जनवरी-2018

देशहोशियार     Posted: December 1, 2016

मैं किराने की दुकान पर पहुँचा ही था कि तभी एक पढ़ी-लिखी,बेहद तेज तर्राट महिला ने जल्दी से दुकान में प्रवेश करते हुए सीधे-सादे, भौंदू से दिखने वाले दुकानदार की ओर एक किलो चायपत्ती का लगभग खाली हो चुका पैकिट बढ़ाते हुए गुस्से में कहा-‘ देखिए यह कैसा चायपत्ती का पुराना पैकिट दिया है, इसकी चायपत्ती में तो फफूँद लगी हुई है ?’
दुकानदार ने चाय का पैकिट लेकर उसे काउंटर के एक कोने में रखते हुए कहा -‘ बहिन जी, इसी कंपनी का एक किलो चायपत्ती का नया पैकिट दे दूँ या रुपये वापिस कर दूँ । ’
महिला ने अपनी योजना को सफल होते देख खुश होते हुए कहा-‘ भाई साहब, आप तो अच्छी क्वालिटी का एक किलो चायपत्ती का नया पैकिट ही दे दीजिए । ’
दुकानदार ने एक किलो चाय का पैकिट और बीस रुपये वापिस करते हुए महिला से कहा – ‘बहिन जी आप तो इसे ले जाइये । यह बिलकुल नई कंपनी की बढिया ,खुशबूदार चायपत्ती है । इसका स्वाद तो पूछिए ही मत, लाजवाब है और यह बीस रुपये सस्ती भी है ।’
महिला ने मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा और चाय के पैकिट सहित बीस रुपये लेकर तत्काल दुकान से चली गई । मैने महिला द्वारा वापिस किया हुआ पैकिट उठाकर दुकानदार को दिखाते हुए कहा-‘देखो इसमें मुश्किल से दो-तीन चम्मच ही चायपत्ती बची है । इसमें कहीं भी फफूँद नही है बल्कि फफूँद दिखलाने के लिये इसमें आटा जैसा कुछ मिलाया गया है । लगता है वह महिला आपको बेवकूफ बना गई है ?
दुकानदार – ‘आप सही कह रहे है ?
क्या ? आप जानते है कि वह आपको बेवकूफ बना गई है ? मैने अचरज से पूछा ।
‘जी हाँ, मैने खाली पैकिट देख लिया था और मुझे मालूम था कि वह झूठ बोल रही है । वह मेरी नियमित ग्राहक है; इसलिए मैं उसे खोना नहीं चाहता था और हमेशा की तरह यदि यह मेरी दुकान में आती भर रही तो, मैं इस महिला से कुछ ही वक्त में एक किलो चायपत्ती की कीमत ही नही, न जाने कितने किलो चायपत्ती की कीमत वसूल कर लूँगा ।

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गतिविधियाँ

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    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
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