अगस्त-2017

अध्ययन -कक्षहिन्दी–लघुकथा में संवेदना     Posted: June 1, 2016

‘संवेदना’ से पूर्व ‘अनुभूति’ को समझना अनिवार्य है, कारण ये लगभग एक ही भाव के दो शब्द हैं, किन्तु पिफर भी भावों के स्तर में दोनों में बहुत अन्तर है। ‘अनुभूति’ को अंग्रेजी फ़ीलिन्ग कहते हैं किन्तु कैसी फ़ीलिन्ग? वैसी फ़ीलिन्ग जिसका एहसास हृदय के भीतर यानी समाज में घटित घटनाओं को देखकर होता और जिससे हृदय प्रभावित होता है। ‘संवेदना’ ‘अनुभूति’ के प्रभाव से लेखक जब शब्दों में अभिव्यक्त करता है तो वह ‘संवेदना’ कहलाती है।

मैं अपने इस लेख में वैसी कतिपय लघुकथाओं की चर्चा करूँगा जिनमें संवेदना का मात्रा पुट ही नहीं है, अपितु जिन्हें पढ़कर हृदय संवेदित हो जाता है। लघुकथाओं की चर्चा से पूर्व ‘संवेदना’ के विषय में अन्य विद्वानों के विचारों को भी समझ–जान लेना प्रासंगिक होगा ।

यों तो इस शब्द पर डॉ तपेश चतुर्वेदी, हरिचरण शर्मा इत्यादि ने भी अपने–अपने ढंग से विचार किया है, किन्तु डॉ धीरेन्द्र वर्मा के विचार अन्य विद्वानों की अपेक्षा मुझे अधिक  सटीक प्रतीत होते हैं–‘सवेदना को ही भाव पक्ष कहा जाता है। भाव पक्ष का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप रसनिष्पत्ति है।’

संवेदना लघुकथा के किसी विषय विशेष से बँधी हुई नहीं होती, प्राय: सभी विषयों में लेखक की योग्यता के अनुसार इसे खोजा एवं महसूस किया जा सकता है। जिसे मैं कतिपय लघुकथाओं के उदाहरणों से स्पष्ट करने का प्रयास करूँगा ।

सर्वप्रथम मैं कमल चोपड़ा की लघुकथा की चर्चा करूँगा । कमल चोपड़ा की लघुकथाएँ यों तो समग्रता में शोषण के विरुद्ध संघर्ष की गाथा प्रत्यक्ष होती हैं, किन्तु इसके बावजूद वे अपनी विशिष्ट भाषा–शैली में संवेदना जगाते हुए पाठक के हृदय में जाकर उसे झकझोर देती है । इनकी लघुकथाओं के पात्रा सदैव इन्सानियत की रक्षा एवं संवेदनशील आदमी को आदमी से जोड़ने में प्रयासरत प्रतीत होते हैं । यही उनकी लघुकथा की अतिरिक्त विशिष्टता है। उदाहरणार्थ ‘एक उसका होना’ लघुकथा का अवलोकन किया जा सकता है।

इस लघुकथा के अंतिम छह पंक्तियाँ देखें किस प्रकार संवेदित करती हैं–‘ठाकुर साहब वहाँ पहुँचे तो काशीराम के लड़कों ने मुँह बिचका दिया । वहाँ उपस्थित छोटे–छोटे लोगों ने ठाकुर साहब को कोई महत्त्व नहीं दिया । अपने आप पर काबू रख वे काशीराम की घरवाली के पास पहुँचे और धीरज बँधाते हुए बोले, ‘हिम्मत रखो ! मेरे होते हुए तुम्हें किस बात की चिन्ता है।’

काशीराम की घरवाली एकाएक रोते–रोते चुप हो गयी और बोली, ‘ठाकुर साहब…। एक आपके होने की ही तो चिन्ता है।’

यह अंतिम वाक्य न मात्रा लघुकथा को सार्थकता देते हुए श्रेष्ठता के उत्कर्ष पर ले जाता है, अपितु हृदय की गहराई तक जाकर संवेदित भी कर जाता है। इस वाक्य पर ही यह लघुकथा खड़ी है। यह लघुकथा सामंती व्यवस्था को पूरी ताकत से बेनकाब करती है। इस लघुकथा में मजदूरों के भीतर संवेदनशीलता के माध्यम से जागरूकता पैदा करने की सार्थक कोशिश की गयी है। ऐसा नहीं है कि कमल चोपड़ा की यही लघुकथा संवेदना को जगाती है, कमल चोपड़ा की प्राय: लघुकथाओं में इस विशेषता को देखा–परखा जा सकता है।

