अक्तुबर-2017

दस्तावेज़सामाजिक विद्रूपताओं की गाथा     Posted: November 1, 2015

एक सार्थक रचना के सृजन की पहली शर्त है सम्बन्धित विधा की सही समझ होना।विधा की शक्ति और सीमा की जानकारी होना । उससे की जाने वाली अपेक्षाओं की भी । यदि कोई कानून–कायदे हों तो उनकी भी । मसलन दोहा, ग़ज़ल या छंदबद्ध कविता लिखी जा रही है तो पीले पंखों वालीसम्बन्धित नियमावली का पालन ज़रूरी है । नई कविता हो तो भी विचार के साथ लय और प्रवाह होने से वह ग्राह्य होती है । ऐसी ही कुछ अपेक्षाएँ एक अच्छी लघुकथा से भी है । कोई निर्धारित मानक या प्रतिमान चाहे न हों, पर यदि लघुकथा है तो इस विधा के ढाँचे में फिट बैठना चाहिए । यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कुछ लोग इस विधा को बहुत आसान मान बैठे हैं । वे भोले लोग भी हाथ साफ करने लग पड़ते हैं, जिन्होंने जीवन में पहले कभी कुछ लिखा ही नहीं । दरअसल लघुकथा लिखना, कहानी–उपन्यास लिखने से भी अधिक कठिन काम है । बलराम अग्रवाल एक समर्थ लघुकथाकार हैं तो इसका एक कारण यह है कि उन्हें लघुकथा के विविध पक्षों का समुन्नत ज्ञान है । सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समझ के साथ–साथ उन्हें मनुष्य–स्वभाव की गहरी पहचान है । सजग बुद्धिजीवी होने के नाते विसंगत समाज के विरोधाभासों, अंतर्विरोधों को वे खुली आंखों देखते हैं और फिर बड़े सलीके से उन्हें व्यक्त करते हैं । सामाजिक बुराइयाँ, विसंगतिया, विद्रूपताएँ, शोषण, पाखण्ड, मिथ्याचार तथा अन्याय उन्हें वक्रीय आक्रोश से भर देते हैं । इस विचलन के पश्चात् अपनी प्रतिक्रिया को दबाकर रख पाना संभव नहीं होता । यह एक तरह की सामाजिक प्रतिबद्धता है । वे यह भी जानते हैं कि प्रतिबद्धता बँटी हुई नहीं हो सकती और यह भी कि उन्हें किसका पक्षधर होना है । बलराम की लघुकथाएँ इसका प्रमाण हैं । इसका यह अर्थ नहीं कि वे किसी वाद या राजनीतिक विचारधारा से बँधे हैं । वैसे लेखक विचारधारा से बँधा हो सकता है, पर उसे विचारधारा का गुलाम नहीं होना चाहिए । जब लेखक वर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण कर उन्हें आम आदमी की चिंताओं से जोड़ता है तो यह भी एक प्रकार की प्रतिबद्धता ही है। वस्तुत: बलराम एक स्वतंत्र चेता विचारक हैं और अपनी बात निर्भीकता से कहने का साहस उनमें है।
बलराम का सशक्त औजार है उनकी कल्पनाशीलता । जानते हैं कि कोई भी सृजन न पूरी तरह यथार्थ/अनुभव आधारित होता है, न कल्पना आधारित । दोनों के समन्वय से ही सार्थक रचना का सृजन संभव है । कल्पना भी रचनात्मक होना चाहिए, ऐसी जो लेखक के कथन को पुष्ठ करे । साथ में प्रांजल भाषा और अभिव्यक्ति कौशल का योग हो तो सोने में सुहागा । लघुकथा संग्रह ‘पीले पंखों वाली तितलियाँ’ की कथाएँ पठनीय और मननीय हैं तो इसलिए कि उनमें ऊपर वर्णित तमाम विशेषताएँ हैं ।
संग्रह की रचनाओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि बलराम अग्रवाल एक प्रयोगशील रचनाकार हैं । मिथक हो या कुछ और, वे प्रयोग कर लघुकथाओं को नया, रंग–रूप आकार देते हैं । जानते हैं कि प्रयोग से ही प्रगति की राह खुलती है । रचनात्मकता और प्रगतिशीलता में अनिवार्यत: कोई द्वंद्व नहीं है । दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है । संग्रह की लघु कथाओं की दूसरी विशेषता है उनकी सांकेतिकता । प्रतीकात्मक रूप में कही गई ये लघुकथाएँ प्रभावी हैं । रचनाकार इस तथ्य से अवगत है कि सरलीकरण, स्पष्टीकरण और विवरणात्मकता से रचना विपरीत रूप से प्रभावित होती है । काफ्का ने सही कहा है, शोर रचना के मार्ग की बड़ी बाधा है । जब लेखक चीजों को समझाने–सुलझाने लगता है तो इसका अर्थ है कि न उसे पाठक पर भरोसा है न स्वयं अपने पर । बलराम की कोशिश होती है कि कम से कम समय लेकर पाठक से अधिक से अधिक दे । इसका यह अर्थ नहीं कि संग्रह की कथाएँ जटिल या अमूर्त हैं । उनमें ऐसे सूत्र हैं जिन्हें थामकर पाठक रचना के अंदर प्रवेश कर सकता है ।
