जनवरी-2018

देशसूदसमेत     Posted: October 1, 2016

विदाई के दिन मंच पर बैठा वह सोच रहा था कि वह ताउम्र कभी पत्नी तो कभी दोस्तों से अपने मातहतों की यही शिकायत करता रहा
– अजीब लोग हैं, मैं इनके साथ शराफ़त से पेश आता हूँ तो मुझे कुछ समझते ही नहीं।
– हुआ क्या?
सुनने वाला जानते हुए भी पूछ बैठता और वह हल्के गुस्से में कहता
– ऑफिस में जिसे देखो वही अपनी जरूरत का रोना रोकर मुझसे पैसे उधार माँगने आ पहुँचता है,
– आप देते ही क्यों हैं उन्हें? आदत तो आपने बिगाड़ रखी है।
– गलती तो मेरी है पर क्या करूँ? ये साले बहाने ऐसे बनाते हैं कि किसी की माँ बीमार तो किसी के बीवी बच्चे।
– ……
अक्सर ही इस बात का श्रोता के पास कोई जवाब न होता
– कोई भी ऐरा-गैरा नत्थूखैरा मेरी कार का दरवाज़ा खोल ऐसे आ बैठता है, जैसे सरकारी गाड़ी नहीं उसके बाप की कार हो।
– हुम्म…..
कोई दिलचस्पी न ले तब भी वह अपनी रौ में बहा जाता।
– उसे खन्ना को देखो मुझसे जूनियर अफसर है तब भी मज़ाल किसी की जो कोई उससे नज़र मिलाकर बात भी कर ले, ऐसा टेरर है उसका। मुझे तो कई बार सलाम तक नहीं ठोकते ये एहसानफ़रामोश। बग़ल से निकल जाता हूँ और ये अपने साथियों के साथ खी-खी करते रहते हैं।
– अरे तो आप ही तो इतना मुँह लगाए घूमते हैं उन्हें कि दिहाड़ी मज़ूर से लेकर आपका जूनियर अफसर तक सब अपना यार समझते हैं।
कभी-कभी सच में अपने पर ही झल्ला उठता था वह।

आज नौकरी के अंतिम दिन लोग उसके लिए जितनी मालाऐं और उपहार लेकर आए थे ,उतने शायद कभी किसी के विदाई समारोह में नहीं आए होंगे। उसने महसूस किया कि ऑफिस कैम्पस के उसके अंतिम क्षणों में हर शख्स की पलकें भीगी थीं ,मानो उनका कोई अपना उनसे दूर हो रहा हो। मंच पर आने वाला हर कर्मचारी उसके बारे में जब कुछ कहता, तो उसे लगता कि आज इतना प्यार देख वह भी रो देगा। काफी देर वह किसी तरह वह खुद को सम्हाले रहा मगर आखिर में बाँध ढह गया, जब कुछ मज़दूरों ने आकर बिलखते हुए कहा
– ”साहब” जिन्नगी निकर गई, आप- सा अफसर नईं देखा। इस परदेस में आप माई-बाप थे हमारे।
उसे लगा कि इस सूद के ढेर के पीछे मूल की छोटी सी गठरी कहीं गुम गई है।

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