इसके पश्चात् डॉ सतीशराज पुष्करणा की लघुकथाओं की चर्चा अनिवार्य इसलिए है कि डॉ पुष्करणा की लघुकथाओं में विषय एवं प्रयोगों के स्तर पर पर्याप्त वैविध्य है। किन्तु एक बात जो उनमें सामान्य है वह है संवेदना । इस स्तर पर यों तो उनकी अनेक लघुकथाओं की चर्चा की जा सकती है, किन्तु ‘आत्मिक बन्धन’ अधिक सटीक है। इस लघुकथा में उन्होंने पति–पत्नी के मय उत्पन्न आत्मीयता को बहुत ही प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत करने में सपफलता प्राप्त की है। पति–पत्नी वृद्धावस्था में अकेले रहते हैं । शीत लहर के दौरान पत्नी सोचती है, पति को ज्यादा ठंड लग रही होगी, अत: वह पति की रजाई के ऊपर एक कंबल और डाल देती है, उनके बार–बार मना करने के बावजूद वह नहीं मानती । पत्नी के सो जाने पर पति वह कम्बल पत्नी की रजाई पर डाल देते हैं और बिछावन पर आकर सो जाते हैं। ‘सुबह जब आँख खुली, तो देखा…… कम्बल पुन: उनकी रजाई के ऊपर था।’

यह वह वाक्य है जो लघुकथा को मजबूत आधर देने के साथ–साथ संवेदना के चरम तक ले जाता है। प्रत्येक लेखक की अपनी विशिष्ट भाषा–शैली होती है। डा पुष्करणा की भी है, जिसके कारण उनकी लघुकथाएँ अलग ही पहचान ली जाती हैं।

श्याम सुन्दर अग्रवाल तो अपनी संवेदनात्मक लघुकथाओं के कारण ही पहचाने जाते हैं। इस श्रेणी में यों इनकी अनेक लघुकथाएँ हैं किन्तु ‘माँ का कमरा’ इस श्रेणी में उनकी सर्वश्रेष्ठ लघुकथा है।इस लघुकथा का शिल्प इस लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है, इसका कथानक  सकारात्मकता के कारण भी अलग पहचान बनाता है। प्राय: लेखकों ने इस विषय पर नकारात्मक सोच को प्रत्यक्ष करती लघुकथाएँ ही लिखी हैं। उन लघुकथाओं में प्राय: बेटे अपने वृद्ध माता–पिता को कष्ट ही पहुँचाते हैं, किन्तु श्यामसुन्दर का कथानायक एक सकारात्मक नायक के रूप में चमत्कृत करता है। इसकी संवेदना को प्रत्यक्ष करती इसकी चंद पंक्तियाँ यहाँ प्रासंगिक होंगी–शाम को जब बेटा घर आया तो बसन्ती बोली, ‘बेटा मेरा सामान मेरे कमरे में रखवा देता ।’

बेटा हैरान हुआ, ‘माँ, तेरा सामान तेरे कमरे में ही तो रखा है नौकर ने ।’ बसन्ती आश्चर्यचकित रह गई, ‘मेरा कमरा ! यह मेरा कमरा ! डबल–बेड वाला….. ।’ ‘हाँ माँ, जब दीदी आती है तो तेरे पास ही सोना पसन्द करती है और तेरे पोता–पोती भी सो जाया करेंगे तेरे साथ । तू टी. वी. देख, भजन सुन । कुछ और चाहिए, बेझिझक बता देना ।’ उसे आलिंगन में ले बेटे ने कहा तो बसन्ती की आँखों में आँसू आ गए ।’ अपेक्षा के विपरीत व्यवहार का प्रत्यक्षीकरण पाठकों को भीतर तक संवेदना से भर देता है।

