अक्तुबर-2017

मेरी पसन्दसामाजिक विसंगतियों पर चोट     Posted: March 1, 2016

भूमंडलीकरण व ग्लैमर का दौर जिस द्रुत गति से चला है, सामाजिक विसंगतियों के चेहरे भी उसी गति से परिवर्तित हो रहे हैं। नित नई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में आंखे चुंधिया जाना भी स्वाभाविक है। सादा जीवन उच्च विचार की उक्ति तो कब की तिरोहित हो चुकी है ।””तेते पैर पसारिए जेती चादर होय”” केवल किताबों की बातें रह गई हैं। बाज़ारवाद ने नए मुखौटे पहन सभी को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया है । । हमारी संस्कृति व सभ्यता का महिमामंडन केवल दिखावा-सा रह गया है। भौतिक सुख-सुविधाएँ जुटाने के लिए हर चुनौती स्वीकार करना शग़ल बन गया है। आज की पीढ़ी को इसमें कुछ असंगत भी प्रतीत नहीं होता। मॉडर्न होने का जुनून-सा सवार है हर किसी पर । इसी परिपेक्ष्य में देखें तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बाढ़ सी आ गई है बाज़ार में। वे भांति-भांति के प्रलोभन देकर अपनी ओर आकर्षित करती हैं , कभी नई-नई स्कीमें लाकर तो कभी शीघ्र अमीर हो जाने के नुस्खे बताकर और वो भी घर बैठे- बैठे । बाज़ारवाद इस कदर हावी है कि जेब में फूटी कौड़ी न हो तब भी हज़ारों की शॉपिंग घर बैठे की जा सकती है। अधुना लघुकथा को भी ऐसे नए व विद्रूपता की हद तक प्रभाव डालते विषयों की दरकार है। शंकाएँ भी जन्म लेती रही हैं कि ऐसे विस्तृत विषय क्या लघुकथा की परिधि में सिमट पाएँगे? मेरे विचार से उसी का बखूबी उत्तर है कथाकार सुभाष नीरव जी की चर्चित लघुकथा मकड़ी । किसी भी विधा को उत्तरोत्तर विकास के लिए नए कलेवर अपनाने ही पड़ते हैं, यह तो लेखक की दक्षता पर निर्भर करता है कि वो पैमानों में रहकर अपनी बात सफलतापूर्वक कह पाए। मेरी पसंद कॉलम एक दस्तावेज है प्रभावशाली लघुकथाओं पर चर्चा कर सहेजने का, जो लघुकथा के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक भी है।
लघुकथा विधा मेरी पसंदीदा विधा रही है। जब से लघुकथा विधा को जानने समझने की ललक जगी तबसे सैंकड़ों लघुकथाएँ पढ़ने का अवसर मिला। मकड़ी मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक है ।
कथा की बात करें तो जैसा विदित ही है कि आज बाज़ार पर कब्ज़ा है तो क्रेडिट कार्ड्स, डेबिट कार्ड्स व ऐसे ही अनेक आकर्षक कार्ड्स का , जो व्यक्ति को अपनी ओर आसानी से खींच लेते हैं व वह उनके जाल में फंसने से स्वयं को रोक भी नहीं पाता । जो उपयोग की वस्तुएँ वो एकमुश्त राशि न होने के कारण नहीं खरीद पाता वो किश्तों में आसानी से प्राप्त हो जाती हैं और फिर शुरू होता है तनख्वाह का किश्तों को चुकाने में खत्म हो जाना। इस कार्डजाल में घुसने का रास्ता तो है पर बाहर निकलने का कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ता। वैश्विक पटल पर विकासशील देशों को फाँसने का षड़यंत्र भी प्रतीत होता है। अराजकता, लूटमार के माहौल ने भी कार्ड संस्कृति को बढ़ाने में महती भूमिका निभाई है। लघुकथा मकड़ी का पात्र भी ऐसे ही मध्यम वर्गीय परिवार से है व एक दफ्तर में मामूली बाबू के पद पर कार्यरत है। बाज़ार स्वयं दस्तक देता है उसके दरवाज़े पर कथा के एक पात्र की मानिंद। थोड़ी कशमकश के बाद , तरह – तरह के कार्ड्स के कारण उसका पर्स चमचमा उठता है, सुनहरी चमक से। वह भी गरदन ऊँची कर चलने में फक्र का अनुभव करने लगता है। उसे सपने पूरे होते प्रतीत होने लगते हैं , कुछ हद तक पूरे होते भी हैं। उसका रहन-सहन का स्तर भी ऊँचा हो जाता है, पत्नी का बीमार होने पर ऑपरेशन भी आसानी से हो जाता है, किसी के आगे हाथ फैलाने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती, किन्तु इन सब के चलते उसकी आधी तनख्वाह किश्तें भरने में ही निकल जाती है, तब उसे होश आता है कि वो कार्ड्स द्वारा फैलाए गए प्रलोभनों के जाल में फँस चुका है । अंत में एक और ऑफर जब दरवाज़े पर दस्तक देती है तो वह दरवाज़ा खटाक से बंद कर लेता है व पत्नी के पूछने पर कि कौन है दरवाज़े पर , केवल मकड़ी कह कर पसीना पोंछने लगता है, जो उसकी घबराहट दर्शाता है।
