठ गए?”

पत्नी के बेरुखे व्यवहार से उन्हें थोड़ा दु:ख हुआ-‘तुम बैठो तो…….।

– बैठती हूँ,पहले चाय ले आऊँ।

पत्नी चाय के साथ एक लिफाफा भी लेते आई। चाय की चुस्की के साथ वे लिफाफा खोलने लगे। पत्नी बोली-‘बेटे का पत्र आया है। कोचिंग लेना चाहता है। बीस हजार तत्काल चाहिए। ड्राफ्ट बनवाकर भिजवा दीजिए।’

– ब्ब्बीस हजार! उनके मुँह से चीख निकल गई मानो बीस हजार बिच्छुओं ने  एक साथ डंक मार दिये हों। बिना एक शब्द आगे बोले वे चाय की चुस्की लेते रहे जैसे घूँट घूँट कर गम पी रहे हों। बेचारा सहमा सा सुख दूर खड़ा था।

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