सुकेश साहनी ने भी अनेक संवेदनापरक लघुकथाएँ लिखी हैं, जिनकी चर्चा हो सकती है किन्तु मुझे लगता है उस धरातल पर ‘ठंडी रजाई’– उनकी अग्रगण्य लघुकथा है। सुकेश की लघुकथाओं में भी विषय वैविध्य के साथ–साथ भिन्न–भिन्न शिल्पों का सटीक प्रयोग हुआ है। सुकेश साहनी प्राय: अपने पात्रों के भीतर प्रवेश करके उनके संवाद लिखते हैं, यही कारण है उनमें स्वाभाविकता अधिक रहती है और इसी कारण रचना में संवेदना सहज ही उत्पन्न हो जाती है। ‘ठंडी रजाई’ की ये कुछ पंक्तियाँ शायद मेरी बात को और अधिक पुष्ट कर सकें–‘आज जबर्दस्त ठंड है, सामने वालों के यहाँ मेहमान भी आये हैं। ऐसे में रजाई के बगैर कापफी परेशानी हो रही होगी ।’

‘हाँ !तो ?’ उसने आशा भरी नजरों से पति की ओर देखा ।

‘मैं सोच रहा था….. मेरा…. मतलब यह था कि …. हमारे यहाँ एक रजाई ।फालतू ही तो पड़ी है।’

‘तुमने तो मेरे मन की बात कह दी, एक दिन के इस्तेमाल से रजाई घिस थोड़े ही जाएगी,’ वह उछल कर खड़ी हो गयी, मैं अभी सुशीला को रजाई दे आती हूँ ।

वह सुशीला को रजाई देकर लौटी तो उसने देखा, वह उसी ठंडी रजाई में घोड़े बेचकर सो रहा था। वह जम्हाइयाँ लेती हुई अपने बिस्तर में घुस गई । उसे सुखद आश्चर्य हुआ, रजाई गर्म थी।‘ इस लघुकथा का अंतिम पैरा न मात्र अर्थपूर्ण है अपितु भावों को भी ऊँचाइयाँ दे रहा है, इस पर यान देने की आवश्यकता है।

मधुदीप भी डॉ पुष्करणा की तरह प्रयोगधर्मी लघुकथाकार हैं। इन्होंने भी अनेक संवेदनशील और श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिखी हैं। मुझे इनकी कई रचना इस दृष्टि से पसंद है किन्तु, ‘हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ’ मुझे अपेक्षाकृत अधिक झकझोरती है और कहीं भीतर तक प्रभावित करती है। इसकी विशेषता यह है कि यह एकालाप शैली में लिखी गयी है। इस लघुकथा का सारा दारोमदार अन्तिम पैराग्रापफ पर टिका है। अन्तिम पैराग्रापफ देखें –‘मैं जिंदगी से खुलकर बातें करना चाहता हूँ । सिर्फ़ बातें करना ही नहीं चाहता, जिंदगी से अपनी बातें मनवाना भी चाहता हूँ। ‘हाँ, मैं जीतना चाहता हूँ।’, इस लघुकथा में नौकरी के जीवन की विवशता तथा अवकाश ग्रहण करने पर मिली स्वतंत्रता को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। यही पंक्तियाँ व्यक्ति को सोचने हेतु विवश करती है, संवेदित भी करती हैं ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ भी लघुकथा–आंदोलन के सक्रिय रचनाकार हैं और उन्होंने भी अलग–अलग शेड्स की लघुकथाएँ लिखने में सफलता पाई है। संवेदनात्मक लघुकथाओं में भी वे पाठकों के प्रिय रहे हैं। यों उनकी अनेक–अनेक लघुकथाएँ उधृत करने योग्य हैं, किन्तु ‘ऊँचाई’ लघुकथा तो उनकी प्रतिनिधि लघुकथा है। यह एक पिता एवं बेटे के मध्य एक सार्थक सोच की लघुकथा है। इस लघुकथा का शीर्षक ‘ऊँचाई’ की भी उल्लेखनीय भूमिका है।

पिता के आने पर बेटा–बहू ऐसा समझते हैं कि पिता कुछ पैसे माँगने आए हैं किन्तु इसके ठीक विपरीत जब वे लौटने लगते हैं तो –‘उन्होंने जेब से सौ–सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, ‘रख लो ! तुम्हारे काम आएँगे । धन की अच्छी पफसल हो गयी थी। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम कमजोर लग रहे हो। ढंग से खाया–पिया करो । बहू का भी यान रखो ।’

मैं कुछ नहीं बोल पाया । शब्द जैसे मेरे हलक में फँस कर रह गये हों । मैं कुछ कहता, इससे पूर्व पिताजी ने प्यार डाँटा, ‘ले–लो! बहुत बड़े हो गये हो क्या?’, ‘नहीं तो !’ मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए । बरसों पहले मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे, पर तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।’

