अगस्त-2017

मेरी पसन्दज़ेहन में घूमती लघुकथाएँ     Posted: January 2, 2017

मेरे लि‍ए लघुकथाएँ ऐसी हैं, जो मैं कि‍सी भी पत्रि‍का या अखबार में सबसे पहले पढ़ना पसंद करती हूं। छोटे आकार की होने के कारण तुरंत पढ़ने का मोह त्‍यागना मुश्‍कि‍ल लगता है। पर अक्‍सर %e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf-%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-2अनुभव कि‍या है मैंने कि‍ कई बार इन कथाओं का असर इतना जोरदार होता है कि‍ वह सारा दि‍न और कई बार महीनों तक जेहन में घूमती रहती है। मेरे हि‍साब से एक मुहावरा बहुत सटीक बैठता है लघुकथाओं पर – ‘देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर’। पत्रिकाओं  और नेट पत्रिकाओं में लघुकथाएँ प्राय पढ़ती रहती हैं। अखबारों में आज भी कुछ सम्पादक ऐसे हैं , जो खाली स्थान के आकार के अनुरूप लघुकथाओं का चयन करते हैं।

लघुकथा लि‍खना आसान नहीं। लघुकथा का लघु कलेवर लेखक को बाध्‍य करता है कि‍ वो जो कहे, सटीक व सीमि‍त शब्‍दों में कहे तभी प्रभाव उत्‍पन्‍न्‍ा होगा। और ऐसा कहे कि‍ पाठकवर्ग को आसानी से समझ आए। आखि‍र लेखन का परोक्ष उदेश्‍य यही है कि‍ हम जो कहना चाहते हैं या जो संदेश देना चाहते हैं, उसे समझे, पढ़कर आत्‍मसात करे पाठक। यही लेखन की सफलता है। लघुकथा में कथ्‍य और शि‍ल्‍प के साथ-साथ इस बात का ध्‍यान रखना बेहद जरूरी है कि‍ लेखन में कहीं से कृत्रि‍मता नहीं हो। अर्थात लघुकथा यर्थाथ के बेहद करीब होनी चाहि‍ए। इसमें उड़ान भरने की गुंजाइश नहीं है।

लघुकथा का चलन बहुत पहले से है। भले ही उस वक्‍त इसे कि‍सी वि‍धा या श्रेणी का नाम नहीं दि‍या गया हो। चि‍त्रा मुद्गल लि‍खती हैं -‘लघुकथा जब भी जन्‍मी, कौंध सी जन्‍मीं।  कौंध के साथ ही उसका चुनाव-रचाव स्‍वयं रचा। मैंने उसे दर्ज कर लि‍या।’ वस्‍तुत: गागर में सागर भरने की वि‍धा है लघुकथा। यह कौंध की तरह हमारे मन पर छाती है। हम कुछ देर को खो जाते हैं कथा के प्रभाव में।

आज मैं अपनी पसंद की दो ऐसी लघुकथाओं को आपके सामने रखने जा रही हूं, जि‍से मैंने बहुत पहले पढ़ा था, और बहुत दि‍नों तक मेरे दि‍माग में रह गई । पहली कथा है रामेश्‍वर काम्‍बोज ‘हि‍मांशु’ जी की ‘ऊँचाई’

एक नजर में यह कथा सामान्‍य कहानी की तरह लगती है कि‍ बेटे के पास उसका पि‍ता आता है गाँव से। जब बि‍ना इत्‍ति‍ला दि‍ए अचानक आने पर पत्‍नी को लगता है कि‍ वह अपनी जरूरत के कारण आए होंगे। बेटे के पास खुद पैसे की कमी है।ऐसे में उसे बड़ा मुश्‍कि‍ल लगता है कि‍ यदि‍ पि‍ता ने कुछ पैसे माँग लिये ,तो वह माँग कैसे पूरी करेगा। वह असमंजस में है और उसकी पत्‍नी अलग कि‍चकि‍च कर रही ; क्‍योंकि‍ उसे आशंका है कि‍ इस बार भी जरूरतों में कटौती की जाएगी। उसकी दवा और बच्‍चों के जूते आने में मुश्‍कि‍ल होगी।

एक सामान्‍य मध्‍यमवर्ग की कहानी है, जि‍से घर-घर की कहानी कहना उचि‍त होगा। आज इंसान की अपनी जरूरतें इतनी बढ़ गई हैं कि‍ अपने परि‍जनों को खुद से काटने लगा है। बोझ लगता है कि‍सी का गाँव से आना।मगर कहानी में सुखद और आश्‍चर्यजनक मोड़ आता है। वह पि‍ता, जि‍सके आने से वातावरण में चुप्‍पी फैल गई थी। बजट गड़बड़ाने के डर से एक बेटा भी पि‍ता के आने से खुश नहीं हो पा रहा था। उसका पि‍ता उससे कहता है कि‍ वह तो इसलि‍ए आया है कि‍ तीन महीने से उसकी कोई  खबर नहीं। वह अपने बेटे की आदतों को जानता है कि‍ ऐसा वह तभी करता है जब बहुत परेशान होता है। वह शाम को ही लौट जाएगा। पि‍ता पैसे माँगने नहीं बल्कि बेटे के प्‍यार के कारण आता है और  जाते हुए उसे वैसे ही हाथ में रुपये थमाता है; जैसा बचपन में थमाया करता था।

