जून-2017

अध्ययन -कक्षहिन्दी लघुकथा में समीक्षा की समस्याएँ एवं समाधन     Posted: November 1, 2016

हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार-समीक्षा अर्थात् अच्छी तरह देखना, जाँच करना-सम्यक् ईक्षा या ईक्षाणम् । किसी वस्तु, रचना या विषय के सम्बन्ध् में सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना, प्रत्येक तत्त्व का विवेचन करना समीक्षा है। जब साहित्य के सम्बन्ध में उसकी उत्पत्ति, उसके स्वरूप, उसके विविध अंगों, गुण-दोष आदि विभिन्न तत्त्वों और पक्षों के सम्बन्ध् में सम्यक् विवेचन किया जाता है, तो उसे ‘साहित्यिक समीक्षा’ कहते हैं। साहित्य के विविध तत्त्वों और रूपों का स्वयं दर्शन कर दूसरों के लिए उसे द्रष्टव्य बनाना ही समीक्षक का कर्म है। शास्त्रा में समीक्षा का अर्थ है-भाष्य के बीच प्रकृत विषय को छोड़कर दूसरे विषय पर विचार करना । यद्यपि कुछ विद्वान ‘चारों ओर देखना’, ‘आलोचना’, ‘समालोचना’ और ‘सम्यक् दृष्टि से ज्ञान प्राप्त करना’ ‘समीक्षा’ में अन्तर उपस्थित करते हैं और ‘समीक्षा’ को अधिक व्यापक रूप प्रदान करते हैं, तो भी व्यावहारिक रूप में ‘आलोचना’, ‘समालोचना’ और ‘समीक्षा’ का प्रयोग लगभग एक ही अर्थ में होता है। ‘समालोचना’ शब्द का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-युग के लोगों ने खूब प्रयोग किया। किन्तु बालकृष्ण भट्ट ने ‘आलोचना’ शब्द का ही उपयोग किया और धीरे-धीरे ‘समालोचना’ शब्द लुप्त हो गया । वर्तमान में इस शब्द का उपयोग कहीं दिखाई नहीं पड़ता । वर्तमान में ‘आलोचना’ एवं ‘समीक्षा’ का उपयोग एक ही तरह से होता है। किन्तु शब्दकोश के अनुसार समानार्थी होते हुए भी ‘समीक्षा’ एवं ‘आलोचना’ का उपयोग अलग-अलग समझा जाता है। ‘आलोचना शब्द को सामान्यतः लोग किसी ‘पुस्तक’ या ‘रचना’ का विस्तार में विश्लेषण करने के अर्थ में लेते हैं जबकि ‘समीक्षा’ को संक्षिप्त विश्लेषण करने के अर्थ में लेते हैं। सही बात जो भी हो, मैं ‘समीक्षा’ एवं ‘आलोचना’ को समानार्थी रूप में लेकर चल रहा हूँ और इस लेख में इसके बाद ‘समीक्षा’ शब्द का ही उपयोग करूँगा ।

मेरे विचार से किसी भी ‘पुस्तक’ या ‘रचना’ को समीक्षा करने से पूर्व उस ‘साहित्यरूप’ की शास्त्रीय जानकारी गम्भीर एवं गहराई तक होनी चाहिए तथा प्रत्येक समीक्षक का अपना साफ एवं स्पष्ट एक निकष भी होना चाहिए जबकि अभी तक कथा-साहित्य में ‘उपन्यास’ एवं ‘कहानी’ जिस ‘कथारूप’ की भी समीक्षा हुई है उसका आधर या तो ‘संस्कृत’ रहा है या फिर  किसी विदेशी भाषा और विशेष रूप से ‘अंग्रेजी’ से आयात किया गया है। हो सकता है मेरी इस बात पर कुछ लोग चिहुँक उठें-ऐसे लोगों से मैं अत्यन्त विनम्रता से कहना चाहूँगा कि वे पहले गम्भीरता से इस पर विचारें और ‘समीक्षा-साहित्य’ का अध्ययन करें तो स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी । किन्तु इसका यह अर्थ हर्गिज नहीं है कि विदेशी साहित्य को पढ़ना या अपनाना नहीं चाहिए। किन्त जब हमारे देश में ही आदिकाल से लेकर अब तक एक-से-एक विद्वान हुए हैं और उन्होंने हमें विपुल मात्रा में ऐसा सुन्दर साहित्य (समीक्षा में भी), विचार, दर्शन, अध्यात्म-तात्पर्य यह है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा से जुड़े ग्रन्थ दिए हैं। हमारे पुराने ग्रन्थों को हमारे देश से विदेशी लोग आकर उठाकर ले गए । हमें उन्होंने उसी साहित्य को अपने नाम से पुनः लौटाना आरम्भ कर दिया और हम उन्हें उद्धृत कर-करके अपने थोथे पाण्डित्य का प्रदर्शन करने का ओछा प्रयास कर रहे हैं। क्या यह सच नहीं है ? फिर  जो कुछ उद्धृत किया जाता है उसकी प्रामाणिकता क्या है ? फिर  प्रत्येक भाषा एवं साहित्य रूप का अपना संस्कार एवं मिजाज होता है और हिन्दी भाषा का भी है । तो, उस भाषा के कथा-साहित्य की समीक्षा का भी अपना निकष होना चाहिए। निकष बनाने से पूर्व समीक्ष्य कथारूप की स्पष्ट आकृति समीक्षक के समक्ष होनी चाहिए।