यह अन्तिम वाक्य इस रचना की नींव है, जिस पर यह लघुकथा अपनी ऊँचाई लिये खड़ी है।

राजेन्द्र मोहन त्रिावेदी ‘बन्धु’ विगत तीन दशकों से अधिक  समय से लघुकथा क्षेत्र में सक्रिय हैं, दो सौ से अधिक  लघुकथाएँ लिखकर चर्चित हो चुके हैं। इनकी लघुकथाएँ समसामयिक होते हुए भी संवेदना से परिपूर्ण हैं । ‘संस्कार’ इनकी लघुकथा ऐसी है, जिससे कोई भी संवेदित हो सकता है। उन्होंने कुत्तों के माध्यम से आज के आदमी के बिगड़ रहे संस्कार पर करारी चोट की है। इस लघुकथा का यह वाक्य जो एक वृद्ध कुत्ता अपने साथियों से कहता है-‘लगता है, मनुष्यों के बीच रहते–रहते तुम्हारे संस्कार भी उन्हीं के जैसे हो गये हैं’’ कृष्णानंद कृष्ण के अनुसार, ‘बन्धु जी के लघुकथाओं की खास खूबी जो पाठकों को आकर्षित करती है, वह है इनकी संवेदनशीलता …… । सीधे–सहज सरल संवादों के कारण वे सहज ही पाठकों के दिल में उतर जाती है, और इनकी रचनाओं का असर देर तक/दूर तक उनके मन–मस्तिष्क पर रहता है जो एक संवेदनशील रचना ही कर सकती है।’

डॉ मिथिलेशकुमारी मिश्र यों तो सर्वविधा सम्पन्न हैं ;किन्तु लघुकथा–जगत् में उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। तीन शतक से अधिक  रचनाओं की रचयिता डॉ मिश्र ने यों तो विभिन्न प्रकार की लघुकथाएँ लिखी हैं ;किन्तु एक बात जो सामान्य–रूप से सभी लघुकथाओं में स्पष्ट उभर कर सामने आती है वह है इनकी लघुकथाओं में जीवन के खुरदरे क्षणों के भीतर से झाँकते मार्मिक और संवेदनशील क्षणों को पकड़ने की सफल कोशिश की गयी है। उदाहरणस्वरूप इनकी ‘पूँजी’ लघुकथा को सहज ही अवलोकित किया जा सकता है। आज प्राय:  हर व्यक्ति भ्रम में जी रहा है। यदि आत्मचिंतन करके देखें तो आप पूरे परिवार, मित्र, समाज की भीड़ में जो आपको अपने लगते हैं, अपने को अकेला पाएँगे । आज प्राय: व्यक्ति स्वार्थी है। पूरा जीवन प्रत्येक व्यक्ति इसी भ्रम की ‘पूँजी’ लेकर जीता है। ‘पूँजी’ का वृद्ध कथा–नायक भी इसी भ्रम की पूँजी के सहारे अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। ‘पूँजी’ का अन्त कितना मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है। देखें, ‘आठवीं पढ़ने का मुझे गर्व नहीं… जीवन पढ़ने–समझने का गर्व जरूर है… आज भी मेरे सम्बन्ध बहुत अच्छे–अच्छे लोगों से हैं…. किसी के भी पास चला जाऊँ, रहने–खाने की कमी नहीं रहेगी…. नहीं चाहता हूँ… कहीं उन लोगों ने भी मेरे पुत्रों की तरह नज़र फेर ली तो …. आज जो मेरे पास भ्रम की पूँजी शेष है… डरता हूँ कहीं वह भी लुट न जाए ’इस लघुकथा का एक–एक शब्द संवेदना भर देता है।