संग्रह की कई कहानियाँ साम्प्रदायिकता विरोधी हैं । कथाकार जाति, धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर नफ़रत फैलाने वालें कट्टरपंथियों के सख्त खिलाफ है ।उसकी आस्था साम्प्रदायिक सद्भाव में है । भरोसा, पूजा वाली जगह, मान–अपमान, सेक्यूलर, मुसलमान आदि इस श्रेणी की महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। इसी प्रकार ईश्वर को ठीक से न समझने वालों और उसके नाम पर पाखंड फैलाने वालों की कलाई भी खोली गई है । ईश्वर, लानत, दहशतगर्ज, अगर तू खुदा है, नाटक, मान–अपमान जैसी लघुकथाओं में । दलित–सवर्ण और ऊंच–नीच के भेदभाव को दर्शाती मर्मस्पर्शी कहानी है ‘गरीब के गाल’ । सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करती लघुकथा ‘कुंडली’ में व्यंग्य अ्रतर्धारा की तरह मौजूद है । बलराम की व्यंग्य कथाएँ करुणा–सिक्त हैं, मानवीय करूणा से ओत–प्रोत । ‘सुंदरता’ जीवन दृष्टि को रेखांकित करती एक खूबसूरत लघुकथा है । सौंदर्य के आंकलन के लिए एक विशेष दृष्टि और समझ होनी चाहिए । सुंदरता ऐसी स्थूल वस्तु नहीं है जो केवल आँखें फाड़कर देखने से अनुभव की जा सकती हो । ।उसे मन की आंखों से देखना पड़ता है । उस तरह की संवेदना का होना आवश्यक है । यश–लिप्सा के कारण मनुष्य हर तरह का समझौता करने और किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है (खनक) । दिए दान के दर्प से दमकता चेहरा तब बुझ जाता है, जब उसे पता चलता है कि जिस बात को लेकर वह गर्वोन्मा था, वह कितनी भ्रामक थी । ‘शंबूक का शाप’ मिथक को तोड़ती एक अविस्मरणीय लघुकथा है। संकट मोचन’ आधुनिक परिवार की संवेदनहीनता की सबल कहानी है । एक और उल्लेखनीय कथा है ‘आदमी और शहर’ । आज शहर हिंसक पशुओं से भी अधिक खतरनाक हो गए हैं । एक बार जंगल में खूंखार पशु की पकड़ से कोई बच भी जाए, मगर ‘शहर’ उसे जरूर निगल जाएगा । ‘रद्दीवाला’ सकारात्मक सोच की प्रेरणास्पद लघुकथा है । सकारात्मक सोच जीवन को उत्साह, उमंग से भर देती है और बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देती है, जबकि नकारात्मकता, निराशा, अवसाद से भर देती है । लेखक का प्रकृति–प्रेम लघुकथा ‘पराकाष्ठा’ में तथा पर्यावरण– प्रदूषण के प्रति चिंता ‘आहत आदमी’ में व्यक्त हुई है । शैतानियत, मानवीय करुणा और प्राकृतिक आपदाओं को लेकर ‘हवाएँ बोलती हैं’ शीर्षक के तहत कुछ बेबाक रचनाओं की सीरीज संग्रह में शामिल है ।
‘पीले पंखों वाली तितलियाँ’ संवेदी, सरल बाल–मन की अद्भुत कथा है । वह बाह्य जगत से अधिक अंर्तगत की गाथा है । बेटा रंग–बिरंगी तितलियों की अटखेलियों में खोया हुआ उनके साथ तादात्म्य बनाएं हुए है । खुशी से भरपूर है । वह कागज पर ‘बी’ फार बटर फ्लाय से भी बड़ी कोई बटरफ्लाय अपने अंदर रच रहा है । लेकिन मां उसकी संवेदना को, उसकी भावना को न समझ केवल बाहरी दुनिया को देख रही है । छिपकली द्वारा तितली को निगल जाने से आहत हुए बालक की व्यथा को भी ‘माम’ समझ नहीं पाती । बालक का सुख उसका अपना सुख रह जाता है ।
कुल मिलाकर ‘पीले पंखों वाली तितलियाँ’ समकालीन यथार्थ के प्रति लेखकीय सरोकारों को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण कृति है । यह बलराम के व्यापक जीवनानुभवों का ही परिणाम है । मनुष्य–जीवन का शायद ही कोई पक्ष हो जो उनसे अछूता रहा हो । उनकी प्रवाहमयी, समावेशी, व्यंजनात्मक भाषा ने उनका काम आसान कर दिया है । निस्संदेह उनका रचना–विधान विलक्षण है । उनके पूरे लेखन में सामाजिक हित की भावना है ।

पीले पंखों वाली तितलियाँ (लघुकथा–संग्रह) लेखक : बलराम अग्रवाल,राही प्रकाशन, करतार नगर, दिल्ली–53,पृष्ठ–152, मूल्य : 300 रुपये
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सूर्यकान्त नागर ,81, बैराठी कालोनी नं. 2,इन्दौर (म.प्र.)
मो.नं. 098938–10050

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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