अगस्त-2017

देशसुख की मिठास     Posted: August 1, 2017

” आम कैसे दिए  ? “

लम्बी गाड़ी से नीचे उतरे साहबनुमा आदमी की आँखों में पहना  काला चश्मा उसके रौबदार व्यक्तित्व को जानकी वाहीऔर बढ़ा रहा था।

” बाबूजी ! ये वाले सौ रुपये किलो हैं ।”

ठेले वाले ने करीने से सजे चमकते पीले रंग वाले बड़े आमों की ढेरी की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।  एक नज़र ठेली पर डालकर दूसरी तरफ़ लगी ढेरी की ओर देखकर चश्मे वाला बोला-”  ये दूसरी ढेरी वाले आम कैसे दे रहे हो ? सौ रुपये किलो ज्यादा महँगा कह रहे हो तुम ”

कार वाले ने रुमाल निकाल।कर चश्मा साफ़ करते हुए फल वाले को अच्छे से घूरा मानो ये परख रहा हो कि फल वाले के ऊपर उसका कितना रुआब पड़ा है।

” बाबूजी ! इनको छोड़िए ये वाले आपके मिज़ाज़ के नहीं हैं ।आप तो ये लीजिए लखनऊ का  ठेठ मलिहाबादी आम,इसकी  गुठली इतनी पतली की खाने का मज़ा आ जाए।”

फल वाले ने पहली ढेरी की तारीफ़ के कशीदे काढ़ते हुए कहा। तभी खड़-खड़ करता एक पुराना रिक्शा चमकदार लम्बी गाड़ी के बगल में रुका ।उसमें से पसीने से लथपथ उतरे रिक्शेवाला, साहबनुमा आदमी के बगल में खड़े होकर ठेली के आमों को नज़रों से परखने लगा।फिर फल वाले से बोला-” आम कैसे दिए भइया ! ”

” ये आम पचास रुपये किलो हैं”- पहली ढेरी की ओर इशारा करके फल वाला फिर कार वाले की ओर मुख़ातिब हुआ।

” साहब ! मलिहाबादी कितना तोल दूँ ? सच कह रहा हूँ  इनकी मिठास लेने के बाद आप  आप हमेशा मुझसे ही आम लेंगे “-तराजू पर आम रखते हुए फल वाले ने कहा।

कार वाला नाक में रुमाल रखता हुआ रिक्शे वाले से दूर खिसका-” पहले थोड़ा दाम ठीक लगाओ।”

” भइया ! मुझे देर हो रही है ।पहले मुझे आम तोल दो।ये दूसरी ढेरी वाला कैसे दिया ?” रिक्शेवाले ने ज़ल्दी मचाई।

” ये तेरे वश का नहीं भाई ! महँगा है।”

” कित्ते रुपये किलो है ? ” रिक्शावाला मन ही मन कुछ हिसाब -सा लगाता हुआ बोला।

” अरे ! कह दिया ना ,तेरे वश की ना है ये वाले आम लेने की।सौ रुपये किलो हैं। हाँ तो साहब ! कितना तोल दूँ।” फल वाला फिर कार वाले की तरफ़ मुड़ा।

” अस्सी के भाव लगाओ तो पाँच किलो तोल दो । लगता है  तुमने आम के साथ  गुठलियों के  भी दाम जोड़ दिए । कुछ ज्यादा ही तारीफ़ कर रहे हो गुठलियों की भी। कुछ व्यंग्य  और कुछ ग़ुरूर से रिक्शे वाले की तरफ देखकर कार वाला बोला।

” भइया ! आप लोग मोल- भाव बाद में करते रहना।पहले मुझे ये बढ़िया वाला तोल दो पाँच किलो। कई दिन से बच्चों को ज़बान दी है बढ़िया वाला आम खिलाने की ।खुश हो जाएँगे आज वे।”-कहकर रिक्शेवाले ने  दस , बीस और पचास रुपयों  के छुट्टे ज़ेब से निकालकर पाँच सौ रुपये फलवाले के सामने रख दिए।

अचानक वहाँ पर छाई ख़ामोशी ने किसी के मुँह में मिठास घोल दी तो किसी के कड़वाहट।

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