कथा के अंत में कार्डों के जरिए फांसने की प्रक्रिया को मकड़ी को प्रतीक बनाकर दर्शाया गया है। वहीं दूसरे रूप में देखें तो ग्लैमर का, नवयौवनाओं का उपयोग लोगों को घर- घर भेजकर कार्ड्स देकर फाँसने के रूप में भी किया जाता है, व उनके लिए भी लेखक ने मकड़ी शब्द का प्रयोग किया है। अतः मकड़ी का प्रतीक के रूप में अनूठा व सुन्दर प्रयोग हुआ है जो कथा को शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्टता प्रदान करता है। कथा एक तारतम्य के साथ कदम दर कदम आगे बढ़ती है व चरम बिंदु पर आकर अपना प्रभाव छोड़ती हुई समाप्त हो जाती है, एक लघु संवाद के माध्यम से जो कि लघुकथा का अंतिम चरम बिंदु व प्रभावशाली पंच भी है।
लघुकथा के मानकों को अक्षरशः पूर्ण करती है यह लघुकथा। यदि तीन सौ से चार सौ शब्दों को शब्द सीमा मानें तो अवश्य थोड़ा आकार बड़ा प्रतीत होता है, किन्तु विद्वानों के कथनानुसार लघुकथा अपना आकार स्वयं तय करती है।
यह विवरणात्मक शैली में लिखी गई यथार्थपरक लघुकथा है व अपना संदेश देने में पूर्णतया सफल होती है। कथ्य की नवीनता व आधुनिकता इसकी विशेषता है वहीं कथा संप्रेषण उच्च कोटि का है। परोक्ष रूप से उधार बांटने व उधार लेने की मानवीय कमज़ोरी व परंपरा पर चोट करती है। साथ ही इसके दुश्परिणामों से सचेत भी करती है। देखा जाए तो यह घर-घर की समस्या को उजागर व इंगित करती है। अंत में शीर्षक पर शीर्षासन करें जो कि लघुकथा के मानकों की महत्वपूर्ण कड़ी है ,तो ग्लैमरस नवयौवनाएँ हों या बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हों या क्रेडिट कार्डस सब पात्र के आसपास अपने चंगुल में फांसने के लिए जाला बुनते हैं मकड़ी की तरह तो ‘मकड़ी’ एक सटीक शीर्षक है व कथा के मर्म को बखूबी समेटने में कामयाब होता है ।
प्राचीन काल से आज तक शासन चाहे राजा-महाराजाओं का हो, तानाशाहों का हो या लोकतंत्र हो जनता के प्रति जवाबदेही उसका नैतिक दायित्व बनता है। वहीं राज-काज चलाने के लिए अनेक तत्वों का सहारा भी लेना पड़ता है। कई हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। अपना राज-काज निर्बाध गति से चलाने के लिए सरकार बहुत सी बातें तोड़-मरोड़ कर भी पेश करती है। नए तकनीकी युग में जवाबदेही और भी बढ़ गई है, क्योंकि जनता के सरोकार केवल अपनी ज़रूरतों तक ही सीमित नहीं रह गए हैं , अब उसे देश की, सरकार की, यहाँ तक कि विश्व पटल पर हो रही छोटी से छोटी हर गतिविधि से सरोकार है। जनता को बरगलाना आज के युग में आसान नहीं है, फिर भी अक्सर तर्क-वितर्क या कुतर्कों से ऐसी कोशिशें की जाती हैं। गलत तथ्य , आँकड़े प्रस्तुत कर स्थिति की भयावहता को छिपाने का प्रयास भी उनमें से एक है।
यूँ तो सत्ता के विषयों पर विद्वानों की लेखनी पहले भी चलती रही है, किन्तु ऐसे क्लिष्ट विषय को लेकर लघुकथा में ढालना कोई आसान काम नहीं है। वर्तमान राजनीति के क्रियाकलाप व जनता की मानसिकता का इससे अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता जो प्रसिद्ध कथाकार सुकेश साहनी जी की लघुकथा ‘कंम्प्यूटर’ में वर्णित है। यह भी मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक है।
इसमें लेखक शतप्रतिशत यथार्थ परक परिस्थितियों को ही उत्कृष्ट शिल्प का सहारा लेकर लघुकथा में ढालने में सफल होते है। कंप्यूटर जो कि वास्तव में ऐसी मानव निर्मित मशीन है जिसमें जितना डेटा फीड होगा उतना ही काम करेगी। उसमें फीड आँकड़ों से बाहर की कोई वस्तु न ही देखी व दिखाई जा सकती है। इसे शैल्पिक दृष्टि से प्रतीक के रूप में प्रयुक्त कर लेखक ने दिखाने का प्रयत्न किया है। देश की लगाम सरकार के हाथों में होती है व जनता रूपी घोड़े को हाँकने के लिए सरकार की आवश्यकता होती है।
दो सम्प्रदायों के बीच हुई दंगे की घटना को आधार बनाकर इसकी रचना हुई है। दंगे के कारण जनता में आक्रोश है। यहाँ कंप्यूटर को समाचार वाचिका की शक्ल में दिखाकर उसके द्वारा घटनाक्रम का विवरण दिया जाता है, दंगे को एक छोटी सी घटना के रूप में पेश किया जाता है। यहाँ सच्ची तस्वीर छिपा ली जाती है।
ऐसे में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के तहत गृहमंत्री की अफवाह न फैलाने की प्रार्थना व अधजली लाशों पर उठे प्रश्न को धर्म शास्त्रों व धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर न्यायसंगत ठहराने का प्रयत्न किया जाता है। यहाँ सरकार द्वारा जनता के दिमाग में जो डेटा फीड किया जाता है, जनता कुछ हद तक सहमत भी नज़र आती है उस तर्क से।
वहीं शांति स्थापित करने की मंशा से दोनों समुदायों के धर्मगुरुओं की अपील का सहारा लेना व उससे काफी हद तक शांति स्थापित होने में कामयाबी मिलना लोगों की मानसिकता भी दर्शाता है अर्थात शांति बनाए रखने के लिए जनता के दिमाग को परिस्थिति अनुसार मोल्ड करना पड़ता है।