इस प्रकार लघुकथा जगत् में अन्य अनेक लघुकथाकारों की भी ऐसी लघुकथाएँ हैं, जो पाठक को संवेदना से भर देती हैं उनमें डॉ सतीश दुबे, विक्रम सोनी, कृष्णानंद कृष्ण, नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’, पवन शर्मा, डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति, हरदीप कौर ‘सन्धु’, डॉ शकुन्तला किरण, कमलेश भारतीय, डॉ रामनिवास ‘मानव’, डॉ बलराम अग्रवाल, बलराम, सुभाष नीरव, रमेश बतरा, महावीर जैन, पृथ्वीराज अरोड़ा, अंजना अनिल, ज्ञानदेव मुकेश, चैतन्य त्रिावेदी, शैल रस्तोगी, विभा रश्मि,अनिता ललित, कमल कपूर, मधुकांत, पवित्रा अग्रवाल, प्रबोध कुमार गोविल इत्यादि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त डॉ हरदीप कौर सन्धु बहुप्रतिभा सम्पन्न लेखिका हैं। जिन्होंने काव्य–विधाओं में भी अपना लोहा मनवाया है ,तो लघुकथा–सृजन में भी उनकी सार्थक सक्रियता अनेक सम्भावनाओं की ओर सुखद संकेत करती प्रतीत होती है। यों तो उनकी अन्य अनेक लघुकथाओं में संवेदना को लेकर यान आकर्षित किया है, किन्तु ‘संरचना’ के किसी अंक में प्रकाशित ‘खूबसूरत हाथ’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। आकार की दृष्टि से बहुत ही छोटी लघुकथा है किन्तु संवेदना की दृष्टि से इसका आयाम काफी बड़ा है।

शिक्षक के आदेश पर बच्चों ने अपने–अपने ढंग से चित्र बनाए । करमो ने बदसूरत से दो हाथ बनाए। अयापक ने हैरान होकर पूछा, ‘ये क्या बनाया ? हाथ ! किसके हैं ये हाथ ?’

‘ये दुनिया के सबसे खूबसूरत हाथ हैं, मेरी माँ के हाथ हैं ये।’

‘तुम्हारी माँ क्या करती है ?’

‘वह मजदूरिन है। दिन भर सड़क पर पत्थर तोड़ने का काम करती है।’

वस्तुत: लघुकथा को और आगे विकास करने हेतु ऐसी ही संवेदना जगाती लघुकथाओं की आवश्यकता है, जो व्यक्ति के मर्म को स्पर्श करते हुए उसे कुछ सोचने हेतु विवश कर दे ।

इसी क्रम में एक और लघुकथा ‘मुक्ति’, जो सुदर्शन रत्नाकर की लेखनी का कमाल है। इसमें अन्य तमाम प्रकार की संवेदनाओं से भिन्न प्रकार की संवेदना है। इस लघुकथा में एक बेटे को अपनी माँ से लगाव है ; किन्तु उसकी बीमारी के कारण माँ के कष्ट को देखकर वह उसकी मुक्ति चाहता है। यद्यपि वह सेवाभाव में कोई कमी नहीं रखता । किन्तु जब वह दिवंगत हो जाती है तो, ‘सभी रस्मों को पूरा करने के बाद आज वह घर में नितान्त अकेला रह गया था । चारपाई, जिसपर माँ सोती थी, सूनी पड़ी थी। घर में सन्नाटा पसरा था । वह चारपाई के पाए पर सिर रखकर फफक पड़ा । उसे उसमें से माँ की ममता की अजीब–सी महक आ रही थी ।

लघुकथा के ये वे पंक्तियाँ हैं जो किसी भी पाठक को संवेदना से भर देने में सक्षम है। यह पूरी लघुकथा विवरणात्मक शैली में सृजित की गयी, इसमें एक भी संवाद नहीं है। इसका कथानक ही कुछ ऐसी ही माँग करता प्रतीत होता है। अपनी संवेदना के कारण यह लघुकथा पाठकों के हृदय में स्थान बना पाने में पूर्णत: सक्षम है।

इक्कीसवीं सदी के लेखकों में नीलिमा शर्मा ‘निविया’ अच्छी लघुकथाएँ लिख रही हैं। ‘तुम भी तो’ इनकी लघुकथा श्रेष्ठता का स्तर तो स्पर्श करती ही है । इसी के साथ वह संवेदना से भी लबालब भर देती है। इसके कतिपय वाक्य यहाँ प्रासंगिक होंगे–‘कौन कमबख्त सोएगा, जब तुम मेरे घर आ जाओगी ?’