लघुकथा-समीक्षा की समस्या में सबसे बड़ी समस्या इसके लेखक ही हैं-वे इतने संकीर्ण हैं कि अपनी मान्यताओं के अतिरिक्त वे किसी अन्य की मान्य को महत्त्व देना ही नहीं चाहते (जब कि उनका अन्तःकरण सच्चाई को स्वीकारता है-ऐसा उनके लेखों से आभासित होता है)। उन्हें यह खतरा बराबर दिखाई देता है कि शायद लघुकथा के इतिहास में उनके कार्यों का मूल्यांकन नहीं होगा । जबकि बात ऐसी नहीं है-किए गए कार्यों का देर-सवेर मूल्यांकन होता ही है। सूरज को बादल कितनी देर तक ढककर छिपा सकता है ? यकीनन बहुत देर तक नहीं । अतः इस भ्रम से ऊपर उठना चाहिए। इन लोगों की इन्हीं संकीर्णताओं ने लघुकथा के विकास में कई बाधाएँ खड़ी करने की कुचेष्टा की है, जिसका अन्दाज इन्हें स्वयं भी होगा ही। ऐसा भी देखा गया है कि अधिकतर लघुकथा लेखकों ने साहित्य को ठीक से पढ़ा भी नहीं है। कथा, कहानी, उपन्यास आदि के अतिरिक्त भी अन्य साहित्यरूपों का अध्ययन जरूरी है तभी ‘लघुकथा’ और सार्थक बहस की जा सकती है। आज सुनी-सुनाई बातों पर कोरी कल्पना के आधार पर बहस नहीं हो सकती ।

लघुकथा-समीक्षा की दूसरी समस्या यह है कि -लगभग प्रत्येक लघुकथा-लेखक कहता है कि उसकी अपनी लघुकथाओं के अतिरिक्त अधिकतर कूड़ा लिखा जा रहा है। इसमें झाड़-झंखाड़ उग आए हैं, आदि-आदि ‘रिमार्क पास’ करके वे लघुकथा की ‘ऐसी-तैसी’ करने पर उतारू रहते हैं। तात्पर्य यह है कि अपनी कुण्ठा को आक्रोश का रूप देकर प्रस्तुत करते हैं। ऐसे लोग स्पष्ट क्यों नहीं बताते कि यह कूड़ा-कर्कट या झाड़-झंखाड़ कहाँ से आ रहा है ? मैं पूछता हूँ कि यह सब कौन ‘सप्लाई’ कर रहा है? आप इस पर प्रकाश क्यों नहीं डालते हैं ? क्या इसमें आप कहीं से भी दोषी नहीं हैं ? दरअसल जिन अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी लोगों का लेखों में ‘नामोल्लेख’ नहीं हो पाता है-वे लोग ही इस प्रकार की कुण्ठाग्रस्त टिप्पणियाँ देते हैं और किसी को ‘समीक्षा’, किसी को ‘सेठिया सम्पादक’ और न जाने किन-किन बेहूदा टिप्पणियों से उन्हें अलंकृत करके अपना ताप उतारने का प्रयास करते हैं। ये लोग न तो लघुकथा के लिए कुछ करते हैं और न ही कुछ करने देना चाहिते हैं। इन्हें तो बिना श्रम के ‘पारिश्रमिक’ चाहिए। कुछ ऐसे भी कुण्ठित हैं जो एकाध पृष्ठ का पत्र, हैण्डबिल या बुकलेट प्रकाशित करके ही समझते हैं कि उन्होंने लघुकथा के हित में न जाने कौन-सा ‘अमोघ बाण’ छोड़ दिया है कि लघुकथा-जगत में उनका ‘राज्याभिषेक’ कर देना चाहिए । ऐसी स्थिति में यह सोच-विचार करने का विषय है कि ये लोग लघुकथा का हित या हानि कर रहे हैं। मेरे विचार से ऐसे लोग सिवा हानि के दूसरा कोई काम नहीं करते हैं। क्या ऐसे लोगों को लघुकथा-लेखकों के बताए रचना-विधान पर ही चलना चाहिए? क्या तभी अच्छी लघुकथाएँ (उनके अनुसार) लिखी जा सकेंगी ? यहीं एक प्रश्न मैं ‘वैसे’ (कूड़ा-कर्कट या झाड़-झंखाड़ कहने वाले) लोगों से पूछना चाहता हूँ कि (आपके निकषानुसार ही) क्या अन्य साहित्यरूपों में कूड़ा-कर्कट या झाड़-झंखाड़ नहीं लिखा गया है ? दरअसल ऐसे कुण्ठाग्रस्त लोगों को लघुकथा की नहीं अपनी चिन्ता है। ऐसे लोगों से लघुकथा को बचाने की आवश्यकता है।