मामला थोड़ा शांत होते ही राजनीतिक कारणों से सरकार गिरने की अफवाह फैल जाती है। यहाँ अनुमान लगाया जा सकता है कि अवश्य सरकार किसी दल विशेष के समर्थन से चल रही होगी व परिस्थितियों का राजनीतिक फायदा उठाने की मंशा से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी गई होगी। यहाँ राजनीति का विद्रूप चेहरा भी लेखक द्वारा पेश किया गया है ।
राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में फिर एक बार जनता दिग्भ्रमित होने लगती है। देश का उत्तरदायित्व अब किसी पर नहीं है, विवरण का डेटा कौन फीड करे तो वहाँ भाई-भाई फिल्म दिखाई देने लगती है। यह भी एक प्रकार से आपसी दुश्मनी को भुलाकर भाइयों की तरह रहने या तनाव को खत्म करने के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। यहाँ देश विकट परिस्थिति से जूझ रहा हो ,तो जनता को फिल्म नहीं अपने प्रश्नों के उत्तर चाहिए, वो कौन दे क्योंकि गिर चुकी सरकार की जवाबदेही गिरते ही खत्म हो जाती है । फीड डेटा खत्म हो चुका है तो कंप्यूटर भी एम्प्टी हो जाता है व कान उमेठने पर डेटा फीड करने की मांग करने लगता है। उसी प्रकार रिक्तता के माहौल में जनता का शोर भी एक प्रकार से डेटा यानी लेटेस्ट समाचार उपलब्ध कराने की मांग ही है।
घटना व प्रतीकों के माध्यम से विवरणात्मक व संवादात्मक शैली में कथानक को पिरोने का प्रयत्न लेखक ने किया है। वहीं कई अनकही बातें भी पाठकों के समझने के लिए छोड़ी गई हैं । शब्दसीमा दुरुस्त है व कथा संप्रेषण कमाल का है। शीर्षक कंप्यूटर डेटा फीडिंग की दृष्टि से व कथा के शिल्प को दृष्टिगत रखते हुए दिया गया है, ऐसा मुझे लगता है। लघुकथा के पैमाने पर खरी उतरती अच्छी लघुकथा के लिए कथाकार सुकेश साहनी जी को साधुवाद।
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1-मकड़ी-सुभाष नीरव

अधिक बरस नहीं बीते जब बाजार ने ख़ुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाजार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाजार को कोई गलत-फहमी हुई होगी, जो वह गलत जगह पर आ गया – उसने सोचा था। उसने बाजार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है। यहाँ हर महीने बंधी-बंधाई तनख्वाह आती है और पूरा महीना बमुश्किल खींच पाती है। इस पर बाजार ने हँसकर कहा था, ”आप अपने-आप को इतना हीन क्यों समझते हैं? इस बाजार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी है? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-गरीब का फर्क ही खत्म हो जाएगा।”
बाजार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान के साथ बात की थी, उसका असर इतनी तेजी से हुआ था कि वह उसकी गिरफ्त में आने से स्वयं को बचा न सका था। अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।
धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफा, फ्रिज, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाजार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाजार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं।
इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आप्रेशन की सलाह दी थी और दस हजार का खर्चा बता दिया था। इतने रूपये कहाँ थे उसके पास? बंधे-बंधाये वेतन में से बमुश्किल गुजारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी- कैसे होगा? तभी, जेब में रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों- हम है न ! धन्य हो इस बाजार का ! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की जरूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम. से रुपया निकलवाकर उसने पत्नी का आप्रेशन कराया था।
लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट-टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, जैसे-तैसे आँख लगती ,तो सपने में जाले-ही-जाले दिखाई देते जिनमें वह ख़ुद को बुरी तरह फंसा और मुक्ति हेतु छटपटाता हुआ पाता।
छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाजा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक-से दरवाजा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज देख ली हो। पत्नी ने पूछा, ”क्या बात है ? इतना घबरा क्यों गये ? बाहर कौन है?”
