अप्रैल-2018

देशज़रूरत     Posted: December 1, 2017

शूटिंग की तैयारी थी। सेट लग चुका था। बस निर्देशक महोदय के आने की प्रतीक्षा थी। उनके आते ही सब सचेत हो उठे।सीमा सिंह-कानपुर“सब रेडी है?” आते ही अपने असिस्टेंट से पूछा।

“जी सर!” उसने मुस्तैदी से उत्तर दिया।

“एक बार सीन ब्रीफ करो।”

“जी, सीन है, माँ-बाप का लाड़ला बेटा रूठ गया है, तो माता पिता तरह-तरह की खाने पीने की चीज़े लाकर उसको मना रहे हैं और बच्चा गुस्से में फेंक रहा है।”

“और वो बाल कलाकार? उसका क्या हुआ? अस्पताल से छुट्टी मिल गई?”

“नहीं  सर, पर दूसरे बच्चे का इंतजाम कर लिया है! यहीं पास की बस्ती से अरेंज किया है। सिर्फ दो सीन हैं बच्चे के, दो सौ रुपए रोज़ पर बुलाया है।”

“काम कर सकेगा?”

“जी सर, मैंने सब समझ दिया है।’

“ओके, चलो फिर, लाइट, कैमरा… एक्शन!”

“कट, कट, कट!”

“हाथ से रखना नहीं है, उठाकर फेंकना हैं,” असिस्टेंट ने झुँझलाहट काबू करते हुए कहा, “पहले केक और पेस्ट्री हाथ मारकर दूर गिराओ, फिर दूध का गिलास गिरा दो। ठीक?”

“चलो, फिर से,” डायरेक्टर ने खीजकर कहा- “एक्शन!”

“ओहो! कट! कट! कट! अबे, तुझको समझाया था ना? फेंक दे, नीचे गिरा दे! ये इतना सँभालकर क्यों रख रहा है?”

बच्चे ने सुबकते हुए कहा, “उन अंकल ने कहा था शूटिंग के बाद खाने का सारा सामान मैं घर ले जा सकता हूँ।”

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गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
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