लघुकथा की तीसरी समस्या है-लघुकथा के कुछ लेखक जाने-अनजाने इसे आवश्यकता से अधिक ‘कायदे-कानूनों की चौहद्दी’ में बाँधने  का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रयास करते हैं या कर रहे हैं। या यों कहें कि इसे ‘ग़णित’ एवं ‘विज्ञान’ की तरह ही ‘सूत्र’ में बाँधकर चलना चाहते हैं। ऐसे ही लोगों के ‘अड़ियल’ रुख ने शायद बहुत सारे ‘फालतू’ विवादों को जन्म दिया है जिससे लघुकथा-समीक्षा के विकास की बात तो एक किनारे रखिए ‘इसका’ ठीक से जन्म तक नहीं होने दिया। यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि अन्य साहित्यरूपों की तरह ही अभी तक ‘लघुकथा’ की भी ‘व्याकरण’ या ‘विज्ञान’ की तरह बिलकुल सटीक परिभाषा नहीं दी जा सकी है। शायद यह सम्भव भी नहीं है। बात सिर्फ़ ‘समझने’ की हुआ करती है। मेरा ख्याल है, अधिकतर लघुकथा के मर्मज्ञ एवं कुशल सम्पादक इस बात को पूरी तरह समझते हैं। यही कारण है कि तमाम सार्थक एवं निरर्थक विवादों के बावजूद लघुकथा निरन्तर समृद्ध-पथ पर है। इसे किसी भी चौहद्दी में कसने या बाँधने का अर्थ इसकी प्रगति एवं विकास को अवरु( करना है। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इसमें ‘अनुशासन’ नहीं होना चाहिए। अन्य साहित्यरूपों की तरह ही इसमें एक अनुशासन की आवश्यकता एवं अनिवार्यता तो है किन्तु ‘अंकुश’ की नहीं । प्रयोग करने की छूट बराबर रहनी चाहिए। ‘प्रयोग’ ही किसी भी साहित्यरूप को विकसित होने या करने में अपना सहयोग प्रदान करते हैं। यह स्मरण रहे कि साहित्य में ‘सार्थक’ प्रयोग ही सदैव जीवित रहते हैं, ‘निरर्थक’ प्रयोग कभी भी जीवित नहीं रहते और स्वतः ही काल-कवलित हो जाते हैं।

लघुकथा-समीक्षा की चौथी समस्या है कि अभी तक निशान्तर, डॉ. वेदप्रकाश जुनेजा एवं राधिकारमण अभिलाषीजी को छोड़कर लघुकथा-समीक्षा का कार्य लघुकथा-लेखक ही करते आए हैं, और कर रहे हैं। प्रारम्भ में तो यह कोई बुरी बात नहीं थी। किन्तु अब यह स्थिति ठीक नहीं है। कारण, प्रत्येक लघुकथा-लेखक ने लघुकथा को अपने-अपने ढंग से समझा या समझने की चेष्टा/कुचेष्टा की है, जो कि स्वाभाविक ही है। और यही कारण है उन्हें अपनी ‘बात’ को स्पष्ट करने हेतु मात्रा ‘अपनी ही लघुकथाएँ’ दिखाई देती हैं या यों कहें कि यही उनकी विशेषता भी है। इसके दो कारण हो सकते हैं-एक तो उन्होंने अपने अतिरिक्त अन्य लेखकों की लघुकथाओं का अध्ययन करने का कष्ट ही नहीं किया या फिर  उन्होंने अपने अतिरिक्त दूसरे का महत्त्व देना अपने अस्तित्व के लिए ‘खतरा’ समझा हो । ऐसे लोगों को यह बात साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि किसी भी क्षेत्र में ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’। ऐसे लोगों को अपने लेखन पर विश्वास होना चाहिए तथा अपने में आत्मविश्वास पैदा करना चाहिए। अन्यथा कुण्ठा एवं हीन भावना उन्हें ‘संकीर्ण’ बना देगी या बना देती है, जिससे लघुकथा एवं उसकी समीक्षा का अहित होगा और हो रहा है।