‘मकड़ी !’ कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।
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कम्प्यूटर-सुकेश साहनी

पलक झपकते ही वह खूबसूरत युवती र्में तब्दील हो गया। फिर सम्मोहित कर देने वाले नारी स्वर में बोला, “दो संप्रदायों की उग्र भीड़ को शांत करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा,जिसके कारण बीस लोगों को चोटें आई है। एहतियात के तौर पर शहर के बारह थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया है।”
भीड़ से तेज भनभनाहट उभरी। नदी-नालों में बह-बहकर आ रहे अधजले शवों को लेकर जनता में भारी रोष व्याप्त्त था।
वह बिजली के बल्ब की तरह दो-तीन बार जला-बुझा, फिर गृहमंत्री के रूप में सामने आकर आवाज़ में मिश्री घोलते हुए बोला, “कृपया अफवाहों पर ध्यान न दें। जहाँ तक नदी-नालों में बहकर आ रहे अधजले शवों का प्रश्न है तो कोई नई बात नहीं है। देश के कुछ भाइयों का मानना है कि अंतिम संस्कार के दौरान अधजले शव को नदी में बहा दिया जाए तो मृतात्मा को मुक्ति मिल जाती है। ये शव को इसी प्रकार के हैं। हम अपने देशवासियों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं।”
भीड़ से फिर तेज शोर उठा।
वह बिजली की-सी तेजी से देश के सबसे बड़े शाही इमाम के रूप में बाद्ल और बोला, ””मैंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों का निरीक्षण किया है,सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं, आप शांति बनाए रखें।””
भीड़ के एक भाग से अभी भी रोषभरी आवाज़ें उठ रही थीं ।
देखते ही देखते वह देश के सबसे बड़े महंत के रूप में सामने आकर कहने लगा, “मैंने अभी-अभी दंगाग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे भाइयों से बातचीत की है। उनको सरकार से कोई शिकायत नहीं है।”
भीड़ छँटने लगी थी।
तभी विचित्र बात हुई। राजनीतिक कारणों से सरकार बर्खास्त कर दिए जाने की बात आग की तरह चारों ओर फैल गई थी।
लोग फिर उसके सामने जमा होने लगे। इस बार वह ‘भाई-भाई’ नामक फीचर फिल्म के रूप में दौड़े जा रहा था।
“हमें फिल्म नहीं चाहिए!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“बर्खास्त सरकार के बारे में बताओ!”कोई दूसरा चिल्लाया।
“धर्मस्थल के बारे में बताओ!!” किसी तीसरे ने चिल्लाकर कहा।
वह उनकी चीख-चिल्लाहट की परवाह किए बिना फिल्म के रूप में दौड़ता रहा।
पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक गुस्से में भर कर उसकी ओर बढ़ने लगे। किसी ने आगे बढ़कर उसका कान उमेठ दिया। वह अदृश्य हो गया।
“खाली—खाली—एमटि—एमटि—” अब केवल उसकी खरखराती आवाज़ सुनाई दी।
“क्या बकवास है” एक युवक दाँत पीसते हुए चिल्लाया।
“डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड —”वह किसी टेप की तरह बजने लगा।
लोग हैरान थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि सरकार के बर्खास्त होते ही उसे क्या हो गया है!
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डॉ नीरज सुधांशु,आर्य नगर, नई बस्ती,बिजनौर-246701
मोबा-09412713640

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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