यह कहानी का ऐसा मोड़ है ,जो जेहन को उद्वेलि‍त करता है। हर पि‍ता याचक नहीं होता , न ही बेटे पर बोझ । पि‍ता या माता बच्‍चे को हमेशा ही प्‍यार करते हैं। उनकी जरूरतों का ध्‍यान रखते हैं और उसकी आदतों से इतने परि‍चि‍त होते हैं कि‍ उन्‍हें दूर रहकर भी पता होता है कि‍ उनका बच्‍चा कि‍स हालत में हैं। वो हरदम सहायता के लि‍ए दि‍ल और हाथ खुले रखते हैं। मगर आज की संतान इन बात को नहीं समझती। उसे माँ-बाप बोझ की तरह लगते हैं। ऐसे में यह कहानी बहुत सुखद अहसास दे जाती है। बेटे की आँखें शर्म से झुकी हैं और पि‍ता उस ऊँचाई पर वैसे ही  वि‍राजमान है, जैसा  बचपन से आज तक वो देखता आया है। अपनी छोटी सोच के कारण बेहद बौना महसूस करता है बेटा खुद को। सच में मन को छू जाती है कहानी और सीख भी दे जाती है।

दूसरी कहानी है सुधा अरोड़ा की ‘बड़ी हत्‍या, छोटी हत्‍या । एकदम से मन को झकझोरती है यह कथा। आज सब जानते हैं समाज का सच। लड़कि‍यों को कोख में और जन्‍मते ही मारने का जो सि‍लसि‍ला समाज में चल रहा है, जाने वो कभी खत्‍म होगा की नहीं। लेखि‍का ने जब ये लि‍खा तो कि‍तना दर्द हुआ होगा, इसे मैंने पढ़ते हुए महसूस कि‍या। अब तक दहेज का दानव लड़कि‍यों को नि‍गल रहा था अब एक नया डर सामने आ रहा है कि‍ कहीं ऐसा न हो कि‍ लड़कि‍यों के साथ दुष्‍कर्म की इतनी घटनाएँ देख लोग इस डर से लड़की पैदा नहीं करना चाहेंगे कि‍ उनकी सुरक्षा कैसे करेंगे।

कहानी के सारे पात्र स्‍त्री हैं। बहू ने बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्‍मते ही दाई से कहती है सास कि‍ बच्‍ची को मार डाल। दाई कहती है कि‍ उसने सुबह से दो छोरी की हत्‍या कर दी है। एक और हत्‍या करेगी, तो ईश्‍वर उसे पाप देगा।

सास समझाती है उसे- बीस बरस के बाद इसके ससुराल वाले दहेज के कारण मार डालेंगे। इससे अच्‍छा है ,अभी मार दो। इतना पाल पोसकर बड़ा करो और उसे ससुराल में मि‍ट्टी तेल छि‍ड़ककर जला दि‍या जाएगा। उस वक्‍त का गुनाह बड़ा होगा, सो अभी छोटा गुनाह ही कर लो। सास के समझाने का असर होता है और बच्‍ची मार दी जाती है। बच्‍ची की माँ को बताया जाता है कि‍ मरी लड़की पैदा हुई थी। वह लम्बी साँस खींचकर चुप रह जाती है : क्‍योंकि‍ उस औरत को पता होता है कि‍ लड़की पैदा हुई होगी , तो उसकी गोद में जिंदा नहीं ही मि‍लेगी।

जब दाई को पैसे कम लग , और माँगे, तो सास का जवाब होता है -सिरजनहार णे पूछ । छोरे गढ़ाई का साँचा कहीं रख के भूल गया क्या?