शायद यह कुण्ठा ही है जो उन्हें अन्य ‘साहित्यरूपों’ के शास्त्रीय पक्ष का अध्ययन करने में बाधा उत्पन्न करती है या प्रेरित नहीं करती। यदि ऐसा होता तो आज ‘लघुकथा’ की स्थिति अन्य कथा-प्रकारों से किसी भी मायने में कम नहीं होती। यही कुण्ठा है जिसने उन्हें तथाकथित ‘आचार्य’ बनने को बाध्य किया और उन्होंने अपने आपको स्थापित करने या करवाने हेतु प्रायः लघुकथा-लेखकों को ‘अनर्गल वक्तव्य’ देने या ‘लेख’ लिखने को बाध्य कर दिया । निष्कर्ष सामने है-लघुकथा लेखकों का ‘सृजन’ या तो ‘रुक’ गया या फिर  जोर-जबरदस्ती कुछ लघुकथाएँ लिखीं भी तो ‘लज्जा’ का सामना करना पड़ा ।

इसकी पृष्ठभूमि में निश्चित रूप से नेतृत्व की भावना ही बलवती रही है या रही होगी। एक लेखक ने अपने लेख या वक्तव्य में एक बात कही तो दूसरे ने उसे जैसे-तैसे सही-गलत ढंग से काटने का सफल-असफल प्रयास किया । राजनीति की तरह ही लघुकथा में ‘दल’ बनने लगे और बात लघुकथा के उत्थान से हटकर व्यक्ति या व्यक्तियों के ‘समूह-विशेष’ के उत्थान पर केन्द्रित होने लगी । इससे ‘साहित्यिक मर्यादाएँ’ भंग हुई और अराजकता विस्तार पाने लगी जिससे दिनानुदिन स्थिति गम्भीर से गम्भीरतर होती जा रही है।

कमलेश्वर ने ठीक ही कहा है-आलोचना अब एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल होती है और चूँकि राजनीति के पास अपनी ‘विचारधारा’ होती है, अतः वह अन्य विचारों का तिरस्कार केवल लेखकों के नामों का सहयोग चाहती रहती है। यह भयंकर स्थिति है। राजनीति-मूलक आलोचकों को ‘विचार’ की जरूरत नहीं होती, उन्हें सिर्फ़ अपने समर्थकों की जरूरत होती है। ऐसी हालत में लेखक के अपने अनुभव का प्रामाणिकता का कोई मूल्य उन आलोचकमों के लिए नहीं रह जाता । केवल मतवाद को प्रामाणिक (यथासम्भव) तरीके से पेश कर देने वाले लेखक ही उनके लिए महान लेखक बन जाते हैं ।

यहीं पर उन लेखकों के लिए संकट उत्पन्न होता है, जो विचारधारा-विशेष को अपनी आस्था का अंग मानते हैं, पर लेखक के रूप में अनुाव की प्रामाणिकता को ही तरजीत देते हैं। क्योंकि राजनीति-मूलक समीक्षा लेखक का प्रामाणिक अनुभव नहीं चाहती, वह अपने अनुवाद को यथासम्भव प्रामाणिक आवरण पहनाने की माँग करती है।