‘देखो तो, तब तुमने क्या लिखा था खत में ?’ काया हँसते हुए बोली ।

शादी की 25वीं वर्षगाँठ पर पुराने खतों की पेटी निकालकर पति–पत्नी पढ़ रहे थे ।

‘और यह देख मोटी, तूने भी तो लिखा था, मैं हमेशा ऐसी बनी रहूँगी, जैसी अब हूँ। कभी नहीं बदलूँगी और देख तो आईना, कितना बदल गई।’ हँसते हुए सुनील ने कही तो बात दिल को लग गई। बात भावनाओं के बदल जाने की कही थी न कि शारीरिक संरचना की ।

आईना भी चुगली कर रहा था, आँखों के नीचे के काले घेरे । कमर के चारों तरफ मोटा टायरनुमा घेरा, डबल गर्दन, आँखें नम हो गईं काया की ।

‘उप्फ !मैं ही कौन–सा सलमान खान लग रहा हूँ। हम दोनों जैसे भी लग रहे हैं, परफेक्ट हैं, मेरी मोटो।’ कहते हुए सुनील ने उसे बाँहों में भर लिया ।

इसी सदी की रचनाकार डॉ नीरज शर्मा हैं जो लघुकथा–जगत् में पर्याप्त सक्रिय हैं। इनकी लघुकथा ‘सक्षम’ है, जिसमें एक कामकाजी माँ को शिशु सँभालने की समस्या को प्रत्यक्ष करने का सफल प्रयास किया है।

प्रसव के पश्चात् जब वह काम पर लौटती है तो बेटी को ‘डे–केयर’ में छोड़ आती है जो उसके ऑफ़िस के भवन में ही प्रथम तल पर था। यहाँ उस माँ की स्वाभाविक संवेदना को लेखिका ने देखें किस सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त की है। वह बार–बार बिटिया के बारे में सोचकर हलकान हुई जा रही थी, पता नहीं अनजान लोगों के बीच कैसे रहेगी । रो तो नहीं रही होगी ? मुझे न पाकर दूध भी लिया होगा कि नहीं ? यह स्वाभाविक संवेदनात्मक द्वन्द्व एक ऐसी माँ का है जो अभी कुछ ही माह का है। यह द्वन्द्व इस लघुकथा को विश्वसनीयता के स्तर भी पुष्ट करने में सक्षम है।

इक्कीसवीं सदी में इन कतिपय लघुकथाओं को पढ़कर आशा जगती है, संवेदना के दृष्टिकोण से वर्तमान पीढ़ी आशा एवं संभावनाएँ जगाती है, जो लघुकथा हेतु सुखद स्थिति है। इन तीन लघुकथाकारों के अतिरिक्त इस दृष्टि से जिनकी लघुकथाएँ आशान्वित करती हैं उनमें कुछेक नाम– नीता सैनी, डॉ छवि निगम, आभा सिंह, शोभा रस्तोगी, नेहा अग्रवाल, सरोज परमार, अखिल रायजादा, सुभाष सलूजा, हरिवंश प्रभात, शिवेन्द्र मिश्र, पूर्णिमा शर्मा, विवेक कुमार, वैभव चौहान, प्रियंका गुप्ता, रीता गुप्ता, भावना सक्सेना, जगदीश राय कुलरियाँ, दीपक मशाल, शशि पाधा, डॉ शील कौशिक, सविता मिश्र, सीमा स्मृति, सपना मांगलिक इत्यादि एवं अन्य अनेक हैं ।

निष्कर्षत: मैं यह कहने में समर्थ हूँ कि नये हों या पुराने लघुकथाकार सभी ने हिन्दी–लघुकथा में संवेदना को महत्त्व दिया है और उसके सार्थक परिणाम हमारे समक्ष हैं। साहित्य का कोई भी रूप हो उसमें मस्तिष्क से उपजी अपनी–अपनी विचारधारा हो, अपनी–अपनी प्रतिबद्धता हो, इससे किसी को इंकार नहीं है, होना भी नहीं चाहिए किनतु उसी के साथ–साथ हृदय से निकली हृदय को स्पर्श करती संवेदना भी तो होनी ही चाहिए । कारण बिना संवेदना डॉ सतीशराज पुष्करणा के अनुसार, ‘रचना, रचना नहीं मात्रा वैचारिक ‘नारा’ बनकर रह जाती है, जैसी बिना जीवन कोई पत्थर की सुन्दर आकृति।’ अत: अन्य विधाओं की भाँति ही लघुकथा में भी संवेदना एक अनिवार्य कारक है, जिसका सटीक उपयोग लघुकथा को श्रेष्ठता की ऊँचाई तक सहज ही ले जाने में समर्थ हो जाता है।

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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

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