यहाँ  एक औरत  दूसरी  औरत को कह रही है कि‍ चूँकि‍ लड़की है, तो मार दे, इसके पैसे भी कम मि‍लेंगे। अगर लड़का होता तो खूब पैसे कमाती वो। एक नन्‍ही जान की कोई कीमत नहीं :क्‍योंकि‍ वह लड़की है। बच्‍ची की हत्‍या करवाकर आराम से पान की गिलौरी गाल के एक कोने दबा लेने का जि‍क्र  मन में वि‍द्रोह पैदा करता है। अगर एक स्‍त्री ही स्‍त्री की हत्‍या करवाएगी तो यह संसार कैसे चलेगा।
बहुत असरदार है यह लघुकथा । मन में एक साथ कई सवाल और कचोट छोड़ जाती है यह कहानी कि‍ क्‍या लड़कि‍याँ मरने के लि‍ए ही पैदा होती है। हत्‍या छोटी हो या बड़ी, बचपन में हो या युवा होने पर, मारी तो लड़कि‍याँ ही जाती हैं। आखि‍र कब तक।

1-ऊँचाई

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी, “लगता है बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है, वर्ना यहाँ कौन आने वाला था। अपने पेट का गड्‌ढा भरता नहीं, घर वालों का कुआँ कहाँ से भरोगे?”

मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा। पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफर की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता मुँह बा चुका है। वह स्कूल जाने के वक्त रोज़ भुनभुनाता है। पत्नी के इलाज़ के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबू जी को भी अभी आना था।

घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी। खान खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया। मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आए होंगे। पिताजी कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए। एकदम बेफिक्र, “सुनो” -कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं साँस रोककर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।
वे बोले, “खेती के काम में घड़ी भर की फ़ुर्सत नहीं मिलती है। इस बखत काम का जोर है। रात की गाड़ी से ही वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली। जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।”

उन्होंने जेब से सौ-सौ के दस नोट निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिए- “रख लो। तुम्हारे काम आ जाएँगे। इस बार धान की फ़सल अच्छी हो गई है। घर में कोई दिक्कत नहीं है। तुम बहुत कमज़ोर लग रहे हो। ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फँसकर रह गए हों। मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डाँटा- “ले लो। बहुत बड़े हो गए हो क्या?”

“नहीं तो” – मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर इकन्नी टिका दिया करते थे, परन्तु तब मेरी नज़रें आज की तरह झुकी नहीं होती थीं।

2-बड़ी हत्या , छोटी हत्या
सुधा अरोड़ा

माँ की कोख से बाहर आते ही , जैसे ही नवजात बच्चे के रोने की आवाज आई , सास ने दाई का मुँह देखा और एक ओर को सिर हिलाया जैसे पूछती हो – क्या हुआ? खबर अच्छी या बुरी ।
दाई ने सिर झुका लिया – छोरी ।
अब दाई ने सिर को हल्का सा झटका दे आँख के इशारे से पूछा – काय करुं?
सास ने चिलम सरकाई और बंधी मुट्टी के अँगूठे को नीचे झटके से फेंककर मुट्ठी खोलकर हथेली से बुहारने का इशारा कर दिया – दाब दे !
दाई फिर भी खड़ी रही । हिली नहीं ।
सास ने दबी लेकिन तीखी आवाज में कहा – सुण्यो कोनी? ज्जा इब ।
दाई ने मायूसी दिखाई – भोर से दो को साफ कर आई । ये तीज्जी है , पाप लागसी ।
सास की आँख में अँगारे कौंधे – जैसा बोला, कर । बीस बरस पाल पोस के आधा घर बाँधके देवेंगे, फिर भी सासरे दाण दहेज में सौ नुक्स निकालेंगे और आधा टिन मिट्टी का तेल डाल के फूँक आएँगे । उस मोठे जंजाल से यो छोटो गुनाह भलो।
दाई बेमन से भीतर चल दी । कुछ पलों के बाद बच्चे के रोने का स्वर बन्द हो गया ।
बाहर निकल कर दाई जाते जाते बोली – बीनणी णे बोल आई – मरी छोरी जणमी ! बीनणी ने सुण्यो तो गहरी मोठी थकी साँस ले के चद्दर ताण ली ।
सास के हाथ से दाई ने नोट लेकर मुट्ठी में दाबे और टेंट में खोंसते नोटों का हल्का वजन मापते बोली – बस्स?
सास ने माथे की त्यौरियाँ सीधी कर कहा।– तेरे भाग में आधे दिन में तीन छोरियों को तारने का जोग लिख्यो था, तो इसमें मेरा क्या दोष?
सास ने उँगली आसमान की ओर उठाकर कहा।– सिरजनहार णे पूछ । छोरे गढ़ाई का साँचा कहीं रख के भूल गया क्या?
…… और पानदान खोलकर मुँह में पान की गिलौरी गाल के एक कोने में दबा ली ।

 

 

 

गतिविधियाँ

  • चर्चा में

    हरियाणा साहित्य-संगम में लघुकथा पर विचार -विमर्श( सुकेश साहनी और राम कुमार आत्रेय की भागीदारी ।)
    लघुकथा अनवरत-2017 का विश्व पुस्तक मेले में अयन प्रकाशन के स्टाल पर विमोचन।

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)

    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´
    rdkamboj@gmail.com

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    -सम्पादक द्वय

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