अपनी विचारधारा मनवाने हेतु लघुकथा-लेखक द्वारा पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ होता है। फिर  जो मन में आता है, उसे लघुकथा के नाम पर प्रकाशित कर देता है। परिणाम यह होता है कि अनावश्यक विवाद की स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। जिससे व्यक्तिगत स्तर पर भी मनमुटाव हो जाता है। इससे भी सृजनकार्य बाधित हो जाता है और ‘खेमे’ बनते हैं और बने हैं। यही कारण है, वर्तमान में लघुकथा के खाते में लघुकथा उतना विपुल भण्डार नहीं है जितना कि अब तक हो जाना चाहिए था । यदि ऐसा होता तो समीक्षक स्वयं इस ओर आकर्षित होते । इसके अतिरिक्त इच्छुक समीक्षक लघुकथा-लेखकों के परस्पर विरोधी वक्तव्यों को सुन-सुनकर आतंकित हो उठते हैं और वे इस विवादास्पद कथा-प्रकार की ओर हाथ बढ़ाने से भी डरते हैं। यदि दुस्साहसी समीक्षक लघुकथा हेतु कुछ कार्य करना भी चाहते हैं तो लघुकथा-लेखक उन्हें अपने-अपने बनाए दायरों में ही रखना चाहते हैं या उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। यह कार्य अधिकतर वे सम्पादक करते हैं तो ‘लघुकथा-बाहुल्य’ पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन करते हैं। लेखक न तो इनका विरोध करते हैं और न ही स्पष्ट रूप से मुखर होते हैं। कारण, यदि वे विरोध करेंगे या मुखर होंगे तो उन्हें लघुकथा-जगत् की सीमा से बाहर कर दिया जा सकता है, इसका भय रहता है। बात यहीं तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है-लघुकथा में तो योजना बना-बनाकर किसी को ‘खारिज’ करने की साजिशें देखने-सुनने में आती रही हैं। जैसे-अमुक चर्चित लेखक को ‘खारिज’ करना है या उसकी बनी हुई छवि को धूमिल करना है तो किसी बन्द हुई पत्रा-पत्रिका के किसी पुराने अंक में छपी उसी चर्चित लेखक की रचना को किसी अन्य नाम से प्रकाशित करके अमुक चर्चित लेखक की छवि को धूमिल करने की साजिशें भी सामने आ चुकी हैं।

कुछेक पत्रिकाओं ने ‘चोर लेखक’ सिद्ध करने हेतु अपनी पत्रिकाओं में स्तम्भ आरम्भ किए थे, जिनका स्पष्ट उद्देश्य ‘ब्लैकमेलिंग’ था। अगर साहित्य में भी ‘ब्लैकमेलिंग’ होगी तो ‘अपराध-जगत’ और ‘साहित्य-जगत’ में क्या अन्तर रह जाएगा? ऐसी घृणित प्रवृत्तियों का घोर विरोध होना चाहिए । इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं ‘चोर लेखकों’ की पैरवी कर रहा हूँ। मेरे कहने का अर्थ यह है कि यदि आपका उद्देश्य पवित्र है ,तो ऐसे चोर लेखकों को महत्त्व ही नहीं देना चाहिए । यदि उनके (चोर लेखक) पास लिखने की क्षमता नहीं है, तो वे स्वतः समाप्त हो जाएँगे । चोरी की रचनाओं पर वे कब तक जिन्दा रहेंगे ? इतनी ही अराजकता लघुकथा में नहीं है – कुछ लेखकों ने तो स्वयं मनगढ़न्त लघुकथाएँ लिखकर उन्हें किसी भी विदेशी रचना का नाम देकर प्रकाशित कर दिया ताकि वे अपने को शोधकर्ता सिद्ध कर सकें। ऐसे लोग क्या सभी विदेशी भाषाओं के जानकार हैं ? यदि उनकी बात में सच्चाई है तो वे मूल रचना का सन्दर्भ एवं अनुवाद-अनुवादक का सन्दर्भ क्यों नहीं प्रस्तुत करते ताकि उनकी नीयत पर शंका न की जा सके । लघुकथा-लेखकों-आलोचकों को भी चाहिए कि वे बिना मूल स्रोत जाने किसी बात या रचना को उद्धत न करें ।

कुछ लोग लघुकथा-लेखकों को अपनी ‘प्रजा’ समझते हैं और वे चाहते हैं कि वे अपनी पत्रा-पत्रिकाओं के माध्यम से जो ‘पफरमान’ जारी करें वह लघुकथा के लिए नियम बन जाए। किन्तु ऐसी स्थिति में क्या किया जाए जब उनके नियमों पर ही उनकी ‘लघुकथा’ पूरी न उतरे। अब यदि आप उनकी लघुकथा को ‘कमजोर’ कह दें तो वे आपकी ‘खारिज’ करने का अभियान चलाने की धमकी देंगे, देते हैं। इतना ही नहीं, वे फतवा भी देंगे कि आपको अभी ‘लघुकथा की समझ’ नहीं है। लगता है जैसे ‘लघुकथा’ उनकी जागीर है।

ऐसे अराजकतापूर्ण माहौल में लघुकथा को बढ़ाने की बात करना निःसन्देह अपने आप में एक गम्भीर समस्या है। इसी प्रकार लघुकथा-समीक्षा में बड़े पैमाने पर अराजकता फैल रही है, जिसे बहुत ही ढंग से-शालीनता से दूर करना होगा।

इसी प्रकार लघुकथा के नाम को लेकर काफी अराजकता फैली हुई है। पहले लघुकथा एवं लघुकहानी को लेकर झंझट था। उसके बाद क्रमशः ‘लघु व्यंग्य’, ‘मिनीकथा’, ‘अणुकथा’, ‘क्षणिक कथा’, ‘कथानिका’, ‘सूक्ष्मिका’ आदि शब्द यदा-कदा कुकुरमुत्तों की तरह से अनिच्छित ढंग से उगते रहे हैं। फिर  भी ‘लघुकथा’ लघुकथा है और लघुकथा ही रहेगी । कहने का तात्पर्य यह है कि ‘प्रवर्तक’ कहलवाने की ललक भी लघुकथा-समीक्षा की भारी क्षति कर रही है। जबकि होना यह चाहिए कि नेतृत्वकर्ता एवं प्रवर्तक बनने की होड़ समाप्त हो और लघुकथा-लेखन की ओर ध्यान केन्द्रित किया जाए। लघुकथा के भण्डार को श्रेष्ठ लघुकथाओं से इतना सम्पन्न कर दिया जाए कि समीक्षक स्वयं इस ‘कथा-रूप’ हेतु काम करने को आगे आएँ और श्रेष्ठ लघुकथाओं का चुनाव करके लघुकथा की पहचान को स्पष्ट करें। वे लघुकथा के रचना-विधान को तय करें। लघुकथा ‘कहानी’ से कहाँ और किस प्रकार भिन्न होती है, यह तय करें । इसके लिए समीक्षकों एवं लेखकों की अलग-अलग संगोष्ठियाँ हों और फिर  मिलकर मतैक्य होकर उसे अनुशासित करके उसमें फैली अराजकता को दूर करें, तब ही एक स्वस्थ माहौल कायम हो सकता है और लघुकथा लाभान्वित हो सकती है। लेखकों को चाहिए कि अच्छी लघुकथाएँ प्रकाशित करने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ही अपनी लघुकथाएँ भेजें और सम्पादकों को भी चाहिए कि वे मात्रा श्रेष्ठ लघुकथाएँ ही प्रकाशित करें ।

इसी प्रकार ‘लघुकथा’ की कई अन्य छोटी-मोटी समस्याएँ हैं, हो सकती हैं। यहाँ मैं लेख की सीमा को और अधिक विस्तार न देते हुए इतना कहना चाहूँगा कि लघुकथा को समझने से पूर्व कथा को समझना नितान्त आवश्यक है। कथा हर काल में अलग-अलग ढंग से देखी, समझी एवं पढ़ी गई है। अग्निपुराण (उत्तर भाग-1 के  पृष्ठ 1643 में इसकी व्याख्या कुछ है, हिन्दी साहित्य कोश ;भाग-1 में कुछ है और बटरोही ने इस पर अपने अलग ढंग से विचार किया है। मेरे विचार से कथा का ही परिष्कृत, परिमार्जित, विकासशील एवं आधुनिक रूप लघुकथा है। यह परम्परा रही है कि समय-समय पर ‘समय’ और ‘परिवेश’ के अनुकूल ही साहित्यरूप भी अपना रूप बदल-बदलकर वर्तमान से जुड़कर चलते हैं और तभी ये प्रासंगिक भी रहते हैं और विकास भी पाते हैं । जो साहित्यरूप अपने को वर्तमान से नहीं जोड़ पाते हैं वे लुप्त हो जाते हैं और मात्र इतिहास की वस्तु बनकर रह जाते हैं।

लघुकथा का दुर्भाग्य यह है कि अभी तक इसका अपना कोई शास्त्र नहीं बन पाया है। हालाँकि धीरे-धीरे इस दिशा में प्रयास चल रहा है। अभी तक इसे एक अण्डरस्टैंडिंग के तहत ही समझा और लिखा जा रहा है। इसके अतिरिक्त एक दुर्भाग्य यह भी है कि लघुकथा के पास रचना के नाम पर विपुल भण्डार नहीं है। आज यदि श्रेष्ठ लघुकथाओं का कोई संकलन प्रकाशित करना हो, तो शायद एक सौ से अधिक ‘मानक लघुकथाएँ’ भी हाथ नहीं लगेंगी जिन पर गर्व किया जा सके या जिन्हें हम समीक्षकों को सौंपकर कहें कि इन्हें मानक मानकर आप लोग ‘लघुकथा का शास्त्र’ लिख दीजिए । यहाँ सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि सर्वप्रथम यह तय हो और शब्दों में बिलकुल सही-सही अभिव्यक्त किया जाए कि लघुकथा क्या है ? यह कहानी से कहाँ और किस प्रकार भिन्न है ? इसका अपना रचना-विधान क्या है? आदि-आदि कई बातें हैं जिन पर विचार करके यदि पूर्णतः नहीं तो लगभग की स्थिति में तो मतैक्य हो जाए। हालाँकि ऐसी बात नहीं है कि लोगों ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया । इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए गए हैं। अब जरूरत है लघुकथा-समीक्षा की दिशा में आगे कार्य करने हेतु विष्णु प्रभाकर, रमेश बतरा, भगीरथ, स्वर्ण किरण, जगदीश कश्यप, सतीशराज पुष्करणा, विक्रम सोनी, निशान्तर आदि के लेखों एवं वक्तव्यों को गम्भीरता से देखने एवं समझने की । हालाँकि अभी तक किसी ने भी लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष एवं समीक्षा को लेकर एक भी ऐसा लेख नहीं लिखा है जिसे लघुकथा पर लिखा गया ‘मानक लेख’ या सर्वश्रेष्ठ लेख कहा जा सके। उपर्युक्त लोग भी ‘एक लगभग’ की स्थिति को ही छू पाए है। हाँ! लघुकथा के इतिहास पक्ष में कृष्ण कमलेश, जगदीश कश्यप, शकुन्तला किरण, स्वर्ण किरण एवं सतीशराज पुष्करणा ने प्रामाणिक कार्य अवश्य ही किए हैं ।

‘लघुकथा’ एवं ‘कहानी’ में अन्त स्पष्ट करने का प्रयास मैंने ‘अवसर’ के लघुकथांक में किया था । किन्तु उस पर खुलकर चर्चा नहीं हो पाई। परिणाम हम देख ही रहे हैं कि आज भी समस्या अपने स्थान पर ज्यों-की-त्यों है। अभी मतैक्य हेतु हिन्दी लघुकथा-समीक्षा पर बिना किसी आग्रह या दुराग्रह के गोष्ठियों, संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों की तत्काल आवश्यकता है और इससे भी अधिक आवश्यकता है श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिखने की, जिससे समीक्षक स्वतः इस ओर आएँ या उन्हें श्रेष्ठ लघुकथाएँ भेजकर उन पर समीक्षात्मक लेख लिखने हेतु आमन्त्रित करें ताकि वे लोग अलग-अलग अपने-अपने ढंग से लघुकथा का शास्त्रा तैयार कर सकें और समीक्षा के प्रतिमान प्रस्तुत कर कसें। फिर  संगोष्ठियों में खुली बहस होनी चाहिए न कि प्रतिष्ठा का झंझट। इस बहस में समीक्षको  के अतिरिक्त लेखकों को भी शामिल रहना चाहिए। इसके बाद जो निष्कर्ष हमारे सामने आएँगे, उनके न मात्र लघुकथा के निकष मतैक्य से सामने आएँगे बल्कि ‘लघुकथा-शास्त्र’ भी तैयार करने में सुविधा हो जाएगी। इस कार्य से चुटकुलेबाज़ तथा ‘मिथकों का दुरुपयोग’ करनेवाले अलघुकथा-लेखक स्वतः ही तलछट की भाँति छँटकर अलग हो जाएँगे और फिर  अधिकतर साफ- सुथरी लघुकथाएँ ही सामने आ पाएँगी ।

बटरोही ने बहुत ठीक कहा है –‘दूसरी ओर ऐसे जल्दबाज कथाकार भी हैं जो अनुभूति के स्तर पर ही खुद को व्यक्त कर देते हैं। वे रचनात्मक दायित्व से जुड़ी कष्ट समानता के बीच से गुजरना ही नहीं चाहते। परिणामस्वरूप अपनी निजी खुशी, निजी यातना को तात्कालिक स्तर पर ही व्यक्त करके दुःखी रहते हैं कि इतना अधिक लिखने पर भी उन्हें कोई नहीं पूछता। …. कहने का तात्पर्य यह है कि लिखने में गम्भीरता होनी चाहिए और लघुकथा के वैयक्तिक रचना होने का अहसास नहीं होना चाहिए । लेखक सार्वजनीन होना चाहिए भले ही लेखक स्वयं पात्रा के रूप में उपस्थित क्यों न हो ।

मुक्तिबोध के अनुसार-‘सही है कि मानव-ज्ञान स्थिति-सापेक्ष है। लेखक के अन्तःकरण में संचित संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन समीक्षकों-लेखकों का आत्मवृत्त जाने ! किन्तु यह तो हो ही सकता है कि समीक्षक अपने स्वयं के उद्योग से लेखक के अन्तर्बाह्य जीवन में ज्यादा दिलचस्पी ले । इसप्रकार की ज्ञान-प्राप्ति से निःसन्देह उसे लाभ होता है और उससे समीक्षा अधिक यथार्थोन्मुख और गहरी होती है।’

हम लोग परिवार और पारिवारिक जीवन को साहित्य के अध्ययन में विशेष महत्त्व ही नहीं देते । आदि के व्यक्ति का विकास बाह्य समाज में तो होता ही है, वह परिवार में भी होता है। परिवार व्यक्ति के अन्तःकरण में, संस्कार में तथा प्रवृत्ति-विकास में पर्याप्त योग देता है। लेखक को घर-परिवार या आस-पास की समस्याओं की ओर देखते हुए लेखन-कार्य करना चाहिए। कारण, अधिकतर ऐसी ही रचनाओं की कमी होती है।

अन्त में एक बात और कि लघुकथा की स्वायत्तता पर भी बात होनी चाहिए और अन्य कथा-रूपों से इसकी ‘अलग पहचान’ होनी चाहिए । पार्थक्य बिन्दु को मतैक्य से तय किया जाना चाहिए। जैसे उपन्यास और कहानी आकार में छोटे-बड़े होने के कारण ही एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार कहानी और लघुकथा भी आकार में छोटे-बड़े होने के कारण ही एक-दूसरे भिन्न नहीं हैं। एक लघुकथा आकार में कहानी से बड़ी हो सकती है और एक कहानी लघुकथा से छोटी हो सकती है। इनमें ‘अन्तर केवल कथानक का होता है।’ फिर  भी यह तो मानना ही होगा कि ‘आकारगत लघुता’ लघुकथा की एक विशेषता है।

लघुकथा-समीक्षकों को बिना किसी आग्रह एवं दुराग्रह के लघुकथा या उसकी पुस्तक को उसके रचना एवं प्रकाशन-काल को मान-जानकर ही उसका समीक्षाकर्म करना चाहिए । इससे भी पूर्व अन्य साहित्यरूपों और विशेष तौर पर कथा-साहित्य एवं उसकी समीक्षा का भी अध्ययन-मनन करना होगा। लघुकथा को विकसित करने के लिए जहाँ यह अनिवार्य है कि उसकी परिभाषा को सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्ष से प्रस्तुत करना चाहिए अर्थात् लघुकथा में क्या हो और क्या न हो-स्पष्ट करना चाहिए, वहीं यह भी जरूरी है कि लघुकथा को विकसित करने के लिए समीक्षक इसे कहानी की विकास-यात्रा वाले मार्ग से लेकर इसके सही स्थान पर पहुँचाएँ ,जिसकी यह सही हकदार है। इस कार्य में लघुकथा-लेखकों को समीक्षकों से मिलकर (परस्परवाद से दूर रहकर) ‘ईमानदारी’ से एक-दूसरे के कार्य में बिना दखलन्दाजी के सहयोग करना होगा।

इसके साथ-साथ मैं पुनः कहना चाहूँगा कि अच्छी लघुकथाएँ ही लिखी जाएँ और अच्छी लघुकथाएँ ही छापी जाएँ, भले ही पुरानी रचनाओं को ही बार-बार क्यों न छापना पडे़। अच्छी लघुकथाओं से हमें लघुकथा-जगत् को समृद्ध करना है, करना होगा और समीक्षक को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वतन्त्र रूप से काम करना होगा, तभी लघुकथा भी अन्य साहित्यरूपों की तरह से प्रतिष्ठा पा सकेगी।

एक बात और, हमें पत्रकारों द्वारा पूर्वाग्रह एवं राजनीति से वशीभूत होकर लिखी गई समीक्षाओं से घबराना नहीं चाहिए। पत्रकार जब समीक्षा लिखता है तो समीक्षाकर्म नहीं करता, वह पत्रकारिताकर्म (वर्तमान में जैसी पत्रकारिता चल रही है) हो सकता है। ऐसे असमीक्षकों को महत्त्व नहीं देना चाहिए । आपकी लघुकथाओं में दम होना चाहिए फिर  चाहे कोई भी, कुछ भी लिखता रहे, कोई अन्तर नहीं पड़ता । समय न्याय करता है और अच्छी रचनाओं से ही लेखक और स्वस्थ समीक्षाओं से ही समीक्षक, साहित्य एवं साहित्यरूप जीवित रहते हैं ।

-0-डॉ सतीशराज पुष्करणा,अध्यक्ष, अ.भा. प्रगतिशील लघुकथा मंच,‘लघुकथानगर’, महेन्द्रू,पटना-800 006

मो: 08298443663, 09431264674

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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    -सम्पादक द्वय

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